July 25, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 374 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चौहत्तरवाँ अध्याय ध्यान ध्यानम् अग्निदेव कहते हैं — मुने ! ‘ध्यै चिन्तायाम्’ — यह धातु है। अर्थात् ‘ध्यै’ धातु का प्रयोग चिन्तन के अर्थ में होता है। (‘ध्यै’ से ही ‘ध्यान’ शब्द की सिद्धि होती है) अतः स्थिरचित्त से भगवान् विष्णु का बारंबार चिन्तन करना ‘ध्यान’ कहलाता है। समस्त उपाधियों से मुक्त मनसहित आत्मा का ब्रह्मविचार में परायण होना भी ‘ध्यान’ ही है। ध्येयरूप आधार में स्थित एवं सजातीय प्रतीतियों से युक्त चित्त को जो विजातीय प्रतीतियों से रहित प्रतीति होती है, उसको भी ‘ध्यान’ कहते हैं। जिस किसी प्रदेश में भी ध्येय वस्तु के चिन्तन में एकाग्र हुए चित्त को प्रतीति के साथ जो अभेद—भावना होती है, उसका नाम भी ‘ध्यान’ है। इस प्रकार ध्यानपरायण होकर जो अपने शरीर का परित्याग करता है, वह अपने कुल, स्वजन और मित्रों का उद्धार करके स्वयं भगवत्स्वरूप हो जाता है। इस तरह जो प्रतिदिन एक या आधे मुहूर्त तक भी श्रद्धापूर्वक श्रीहरि का ध्यान करता है, वह भी जिस गति को प्राप्त करता है, उसे सम्पूर्ण महायज्ञों के द्वारा भी कोई नहीं पा सकता ॥ १-६ ॥’ तत्त्ववेत्ता योगी को चाहिये कि वह ध्याता, ध्यान, ध्येय तथा ध्यान का प्रयोजन — इन चार वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करके योग का अभ्यास करे। योगाभ्यास से मोक्ष तथा आठ प्रकार के महान् ऐश्वर्यों (अणिमा आदि सिद्धियों) की प्राप्ति होती है। जो ज्ञान-वैराग्य से सम्पन्न, श्रद्धालु, क्षमाशील, विष्णुभक्त तथा ध्यान में सदा उत्साह रखने वाला हो, ऐसा पुरुष ही ‘ध्याता’ माना गया है। ‘व्यक्त और अव्यक्त, जो कुछ प्रतीत होता है, सब परम ब्रह्म परमात्मा का ही स्वरूप है’ इस प्रकार विष्णु का चिन्तन करना ‘ध्यान’ कहलाता है। सर्वज्ञ परमात्मा श्रीहरि को सम्पूर्ण कलाओं से युक्त तथा निष्कल जानना चाहिये। अणिमादि ऐश्वर्यों की प्राप्ति तथा मोक्ष — ये ध्यान के प्रयोजन हैं। भगवान् विष्णु ही कर्मों के फल की प्राप्ति कराने वाले हैं, अतः उन परमेश्वर का ध्यान करना चाहिये। वे ही ध्येय हैं। चलते-फिरते, खड़े होते, सोते-जागते, आँख खोलते और आँख मींचते समय भी, शुद्ध या अशुद्ध अवस्था में भी निरन्तर परमेश्वर का ध्यान करना चाहिये ॥ ७-१११/२ ॥ अपने देहरूपी मन्दिर के भीतर मन में स्थित हृदयकमलरूपी पीठ के मध्यभाग में भगवान् केशव की स्थापना करके ध्यानयोग के द्वारा उनका पूजन करे। ध्यानयज्ञ श्रेष्ठ, शुद्ध और सब दोषों से रहित है। उसके द्वारा भगवान् का यजन करके मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है। बाह्यशुद्धि से युक्त यज्ञों द्वारा भी इस फल की प्राप्ति नहीं हो सकती। हिंसा आदि दोषों से मुक्त होने के कारण ध्यान अन्तःकरण की शुद्धि का प्रमुख साधन और चित्त को वश में करने वाला है। इसलिये ध्यानयज्ञ सबसे श्रेष्ठ और मोक्षरूपी फल प्रदान करने वाला है; अतः अशुद्ध एवं अनित्य बाह्य साधन यज्ञ आदि कर्मों का त्याग करके योग का ही विशेषरूप से अभ्यास करे। पहले विकारयुक्त, अव्यक्त तथा भोग्य-भोग से युक्त तीनों गुणों का क्रमशः अपने हृदय में ध्यान करे। तमोगुण को रजोगुण से आच्छादित करके रजोगुण को सत्त्वगुण से आच्छादित करे। इसके बाद पहले कृष्ण, फिर रक्त, तत्पश्चात् श्वेतवर्ण वाले तीनों मण्डलों का क्रमशः ध्यान करे। इस प्रकार जो गुणों का ध्यान बताया गया, वह ‘अशुद्ध ध्येय’ है। उसका त्याग करके ‘शुद्ध ध्येय’ का चिन्तन करे। पुरुष (आत्मा) सत्त्वोपाधिक गुणों से अतीत चौबीस तत्त्वों से परे पचीसवाँ तत्त्व है, यह ‘शुद्ध ध्येय’ है। पुरुष के ऊपर उन्हीं की नाभि से प्रकट हुआ एक दिव्य कमल स्थित है, जो प्रभु का ऐश्वर्य ही जान पड़ता है। उसका विस्तार बारह अंगुल है। वह शुद्ध, विकसित तथा श्वेत वर्ण का है। उसका मृणाल आठ अंगुल का है। उस कमल के आठ पत्तों को अणिमा आदि आठ ऐश्वर्य जानना चाहिये। उसकी कर्णिका का केसर ‘ज्ञान’ तथा नाल ‘उत्तम वैराग्य’ है। ‘विष्णु—धर्म’ ही उसकी जड़ है। इस प्रकार कमल का चिन्तन करे। धर्म, ज्ञान, वैराग्य एवं कल्याणमय ऐश्वर्य स्वरूप उस श्रेष्ठ कमल को, जो भगवान् का आसन है, जानकर मनुष्य अपने सब दुःखों से छुटकारा पा जाता है। उस कमलकर्णिका के मध्यभाग में ओङ्कारमय ईश्वर का ध्यान करे। उनकी आकृति शुद्ध दीपशिखा के समान देदीप्यमान एवं अँगूठे के बराबर है। वे अत्यन्त निर्मल हैं। कदम्बपुष्प के समान उनका गोलाकार स्वरूप तारा की भाँति स्थित है। अथवा कमल के ऊपर प्रकृति और पुरुष से भी अतीत परमेश्वर विराजमान हैं, ऐसा ध्यान करे तथा परम अक्षर ओंकार का निरन्तर जप करता रहे। साधक को अपने मन को स्थिर करने के लिये पहले स्थूल का ध्यान करना चाहिये। फिर क्रमशः मन के स्थिर हो जाने पर उसे सूक्ष्म तत्त्व के चिन्तन में लगाना चाहिये ॥ १२-२६१/२ ॥ (अब कमल आदि का ध्यान दूसरे प्रकार से बतलाया जाता है —) नाभि-मूल में स्थित जो कमल की नाल है, उसका विस्तार दस अंगुल है। नाल के ऊपर अष्टदल कमल है, जो बारह अंगुल विस्तृत है। उसकी कर्णिका के केसर में सूर्य, सोम तथा अग्नि — तीन देवताओं का मण्डल है। अग्नि मण्डल के भीतर शङ्ख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण करने वाले चतुर्भुज विष्णु अथवा आठ भुजाओं से युक्त भगवान् श्रीहरि विराजमान हैं। अष्टभुज भगवान् के हाथों में शङ्ख चक्रादि के अतिरिक्त शार्ङ्गधनुष, अक्षमाला, पाश तथा अङ्कुश शोभा पाते हैं। उनके श्रीविग्रह का वर्णं श्वेत एवं सुवर्णक समान उद्दीप्त है। वक्षःस्थल में श्रीवत्स का चिह्न और कौस्तुभमणि शोभा पा रहे हैं। गले में वनमाला और सोने का हार है। कानों में मकराकार कुण्डल जगमगा रहे हैं। मस्तक पर रत्नमय उज्वल किरीट सुशोभित हैं। श्रीअङ्गों पर पीताम्बर शोभा पाता है। वे सब प्रकार के आभूषणों से अलंकृत हैं। उनका आकार बहुत बड़ा अथवा एक बिते का है। जैसी इच्छा हो, वैसी ही छोटी या बड़ी आकृति का ध्यान करना चाहिये। ध्यान के समय ऐसी भावना करे कि ‘मैं ज्योतिर्मय ब्रह्म हूँ —मैं ही नित्यमुक्त प्रणवरूप वासुदेवसंज्ञक परमात्मा हूँ।’ ध्यान से थक जाने पर मन्त्र का जप करे और जप से थकने पर ध्यान करे। इस प्रकार जो जप और ध्यान आदि में लगा रहता है, उसके ऊपर भगवान् विष्णु शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं। दूसरे दूसरे यज्ञ जपयज्ञ की सोलहवों कला के बराबर भी नहीं हो सकते। जप करने वाले पुरुष के पास आधि, व्याधि और ग्रह नहीं फटकने पाते। जप करने से भोग, मोक्ष तथा मृत्यु विजयरूप फल की प्राप्ति होती है ॥ २७-३५ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ध्याननिरूपण’ नामक तीन सौ चौहत्तर अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७४ ॥ Content is available only for registered users. 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