श्रीभगवती शतक (पञ्जाब के सिद्ध सन्त पूज्य दौलतराम जी रचित) नमो भगवती ! जागती ज्योति-ज्वाला । तुही रक्ष-पाला कृपाला दयाला ॥ तुही दीन के दुःख-दारिद्र हरती । तुही भक्त को पार संसार करती ॥ १ ॥ तुही भूरि सुख की सदा देन-हारी । सभी छोंड़ि मैं ओट लीन्ही तिहारी ॥ नमो योगिनी ! योग में… Read More


सरस्वतीसूक्त वैदिक परम्परा में सरस्वतीरहस्योपनिषद् के अनुसार सरस्वती की उपासना ब्रह्म-ज्ञान प्राप्ति का परमोत्तम साधन है । महर्षि आश्वलायन ने इसके द्वारा तत्त्व-ज्ञान प्राप्त किया था । यह स्तवन ऋग्वेद के उपनिषद् भाग के अन्तर्गत है । इसका आश्रय लेने से माँ सरस्वती की कृपा से विद्याप्राप्ति के विघ्न विशेषरूप से दूर होते हैं तथा… Read More


॥ पवमानसूक्त ॥ अथर्ववेद की नौ शाखाएँ कही गयी हैं, जिनमें शौनकीय तथा पैप्पलाद शाखा मुख्य हैं । शौनकीय शाखा की संहिता तो उपलब्ध है, किंतु पैप्पलाद संहिता प्रायः उपलब्ध नहीं होती । इसी पप्पलाद संहिता में २१ मन्त्रात्मक एक सूक्त पठित है, जो ‘पवमानसूक्त’ कहलाता है । वेद में पवमान शब्द अनेक अर्थों में… Read More


॥ विष्णुसूक्त ॥ इस सूक्त के द्रष्टा दीर्घतमा ऋषि हैं । विष्णुके विविध रूप, कर्म हैं । अद्वितीय परमेश्वररूप में उन्हें ‘महाविष्णु’ कहा जाता हैं । यज्ञ एवं जलोत्पादक सूर्य भी उन्हीं का रूप है। वे पुरातन हैं, जगत्स्रष्टा हैं। नित्य-नूतन एवं चिरसुन्दर हैं । संसार को आकर्षित करनेवाली भगवती लक्ष्मी उनकी भार्या हैं ।… Read More


॥ नारायणसूक्त ॥ इस सूक्तके ऋषि नारायण, देवता आदित्य-पुरुष और छन्द भूरिगार्षी त्रिष्टुप, निच्यूदा त्रिष्टुप् एवं आर्य्यनुष्टुप् है । इस सूक्त में केवल छः मन्त्र हैं । शुक्लयजुर्वेद में पुरुषसूक्त के १६ मन्त्रों के अनन्तर इसके छः मन्त्र प्राप्त होते हैं । अतः इसे ‘उत्तर नारायणसूक्त’ भी कहा जाता है । इसमें सष्टि के विकास… Read More


॥ चतुःश्लोकी भागवत ॥ अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम् । पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्यहम् ॥ १ ॥ ‘सृष्टि के पूर्व केवल मैं-ही-मैं था । मेरे अतिरिक्त न स्थूल था न सूक्ष्म और न तो दोनों का कारण अज्ञान । जहाँ यह सृष्टि नहीं है, वहाँ मैं-ही-मैं हूँ और इस सृष्टि के रूप में जो कुछ… Read More


॥ बृहत्साम ॥ भगवान् श्रीकृष्ण ने वेदों में सामवेदको अपनी विभूति बताया है – ‘वेदानां सामवेदोऽस्मि’ (गीता १०।२२) । सामवेद में अनेक मनोहारी गीत हैं, जिन्हें ‘साम’ कहा जाता है। यथा – रथन्तरसाम, वार्षसाम, बृहत्साम, सेतुसाम, वीङ्कसाम, कल्माषसाम, आज्यदोहसाम, ज्येष्ठसाम इत्यादि। इनका गायन एक विशिष्ट परम्परागत वैदिक पद्धति से किया जाता है, जो अत्यन्त मनोहारी… Read More


॥ अग्निसूक्त ॥ ॥ अग्निसूक्त (क) ॥ इस सूक्त के ऋषि वैश्वामित्र मधुच्छन्दा हैं, देवता अग्नि हैं तथा छन्द गायत्री है । वेद में अग्निदेवता का विशेष महत्व है । ऋग्वेदसंहिता में दो सौ सूक्त अग्नि के स्तवन में प्राप्त हैं । ऋग्वेद के सभी मण्डलों के आदि में ‘अग्निसूक्त’ के अस्तित्व से इस देव… Read More


॥ आकूतिसूक्त ॥ इस सूक्त में शक्तितत्त्व ‘आकूति’ नाम से व्यक्त हुआ है । ‘आकूति’ नाम सभी शक्तिभेदों हेतु समानरूप से व्यवहार में आता है । इस सूक्त में इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया-शक्ति के इन तीन भेदों को ही आकूति कहा गया है । इस सूक्त के द्रष्टा ऋषि अथर्वाङ्गिरा तथा देवता अग्निस्वरूपा आकूति हैं… Read More


॥ पुरुषसूक्त ॥ वेदों में प्राप्त सूक्तों में पुरुषसूक्त’ का अत्यन्त महनीय स्थान है । आध्यात्मिक तथा दार्शनिक दृष्टि से इस सूक्त का बड़ा महत्त्व है। इसीलिये यह सूक्त ऋग्वेद (१०वें मण्डल का ९०वाँ सूक्त), यजुर्वेद (३१वाँ अध्याय), अथर्ववेद (१९वें काण्डका छठा सूक्त), तैत्तिरीयसंहिता, शतपथब्राह्मण तथा तैत्तिरीय आरण्यक आदि में किंचित् शब्दान्तर के साथ प्रायः… Read More