July 14, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 288 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ दो सौ अठासीवाँ अध्याय अश्ववाहन-सार अश्ववाहनसारः भगवान् धन्वन्तरि कहते हैं — सुश्रुत। अब मैं अश्ववाहन का रहस्य और अश्वों की चिकित्सा का वर्णन करूँगा। धर्म, कर्म और अर्थ की सिद्धि के लिये अश्वों का संग्रह करना चाहिये। घोड़े के ऊपर प्रथम बार सवारी करने के लिये अश्विनी, श्रवण, हस्त, उत्तराषाढ़, उत्तरभाद्रपद और उत्तरफाल्गुनी नक्षत्र प्रशस्त माने गये हैं। घोड़ों पर चढ़ने के लिये हेमन्त, शिशिर और वसन्त ऋतु उत्तम हैं। ग्रीष्म, शरद् एवं वर्षा ऋतु में घुड़सवारी निषिद्ध है। घोड़ों को तीखे और लचीले डंडों से न मारे। उनके मुख पर प्रहार न करे। जो मनुष्य घोड़े के मन को नहीं समझता तथा उपायों को जाने बिना ही उसपर सवारी करता है तथा घोड़े को कीलों और अस्थियों से भरे हुए दुर्गम, कण्टकयुक्त, बालू और कीचड़ से आच्छन्न पथ पर, गड्डों या उन्नत भूमियों से दूषित मार्ग पर ले जाता है एवं पीठपर काठी के बिना ही बैठ जाता है, वह मूर्ख अश्व का ही वाहन बनता है, अर्थात् वह अश्व के अधीन होकर विपत्ति में फँस जाता है। कोई बुद्धिमानों में श्रेष्ठ सुकृती अश्ववाहक अश्वशास्त्र को पढ़े बिना भी केवल अभ्यास और अध्यवसाय से ही अश्व को अपना अभिप्राय समझा देता है। अथवा घोड़े के अभिप्राय को समझकर दूसरों को उसका ज्ञान करा देता है। ॥ १-६१/२ ॥’ अश्व को नहलाकर पूर्वाभिमुख खड़ा करे। फिर उसके शरीर में आदि में ‘ॐ’ और अन्त में ‘नमः’ शब्द जोड़कर अपने बीजाक्षर से युक्त मन्त्र बोलकर देवताओं की क्रमशः योजना (न्यास या भावना) करे।1 अश्व के चित्त में ब्रह्मा, बल में विष्णु, पराक्रम में गरुड, पार्श्वभाग में रुद्रगण, बुद्धि में बृहस्पति, मर्मस्थान में विश्वेदेव, नेत्रावर्त और नेत्र में चन्द्रमा सूर्य, कानों में अश्विनीकुमार, जठराग्नि में स्वधा, जिह्वा में सरस्वती, वेग में पवन, पृष्ठभा गमें स्वर्गपृष्ठ, खुराग्र में समस्त पर्वत, रोमकूपों में नक्षत्रगण, हृदय में चन्द्रकला, तेज में अग्नि, श्रोणिदेश में रति, ललाट में जगत्पति, हेषित (हिनहिनाहट) – में नवग्रह एवं वक्षःस्थल में वासुकि का न्यास करे। अश्वारोही उपवासपूर्वक अश्व की अर्चना करे एवं उसके दक्षिण कर्ण में निम्नलिखित मन्त्र का जप करे ॥ ७-१२ ॥ हय गन्धर्वराजस्त्वं श्रृणुष्व वचनं मम । गन्धर्वकुलकजातस्त्वं माभूस्त्वं कुलदूषकः ॥ द्विजानां सत्यवाक्येन सोमस्य गरुडस्य च । रुद्रस्य वरुणस्यैव पवनस्य बलेन च ॥ हुताशनस्य दीप्त्या च स्मर जाति तुरङ्गम । स्मर राजेन्द्रपुत्रस्त्वं सत्यवाक्यमनुस्मर ॥ समर त्वं वारुणीं कन्यां स्मर त्वं कौस्तुभं मणिं । क्षीरोदसागरे चैव मथ्यमाने सुरासुरैः ॥ तत्र देवकुले जातः स्ववाक्यं परिपालय । कुले जातस्त्वमश्वानां मित्रं मे भव शाश्वतम् ॥ श्रृणु मित्र त्वमेतच्च सिद्धो मे भव वाहन । विजयं रक्ष माञ्चैव समरे सिद्धिमावह ॥ तव पृष्ठं समारुह्य हता दैत्याः सुरैः पुरा । अधुना त्वां समारुह्य जेष्यामि रिपुवाहिनीं ॥ “तुरंगम ! तुम गन्धर्वराज हो। मेरे वचन को सुनो। तुम गन्धर्वकुल में उत्पन्न हुए हो। अपने कुल को दूषित न करना। अश्व ! ब्राह्मणों के सत्यवचन, सोम, गरुड, रुद्र, वरुण और पवन के बल एवं अग्नि के तेज से युक्त अपनी जाति का स्मरण करो। याद करो कि ‘तुम राजेन्द्रपुत्र हो।’ सत्यवाक्य का स्मरण करो। वरुणकन्या वारुणी और कौस्तुभमणि को याद करो। जब दैत्यों और देवताओं द्वारा क्षीरसमु द्रका मन्थन हो रहा था, उस समय तुम देवकुल में प्रादुर्भूत हुए थे। अपने वाक्य का पालन करो। तुम अश्ववंश में उत्पन्न हुए हो। सदा के लिये मेरे मित्र बनो। मित्र ! तुम यह सुनो। मेरे लिये सिद्ध वाहन बनो। मेरी रक्षा करते हुए मेरी विजय की रक्षा करो। समराङ्गण में मेरे लिये तुम सिद्धिप्रद हो जाओ। पूर्वकाल में तुम्हारे पृष्ठभाग पर आरूढ़ होकर देवताओं ने दैत्यों का संहार किया था। आज मैं तुम्हारे ऊपर आरूढ़ होकर शत्रुसेनाओं पर विजय प्राप्त करूँगा ॥ १३-१९ ॥ अश्वारोही वीर अश्व के कर्ण में उसका जप करके शत्रुओं को मोहित करता हुआ अश्व को युद्धस्थल में लाये और उसपर आरूढ़ हो युद्ध करते हुए विजय प्राप्त करे। श्रेष्ठ अश्वारोही घोड़ों के शरीर से उत्पन्न दोषों को भी प्रायः यत्नपूर्वक नष्ट कर देते हैं तथा उनमें पुनः गुणों का विकास करते हैं। श्रेष्ठ अश्वारोहियों द्वारा अश्व में उत्पादित गुण स्वाभाविक से दीखने लगते हैं। कुछ अश्वारोही तो घोड़ों के सहज गुणों को भी नष्ट कर देते हैं। कोई अश्वों के गुण और कोई उनके दोषों को जानता है वह बुद्धिमान् पुरुष धन्य है, जो अश्व-रहस्य को जानता है। मन्दबुद्धि मनुष्य उनके गुण-दोष दोनों को ही नहीं जानता। जो कर्म और उपाय से अनभिज्ञ है, अश्व का वेगपूर्वक वाहन करने में प्रयत्नशील है, क्रोधी एवं छोटे अपराध पर कठोर दण्ड देता है, वह अश्वारोही कुशल होने पर भी प्रशंसित नहीं होता है। जो अश्वारोही उपाय का जानकार है, घोड़े के चित्त को समझने वाला है, विशुद्ध एवं अश्वदोषों का नाश करने वाला है, वह सम्पूर्ण कर्मों में निपुण सवार सदा गुणों के उपार्जन में लगा रहता है। उत्तम अश्वारोही अश्व को उसकी लगाम पकड़कर बाह्यभूमि में ले जाय। वहाँ उसकी पीठ पर बैठकर दायें-बायें के भेद से उसका संचालन करे। उत्तम घोड़े पर चढ़कर सहसा उस पर कोड़ा नहीं लगाना चाहिये; क्योंकि वह ताड़ना से डर जाता है और भयभीत होने से उसको मोह भी हो जाता है। अश्वारोही प्रातःकाल अश्व को उसकी वल्गा (लगाम) उठाकर प्लुतगति से चलाये। संध्याकाल में यदि घोड़े के पैर में नाल न हो तो लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलाये, अधिक वेग से न दौड़ाये ॥ २०-२८ ॥ ऊपर जो कान में जपने की बात तथा अश्व संचालन के सम्बन्ध में आवश्यक विधि कही गयी है, इससे अश्व को आश्वासन प्राप्त होता है, इसलिये उसके प्रति यह ‘सामनीति’ का प्रयोग हुआ। जब एक अश्व दूसरे अश्व के साथ (रथ आदि में) नियोजित होता है, तो उसके प्रति यह ‘भेद-नीति’ का बर्ताव हुआ। कोड़े आदि से अश्व को पीटना यह उसके ऊपर ‘दण्डनीति’ का प्रयोग है। अश्व को अनुकूल बनाने के लिये जो काल- विलम्ब सहन किया जाता है या उसे चाल सीखने का अवसर दिया जाता है, यह उस अश्व के प्रति ‘दान नीति ‘का प्रयोग समझना चाहिये ॥ २९ ॥ पूर्व-पूर्व नीति की शुद्धि (सफल उपयोग) हो जाने पर उत्तरोत्तर नीति का प्रयोग करे। घोड़े की जिह्वा के नीचे बिना योग के ग्रन्थि बाँधे। अधिक से अधिक सौगुने सूत को बँटकर बनायी गयी वल्गा (लगाम को) घोड़े के दोनों गल्फरों में घुसा दे। फिर धीरे-धीरे वाहन को भुलावा देकर लगाम ढीली करे। जब घोड़े की जिह्वा आहीनावस्था को प्राप्त हो, तब जिह्वातल की ग्रन्थि खोल दे। जबतक अश्व स्तोभ (स्थिरता)- का त्याग न करे, तबतक गाढ़ता का मोचन करे लगाम को अधिक न कसे। उरस्त्राण को तबतक खूब कसा कसा रखे, जबतक अश्व मुख से लार गिराता रहे। जो स्वभाव से ही ऊपर मुँह किये रहे, उसी अश्व का उरस्त्राण खूब कसकर श्रेष्ठ घुड़सवार उसे अपनी दृष्टि के संकेत पर लीलापूर्वक चला सकता है ॥ ३०-३३१/२ ॥ जो पहले घोड़े के पिछले दायें पैर से दाईं वल्गा संयोजित कर देता है, उसने उसके दायें पैर को काबू में कर लिया। इसी क्रम से जो बायीं वल्गा से घोड़े के बायें पैर को संयुक्त कर देता है, उसने भी उसके वाम पैर पर नियन्त्रण पा लिया। यदि अगले पैर परित्यक्त हुए तो आसन सुदृढ़ होता है। जो पैर दुष्कर मोटनकर्म में अपहृत हो गये, अथवा बायें पैर में हीन अवस्था आ गयी, उस स्थिति का नाम ‘नाटकायन’ है। हनन और गुणन कर्मों में ‘खलीकार’ होता है। बारंबार मुख व्यावर्तन अश्व का स्वभाव है। ये सब लक्षण उसके पैरों पर नियन्त्रण पाने के कारणभूत नहीं हैं। जब देख ले कि घोड़ा पूर्णतः विश्वस्त हो गया है, तब आसन को जोर से दबाकर अपना पैर उसके मुख से अड़ा दे; ऐसा करके उसकी ग्राह्यता का अवलोकन हितकारी होता है। रानों द्वारा जोर से दबाकर लगाम खींचकर उसके बन्धन से जो घोड़े के दो पैरों को गृहीत आकर्षित किया जाता है, वह ‘उद्वक्कन’ कहलाता है। लगाम से घोड़े के चारों पैरों को संयुक्त कर उसे यथेष्ट ढीली करके बाह्य पाणिभागों के प्रयोग से जहाँ घोड़े को मोड़ा जाता है, उसे ‘मोट्टन’ (या ताड़न) माना गया है ॥ ३४-४१ ॥ बुद्धिमान् घुड़सवार इस क्रम से प्रलय तथा अविप्लव को जान ले। फिर चतुर्थ मोटन क्रिया द्वारा इस विधि का सम्पादन होता है। जो घोड़ा लघुमण्डल में मोटन और उद्वक्कन द्वारा अपने पैर को भूमि पर नहीं रखता भूमिस्पर्शक बिना ही चक्कर पूरा कर लेता है, वह सफल माना गया है; उसे इस प्रकार की पादगति ग्रहण करानी- सिखानी चाहिये। आसन में खूब कसकर निबद्ध करके जिसे शिक्षा दी जाती है, तथापि जो मन्दगति से ही चलता है, फिर संग्रहण करके (पकड़कर) जिसे अभीष्ट चाल ग्रहण करायी जाती है, उसकी उस शिक्षणक्रिया को ‘संग्रहण’ कहा गया है। जो घोड़ा स्थान में स्थित होकर भी व्यग्रचित्त हो जाय और उसके पार्श्वभाग में ऐंड़ लगाकर लगाम खींचकर उसे कण्टकपान (लगाम के लोहे का आस्वादन) कराया जाय तथा इस प्रकार पार्श्वभाग में किये गये इस पाद-प्रहार से जो खलीकृत होकर चाल सीखे, उसका वह शिक्षण ‘खलीकार’ माना गया है। तीनों प्रकार की गतियों से भी जो मनोवाञ्छित पैर (चाल) नहीं पकड़ पाता है, उस दशा में डंडे से मारकर जहाँ वह पादग्रहण कराया जाता है, वह क्रिया ‘हनन’ कही गयी है ॥ ४२-४७ ॥ जब दूसरी वल्गा (लगाम) के द्वारा चार बार खलीकृत करके अश्व को अन्यत्र ले जाकर उच्छ्वासित करके वह चाल ग्रहण करायी जाती है, तब उस क्रिया को ‘उच्छास’ नाम दिया जाता है। स्वभाव से ही अश्व अपना मुख बाह्य दिशा की ओर घुमा देता है। उसे यत्नपूर्वक उसी दिशा की ओर मोड़कर, वहीं नियुक्त करके जब अश्व को वैसी गति ग्रहण करायी जाती है, तब इस यत्न को ‘मुखव्यावर्तन’ कहते हैं। क्रमशः तीनों ही गतियों में चलने की रीति ग्रहण कराकर फिर उसे मण्डल आदि पञ्चधाराओं में चलने का अभ्यास कराये। ऊपर उठे हुए मुख से लेकर घुटनों तक जब अश्व शिथिल हो जाय, तब उसे गति की शिक्षा देने के लिये बुद्धिमान् पुरुष उसके ऊपर सवारी करे तथा जबतक उसके अङ्गों में हल्कापन या फुर्ती न आ जाय, तबतक उसे दौड़ाता रहे। जब घोड़े की गर्दन कोमल, मुख हलका और शरीर की सारी संधियाँ शिथिल हो जायें, तब वह सवार के वश में होता है; उसी अवस्था में अश्व का संग्रह करे। जब वह पिछला पाद (गति-ज्ञान) न छोड़े, तब वह साधु (अच्छा) अश्व होता है। उस समय दोनों हाथों से लगाम खींचे। लगाम खींचकर ऐसा कर दे, जिससे घोड़ा ऊपर की और गर्दन उठाकर एक पैर से खड़ा हो जाय। जब भूतल पर स्थित हुए पिछले दोनों पैर आकाश में उठे हुए दोनों अग्रिम पैरों के आश्रय बन जायें, उस समय अश्व को मुट्ठी से संधारण करे। सहसा इस प्रकार खींचने पर जो घोड़ा खड़ा नहीं होता, शरीर को झकझोरने लगता है, तब उसको मण्डलाकार दौड़ाकर साधे — वश में करे। जो घोड़ा कंधा कँपाने लगे, उसे लगाम से खींचकर खड़ा कर देना चाहिये ॥ ४८-५६ ॥ गोबर, नमक और गोमूत्र का क्वाथ बनाकर उसमें मिट्टी मिला दे और घोड़े के शरीर पर उसका लेप करे। यह मक्खी आदि के काटने की पीड़ा तथा थकावट को दूर करने वाला है। सवार को चाहिये कि वह ‘भद्र’ आदि जाति के घोड़ों को माँड़ दे। इससे सूक्ष्म कीट आदि के दंशन का कष्ट दूर होता है। भूख के कारण घोड़ा उत्साहशून्य हो जाता है, अतः माँड़ देना इसमें भी लाभदायक है। घोड़े को उतनी ही शिक्षा देनी चाहिये, जिससे वह वशीभूत हो जाय। अधिक सवारी में जोते जाने पर घोड़े नष्ट हो जाते हैं। यदि सवारी ली ही न जाय तो वे सिद्ध नहीं होते। उनके मुख को ऊपर की ओर रखते हुए ही उनपर सवारी करे। मुट्ठी को स्थिर रखते हुए दोनों घुटनों से दबाकर अश्व को आगे बढ़ाना चाहिये। गोमूत्राकृति, वक्रता, वेणी, पद्ममण्डल और मालिका — इन चिह्नों से युक्त अश्व ‘पञ्चोलूखलिक’ कहे गये हैं। ये कार्य में अत्यन्त गर्वीले कहे गये हैं। इनके छः प्रकार के लक्षण बताये जाते हैं — संक्षिप्त, विक्षिप्त, कुञ्चित, आञ्चित, वल्गित और अवल्गित। गली में या सड़क पर सौ धनुष की दूरी तक दौड़ाने पर ‘भद्र’ जातीय अश्व सुसाध्य होता है। ‘मन्द’ अस्सी धनुष तक और ‘दण्डैकमानस’ नब्बे धनुष तक चलाया जाय तो साध्य होता है। ‘मृगजङ्ख्य’ या मृगजातीय अश्व संकर होता है; वह इन्हीं के समन्वय के अनुसार अस्सी या नब्बे धनुष की दूरी तक हाँकने पर साध्य होता है ॥ ५७-६३ ॥ शक्कर, मधु और लाजा (धान का लावा) खाने वाला ब्राह्मणजातीय अश्व पवित्र एवं सुगन्धयुक्त होता है, क्षत्रिय अश्व तेजस्वी होता है, वैश्य अश्व विनीत और बुद्धिमान् हुआ करता है और शूद्र- अश्व अपवित्र, चञ्चल, मन्द, कुरूप, बुद्धिहीन और दुष्ट होता है। लगाम द्वारा पकड़ा जाने पर जो अश्व लार गिराने लगे, उसे रस्सी और लगाम खोलकर पानी की धारा से नहलाना चाहिये। अब अश्व के लक्षण बताऊँगा, जैसा कि शालिहोत्र ने कहा था ॥ ६४-६६ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें ‘अश्ववाहन-सार-वर्णन’ नामक दो सौ अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८८ ॥ 1. यथा — ‘ॐ ब्रह्मणे नमः चित्ते ।’, ‘ॐ विं विष्णवे नमः बले ।’ इत्यादि Content is available only for registered users. 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