भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १०६ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (उत्तरपर्व) अध्याय १०६ अनन्तव्रत-माहात्म्य में कार्तवीर्य के आविर्भाव का वृत्तान्त राजा युधिष्ठिर ने कहा — भगवन् ! भक्तिपूर्वक नारायण की आराधना करने से सभी मनोवाञ्छित फल प्राप्त हो जाते हैं, किंतु स्त्री-पुरुषों के लिये संतानहीन होने से अधिक कोई… Read More


भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १०४ से १०५ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (उत्तरपर्व) अध्याय १०४ से १०५ मनोरथ (पूर्णमनोरथ) पूर्णिमा तथा अशोक (विशोक)-पूर्णिमा व्रत-विधि भगवान् श्रीकृष्ण बोले — राजन् ! फाल्गुन की पूर्णिमा से संवत्सर पर्यन्त किया जानेवाला एक व्रत है, जो मनोरथ-पूर्णिमा के नाम से विख्यात है ।… Read More


भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १०३ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (उत्तरपर्व) अध्याय १०३ महाकार्तिकी-व्रत के प्रसंग में रानी कलिंगभद्रा का आख्यान भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं — महाराज ! पूर्वकाल में मध्य देश के वृषस्थल नामक स्थान में महाराज दिलीप की कलिंगभद्रा नाम की एक सर्वगुणसम्पन्ना महारानी थी । वह… Read More


भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १०२ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (उत्तरपर्व) अध्याय १०२ सावित्री-व्रतकथा एवं व्रत-विधि राजा युधिष्ठिर ने कहा — भगवन् ! अब आप सावित्री-व्रत के विधान का वर्णन करें । भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज ! सावित्री नाम की एक राजकन्या ने वन में जिस प्रकार यह… Read More


भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १०१ ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (उत्तरपर्व) अध्याय १०१ युगादि तिथियों की विधि राजा युधिष्ठिर ने पूछा — भगवन् ! आप उन तिथियों का वर्णन करें, जिनमें स्वल्प भी किया गया स्नान, दान, जप आदि पुण्यकर्म अक्षय हो जाते हैं और महान् धर्म तथा शुभ… Read More


भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १०० ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय भविष्यपुराण (उत्तरपर्व) अध्याय १०० वैशाखी, कार्तिकी और माघी पूर्णिमा की विधि राजा युधिष्ठिर ने पूछा — भगवन् ! संवत्सर में कौन-कौन तिथियाँ स्नान-दान आदि में अधिक पुण्यप्रद हैं । उनका आप वर्णन करे । भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज !… Read More


॥ प्रत्यंगिरा स्तोत्रम् ॥ ॥ ॐ नमः श्री कालसंकर्षिण्यै ॥ ॥ भगवान शिव उवाच ॥ एँ ख्फ्रें नमोऽस्तु ते महामाये देहातीते निरञ्जने । प्रत्यंगिरा जगद्धात्रि राजलक्ष्मी नमोऽस्तु ते ॥ वर्ण देहा महागौरी साधकेच्छा प्रवर्तते । पददेहामहास्फार परासिद्धि समुत्थिता ॥ तत्त्वदेहास्थिता देवि साधकान् ग्रहा स्मृता । महाकुण्डलिनी प्रोक्ता सहस्रदलस्य च भेदिनी ॥… Read More


॥ पवमानसूक्त ॥ अथर्ववेद की नौ शाखाएँ कही गयी हैं, जिनमें शौनकीय तथा पैप्पलाद शाखा मुख्य हैं । शौनकीय शाखा की संहिता तो उपलब्ध है, किंतु पैप्पलाद संहिता प्रायः उपलब्ध नहीं होती । इसी पप्पलाद संहिता में २१ मन्त्रात्मक एक सूक्त पठित है, जो ‘पवमानसूक्त’ कहलाता है । वेद में पवमान शब्द अनेक अर्थों में… Read More


॥ विष्णुसूक्त ॥ इस सूक्त के द्रष्टा दीर्घतमा ऋषि हैं । विष्णुके विविध रूप, कर्म हैं । अद्वितीय परमेश्वररूप में उन्हें ‘महाविष्णु’ कहा जाता हैं । यज्ञ एवं जलोत्पादक सूर्य भी उन्हीं का रूप है। वे पुरातन हैं, जगत्स्रष्टा हैं। नित्य-नूतन एवं चिरसुन्दर हैं । संसार को आकर्षित करनेवाली भगवती लक्ष्मी उनकी भार्या हैं ।… Read More


॥ नारायणसूक्त ॥ इस सूक्तके ऋषि नारायण, देवता आदित्य-पुरुष और छन्द भूरिगार्षी त्रिष्टुप, निच्यूदा त्रिष्टुप् एवं आर्य्यनुष्टुप् है । इस सूक्त में केवल छः मन्त्र हैं । शुक्लयजुर्वेद में पुरुषसूक्त के १६ मन्त्रों के अनन्तर इसके छः मन्त्र प्राप्त होते हैं । अतः इसे ‘उत्तर नारायणसूक्त’ भी कहा जाता है । इसमें सष्टि के विकास… Read More