January 1, 2026 | aspundir | Leave a comment श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -011 ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ ग्यारहवाँ अध्याय श्वेतलोहितकल्प में शिवस्वरूप भगवान् सद्योजात का प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमा श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकादशोऽध्यायः सद्योजातमाहात्म्यं ऋषिगण बोले — [ हे सूतजी !] ब्रह्माजी ने सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर तथा ईशानसंज्ञक सनातन पुरुषोत्तम महेश्वर शिव को किस प्रकार देखा ? आप हमें यथावत् रूप से यह बताने की कृपा कीजिये ॥ ११/२ ॥ सूतजी बोले — उनतीसवाँ कल्प श्वेतलोहित नाम से जाना जाता है। उस कल्प में जब ब्रह्माजी समाधिस्थ होकर परमेश्वर का ध्यान कर रहे थे, उसी समय शिखाधारी श्वेतलोहित वर्णवाला एक कुमार प्रकट हुआ ॥ २-३ ॥ उन सद्योजात कुमार को देखकर सर्वतोमुख श्रीमान् ब्रह्माजी उन्हीं ब्रह्मरूपी महात्मा परमेश्वर को हृदय में धारण करके ध्यानयोग में तत्पर हो गये । पुनः ध्यान- योग से उन्हें साक्षात् परमेश्वर जानकर प्रणाम किया । ब्रह्माजी ने उन सद्योजात कुमार को परात्पर ब्रह्म कल्पित कर लिया ॥ ४-५१/२ ॥ तत्पश्चात् उन सद्योजात ब्रह्म के समीप ही सुनन्द, नन्दन, विश्वनन्द तथा उपनन्दन नामक श्वेतवर्णवाले चार महायशस्वी शिष्य प्रकट हुए। वे महात्मा शिष्य उन सद्योजात ब्रह्म की सेवामें सर्वदा तत्पर रहते थे ॥ ६-७ ॥ उनके आगे श्वेत वर्ण की आभा वाले श्वेत नामक एक महातेजस्वी मुनि उत्पन्न हुए। उन सद्योजात से उत्पन्न होनेके कारण उस मुनि का नाम हर भी है ॥ ८ ॥ वहाँ पर वे सभी मुनि परम भक्ति से शाश्वत ब्रह्मरूप उन सद्योजात महेश्वर की स्तुति करते हुए उनके शरणागत हुए ॥ ९ ॥ अतएव हे द्विजो ! जो प्राणी प्राणायामपरायण होकर ब्रह्मतत्परचित्त से उन विश्वेश्वरदेव के शरणागत होते हैं; वे सभी पापों से मुक्त, विमल आत्मा वाले तथा ब्रह्मज्ञानी हो जाते हैं और अन्त में विष्णुलोक को भी पार करके रुद्रलोक को जाते हैं ॥ १०-११ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘सद्योजातमाहात्म्य’ नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe