June 8, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 041 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ इकतालीसवाँ अध्याय शिलान्यास की विधि शिलादिन्यासविधानम् भगवान् हयग्रीव बोले — अब मैं शिलान्यास स्वरूपा पाद-प्रतिष्ठा का वर्णन करूंगा। पहले मण्डप बनाना चाहिये; फिर उसमें चार कुण्ड बनावे। वे कुण्ड क्रमशः कुम्भन्यास1 , इष्टकान्यास2 , द्वार और खम्भे के शुभ आश्रय होंगे। कुण्ड का तीन चौथाई हिस्सा कंकड़ आदि से भर दे और बराबर करके उस पर वास्तुदेवता का पूजन करे। नींव में डाली जाने वाली ईंटें खूब पकी हों; बारह-बारह अङ्गुल की लंबी हों तथा विस्तार के तिहाई भाग के बराबर, अर्थात् चार अङ्गुल उनकी मोटाई होनी चाहिये। अगर पत्थर का मन्दिर बनवाना हो तो ईंट की जगह पत्थर ही नींव में डाला जायगा। एक-एक पत्थर एक-एक हाथ का लंबा होना चाहिये। (यदि सामर्थ्य हो तो) ताँबे के नौ कलशों की, अन्यथा मिट्टी के बने नौ कलशों की स्थापना करे। जल, पञ्चकषाय3 , सर्वौषधि और चन्दनमिश्रित जल से उन कलशों को पूर्ण करना चाहिये। इसी प्रकार सोना, धान आदि से युक्त तथा गन्ध-चन्दन आदि से भली-भाँति पूजित करके उन जलपूर्ण कलशों द्वारा ‘आपो हि ष्ठा’4 इत्यादि तीन ऋचाओं, ‘शं नो5 देवीरभिष्टय’ आदि मन्त्रों ‘तरत्स मन्दीः 6 ‘ इत्यादि मन्त्र एवं पावमानी’7 ऋचाओं के तथा ‘उदुत्तमं वरुण 8 ‘ ‘कया नः9 ‘ और ‘वरुणस्योत्तम्भनमसि10 ‘ इत्यादि मन्त्रों के पाठपूर्वक ‘हंसः शुचिषद्’11 इत्यादि मन्त्र तथा श्रीसूक्त का भी उच्चारण करते हुए बहुत-सी शिलाओं अथवा ईटों का अभिषेक करे। फिर उन्हें नींव में स्थापित करके मण्डप के भीतर एक शय्या पर पूर्वमण्डल में भगवान् श्रीविष्णु का पूजन करे। अरणी-मन्थन द्वारा अग्नि प्रकट करके द्वादशाक्षर-मन्त्र से उसमें समिधाओं का हवन करना चाहिये ॥ १-९ ॥’ ‘आधार’ और ‘आज्यभाग’ नामक आहुतियाँ प्रणवमन्त्र से ही करावे। फिर अष्टाक्षर-मन्त्र से आठ आहुति देकर ॐ भूः स्वाहा, ॐ भुवः स्वाहा, ॐ स्वः स्वाहा — इस प्रकार तीन व्याहृतियों से क्रमशः लोकेश्वर अग्नि, सोमग्रह और भगवान् पुरुषोत्तम के निमित्त हवन करे। इसके बाद प्रायश्चित्तसंज्ञक हवन करके प्रणवयुक्त द्वादशाक्षर मन्त्र से उड़द, घी और तिल को एक साथ लेकर पूर्णाहुति-हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् आचार्य पूर्वाभिमुख होकर आठ दिशाओं में स्थापित कलशों पर पृथक्-पृथक् पद्म आदि देवताओं का स्थापनपूजन करे। बीच में भी धरती लीपकर पत्थर की एक शिला और कलश स्थापित करे। इन नौ कलशों पर क्रमशः नीचे लिखे देवताओं की स्थापना करनी चाहिये ॥ १०-१३ ॥ पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप, कुमुद, आनन्द, पद्म और शङ्ख — इनको आठ कलशों में और पद्मिनी को मध्यवर्ती कलश पर स्थापित करे ॥ १४ ॥ इन कलशों को हिलावे-डुलावे नहीं; उनके निकट पूर्व आदि के क्रम से ईशानकोणतक एक एक ईंट रख दे। फिर उन पर उनकी देवता विमला आदि शक्तियों का न्यास (स्थापन) करना चाहिये।12 बीच में ‘अनुग्रहा की स्थापना करे। इसके बाद इस प्रकार प्रार्थना करे — ‘मुनिवर अङ्गिरा की सुपुत्री इष्ट का देवी, तुम्हारा कोई अङ्ग टूटा-फूटा या खराब नहीं हुआ है; तुम अपने सभी अङ्गों से पूर्ण हो। मेरा अभीष्ट पूर्ण करो। अब मैं प्रतिष्ठा करा रहा हूँ’ ॥ १५-१७ ॥ उत्तम आचार्य इस मन्त्र से इष्टकाओं की स्थापना करने के पश्चात् एकाग्रचित्त होकर मध्यवाले स्थान में गर्भाधान करे। (उसकी विधि यों है —) एक कलश के ऊपर देवेश्वर भगवान् नारायण तथा पद्मिनी (लक्ष्मी) देवी को स्थापित करके उनके पास मिट्टी, फूल, धातु और रत्नों को रखे। इसके बाद लोहे आदि के बने हुए गर्भपात्र में, जिसका विस्तार बारह अङ्गुल और ऊँचाई चार अङ्गुल हो, अस्त्र की पूजा करे। फिर ताँबे के बने हुए कमल के आकारवाले एक पात्र में पृथ्वी का पूजन करे और इस प्रकार प्रार्थना करे — ‘सम्पूर्ण भूतों की ईश्वरी पृथ्वीदेवी! तुम पर्वतों के आसन से सुशोभित हो; चारों ओर समुद्रों से घिरी हुई हो; एकान्त में गर्भ धारण करो। वसिष्ठकन्या नन्दा! वसुओं और प्रजाओं के सहित तुम मुझे आनन्दित करो। भार्गवपुत्री जया! तुम प्रजाओं को विजय दिलानेवाली हो। (मुझे भी विजय दो।) अङ्गिरा की पुत्री पूर्णा! तुम मेरी कामनाएँ पूर्ण करो। महर्षि कश्यप की कन्या भद्रा! तुम मेरी बुद्धि कल्याणमयी कर दो। सम्पूर्ण बीजों से युक्त और समस्त रत्नों एवं औषधों से सम्पन्न सुन्दरी जया देवी तथा वसिष्ठपुत्री नन्दा देवी! यहाँ आनन्दपूर्वक रम जाओ। हे कश्यप की कन्या भद्रा! तुम प्रजापति की पुत्री हो, चारों ओर फैली हुई हो, परम महान् हो; साथ ही सुन्दरी और सुकान्त हो, इस गृह में रमण करो। हे भार्गवी देवी ! तुम परम आश्चर्यमयी हो; गन्ध और माल्य आदि से सुशोभित एवं पूजित हो; लोकों को ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली देवि! तुम इस गृह में रमण करो। इस देश के सम्राट, इस नगर के राजा और इस घर के मालिक के बाल-बच्चों को तथा मनुष्य आदि प्राणियों को आनन्द देने के लिये पशु आदि सम्पदा की वृद्धि करो।’ इस प्रकार प्रार्थना करके वास्तु-कुण्ड को गोमूत्र से सींचना चाहिये ॥ १८-२८ ॥ यह सब विधि पूर्ण करके कुण्ड में गर्भ को स्थापित करे। यह गर्भाधान रात में होना चाहिये। उस समय आचार्य को गौ-वस्त्र आदि दान करे तथा अन्य लोगों को भोजन दे। इस प्रकार गर्भपात्र रखकर और ईंटों को भी रखकर उस कुण्ड को भर दे। तत्पश्चात् मन्दिर की ऊँचाई के अनुसार प्रधानदेवता के पीठ का निर्माण करे। ‘उत्तम पीठ’ वह है, जो ऊँचाई में मन्दिर के आधे विस्तार के बराबर हो। उत्तम पीठ की अपेक्षा एक चौथाई कम ऊँचाई होने पर मध्यम पीठ कहलाता है और उत्तम पीठ की आधी ऊँचाई होने पर ‘कनिष्ठ पीठ’ होता है। पीठ-बन्ध के ऊपर पुनः वास्तुयाग (वास्तुदेवता का पूजन) करना चाहिये। केवल पाद-प्रतिष्ठा करनेवाला मनुष्य भी सब पापों से रहित होकर देवलोक में आनन्द-भोग करता है ॥ २९-३२ ॥ मैं देवमन्दिर बनवा रहा हूँ, ऐसा जो मन से चिन्तन भी करता है, उसका शारीरिक पाप उसी दिन नष्ट हो जाता है। फिर जो विधिपूर्वक मन्दिर बनवाता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है? जो आठ ईंटों का भी देवमन्दिर बनवाता है, उसके फल की सम्पत्ति का भी कोई वर्णन नहीं कर सकता। इसी से विशाल मन्दिर बनवाने से मिलनेवाले महान् फल का अनुमान कर लेना चाहिये ॥ ३३-३५ ॥ गाँव के बीच में अथवा गाँव से पूर्वदिशा में यदि मन्दिर बनवाया जाय तो उसका दरवाजा पश्चिम की ओर रखना चाहिये और सब कोणों में से किसी ओर बनवाना हो तो गाँव की ओर दरवाजा रखे। गाँव से दक्षिण, उत्तर या पश्चिमदिशा में मन्दिर बने, तो उसका दरवाजा पूर्वदिशा की ओर रखना चाहिये ॥ ३६-३७ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘सर्वशिलाविन्यासविधान आदि का कथन’ नामक इकतालीसवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥ 1. . कलश की स्थापना। 2. . ईंट या पत्थर की स्थापना। 3. . तन्त्र के अनुसार निम्नाकित पांच वृक्षों का कषाय — जामुन, सेमर, खिरैंटी, मौलसिरी और बेर। यह कषाय वृक्ष की छाल को पानी में भिगोकर निकाला जाता है और कलश में डालने एवं दुर्गापूजन आदि के काम आता है। 4. . (शुक्लयजुर्वेदः अध्यायः ११ मन्त्राः ५०-५२) ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः । ॐ ता न ऽ ऊर्जे दधातन । ॐ महे रणाय चक्षसे ॥ ५० ॥ ॐ यो वः शिवतमो रसः । ॐ तस्य भाजयतेह नः । ॐ उशतीरीव मातरः ॥ ५१ ॥ ॐ तस्मा ऽ अरं गमाम वः । ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ । ॐ आपो जनयथा च नः ॥ ५२ ॥ 5. . शं नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ आपो॑ भवन्तु पी॒तये॑। शं योर॒भि स्र॑वन्तु नः ॥ (अथर्व०, १। ६। १) 6. . (ऋ०, मं०९, सू०५८ ।१-४) तर॒त्स म॒न्दी धा॑वति॒ धारा॑ सु॒तस्यान्ध॑सः । तर॒त्स म॒न्दी धा॑वति ॥ उ॒स्रा वे॑द॒ वसू॑नां॒ मर्त॑स्य दे॒व्यव॑सः । तर॒त्स म॒न्दी धा॑वति ॥ ध्व॒स्रयो॑: पुरु॒षन्त्यो॒रा स॒हस्रा॑णि दद्महे । तर॒त्स म॒न्दी धा॑वति ॥ आ ययो॑स्त्रिं॒शतं॒ तना॑ स॒हस्रा॑णि च॒ दद्म॑हे । तर॒त्स म॒न्दी धा॑वति ॥ 7. . ऋग्वेद, नवम मण्डल, अध्याय १, २, ३ के सूक्तों को ‘पावमानसूक्त‘ तथा ऋचाओं को ‘पावमानी ऋचाएं कहते हैं। 8. . उदु॑त्त॒मं व॑रुण॒ पाश॑म॒स्मदवा॑ध॒मं वि म॑ध्य॒म श्र॑थाय। अथा॑ व॒यमा॑दित्य व्र॒ते तवाना॑गसो॒ऽअदि॑तये स्याम ॥ (यजु०, १२।१२) 9. . कया॑ नश्चि॒त्रऽ आ भु॑वदू॒ती स॒दावृ॑धः॒ सखा॑। कया॒ शचि॑ष्ठया वृ॒ता ॥ (यजु०, ३६। ४) 10. . वरु॑णस्यो॒त्तम्भ॑नमसि॒ वरु॑णस्य स्कम्भ॒सर्ज॑नी स्थो॒ वरु॑णस्यऽऋत॒सद॑न्यसि॒ वरु॑णस्यऽऋत॒सद॑नमसि॒ वरु॑णस्यऽऋत॒सद॑न॒मासी॑द ॥(यजु०.४।३६) 11. . हंसः शु॑चि॒षद् वसु॑रन्तरिक्ष॒सद्धोता॑ वेदि॒षदति॑थिर्दुरोण॒सत्। नृ॒षद्व॑र॒सदृ॑त॒सद् व्यो॑म॒सद॒ब्जा गो॒जाऽऋ॑त॒जाऽअ॑द्रि॒जाऽऋ॒तं बृ॒हत् ॥ (यजु० १०। २४; कठ० २।२।२) 12. विमला आदि शक्तियों के नाम इस प्रकार है — विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्नी, सत्या, ईशाना तथा अनुग्रहा। Content is available only for registered users. 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