मूसलकिसलयम् मूसलकिसलयम् तेरहवीं शताब्दी में तमिलनाडु में नम्मालवार नाम के तमिल और संस्कृत के एक महान् साहित्यकार हो चुके हैं । वे बचपन में अनपढ़ रसोइया थे । वे आचार्य और उनके छात्रों के लिये भोजन बनाने का कार्य करते थे । आचार्य थे – पेरिया अचन पिल्लई । एक रोज आचार्य ने उस रसोइये से… Read More
पश्चात्ताप का परिणाम पश्चात्ताप का परिणाम इक्ष्वाकु-वंश के महीप त्रिवृष्ण के पुत्र त्र्यरुण की अपने पुरोहित के पुत्र वृशजान से बहुत पटती थी । दोनों एक-दूसरे के बिना नही रह सकते थे । महाराज त्र्यरुण की वीरता और वृशजान के पाण्डित्य से राजकीय समृद्धि नित्य बढ़ रही थी । महाराज ने दिग्विजय-यात्रा की; उन्होंने वृशजान से सारथि-पद स्वीकार… Read More
कीड़े से महर्षि मैत्रेय कीड़े से महर्षि मैत्रेय भगवान् व्यास सभी जीवों की गति तथा भाषा को समझते थे । एक बार जब वे कहीं जा रहे थे, तब रास्ते में उन्होंने एक कीड़े को बड़े वेग से भागते हुए देखा । उन्होंने कृपा करके कीड़े की बोली में ही उससे इस प्रकार भागने का कारण पूछा । कीड़े… Read More
उड़िया विलंकारामायण उड़िया विलंकारामायण उड़िया भाषा में एक ऐसी रामायण लिखी गई, जिसकी विषयवस्तु वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण एवं रामचरितमानस से सर्वथा भिन्न है । इस ग्रन्थ का नाम है विलंकारामायण । इसके रचयिता हैं उड़िया के आदिकवि शारलादास । ऐसा माना जाता है कि उन्होंने इसकी रचना जगन्नाथपुरी के राजा गजपति गौड़ेश्व कपिलेन्द्रदेव के शासनकाल (1452-1479… Read More
कृत्तिवास रामायण की रामकथा कृत्तिवास रामायण की रामकथा तुलसीदास जी के आविर्भाव से लगभग एक सौ वर्ष पूर्व बंगदेश (बंगाल) में कृत्तिवास नामक महाकवि का आविर्भाव माना जाता है । उनका जन्म 1433 ई॰ का माना जाता है । श्रीराम ही उनके उपास्यदेव थे । उन्होंने ‘कृत्तिवास रामायण’ की रचना की थी । इसमें सात काण्ड हैं । उन्होंने… Read More
दश महा-विद्याओं की उत्पत्ति दश महा-विद्याओं की उत्पत्ति दक्ष प्रजापति ने अपने द्वारा आयोजित यज्ञ में भगवान् शिव को निमन्त्रित नहीं करने पर जब भगवती ने अपने पिता से कारण पुछने के लिये पितृ-गृह जाने के लिए भगवान् शिव से अनुमति लेनी चाही, तो महादेव ने अनुमति नहीं दी । यह सुनकर क्रोधावेश में सती के अंग कम्पित होने… Read More
कालीदास और घटकर्पर कालीदास और घटकर्पर महाराज विक्रमादित्य के नव-रत्नों के नाम इस प्रकार है – धन्वन्तरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, वेताल-भट्ट, घटकर्पर, कालिदास, वाराह-मिहिर तथा रुचि । घटकर्पर को विद्वान् बनाने तथा दरबार में स्थान दिलाने में कालिदास का भी हाथ था । इसके विषय में ‘बंगाल एशियाटिक सोसायटी’ के प्रमुख सदस्य तथा अंग्रेज विद्वान् “हेवरलिन” ने एक… Read More
ऐसे हुए श्रीराम अजेय ऐसे हुए श्रीराम अजेय भगवन् श्रीराम अपने युग के अजेय योद्धा थे । देव, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग, किन्नर, राक्षस आदि में भी उनके समान योद्धा न था । तीनों लोकों को जीतने वाले रावण पर विजय पाना कोई आसान काम नहीं था । तत्कालीन सभी शक्तियाँ व्यक्तिगत एवं सामूहिक रुप से रावण से परास्त… Read More
धनाधीश कुबेर धनाधीश कुबेर महिर्ष पुलस्त्य के पुत्र महामुनि विश्रवा ने इलविडा (या देववर्णिणी) का पाणिग्रहण किया। उसी से कुबेर जी की उत्पत्ति हुई। भगवान् ब्रह्मा ने इन्हें समस्त सम्पत्ति का स्वामी बनाया। ये तप करके उत्तर दिशा के लोक पाल हुए। कैलास के समीप इनकी अलकापुरी है। श्वेतवर्ण, तुन्दिल शरीर, अष्ट-दन्त एवं तीन चरणों वाले, गदाधारी… Read More
दया धर्म का मूल दया धर्म का मूल एक फ्रेंच लड़का रोलफेनस् जंगली जानवरों से, खास करके पक्षियों से बहुत प्रेम करता था । उसका सबसे अधिक प्यार था, आकाश में गाती हुई उड़ने वाली लवा (Skylark) नामक चिड़िया से । एक दिन वह रास्ते से जा रहा था, उसको लार्क का संगीत सुनाई पड़ा । उसने आस-पास देखा,… Read More