श्रीलिङ्गमहापुराण -[पूर्वभाग] -081
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
इक्यासीवाँ अध्याय
विविध मासों में किये जाने वाले पशुपाशविमोचक लिङ्गव्रत का विधान तथा उसका माहात्म्य
श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे एकाशीतितमोऽध्यायः
पशुपाशविमोचनलिङ्गपूजादिकथनं

ऋषिगण बोले — [हे सूतजी!] आपने पशुपाश से मुक्त करने वाले इस व्रत को बता दिया; पूर्वकाल में देवताओं ने लिङ्गसम्बन्धी पाशुपतव्रत का अनुष्ठान किया था, अतः आपने पहले [ इसके विषयमें] जैसा भी श्रवण किया था, उसे हम लोगों को बताइये ॥ ११/२

सूतजी बोले — [हे ऋषियो !] पूर्वकाल में सनत्कुमार ने [इस सम्बन्ध में] शिलादपुत्र नन्दी से आदरपूर्वक पूछा था; तब नन्दी ने उनसे जो बात कही थी, वही मैं भी आप लोगों को संक्षेप में बताता हूँ — देवताओं, दैत्यों, सिद्धों, गन्धर्वों, चारणों तथा महाभाग्यवान् मुनियों ने पशुपाश से मुक्त करने वाले इस अत्युत्तम द्वादश लिङ्ग नामक व्रत को किया था। यह भोग (सुख) प्रदान करने वाला, योग देने वाला, मनोरथ पूर्ण करने वाला, मुक्ति देने वाला, शिव से सदा अवियोग कराने वाला, पुण्य देने वाला, भक्तों के भय का नाश करने वाला, छ: अंगों सहित वेदों का मंथन करके उन [शिव ] -के द्वारा निर्मित, समस्त दानों में उत्तम, दस हजार अश्वमेध यज्ञों से अधिक पुण्य देने वाला, सभी मंगल प्रदान करने वाला, पवित्र, समस्त शत्रुओं का विनाश करने वाला, संसार सागर में डूबे हुए प्राणियों को मोक्ष देने वाला, सभी रोगों को नष्ट करने वाला तथा सभी ज्वरों का विनाश करने वाला है; इसे पूर्वकाल में ब्रह्मा, विष्णु तथा देवताओं ने किया था ॥ २-८ ॥

हे विप्रेन्द्रो ! एक विशाल लिङ्ग बनाकर इसे चन्दनमिश्रित जल से स्नान कराकर चैत्र महीने से प्रारम्भ करके इस शिवलिङ्गव्रत को करना चाहिये । केसर की कर्णिका से युक्त, नौ रत्नों से जटित तथा आठ दलों वाले एक सुन्दर सुवर्णमय कमल की रचना करके उसकी कर्णिका में विधि के अनुसार वेदीयुक्त स्फटिक के लिङ्ग की स्थापना करनी चाहिये। हे सुव्रतो ! उसमें भक्तिपूर्वक विधि के अनुसार बिल्वपत्रों से, हजार श्वेत- लाल-नीले कमलों से, श्वेतमदार के कर्णिकारों से, कनैल पुष्पों से, कुरबक पुष्पों से तथा अन्य उपलब्ध पुष्पों से रुद्रगायत्री मन्त्र “ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्”। द्वारा उस लिङ्ग का अर्चन करना चाहिये। हे उत्तम द्विजो ! गन्ध, धूप, दीप, नीराजन आदि मंगल उपचारों से लिङ्गमूर्ति महेश्वर का पूजन करके अघोर मन्त्र [^1]  से दक्षिण भाग में अगर देना चाहिये, सद्योजात मन्त्र [^2]  से पश्चिम भाग में दिव्य मनःशिला और वामदेव मन्त्र [^3]  से उत्तर भाग में चन्दन अर्पित करना चाहिये। हे श्रेष्ठ मुनियो ! तत्पुरुष मन्त्र [^4]  से पूर्व भाग में हरिताल प्रदान करना चाहिये। हे विप्रो ! श्वेत अगरु से तथा कृष्ण अगरु से उत्पन्न धूप, सुगन्धित तथा उत्तम गुग्गुलधूप और सितार नामक धूप भक्तिपूर्वक महेश्वर [^5] को अर्पित करना चाहिये । तत्पश्चात् महाचरु को नैवेद्य के रूप में अर्पित करना चाहिये अथवा आढ़क परिमाण में अन्न निवेदित करना चाहिये । [ हे विप्रो ! ] मैंने आप लोगों को यह पुण्यदायक शिवलिङ्ग महाव्रत बता दिया ॥ ९-१८ ॥

यह सभी महीनों में सामान्य शिवलिङ्गव्रत है; अब मैं विशेष का वर्णन करता हूँ । हे विप्रेन्द्रो ! वैशाख में वज्र (हीरा)-निर्मित लिङ्ग, ज्येष्ठ में मरकतनिर्मित लिङ्ग, आषाढ़ में मोती से निर्मित लिङ्ग, सावन में नीलमणि से निर्मित लिङ्ग, भाद्रपदमास में पद्मराग से निर्मित सुन्दर लिङ्ग, आश्विन (क्वार)- में गोमेद से निर्मित शुभ लिङ्ग, कार्तिक में प्रवाल (मूँगा ) – से निर्मित लिङ्ग, मार्गशीर्ष (अगहन) – में वैडूर्य से निर्मित लिङ्ग, पौष में पुष्पराग (पुखराज ) – से निर्मित लिङ्ग, माघ में सूर्यकान्तमणि से निर्मित लिङ्ग तथा फाल्गुन में स्फटिक से निर्मित लिङ्ग का यजन करना चाहिये ॥ १९–२२ ॥

सभी महीनों में सुवर्णमय एक कमल बनाने का विधान है। सुवर्ण के अभाव में चाँदी का कमल बनाना चाहिये। रत्नों के अभाव में सोने अथवा चाँदी से निर्माण करना चाहिये। चाँदी के भी अभाव में ताँबे अथवा लोहे से बनाना चाहिये। वेदी सहित पाषाण का अथवा काष्ठ का अथवा मिट्टी का सर्वगन्धमय लिङ्ग बनाये अथवा क्षणिक लिङ्ग की रचना करे ॥ २३–२५ ॥

हेमन्त ऋतु बिल्वपत्र से महादेव की पूजा करनी चाहिये। सभी महीनों में एक सुवर्णमय कमल बनाना चाहिये अथवा सुवर्ण की कर्णिकायुक्त चाँदी का उत्तम कमल बनाना चाहिये और चाँदी के अभाव में बिल्वपत्रों से ही [शिव का] पूजन करना चाहिये । हजार कमलों के अभाव में उसके आधे से ही पूजन करना चाहिये अथवा उसके भी आधे से अथवा कम-से-कम एक सौ आठ कमलों से रुद्र का पूजन करना चाहिये ॥ २६–२८ ॥

बिल्वपत्र में सर्वलक्षणयुक्त देवी लक्ष्मी, नीलोत्पल में साक्षात् अम्बिका और उत्पल में स्वयं षडानन विराजमान रहते हैं; सभी देवताओं के स्वामी महादेव शिव पद्म में निवास करते हैं, अतः बुद्धिमान् मनुष्य को पूरे प्रयत्न से बिल्वपत्र का [कभी भी ] त्याग नहीं करना चाहिये और नीलोत्पल, उत्पल तथा विशेषकर कमल का त्याग नहीं करना चाहिये। पद्म सभी को वश में करने वाला होता है और शिला (मनःशिला) सभी सिद्धियों को देने वाली होती है। कृष्ण अगरु से उत्पन्न धूप सभी पापों को हरने वाला, गुग्गुल आदि के दीपों का निवेदन सभी रोगों का क्षय करने वाला, चन्दन सभी सिद्धियों को देने वाला और सुगन्धित धूप सभी कामनाओं तथा अर्थों का साधक है। श्वेत अगरु तथा कृष्ण अगरु से बनाया हुआ धूप और सौम्य सीतारि [नामक] धूप साक्षात् निर्वाण-सिद्धि प्रदान करने वाला है ॥ २९-३४ ॥

श्वेत मदार के पुष्प में साक्षात् चतुर्मुख ब्रह्मा निवास करते हैं और कर्णिकार के पुष्प में साक्षात् [देवी] मेधा निवास करती हैं। करवीर के पुष्प में गणाध्यक्ष, पुष्प में स्वयं नारायण और सभी सुगन्धित पुष्पों में [ भगवती ] पार्वती विराजमान हैं। अतः यथोपलब्ध इन पुष्पों से तथा शुभ पुष्प, धूप, दीप आदि से भक्तिपूर्वक अपने वित्त-सामर्थ्य अनुसार देवदेवेश [ शिव ] -की पूजा करनी चाहिये ॥ ३५-३७ ॥ तदनन्तर भक्तिपूर्वक पायस तथा महाचरु निवेदित करे और घृतयुक्त, व्यंजनोंसहित तथा अन्य द्रव्ययुक्त शुद्ध अन्न अथवा मूँग का अन्न एक आढ़क (चार प्रस्थ) अथवा उसका आधा समर्पित करे । पुनः चामर और तालवृन्त (ताड़ का पंखा ) उन्हें भक्तिपूर्वक निवेदित करे । इसी प्रकार न्यायपूर्वक अर्जित किये गये अनेक प्रकार के पवित्र पूजायोग्य उपहारों को जल से प्रोक्षित करके भक्तियुक्त चित्त से [भगवान्] रुद्र को समर्पित करे ॥ ३८-४०१/२

जीतने की इच्छा वाले विष्णु ने सभी देवताओं की स्थिति के लिये क्षीरसागर से सारा अमृत खींचकर साक्षात् अन्न के भीतर स्थापित कर दिया। प्राणियों को अन्नदान करने से शिवजी के प्रति अनुराग हो जाता है, अतः अन्न से शिव की पूजा करनी चाहिये। अन्न में प्राण प्रतिष्ठित रहते हैं । उपहार में तुष्टि विद्यमान रहती है। पंखे में स्वयं वायुदेव वास करते हैं । महादेव सभी वस्तुओं में विराजमान रहते हैं । जलदेवता (वरुण) सुगन्धित जल में विद्यमान हैं। पीठ ( वेदी) – में महत् आदि के साथ साक्षात् [ देवी] प्रकृति विराजमान हैं। अतः प्रत्येक महीने विधि के अनुसार भक्तिपूर्वक शिव की पूजा करनी चाहिये । समस्त कार्यों की सिद्धि के लिये पूर्णिमा को व्रत [अवश्य ] करना चाहिये । [ व्रत में] सत्य, शुद्धता, दया, शान्ति, सन्तोष तथा दानशीलता का पालन करना चाहिये । पूर्णिमा तथा अमावस्या के दिन उपवास करना चाहिये ॥ ४१-४६ ॥

वर्ष के अन्त में गोदान तथा विशेषरूप से वृषोत्सर्ग करना चाहिये। वेद के पारगामी श्रोत्रिय ब्राह्मणों को भक्तिपूर्वक भोजन कराना चाहिये। पूजा किये गये उस शिवलिङ्ग को सभी सामग्रियों सहित शिवक्षेत्र में स्थापित कर देना चाहिये। अथवा ब्राह्मण को समर्पित कर देना चाहिये ॥ ४७-४८ ॥ हे श्रेष्ठ मुनियो ! जो इस प्रकार सभी मासों में शिवलिङ्ग महाव्रत को करता है, वही तप करने वालों में श्रेष्ठ है और वह करोड़ों सूर्यों के समान देदीप्यमान तथा रत्नों से सुशोभित विमानों से शिवलोक पहुँचकर [वहाँ से] कभी भी इस लोक में वापस नहीं आता है; अथवा जो एक महीने भी इसी प्रकार [इस] उत्तम व्रत को करता है, वह शिवलोक प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । अथवा [सांसारिक भोगों में] आसक्तचित्त वाला व्यक्ति एक वर्ष तक यदि इस प्रकार करे, तो वह जिन-जिन कामनाओं को [मन में] संचित किये रहता है, उन उनको प्राप्त करके शिवलोक जाता है। आसक्त मनुष्य भी [ इसे करके ] देवत्व, पितृत्व, इन्द्रत्व तथा गणाधिपतित्व प्राप्त कर लेता है ॥ ४९–५३ ॥

विद्या चाहने वाला विद्या प्राप्त करता है, भोग चाहने वाला भोग प्राप्त करता है, धन चाहने वाला धन प्राप्त करता है और आयु की कामना करने वाला दीर्घ आयु प्राप्त करता है। जिन-जिन कामनाओं का मनुष्य चिन्तन करता है, उन उनको एक मास के ही व्रत से प्राप्त करके इस लोक में आनन्दित रहता है और अन्त में वह रुद्रत्व प्राप्त करता है ॥ ५४-५५ ॥ विश्व का सृजन करने वाले शिव ने देवताओं, असुरों, सिद्धों, मनुष्यों तथा विद्याधरों के हित के लिये इस परम पवित्र, परम रहस्यमय एवं उत्तम व्रत की सृष्टि की है ॥ ५६ ॥ इस प्रकार विधिपूर्वक ईश्वर की पूजा करके सेवकों तथा पुत्रों के साथ सिर झुकाकर प्रणाम करके प्रयत्नपूर्वक शिव की प्रदक्षिणा करके व्यपोहन नामक स्तव का जप करना चाहिये ॥ ५७ ॥ पूर्व काल में विश्व की रचना करने वाले महानुभाव देव पितामह (ब्रह्मा)-ने देवताओं के साथ तीनों लोकों के हित के लिये इस महामूल्यवान् स्तव को बनाया था ॥ ५८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के अन्तर्गत पूर्वभाग में ‘पशुपाशविमोचनलिङ्गपूजादिकथन’ नामक इक्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८१ ॥

ये सद्योजातादि पाँच मन्त्र इस प्रकार हैं —
[^1]: ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥
[^2]: ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः । भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥
[^3]: ॐ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बल-प्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥
[^4]: ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥
[^5]: ॐ ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणो ब्रह्मा शिवो मेऽस्तु सदा शिवोम् ॥

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