श्रीकृष्ण ने जब अर्जुन के साथ किया युद्ध श्रीकृष्ण ने जब अर्जुन के साथ किया युद्ध एक बार महर्षि गालव जब प्रातः सूर्यार्घ्य प्रदान कर रहे थे, उनकी अञ्जलि में आकाशमार्ग से जाते हुए चित्रसेन की थूकी हुई पीक गिर पड़ी । मुनि को इससे बड़ा क्रोध हुआ । वे उसे शाप देना ही चाहते थे कि उन्हें अपने तपोनाश का ध्यान आ… Read More
शारदीय नव-रात्र में कलश-स्थापन शारदीय नव-रात्र में कलश-स्थापन चारों नव-रात्रों में “शारदीय-नव-रात्र’ का विशेष महत्त्व है। कहा भी है- शरत्-काले महा-पूजा, क्रियते या च वार्षिकी । तस्याह सकलां बाधां, नाशयिष्याम्यसंशयम् ।। ऐसी दशा में ‘शारदीय नव-रात्र’ के पूजा-विधान पर विशेष रुप से ध्यान देना आवश्यक है। भगवान् आशुतोष कथित अनेक तन्त्र-शास्त्र एवं स्मार्त-शास्त्र इस पूजा के उत्तमोत्तम विधि-विधान से… Read More
नवदुर्गोपनिषत् नवदुर्गोपनिषत् उक्तं चाथर्वणरहस्ये । विनियोगः- ॐ अस्य श्रीनवदुर्गामहामन्त्रस्य किरातरुपधर ईश्वर ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, अन्तर्यामी नारायणः किरातरुप धरेश्वरो नवदुर्गागायत्री देवता, ॐ बीजं, स्वाहा शक्तिः, क्लीं कीलकं, मम धर्मार्थकाममोक्षार्थे जपे विनियोगः ।… Read More
सूरदास और कन्या सूरदास और कन्या उस समय मुगल सम्राट् अकबर राज्य कर रहा था । उसके बहुत-सी हिंदू बेगमें भी थीं । उनमें से एक का नाम था “जोधाबाई” । एक दिन जोधाबाई नदी में नहाने गयी । वहाँ उसने देखा कि एक छोटी-सी सुकुमार लड़की पानी में डूब-सी रही है । उसको दया आ गयी ।… Read More
ब्रह्मणस्पती सूक्त ब्रह्मणस्पती सूक्त [ऋषि – कण्व धौर । देवता – ब्रह्मणस्पति । छन्द बाहर्त प्रगाध(विषमा बृहती, समासतो बृहती)।] उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे । उप प्र यन्तु मरुतः सुदानव इन्द्र प्राशूर्भवा सचा ॥१॥ हे ब्रह्मणस्पते! आप उठें, देवो की कामना करने वाले हम आपकी स्तुति करते है। कल्याणकारी मरुद्गण हमारे पास आयें। हे इन्द्रदेव। आप ब्रह्मणस्पति के साथ… Read More
स्वस्ति-वाचन स्वस्ति-वाचन सभी शुभ एवं मांगलिक धार्मिक कार्यों को प्रारम्भ करने से पूर्व वेद के कुछ मन्त्रों का पाठ होता है, जो स्वस्ति-पाठ या स्वस्ति-वाचन कहलाता है । इस स्वस्ति-पाठ में ‘स्वस्ति’ शब्द आता है, इसलिये इस सूक्त का पाठ कल्याण करनेवाला है । ऋग्वेद प्रथम मण्डल का यह ८९वाँ सूक्त शुक्लयजुर्वेद वाजसनेयी-संहिता (२५/१४-२३), काण्व-संहिता, मैत्रायणी-संहिता… Read More
श्राद्ध सम्बन्धी ज्ञातव्य श्राद्ध सम्बन्धी ज्ञातव्य श्राद्ध के बारह भेदः- नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि (नान्दी), सपिंडन, पार्वण, गोष्ठी, शुद्धि, कर्मांग, दैविक, यात्रा एवं पुष्टिश्राद्ध – ये श्राद्ध के बारह भेद माने गये हैं । श्राद्ध में ब्राह्मण-संख्याः- श्राद्ध में अधिक ब्राह्मणों का निमंत्रण ठीक नहीं है । देवकार्य में दो तथा पितृकार्य में तीन ब्राह्मण पर्याप्त हैं, अथवा… Read More
श्राद्ध-कर्मःएक संक्षिप्त विधि श्राद्ध-कर्मःएक संक्षिप्त विधि श्राद्ध दिवस से पूर्व दिवस को बुद्धिमान् पुरुष श्रोत्रिय आदि से विहित ब्राह्मणों को ‘पितृ-श्राद्ध तथा ‘वैश्व-देव-श्राद्ध’ के लिए निमंत्रित करें। पितृ-श्राद्ध के लिए सामर्थ्यानुसार अयुग्म तथा वैश्व-देव-श्राद्ध के लिए युग्म ब्राह्मणों को निमंत्रित करना चाहिए। निमंत्रित तथा निमंत्रक क्रोध, स्त्रीगमन तथा परिश्रम आदि से दूर रहे। श्राद्ध-दिवस पर निम्न प्रक्रिया का… Read More
भगवती सीता की शक्ति तथा पराक्रम भगवती सीता की शक्ति तथा पराक्रम एक बार भगवान् श्रीराम जब सपरिकर सभा में विराज रहे थे, विभीषण बड़ी विकलतापूर्वक अपनी स्त्री तथा चार मन्त्रियों के साथ दौड़े आये और बार-बार उसाँस लेते हुए कहने लगे – ‘राजीवनयन राम ! मुझे बचाइये, बचाइये । कुम्भकर्ण के पुत्र मूलकासुर नामक राक्षस ने, जिसे मूल नक्षत्र में… Read More
पीताम्बरा अष्टक पीताम्बरा अष्टक ध्यावत धनेश-अमरेश हू रमेश नित्य, पूजत प्रजेश पद-कञ्ज शम्भु-रानी के । गावत गजानन षडानन अनन्त वेद, पावन दयाल मातु गुन वर-दानी के । पावत परम पुरषारथ प्रसाद जन, लावत ललकि उर ध्यान दया-धानी के । भावत ‘सरोज’ बल-वैभव अपार, अरि-नाशक समृद्ध सदा बगला भवानी के ।। १… Read More