अग्निपुराण – अध्याय 377
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ सतहत्तरवाँ अध्याय
श्रवण एवं मननरूप ज्ञान
ब्रह्मज्ञानम्

अग्निदेव कहते हैं — अब मैं संसाररूप अज्ञानजनित बन्धन से छुटकारा पाने के लिये ‘ब्रह्मज्ञान’ का वर्णन करता हूँ। ‘यह आत्मा परब्रह्म है और वह ब्रह्म में ही हूँ।’ ऐसा निश्चय हो जाने पर मनुष्य मुक्त हो जाता है। घट आदि वस्तुओं की भाँति यह देह दृश्य होने के कारण आत्मा नहीं है; क्योंकि सो जाने पर अथवा मृत्यु हो जाने पर यह बात निश्चितरूप से समझ में आ जाती है कि ‘देह से आत्मा भिन्न है’। यदि देह ही आत्मा होता तो सोने या मरने के बाद भी पूर्ववत् व्यवहार करताः (आत्मा के) ‘अविकारी’ आदि विशेषणों के समान विशेषण से युक्त निर्विकाररूप में प्रतीत होता। नेत्र आदि इन्द्रियाँ भी आत्मा नहीं हैं; क्योंकि वे ‘करण’ हैं। यही हाल मन और बुद्धि का भी है। वे भी दीपक की भाँति प्रकाश के ‘करण’ हैं, अतः आत्मा नहीं हो सकते। ‘प्राण’ भी आत्मा नहीं है; क्योंकि सुषुप्तावस्था में उसपर जडता का प्रभाव रहता है। जाग्रत् और स्वप्नावस्था में प्राण के साथ चैतन्य मिला-सा रहता है, इसलिये उसका पृथक् बोध नहीं होता; परंतु सुषुप्तावस्था में प्राण विज्ञानरहित है — यह बात स्पष्टरूप से जानी जाती है। अतएव आत्मा इन्द्रिय आदि रूप नहीं है। इन्द्रिय आदि आत्मा के करणमात्र हैं। अहंकार भी आत्मा नहीं है; क्योंकि देह की भाँति वह भी आत्मा से पृथक् उपलब्ध होता है। पूर्वोक्त देह आदि से भिन्न यह आत्मा सबके हृदय में अन्तर्यामीरूप से स्थित है। यह रात में जलते हुए दीपक की भाँति सबका द्रष्टा और भोक्ता है ॥ १-७ ॥’

समाधि के आरम्भकाल में मुनि को इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये — ‘ब्रहा से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी तथा पृथ्वी से सूक्ष्म शरीर प्रकट हुआ है।’ अपञ्चीकृत भूतों से पञ्चीकृत भूतों की उत्पत्ति हुई है। फिर स्थूल शरीर का ध्यान करके ब्रह्म में उसके लय होने की भावना करे। पञ्चीकृत भूत तथा उनके कार्यों को ‘विराट्’ कहते हैं। आत्मा का वह स्थूल शरीर अज्ञान से कल्पित है। इन्द्रियों के द्वारा जो ज्ञान होता है, उसे धीर पुरुष ‘जाग्रत् अवस्था’ मानते हैं। जाग्रत्‌ के अभिमानी आत्मा का नाम ‘विश्व’ है। ये (इन्द्रिय-विज्ञान, जाग्रत् अवस्था और उसके अभिमानी देवता) तीनों प्रणव की प्रथम मात्रा ‘अकारस्वरूप’ हैं। अपञ्चीकृत भूत और उनके कार्य को ‘लिङ्ग’ कहा गया है। सत्रह तत्त्वों (दस इन्द्रिय, पञ्चतन्मात्रा तथा मन और बुद्धि) से युक्त जो आत्मा का सूक्ष्म शरीर है, जिसे ‘हिरण्यगर्भ’ नाम दिया गया है, उसी को ‘लिङ्ग’ कहते हैं। जाग्रत् अवस्था के संस्कार से उत्पन्न विषयों की प्रतीति को ‘स्वप्न’ कहा गया है। उसका अभिमानी आत्मा ‘तैजस’ नाम से प्रसिद्ध है। वह जाग्रत्‌ के प्रपञ्च से पृथक् तथा प्रणव की दूसरी मात्रा ‘उकाररूप’ है। स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीरों का एक ही कारण है — ‘आत्मा’। आभासयुक्त ज्ञान को ‘अध्याहृत ज्ञान’ कहते हैं। इन अवस्थाओं का साक्षी ‘ब्रह्म’ न सत् है, न असत् और न सदसत्-रूप ही है। वह न तो अवयवयुक्त है और न अवयव से रहित; न भिन्न है न अभिन्नः भिन्नाभिन्नरूप भी नहीं है। वह सर्वथा अनिर्वचनीय है। इस बन्धनभूत संसार की सृष्टि करने वाला भी वही है। ब्रह्म एक है और केवल ज्ञान से प्राप्त होता है; कर्मों द्वारा उसकी उपलब्धि नहीं हो सकती ॥ ८-१७ ॥

जब बाह्यज्ञान के साधनभूत इन्द्रियों का सर्वथा लय हो जाता है, केवल बुद्धि की ही स्थिति रहती है, उस अवस्था को ‘सुषुति’ कहते हैं। ‘बुद्धि’ और ‘सुषुप्ति’ दोनों के अभिमानी आत्मा का नाम ‘प्राज्ञ’ है। ये तीनों ‘मकार’ एवं प्रणव रूप माने गये हैं। यह प्राज्ञ ही अकार, उकार और मकार स्वरूप है। ‘अहम्’ पद का लक्ष्यार्थभूत चित्स्वरूप आत्मा इन जाग्रत् और स्वप्न आदि अवस्थाओं का साक्षी है। उसमें अज्ञान और उसके कार्यभूत संसारादिक बन्धन नहीं हैं। ‘मैं नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्य, आनन्द एवं अद्वैतस्वरूप ब्रह्म हूँ। मैं ज्योतिर्मय परब्रह्म हूँ। सर्वथा मुक्त प्रणव (ॐ) वाच्य परमेश्वर हूँ। मैं ही ज्ञान एवं समाधिरूप ब्रह्म हूँ। बन्धन का नाश करने वाला भी मैं ही हूँ। चिरन्तन, आनन्दमय, सत्य, ज्ञान और अनन्त आदि नामों से लक्षित परब्रह्म मैं ही हूँ। ‘यह आत्मा परब्रह्म है, वह ब्रह्म तुम हो’ — इस प्रकार गुरु द्वारा बोध कराये जाने पर जीव यह अनुभव करता है कि मैं इस देह से विलक्षण परब्रह्म हूँ । वह जो सूर्यमण्डल में प्रकाशमय पुरुष है, वह मैं ही हूँ। मैं ही ॐकार तथा अखण्ड परमेश्वर हूँ।’ इस प्रकार ब्रह्म को जानने वाला पुरुष इस असार संसार से मुक्त होकर ब्रह्मरूप हो जाता है ॥ १८-२४ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘ब्रहाज्ञानविरूपण’ नामक तीन सी सतहसरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७७ ॥

Content is available only for registered users. Please login or register

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.