परमभागवत परीक्षित् परमभागवत परीक्षित् जिस समय पाण्डव लोग सभी सुकृत कर्मों का अनुष्ठान करके आत्मा के आत्यन्तिक स्वरूप को जानकर, अपने मन को भगवान् के चरणाम्बुज में लगाकर एकान्त गति को प्राप्त हो गये, उस समय ब्राह्मणों की शिक्षासे महाभागवत राजा परीक्षित् पृथिवीका शासन करने लगे । राजा परीक्षित् ने जब सुना कि ‘कलिकाल के प्रभावसे प्राणियोंके… Read More
श्री धन्वन्तरि व्रत-कथा श्री गरुड़-पुराणोक्त रोग-नाशिनी श्री धन्वन्तरि व्रत-कथा प्रथम अध्याय सनकादिक मुनियों ने सूत जी से कहा – हे सूत महा-मुने ! आपने भगवान् धन्वन्तरि की पूजा-विधि का विस्तार-पूर्वक वर्णन किया, किन्तु इसे सुनने पर भी हमें तृप्ति नहीं हुई । अतः श्री धन्वन्तरि का माहात्म्य अधिक विस्तार से बताइए । मुनि-श्रेष्ठ सुत जी ने कहा –… Read More
श्रीकृष्ण ने जब अर्जुन के साथ किया युद्ध श्रीकृष्ण ने जब अर्जुन के साथ किया युद्ध एक बार महर्षि गालव जब प्रातः सूर्यार्घ्य प्रदान कर रहे थे, उनकी अञ्जलि में आकाशमार्ग से जाते हुए चित्रसेन की थूकी हुई पीक गिर पड़ी । मुनि को इससे बड़ा क्रोध हुआ । वे उसे शाप देना ही चाहते थे कि उन्हें अपने तपोनाश का ध्यान आ… Read More
सूरदास और कन्या सूरदास और कन्या उस समय मुगल सम्राट् अकबर राज्य कर रहा था । उसके बहुत-सी हिंदू बेगमें भी थीं । उनमें से एक का नाम था “जोधाबाई” । एक दिन जोधाबाई नदी में नहाने गयी । वहाँ उसने देखा कि एक छोटी-सी सुकुमार लड़की पानी में डूब-सी रही है । उसको दया आ गयी ।… Read More
भगवती सीता की शक्ति तथा पराक्रम भगवती सीता की शक्ति तथा पराक्रम एक बार भगवान् श्रीराम जब सपरिकर सभा में विराज रहे थे, विभीषण बड़ी विकलतापूर्वक अपनी स्त्री तथा चार मन्त्रियों के साथ दौड़े आये और बार-बार उसाँस लेते हुए कहने लगे – ‘राजीवनयन राम ! मुझे बचाइये, बचाइये । कुम्भकर्ण के पुत्र मूलकासुर नामक राक्षस ने, जिसे मूल नक्षत्र में… Read More
ज्येष्ठा देवी (द्ररिद्रा देवी) का अवतरण ज्येष्ठा देवी (द्ररिद्रा देवी) का अवतरण सनत्कुमार-संहिता के कार्तिक माहात्म्य में भगवान सूर्य ने बताया है कि जब द्वापर के अन्त में देवता और दानवों ने भगवान विष्णु और राजा बलि आदि के साथ समुद्र-मन्थन किया तो उस समय मन्दराचल को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया। पाँच वर्षों तक मन्थन किया गया… Read More
भगवती स्वाहा (स्वाहा देवी) का उपाख्यान भगवती स्वाहा (स्वाहा देवी) का उपाख्यान श्रीब्रह्मवैवर्त्त-पुराण के प्रकृति-खण्ड के 40 वें अध्याय में भगवती ‘स्वाहा’ का सुन्दर उपाख्यान वर्णित है । नारदजी के पुछे जाने पर भगवान् नारायण कहते है – मुने ! सृष्टि के प्रारम्भिक समय की बात है – देवता भोजन की व्यवस्था के लिये ब्रह्मलोक की मनोहारिणी सभा में गये ।… Read More
उपासना का फल उपासना का फल महर्षि अत्रि का आश्रम उनकी तपस्या का पवित्र प्रतीक थी । चारों ओर अनुपम शान्ति और दिव्य आनन्द की वृष्टि निरन्तर होती रहती थी । यज्ञ की धूम-शिखाओं और वेद-मन्त्रों के उच्चारण से आश्रम के कण-कण में रमणीयता का निवास था । महर्षि आनन्द-मग्न रहकर भी सदा उदास दीख पड़ते थे ।… Read More
त्यागी कौन ? त्यागी कौन ? बहुत बड़े धनी और विद्वान् जमींदार की एक बार किसी महात्मा से भेंट हो गयी । महात्मा बड़े त्यागी थे । जमींदार ने उन्हें एक लँगोटी का कपड़ा देना चाहा, परन्तु महात्मा आवश्यकता न होने से स्वीकार नहीं किया । कुछ समय तक साधु-संग करने पर जमींदार के मन में भी वैराग्य… Read More
अग्नियों द्वारा उपदेश अग्नियों द्वारा उपदेश कमल का पुत्र उपकोसल सत्यकाम जाबाल के यहाँ ब्रह्मचर्य ग्रहण करके अध्ययन करता था । बारह वर्षों तक उसने आचार्य एवं अग्नियों की उपासना की । आचार्य ने अन्य सभी ब्रह्मचारियों का समावर्तन-संस्कार कर दिया और उन्हें घर जाने की आज्ञा दे दी । केवल उपकोसल को ऐसा नहीं किया । उपकोसल… Read More