अग्निपुराण – अध्याय 119 अग्निपुराण – अध्याय 119 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय जम्बू आदि महाद्वीपों तथा समस्त भूमि के विस्तार का वर्णन महाद्वीपादि अग्निदेव कहते हैं — जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन है। वह सब ओर से एक लाख योजन विस्तृत खारे पानी के समुद्र से घिरा… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 118 अग्निपुराण – अध्याय 118 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ अठारहवाँ अध्याय भारतवर्ष का वर्णन भारतवर्षं अग्निदेव कहते हैं — समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण जो वर्ष है, उसका नाम ‘भारत’ है। उसका विस्तार नौ हजार योजन है। स्वर्ग तथा अपवर्ग पाने की इच्छावाले पुरुषों के… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 117 अग्निपुराण – अध्याय 117 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ सत्रहवाँ अध्याय श्राद्ध-कल्प पार्वणश्राद्ध श्राद्धकल्पः अग्निदेव कहते हैं — महर्षि कात्यायन ने मुनियों से जिस प्रकार श्राद्ध का वर्णन किया था, उसे बतलाता हूँ। गया आदि तीर्थों में, विशेषतः संक्रान्ति आदि के अवसर पर श्राद्ध करना चाहिये। अपराह्नकाल… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 116 अग्निपुराण – अध्याय 116 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ सोलहवाँ अध्याय गया में श्राद्ध की विधि गयाश्राद्धविधिः अग्निदेव कहते हैं — गायत्री मन्त्र से ही महानदी में स्नान करके संध्योपासना करे। प्रातःकाल गायत्री के सम्मुख किया हुआ श्राद्ध और पिण्डदान अक्षय होता है। सूर्योदय के समय तथा… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 115 अग्निपुराण – अध्याय 115 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय गया–यात्रा की विधि गयायात्राविधिः अग्निदेव कहते हैं — यदि मनुष्य गया जाने को उद्यत हो तो विधिपूर्वक श्राद्ध करके तीर्थयात्री का वेष धारणकर अपने गाँव की परिक्रमा कर ले: फिर प्रतिदिन पैदल यात्रा करता रहे। मन… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 114 अग्निपुराण – अध्याय 114 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ चौदहवाँ अध्याय गया-माहात्म्य गयामाहात्म्यम् अग्निदेव कहते हैं — अब मैं गया के माहात्म्य का वर्णन करूँगा। गया श्रेष्ठ तीर्थों में सर्वोत्तम है। एक समय की बात है — गय नामक असुर ने बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की। उससे… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 113 अग्निपुराण – अध्याय 113 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ तेरहवाँ अध्याय नर्मदा माहात्म्य नर्मदादिमाहात्म्यम् अग्निदेव कहते हैं — अब मैं नर्मदा आदि का माहात्म्य बताऊँगा । नर्मदा श्रेष्ठ तीर्थ है। गङ्गा का जल स्पर्श करने पर मनुष्य को तत्काल पवित्र करता है, किंतु नर्मदा का जल दर्शनमात्र… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 112 अग्निपुराण – अध्याय 112 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ बारहवाँ अध्याय वाराणसी माहात्म्य वाराणसीमाहात्म्यम् अग्निदेव कहते हैं — वाराणसी परम उत्तम तीर्थ है। जो वहाँ श्रीहरि का नाम लेते हुए निवास करते हैं, उन सबको वह भोग और मोक्ष प्रदान करता है। महादेवजी ने पार्वती से उसका… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 111 अग्निपुराण – अध्याय 111 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय प्रयाग-माहात्म्य प्रयागमाहात्म्यं अग्निदेव कहते हैं — ब्रह्मन् ! अब मैं प्रयाग का माहात्म्य बताता हूँ, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला तथा उत्तम है। प्रयाग में ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता तथा बड़े-बड़े मुनिवर निवास करते हैं।… Read More
अग्निपुराण – अध्याय 110 अग्निपुराण – अध्याय 110 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ एक सौ दसवाँ अध्याय गङ्गाजी की महिमा गङ्गामाहात्म्यं अग्निदेव कहते हैं — अब गङ्गा का माहात्म्य बतलाता हूँ। गङ्गा का सदा सेवन करना चाहिये । वह भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली हैं। जिनके बीच से गङ्गा बहती हैं, वे… Read More