श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -041
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
इकतालीसवाँ अध्याय
विभिन्न कल्पों में त्रिदेवों का परस्पर प्राकट्य तथा ब्रह्मा द्वारा महेश्वर की नामाष्टक स्तुति का वर्णन
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकचत्वारिंशोऽध्यायः
इन्द्रवाक्यं

इन्द्र बोले —  तत्पश्चात् एक हजार चतुर्युगी के व्यतीत हो जाने पर प्रभात वेला में भगवान् ब्रह्मा ने नष्ट हुई प्रजाओं का पुनः पूर्ववत् सृजन किया । हे विप्रेन्द्र ! इस प्रकार ब्रह्मा परार्ध का दूना समय बीत जाने पर पृथ्वी जल में, जल अग्नि में, अग्नि वायु में और वायु आकाश में अपनी-अपनी तन्मात्रासहित व्याप्त हो गये। हे द्विजश्रेष्ठ ! दसों इन्द्रियाँ, मन तथा तन्मात्राएँ अहंकार को प्राप्तकर तत्क्षण उसी में विलीन हो गयीं । अहंकार उस महत् को व्याप्त करके एवं महत् भी अव्यक्त को व्याप्त करके उसी क्षण उनमें विलीन हो गया । हे द्विज ! अव्यक्त भी अपने गुणों के साथ महेश्वर में समाहित हो गया। इसके अनन्तर उन्हीं परम पुरुष शिव से पूर्व की भाँति सृष्टि होने लगी ॥ १-५१/२

एतदनन्तर पद्मयोनि ब्रह्माजी ने अपने मन से मानस पुत्रों का सृजन किया। इस लोक में जब प्रजाओं की वृद्धि न हो सकी, तब प्रजा-वृद्धि के लिये स्वयं भगवान् ब्रह्मा अपने मानस पुत्रों के साथ महेश्वर के निमित्त कठोर तप करने लगे। तब उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर वे महेश्वर शिव उनकी कामना समझकर उन पुरुषरूप ब्रह्मा के ललाट के मध्य-भाग का भेदन करके ‘मैं आपका पुत्र हूँ’ – ऐसा कहकर स्त्री-पुरुषरूप में प्रकट हो गये । उनके पुत्र महादेव अर्धनारीश्वर के रूप में प्रतिष्ठित हुए। तब उन्होंने जगद्गुरु ब्रह्मा सहित सब कुछ दग्ध कर दिया ॥ ६-१० ॥

इसके बाद शिवजी ने समग्र जगत् की वृद्धि के लिये योगमार्ग के द्वारा कल्याणमयी अर्धमात्रास्वरूपिणी अपनी अर्धांगिनी परमेश्वरी के साथ संसर्ग किया। विश्वेश्वर विश्वात्मा परमेश्वर शिव ने उन परमेश्वरी से विष्णु, ब्रह्मा और पाशुपत अस्त्र का सृजन किया। इसीलिये ब्रह्मा तथा विष्णु को महादेवी के अंश से उत्पन्न कहा गया है और उन ब्रह्मा को अण्डज, पद्मज और भवांगभव भी कहा जाता है। मैंने आपसे यह सम्पूर्ण पुरातन इतिहास कह दिया। जब तक ब्रह्मा का परार्ध रहता है, तब तक के उनके ऐश्वर्य तथा तमोगुण से प्रादुर्भूत उनके वैराग्य के विषय में मैं संक्षेप में कहूँगा ॥ ११–१४१/२

भगवान् नारायण ने भी अपने शरीर को दो भागों में विभक्त करके अपने उसी अंग से सम्पूर्ण चराचर की सृष्टि की। तब उन्होंने ब्रह्मा का सृजन किया और पितामह ब्रह्मा ने रुद्र का सृजन किया । हे मुने! दूसरे कल्प में रुद्र ने विष्णु, ब्रह्मा और ईश्वर (शिव) – को उत्पन्न किया। हे मुने! तदनन्तर दूसरे कल्प में हरि (विष्णु) – ने ब्रह्मा का सृजन किया । पुनः [दूसरे कल्प में] ब्रह्मा ने नारायण को और फिर भव (रुद्र) – ने ब्रह्मा की सृष्टि की। तत्पश्चात् अजन्मा भगवान् ब्रह्मा ‘यह संसार दुःखरूप है ‘ – ऐसा सोचकर सृष्टिकार्य छोड़ करके अपने को आत्मतत्त्व में अवस्थितकर प्राण-संचार को निरुद्ध करके पाषाण की भाँति अचल होकर दस हजार वर्षों तक समाधि में स्थित रहे ॥ १५-१९१/२

तब उनके हृदय में जो नीचे की ओर मुख वाला सुन्दर कमल विराजमान था, वह पूरक प्राणायाम द्वारा वायुपूरित होकर विकसित हो उठा और पुनः कुम्भक प्राणायाम द्वारा वायु निरुद्ध होकर ऊर्ध्वमुख वाला हो गया। तब उन्होंने परमेश्वर को उसी कमल की कर्णिका के मध्य में स्थापित कर दिया। तदनन्तर आत्मनियन्त्रण करने वाले, संयम के द्वारा विशुद्ध आत्मा वाले तथा पूजन के योग्य ब्रह्मा ने ओंकार शब्द से सम्बन्ध रखने वाली अर्धमात्रा से परे जो नाद है, उससे भी परे ब्रह्मसंज्ञक नादस्वरूप, मृणालतन्तु के शतभाग के एक भाग में अवस्थित परम सूक्ष्म पीतवर्ण अग्निशिखा-सदृश, यम-नियम आदि योगांग पुष्पों के द्वारा पूजनीय तथा अविनाशी ईश्वर को अपने हृदय में ध्यानावस्थित करके उनकी पूजा की ॥ २०-२३१/२

तब हृदयकमल में विराजमान रहने वाले उन ब्रह्मा के अंश से जायमान सर्वव्यापी रुद्र उनके ललाट का भेदन करके पितामह से उत्पन्न हुए । शिव के हृदय से प्रादुर्भूत पुरुष रुद्र स्वभावतः स्वयं नील होते हुए भी अग्नि के संयोग के कारण लोहित (रक्त) वर्ण के हो गये। चूँकि वे कालाकृति पुरुष रुद्र नील और लोहित वर्ण के हुए, अतः वे ब्रह्मदेव प्रभु रुद्र को ‘नीललोहित’ – ऐसा कहने लगे। कालरूप भगवान् रुद्र ब्रह्माजी से अत्यन्त प्रसन्न हुए । हे महामुने! तदनन्तर विश्वात्मा पितामह ब्रह्मा नामाष्टक स्तोत्र से प्रसन्नचित्त विश्वात्मा भगवान् रुद्र की स्तुति करने लगे ॥ २४–२८ ॥

पितामह बोले —  हे भगवन् ! हे रुद्र ! हे भास्कर ! अमित तेजस्वी आपको नमस्कार है; अम्बुमय तथा रस-स्वरूप आप भगवान् भव को नमस्कार है । गन्धमय पृथ्वीरूप शर्व को नित्य नमस्कार है; स्पर्शगुणयुक्त वायुरूप ईश को बार-बार नमस्कार है। अमित तेजस्वी अग्नि-रूप पशुपति को नमस्कार है । शब्दतन्मात्रा वाले व्योमरूप आप भीम को नमस्कार है । आप अमृतमय चन्द्रस्वरूप महादेव को नमस्कार है; आप कर्मयोगी यजमानरूप उग्र को नमस्कार है। जो मनुष्य समाहितचित्त होकर पितामह ब्रह्मा के द्वारा रुद्र के लिये कहे गये इस स्तोत्र का पाठ करता है या श्रवण करता है अथवा विप्रों को सुनाता है, वह एक वर्ष में ही अष्टमूर्ति भगवान् रुद्र का सायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ २९-३३१/२

इस प्रकार स्तुति करके जब पितामह ने महादेव की ओर देखा, तब वे सभी ओर आठ प्रकार से विभक्त होकर सुशोभित होने लगे। उसी समय से सूर्य, चन्द्र, अग्नि प्रकाश करने लगे और पृथ्वी, वायु, यजमानरूप पुरुष, जल तथा सर्वव्यापी गगन अपने-अपने गुणधर्म से समन्वित हुए। उसी समय से लोग उन ईश्वर को ‘अष्टमूर्ति’ इस नाम से कहने लगे ॥ ३४-३६ ॥ उन्हीं अष्टमूर्ति के अनुग्रह से ब्रह्माजी पुनः सृष्टि करने लगे। इस सम्पूर्ण जगत् का सृजन करके पुनः दूसरे कल्प में हजार युगपर्यन्त चराचर संसार के सुप्त रहने पर भगवान् ब्रह्मा ने प्रजाओं की सृष्टि करने के विचार से अत्यन्त उग्र तप आरम्भ कर दिया ॥ ३७-३८ ॥

इस प्रकार तप करते हुए उन ब्रह्मा को जब कोई  सफलता प्राप्त न हुई; तब दीर्घकाल तक तप करने से उत्पन्न दुःख के कारण उन्हें क्रोध आ गया। तब क्रोधाविष्ट उन ब्रह्मा के नेत्रों से अश्रुबिन्दु गिरने लगे । तदनन्तर उन अश्रुबिन्दुओं से भूत-प्रेत प्रादुर्भूत हो गये ॥ ३९-४० ॥ तब उन सभी भूत-प्रेत-निशाचरों को पहले उत्पन्न हुआ देखकर अजन्मा तथा परम ऐश्वर्यशाली भगवान् ब्रह्मा अपने को कोसने लगे। इससे उन भगवान् पितामह ने कोपाविष्ट होकर अपने प्राण त्याग दिये ॥ ४११/२

तत्पश्चात् उन प्रभु के मुख से कान्तिवाले उदयकालीन सूर्य के समान अर्धनारीश्वर के रूप में होकर प्राणमय रुद्र प्रकट हुए। तब वे अपने को ग्यारह स्वरूपों में 1  विभक्त करके व्यवस्थित हो गये। उन सर्वात्मा रुद्र ने अपने आधे अंश से कल्याणकारिणी उमा को आविर्भूत किया ॥ ४२-४३१/२

तत्पश्चात् उमा ने लक्ष्मी, दुर्गा तथा श्रेष्ठ सरस्वती का सृजन किया; पुन: उन्होंने वामा, रौद्री महामाया, कमल के समान नेत्रोंवाली वैष्णवी, कल – विकरिणी, काली, कमल-वासिनी, बलविकरिणी, देवी बलप्रमथिनी, सर्वभूतदमनी और मनोन्मनी का सृजन किया । इसी प्रकार उन्होंने अन्य बहुत-सी हजारों नारियों की सृष्टि की ॥ ४४–४६१/२

तब तीनों लोकों के स्वामी परमेश्वर महादेव समस्त रुद्रों तथा उन देवियों के साथ उन सर्वात्मा ब्रह्मा के समक्ष खड़े हो गये। तदनन्तर ब्रह्मपुत्र दयालु महेश्वर शिव ने उन मरे हुए परमेष्ठी भगवान् ब्रह्मा को पुनः प्राण प्रदान कर दिये । जब प्रभु शिव ने ब्रह्मा में आत्मस्थित प्राणों का संचार किया, तब उन्हें कुछ-कुछ चेतनायुक्त देखकर भगवान् रुद्र अत्यन्त प्रसन्न हुए । इसके बाद देवेश्वर शिव ने ब्रह्माजी से यह श्रेष्ठ वचन कहा — हे देव ! डरिये मत ! हे महाभाग ! हे विरिञ्च! हे जगद्गुरो ! मैंने आपमें प्राण स्थापित कर दिये हैं; अतः हे प्रभो ! अब उठिये ॥ ४७-५१ ॥

तब उनका स्वप्नभूत मनोगत वचन सुनकर पितामह प्रसन्नचित्त हो गये । तदनन्तर लब्धप्राण ब्रह्माजी ने अपने खिले हुए कमल के समान नेत्रों से महेश्वर को देखा। बहुत समय तक उन्हें देखते रहने के पश्चात् भगवान् ब्रह्मा ने उठ करके दोनों हाथ जोड़कर स्नेहयुक्त गम्भीर वाणी में उनसे कहा — हे महाभाग ! आप मेरे मन को आनन्दित कर रहे हैं; एकादश रूपों में प्रतिष्ठित अष्टमूर्ति आप कौन हैं ? ॥ ५२–५४१/२

इन्द्र बोले — उनका वचन सुनकर देवशत्रुओं का संहार करने वाले महेश्वर अपने सुखप्रद हाथों से ब्रह्माजी का स्पर्श करते हुए उनसे कहने लगे ॥ ५५१/२

श्रीशंकर बोले —  मुझे परमात्मा तथा इन्हें अजन्मा माया समझिये और सामने खड़े ये रुद्र आपकी रक्षा करने के लिये यहाँ आये हैं ॥ ५६१/२

तदनन्तर उन देवाधिदेव को प्रणाम करके ब्रह्मा ने हाथ जोड़कर हर्षपूर्ण गद्गद वाणी में कहा —  हे भगवन् ! हे देवदेवेश ! मैं दुःखों से अत्यन्त व्याकुल हूँ । हे ईशान ! हे शंकर ! मुझे इस संसार से मुक्त करने में आप समर्थ हैं ॥ ५७-५८१/२

तत्पश्चात् पितामह ब्रह्मा की इस बात पर हँसकर सर्व-व्यापी तथा जगत् के स्वामी उमापति भगवान् शिव रुद्रों एवं उन भगवती उमा के साथ अन्तर्धान हो गये ॥ ५९१/२

इन्द्र बोले —  हे शिलाद ! अतः समस्त लोकों में अयोनिज तथा मृत्युरहित पुरुष सर्वथा दुर्लभ है। [यहाँतक कि] वे पद्मयोनि ब्रह्मा भी मृत्युयुक्त हैं – ऐसा जानिये। किंतु यदि देवेश्वर भगवान् रुद्र प्रसन्न हो जायँ, तो आपके लिये मृत्युरहित तथा अयोनिज पुत्र दुर्लभ नहीं है। मैं, विष्णु एवं महात्मा ब्रह्मा भी मृत्युहीन तथा अयोनिज पुत्र देने में असमर्थ हैं ॥ ६०-६२१/२

शैलादि बोले —  इस प्रकार विप्रेन्द्र से कहकर तथा उन पर अनुग्रह करके वे दयालु इन्द्र देवताओं के साथ श्वेतवर्ण वाले ऐरावत पर आरूढ़ होकर चले गये ॥ ६३-६४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘इन्द्रवाक्य’ नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥

1 भगवान् रुद्र के ग्यारह नामों का वर्णन विभिन्न पुराणों में आया है, किंतु नामों में अन्तर है, लिङ्गपुराण पूर्वभाग अ० ६३ में ११ रुद्रों के नाम इस प्रकार बताये गये हैं — अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, भैरव, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी तथा अपराजित ।

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