अग्निपुराण – अध्याय 349 अग्निपुराण – अध्याय 349 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ उनचासवाँ अध्याय व्याकरण-सार व्याकरणम् स्कन्द बोले — कात्यायन। अब मैं बोध के लिये तथा बालकों को व्याकरण का ज्ञान कराने के लिये सिद्ध शब्द रूप सारभूत व्याकरण का वर्णन करता हूँ; सुनो। पहले प्रत्याहार आदि संज्ञाएँ बतलायी जाती… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 348 अग्निपुराण – अध्याय 348 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ अड़तालीसवाँ अध्याय एकाक्षर कोष एकाक्षराभिधानम् अग्निदेव कहते हैं — अब मैं तुम्हें ‘एकाक्षराभिधान’ तथा मातृकाओं के नाम एवं मन्त्र बतलाता हूँ। सुनो ‘अ’ नाम है भगवान् विष्णु का। ‘अ’ निषेध अर्थ में भी आता है। ‘आ’ ब्रह्माजी का… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 347 अग्निपुराण – अध्याय 347 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ सैंतालीसवाँ अध्याय काव्य दोष विवेक काव्य दोष विवेकः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ। ‘दृश्य’ और ‘श्रव्य’ काव्य में यदि ‘दोष’ [^1] हो तो वह सहृदय सभ्यों (दर्शकों और पाठकों) के लिये उद्वेगजनक होता है। वक्ता, वाचक एवं वाच्य… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 346 अग्निपुराण – अध्याय 346 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ छियालीसवाँ अध्याय काव्य गुण-विवेक काव्यगुणविवेकः अग्निदेव कहते हैं — द्विजश्रेष्ठ ! गुणहीन काव्य अलंकारयुक्त होने पर भी सहृदय के लिये प्रीतिकारक नहीं होता, जैसे नारी के यौवनजनित लालित्य से [^1] रहित शरीर पर हार भी भारस्वरूप हो जाता… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 345 अग्निपुराण – अध्याय 345 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ पैंतालीसवाँ अध्याय शब्दार्थोभयालंकार निरुपण शब्दार्थालङ्काराः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! ‘शब्दार्थालंकार’ शब्द और अर्थ दोनों को समानरूप से अलंकृत करता है; जैसे एक ही अङ्ग में धारण किया हुआ हार कामिनी के कण्ठ एवं कुचमण्डल की कान्ति… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 344 अग्निपुराण – अध्याय 344 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चौवालीसवाँ अध्याय अर्थालंकारों का निरूपण अर्थालङ्कारनिरूपणं अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! अर्थों का अलंकरण [^1] अर्थालंकार’ कहा जाता है। उसके बिना शब्द-सौन्दर्य भी मन को आकर्षित नहीं करता है। अर्थालंकार से हीन सरस्वती विधवा के समान शोभाहीन… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 343 अग्निपुराण – अध्याय 343 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तैंतालीसवाँ अध्याय शब्दालंकारों का विवरण शब्दालङ्काराः अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ पद एवं वाक्य में वर्णों की आवृत्ति को ‘अनुप्रास’ [^1] कहते हैं। वृत्त्यनुप्रास के वर्णसमुदाय दो प्रकार के होते हैं — एकवर्ण और अनेकवर्ण[^2] ॥ १ ॥… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 342 अग्निपुराण – अध्याय 342 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ बयालीसवाँ अध्याय अभिनय और अलंकारों का निरूपण अभिनयादिनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ ! ‘काव्य’ अथवा ‘नाटक’ आदि में वर्णित विषयों को जो अभिमुख कर देता सामने ला देता, अर्थात् मूर्तरूप से प्रत्यक्ष दिखा देता है, पात्रों के… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 341 अग्निपुराण – अध्याय 341 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ इकतालीसवाँ अध्याय नृत्य आदि में उपयोगी आङ्गिक कर्म नृत्यादावङ्गकर्म्मनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं ‘अभिनय’ [^1] में नृत्य आदि के समय शरीर से होने वाली विशेष चेष्टा को तथा अङ्ग प्रत्यङ्ग के कर्म को बताता हूँ।… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 340 अग्निपुराण – अध्याय 340 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चालीसवाँ अध्याय रीति-निरूपण रीतिनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं ‘वाग्विद्या’ (काव्यशास्त्र) के सम्यक् परिज्ञान के लिये ‘रीति’ का वर्णन करता हूँ। उसके भी चार भेद होते हैं — पाञ्चाली, गौडी, वैदर्भी तथा लाटी। इनमें ‘पाञ्चाली रीति’… Read More