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भक्त ठाकुर श्री किशनसिंह राठौड़
(गारबदेसर, बीकानेर)

बीकानेर राज्य के संस्थापक राव बीकाजी राठौड़ के दो पुत्र हुए लूणकरणजी और घड़सी जी । बडे लूणकरणजी बीकाजी के बाद गद्दी पर बैठे । छोटे घड़सी घडसाना के जागीरदार हुए । घड़सीजी के पुत्र देदलजी को 84 गांव सहित गारबदेसर का तामीजी ठिकाना मिला । देदलजी के पुत्र रायसिंह के दो पुत्र हुए – बाघसिंह जी और किशनसिंह जी । बाघसिंह बडे थे, वे रायसिंह जी के उत्तराधिकारी हुए ।
om, ॐ

किशनसिंह जी भक्ति के प्रबल संस्कार लेकर सं॰ 1647 में माघ सुदी नवमी को जन्मे थे । वे मुरलीधर के बडे भक्त थे । बड़े धर्मनिष्ठ, गो-ब्राह्मण सेवी और दानशील भी थे । प्रतिदिन ब्राह्मणों और गरीबो को भोजन कराकर स्वयं भोजन करना उनका नियम था । सम्भवतः इसी कारण बडे भाई से उनकी अनबन रहती । इसलिए वे गारबदेसर छोड़कर अपने ननिहाल उदयपुर (शेखावाटी) चले गये । वहाँ स्वतन्त्रतापूर्वक भजन-स्मरण में लवलीन रहते । वे मुरलीधर जी की मानसी सेवा किया करते ।
मानसी-सेवा करते-करते उनकी विरहाग्नि भड़क उठी । मुरलीधर के साक्षात् दर्शन की उत्कंठा इतनी तीव्र हो गयी कि दर्शन बिना उनका जीना दूभर हो गया । तब उन्होने संकल्प किया कि जब तक दर्शन न होंगे वे अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे । तीन दिन और रात बीत गये बिना अन्न-जल ग्रहण किये । मामा हीरसिंह और नाना-नानी ने बहुत चेष्टा की कि वे अपना संकल्प त्याग दें । शास्त्रज्ञ पण्डितों ने कहा- ” ये भगवद् दर्शन प्राप्त करने का उपाय नहीं है । भगवान परम स्वतंत्र हैं । हठ करने से नहीं मिलते । यदि इस प्रकार हठ करने से भगवान मिल जाये तो हर कोई प्राप्त करले उन्हें । ” पर वे अपने निश्चय पर दृढ़ रहे । उन्होने कहा- ”आप लोग जो भी कहे, मै अब अन्न-जल तभी ग्रहण करूँगा, जब भगवान दर्शन देंगे । या तो दर्शन होंगे या मृत्यु । मृत्यु तो वैसे भी होनी है, क्योंकि मेरे लिए दर्शन किए बिना प्राण धारण करना सम्भव नहीं है । मेरे लिए दर्शन और मृत्यु दोनों ही कल्याणकारी हैं, क्योंकि दोनो दशाएँ असह्य विरह-वेदना से मुक्ति दिलाने वाली है । ”
किशनसिंह जी का हठ कोरा हठ नहीं था । उनका हठ प्रेम-हठ था । कोरे हठ से भगवान पकड में नहीं आते । पर प्रेम-हठ के आगे उन्हे हार मानकर भक्त का हठ रखना पडता है । प्रेम-रहित हठ करने वाले के आगे भगवान् प्रकट भी हो जायें तो क्या उसे दर्शन हों ? दर्शन तो प्रेम के नेत्रों से ही होते हैं । चर्म-चक्षुओ से दर्शन तो कंस, जरासन्ध, चारूण, मुष्टिक आदि ने भी किये थे, पर क्या उन्हें भगवान के यथार्थ स्वरूप के दर्शन हुए थे ? किशनसिह के प्रेम-हठ की भगवान को रक्षा करनी पड़ी । पर भगवान तो कौतुक-प्रिय और रसिक है न । उनकी प्रत्येक क्रिया कौतुक और रसिकता से परिपूर्ण होती है । उन्होंने किशनसिह जी को दर्शन दिये, पर छद्म वेश मे । वे आये एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर और लगे किशनसिह जी को उपदेश करने । उन्होंने भी कही वही बात । बोले- ‘देखो वत्स, बन्धुच्छ-बान्धवों का कहना मान लो । भगवान् हठ करने से नहीं मिलते । तुम अन्न-जल ग्रहण करो ।’
यह सुनते-सुनते तो किशनसिंह के कान पक गये थे । उन्होने जैसे ब्राह्मण रूपी भगवान् की बात सुनी ही नहीं । न उनका कोई उत्तर दिया, न उनकी ओर प्रक्षेप ही किया । तब भगवान् ने कहा- ”देखो, मै 100 वर्ष का तपस्वी ब्राह्मण हूँ ब्रह्मविद् हूँ इसलिए तुम मेरे दर्शन को ही भगवान् का दर्शन मानकर अपना हठ छोड दो ।”
इस पर भी किशनसिह जी ने भगवान् की ओर प्रक्षेप नहीं किया । वे सिर नीचा किये बैठे रहे । हारकर भगवान् ने कहा- ”वत्स । मैं स्वयं भगवान् हूँ । तुम्हारा कष्ट देखकर मुझसे रहा नहीं गया । इसलिए तुम्हें दर्शन देने चला आया हूँ । अब तुम मेरे दर्शन कर अन्न-जल ग्रहण करो ।”
किशनसिंहजी ने कहा- ‘यदि आप भगवान् हैं तो मैं आपको दण्डवत करता हूँ । पर मैं कैसे जानूँ कि आप सचमुच भगवान् हैं?’
“वत्स, भगवान् सत्यस्वरूप है । वे झूठ नहीं बोलते । इसलिए मेरी बात का विश्वास करो ।”
”यदि आप सचमुच भगवान् है, तो मुझे यह कहने के लिए क्षमा करे कि झूठ तो आप अभी बोल चुके हैं । भागवत् पुराण साक्षी है कि आप झूठ ही अधिक बोलते हैं, सत्य कम । शास्त्र कहते हैं कि आपके लिए झूठ और सत्य दोनों समान हैं । आप सत्यस्वरूप इसलिए तो है कि आपका झूठ भी सत्य होता है । ”
भगवान् शायद भक्त से यही कहलाना चाहते थे कि वे झूठे हैं उन्हे भक्त के मुख से अपनी निन्दा सुन जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी स्तुति सुनकर भी नहीं होती उन्होंने प्रसन्न होकर तब कहा- “अच्छा, तो लौ मेरे साक्षात् दर्शन करो और वर माँगो ।”
उसी समय किशनसिह जी ने देखा अपनी नील और कोटि चन्द्रमा के समान सुशीलता, कमनीय छटा बिखेरते हुए प्रसन्न मुद्रा मे अपने सामने खडे मोर-मुकुट पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण ।
किशनसिह एकटक प्रभु की और देखते रहे उनका सारा शरीर रोमांचित और पुलकित हो गया । नेत्रों से अश्रुधारा बह चली । गद्‌गद् कण्ठ से अस्फुट स्वर मे ”प्रभु, प्रभु । ” कहते हुए वे उनके चरणों मे गिर पडे । प्रभु ने स्नेह से उन्हें उठाते हुए वर माँगने को कहा ।
किशनसिंह ने कहा- ”प्रभु । वर क्या माँगू ? माँगने को क्या कुछ बाकी रहा ? यदि देना है तो यह वर दें कि आपके चरणों मे मेरी भक्ति बनी रहे और मैं जब भी आपका स्मरण करूँ आप इसी रूप में मुझे दर्शन दें ।”
प्रभु ने कहा- ”तथास्तु” पर उन्हें इतने से सन्तोष कहाँ ? उन्होंने एक शालग्राम शिला देते हुए कहा- ”इसकी सेवा करना । तुम्हारी गो-ब्राह्मण और सन्तों की सेवा मे रुचि है न । उसके लिये यह शिला नित्य सवा मासा स्वर्ण उगला करेगी, जिससे तुम्हारी सेवा अबाध गति से और खुले हस्त से होती रहेगी । और देखो, तुम आज ही गारबदेसर चले जाओ और वहाँ का राज-काज संभालो ।”
“गारबदेसर मे तो मेरा भाई बाघसिंह का राज्य है प्रभु ।” किशनसिंह ने आश्चर्य से कहा ।
प्रभु ने आश्वस्त करते हुए कहा- ”आज से चौथे दिन बाघसिंह युद्ध में मारा जायेगा । तुम्हारा राजतिलक होगा । इतना कह प्रभु अन्तर्धान हो गये 1
किशनसिंह जी प्रभु के आदेशानुसार उसी दिन गारबदेसर के लिए चल दिये । वे मार्ग में ही थे । जब बाघसिह शत्रु के हाथ से मारे गये । गारबदेसर सरदार बाघसिह के कोई पुत्र न होने के कारण उनके बाद उनके उत्तराधिकारी किशनसिहजी को लिवा लाने के लिए उदयपुर के लिए चल पडे । मार्ग में उनकी किशनसिंह जी की कुबिया ग्राम में भेंट हुई । उन्होंने किशनसिंह जी को जुहार पर भाई के मारे जाने का सब हाल सुनाया और नौबत-नगाडो के साथ आदरपूर्वक ले जाकर राजतिलक करवाया ।
गारबदेसर मे किशनसिह के गद्दी पर बैठते ही न्यायशीलता और धर्मपरायणता के एक स्वर्णिम युग का आरम्भ हुआ । प्रजा की सुख-समृद्धि का अन्त न रहा । किशनसिह जी नित्य षोडशोपचार से सालग्राम का पूजन करते । ‘प्रसिद्ध है कि उन्हे प्रत्येक दिन पूजन के पश्चात् सवा मासा सोना भगवान से मिला करता और वे उक्त सोने को नित्य ब्राह्मणों को दान कर दिया करते । अद्यावधि मूर्ति के अधरोष्ठ पर सोने का चिन्ह है । एक दिन ठकुरानी साहब ने हठ करके सोना अपने पास रख लिया उसके बाद सोना मूर्ति से प्राप्त नही हुआ ।
ठाकुर किशनसिह अब राज-काज तो प्रभु की आज्ञा से औपचारिक रूप में ही करते उनका ध्यान हर समय प्रभु की लीला-चिंतन और उनकी मानसी-सेवा मे लगा रहता ।
एक बार वे बीकानेर के महाराज कर्णसिंहजी के साथ किसी यात्रा में जा रहे थे । मार्ग में पूजा का समय हो गया । तब उन्होंने घोड़े पर बैटे-भैटे एक कपड़ा सिर पर डाला और भगवान् की मानसिक-सेवा करने लगे सेवा मे वे जब भगवान् को दही का भोग लगाने जा रहे थे, महाराजा की उन पर दृष्टि पड़ी । उन्होंने कहा- ”किशनसिंह नींद ले रहे हो क्या ?” पर किशनसिंह को होश कहाँ ? वे ब्रह्मज्ञान शून्य हो सेवा में तल्लीन थे । महाराजा के शब्द उन्हे सुनाई ही नहीं दिये । महाराजा ने तब अपना घोड़ा उनके निकट लाकर उनके वस्त्र खींचे वस्त्र खींचते ही किशनसिह जी के हिल जाने से दही गिर पड़ा महाराजा ने उसे घोडे की काठी और पीठ पर पड़ा देखा । यह देख उन्होंने आश्चर्य से कहा- ‘किशनसिह, यह क्या ?’ किशनसिह जी चुप रहे । पर महाराज के आग्रह करने पर उन्होंने सब बातें उन्हें बता दी । महाराजा को उस दिन से उन पर विशेष श्रद्धा हो गयी । उन्होंने उन्हें अपने साथ कहीं ले जाना बन्द कर दिया और भजन करने के लिए स्वतंत्र छोड दिया ।
मुरलीधर परछाई की तरह सदा किशनसिंह जी के साथ रहते और हर संकट मे उनकी रक्षा करते । एक बार वे सत्यवादिता के कारण बड़े सकट में पड गये । उन्होंने सदा सत्य बोलने का व्रत ले रखा था । उनका कहना था कि जो व्यक्ति सत्य की रक्षा नहीं करता उसे सत्यस्वरूप भगवान नहीं मिलते ।
एक बार दान-दक्षिणा में अधिक खर्च कर देने के कारण वे समय से सरकारी लगान जमा न करा सके । लगान वसूल करने वाले अधिकारी ने तकादा किया तो कहा- ‘आप दीवाली तक और ठहर जावें । मैं दीवाली के पहले लगान जमा करके ही दीवाली का पूजन करूँगा ।’
यह तो कह दिया, पर वे मुरलीधर की मानसिक सेवा-पूजा में इतना डूबे रहते कि देश-काल का ध्यान ही न रहता । दीवाली आ गयी और उन्हे पता नहीं नौकरों-चाकरों को दीपमालिका सजाते देखा तो चौंककर पूछा- ”क्यो दीवाली कब है? उन्होने कहा- ”दीवाली आज ही है सरकार ।” यह सुनते ही उनके सारे शरीर में बिजली-सी कौध गयी (जीवन मे पहली बार अपने वचन की रक्षा न कर सकने के कारण उन्हें आन्तरिक वेदना हुई पर जो होना था सो हो गया । अब दीवाली के दूसरे दिन लगान जमा कराने के लिए वे व्यस्त हो पड़े । जल्दी-जल्दी जहाँ-तहाँ से रुपया इकट्ठा किया और घोड़े पर सवार हो संध्या समय बीकानेर के लिए चल दिये । पहुँचते- पहुँचते सबेरा हो गया ।
लगान जमा करने वाले अधिकारी ने सामने पड़ते ही उसने कहा- “ठाकुर साहब । आप तो कल सबेरे जाने वाले थे, गये नही?”
‘क्या? मै आया कब था, जो जाता? अभी-अभी तो रुपये लेकर चला आ रहा हूँ । मझे खेद है कि अपने वचनानुसार दीवाली के पूर्व लगान जमा न कर सका ।”
अधिकारी ने आश्चर्य से उनकी ओर देखते हुए कहा- ”आप क्या कह रहे हैं ? लगान तो आपने कल ही जमा करा दिया । ”
‘कल? कल शाम तक तो गारबदेसर में था ।’
अधिकारी ने उसी समय बही मंगवाई और उन्हें दिखाते हुए कहा- ”देखिये ठाकुर साहब, यह आपके रुपये जमा हो रहे है । यह आप ही के हस्ताक्षर हैं न ?”
ठाकुर साहब ने आँख गड़ाकर देखते हुए कहा- ”हस्ताक्षर तो बिकुल मेरे ही जैसे है । कहने के साथ ही उनका शरीर रोमांचित हो गया । उनके नेत्रों से अश्रु बिन्दु टपक पडे । उन्हें समझने में देर न लगी कि यह काम किसका है । उनके मुरलीधर के सिवा यह और किसका हो सकता था ? कौन इतनी बड़ी रकम अपने पास से उनके नाम से जमा करा सकता था ? कौन ठीक उनके जैसा बहुरूपिया ऐसा कर भी सकता तो उसे उनके लिए इतना कष्ट उठाने की क्या पडी थी ? पर मुरलीधर का तो यह स्वभाव ही ठहरा वे अपने भक्तों के लिए क्या नहीं करते ? वे उनके आगे-पीछे सब खबर रखते है और उनकी सेवा के लिए तत्पर रहते हैं । वे कभी अपनी सुध-बुध भले ही भूल जाये, भक्तों की सुध नहीं भूलते । अपना कार्य भले ही दूसरों से करा लें, भक्तों का कार्य वे अपने अंशावतारो पर भले ही छोड दें, पर भक्तों को संकट में देख उनके कार्य के लिए सिंहासन छोड़कर स्वयं भागे चले आते हैं । अपने-आप चाहे कितना सच बोलें, चाहे कितना झूठ, किन्तु भक्तों की बात कभी झूठी नहीं पड़ने देते । उनके झूठ को भी सत्य कर देने मे न जाने कितनी आत्मतुष्टि का अनुभव करते हैं । उन्हें तो सुख मिलता है उनकी भांति-भांति से सेवा करने में और उनकी सेवा ग्रहण करने मे वह सुख उन्हें अपने आनन्द स्वरूप से भी नहीं मिलता ।
भाग्यवान अधिकारी को भी इस रहस्य को समझने में देर न लगी । वह समझ गया कि कल भक्तवत्सल भगवान ही अपने भक्त की बात रखने के लिए किशनसिंह जी के रूप में लगान जमा कराने आये थे । वह यह सोच कर अपने भाग्य को सराहने लगा कि किशनसिंह जी के रूप में उसने भगवान के दर्शन किये और उनके हाथ से रुपये लेकर जमा किये ।
इस घटना की खबर महाराजा कर्णसिंह तक पहुँच गयी । किशनसिंह लौटते समय जब उन्हे जुहार करने गये, उन्होंने भावविह्वल हो गद्‌गद कण्ठ से कहा- ”किशनसिह तुम धन्य हो । तुम्हारे कारण मैं भी धन्य हूँ जो भगवान ने मेरे राज्य में पदार्पण किया और मेरे खजाने में राजस्व जमा कर मुझे अनुगृहीत किया । मैं आज से तुम्हारा लगान माफ करता हूँ और तुम्हारा पट्टा दुगना करता हूँ । लगान जमा करने के लिये न तुम्हे कष्ट करना पड़ा करेगा, न तुम्हारे भगवान को ।”
किशनसिह ने गारबदेसर लौटकर लगान के रुपये से मुरलीधर का मन्दिर बनवाया, जो आज तक इस घटना की साक्षी रहा है ।
एक बार और अपने धर्माचरण के कारण ही संकट मे पड़ना पड़ा । उनका मुख्य साधन था नाम-जप ? नाम-जप के साथ ही वे लीला-स्मरण करते । जप के समय न बोलने का नियम दृढता से पालन करते । एक और नियम, जिसका वे दृढ़ता से पालन करते थे, भगवान की शपथ का नियम । यदि कोई उन्हे भगवान की शपथ दिला देता तो उसकी भी पूरी रक्षा करते । यह दोनों बातें सभी लोग जानते । एक बार दो चोर इन दोनों बातों का लाभ उठाकर उनके ऊँट चुरा ले गये । उस समय गर्मी का मौसम था ठाकुर किशनसिंह जी जप कर रहे थे । चोर गये और उनके सामने से दो ऊँट खोल ले गये । जाते समय उनसे कह गये- ”आपको राम दुहाई जो इस बात को किसी से कहे ।”
चोर ऊँट ले गये और किशनसिह जी मौन साधे रहे । पीछे किसी ने पूछा कि ऊँट कौन ले गया, तो हँसकर बोले- ”जिसने देखा वह कहेगा नहीं और जो ले गया वह देगा नहीं ।”
चोर ऊँटो को लेकर दूर भागते गये । सबेरा होने को था तब ऊँटो को पानी पिलाने के लिए एक कुवे पर गये । किसी से पूछा- ”यह कौन गाँव है?” उसने उत्तर दिया- “गारबदेसर ।” वे सुनकर चौंके । ऊँटो को वहीं छोड़कर भाग गये । मुरलीधर ने उन्हे ऐसा दिशा-भ्रम उत्पन्न कर दिया था कि वे रात भर दौड़-भाग करने के बाद गारबदेसर ही लौट आये थे ।
एक बार आ गया अकाल का संकट । गारबदेसर की प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी । किशनसिह जी ने अपना अनाज का सारा भण्डार प्रजा को बाँट दिया । अगली फसल के लिए बीज तक उनके पास न रहा । पर अगली फसल के लिए भी पानी नहीं बरसा । न जाने कौतुकी मुरलीधर को क्या लीला करनी थी, चारों ओर पानी बरसा, पर गारबदेसर में सूखा रहा । संकट बढ़ता दिखाई दिया, तो प्रजा के कुछ लोगो ने किशनसिंह जी से आकर कहा- ”आप यदि भगवान से प्रार्थना करें, तो वृष्टि हो जाये ।”
उन्होंने कहा- “वर्षा तो भगवान के अधीन है उनकी इच्छा होगी तभी बरसेगा मेरे प्रार्थना करने से क्या होगा?”
वर्षा भगवान् के अधीन है । पर भगवान भक्तों के अधीन है । भगवान आपकी प्रार्थना न सुनें यह सम्भव नहीं । इसलिए आप एक बार प्रार्थना अवश्य करें ।’ उन लोगो ने आग्रह करते हुए कहा ।
किशनसिंह उनका आग्रह न टाल सके उन्होने भगवान से प्रार्थना करते हुए कहा-
“सौ कोसा बिजली खिणें, यामें कुण संदेह ।
किसना की तिसना मिटे, जो आंगण बरसे मेह ।।”
उसी समय काली घटा छा गयी, बादल गरजने लगे और घनघोर वृष्टि हो गयी । पर अब खेती के लिए बीज कहाँ से आये ? बीज का भंडार प्रजा की क्षुधा मिटाने में पहले ही समाप्त हो चुका था । बीज के लिये चिन्ता हो रही थी, उसी समय दो ऊँटनियाँ, जिनकी पीठ पर ग्वार, बाजरा और मोठ के बोरे लदे हुए थे, किशनसिंह जी के महल के सामने आ खड़ी हुई । किसकी ऊंटनियां थीं, कहाँ से आयी थी, कोई न जान सका । इसे भी मुरलीधर की लीला समझ लोग उछल-उछल कर मुरलीधर की जय-जयकार करने लगे । किशनसिंहजी ने बीज किसानों में बाँट दिया । जिनके पास खेत जोतने के लिए पशु नहीं थे, उन्हें खेत जोतने को ऊंटनियाँ दे दी । समय पर अच्छी फसल उग आयी । तब जितना अनाज ऊँटनियां लाई थी, उससे सवाया उनकी पीठ पर लाद कर उन्हें उसी ओर चलता कर दिया, जिस ओर से वे आई थी । कुछ दूर एक टीले तक जाकर वे अदृश्य हो गयी ।
मुरलीधर की एक ओर लीला, जो गारबदेसर के लोगों मे किशनसिंह जी के सम्बन्ध में बहुत प्रसिद्ध है, इस प्रकार है-
किशनसिंह का भक्त हृदय जीव मात्र के प्रति दयाभाव से भरा रहता । पर उन्हें कभी-कभी महाराजा के साथ शिकार पर जाना पड़ता, जो उन्हे अच्छा नहीं लगता । एक बार उन्होने शिकार के समय महाराजा के इंगित पर एक गर्भवती हिरनी का पीछा कर तलवार से उसके दो टुकडे कर दिये । उसके पेट के बच्चे के भी दो टुकडे हो गये । मरते समय हिरनी ने जिस करुण दृष्टि से उनकी ओर देखा, वह उनके हृदय में हमेशा के लिये चुभकर रह गयी । उन्होने तत्काल संकल्प किया कि जिस तलवार से उन्होने उस निरपराध असहाय जीव की अकारण हत्या की उस तलवार को ही न रखेंगे । पर तलवार एकदम न रखना उनकी राजपूती शान और सामन्ती मर्यादा के विरुद्ध होता, इसलिये उन्होने म्यान मे गुप्त रूप से लोहे की तलवार की जगह काठ के तलवार रखना प्रारम्भ कर दिया । बहुत दिनो तक किसी को इसका पता न चला । आखिर एक दूसरे सामन्त को, जो उनसे ईर्ष्या करता था, इसका पता चल गया । उसने महाराजा से शिकायत करदी । महाराजा को विश्वास न हुआ, तब उसने जोर देकर कहा- ”आप उनकी तलवार एक बार निकलवा कर देखें तो, यदि काठ की न निकले तो मेरा सिर धड़ से अलग कर दे ।”
महाराजा को सीधे किशनसिह जी से तलवार निकाल कर दिखाने को कहना अपमानजनक लगा । उन्होने एक दिन सामन्तों की सभा मे सभी से विनोद मे कहा- ‘सब अपनी-अपनी तलवार निकाल कर दिखाओ । देखें किसकी ज्यादा चमकती हे । ‘ सबने अपनी-अपनी तलवार निकाली, पर किशनसिंह जी चुप बैठे रहे । महाराजा ने कहा- ”किशनसिंह जी, आप भी अपनी तलवार निकाले ।” किशनसिंह जी को कहना पड़ा- ”मेरी तलवार क्या देखनी महाराज । यह तो काठ की है ।” दूसरे सामन्ती को लगा कि वे व्यंग्य से ऐसा कह रहे हैं, पर महाराजा को सन्देह हुआ । उन्होंने कहा- ‘ नहीं, तुम्हे भी दिखानी होगी, काठ की लोहे की जैसी भी हो । ‘ तब किशनसिंह जी को तलवार निकालनी पड़ी । निकालते ही उसे लोहे की ओर बिजली की तरह चमकती देख वे आश्चर्य में डूब गये । मन ही मन मुरलीधर के भक्तवात्सल्य और उनकी कृपा का स्मरण करते हुए चुपचाप खडे रहे । पर महाराज क्रोध से उस सामन्त पर बिफरते हुए जिसने शिकायत की थी, बोले- ”नीच । तुझे एक वीर और वरिष्ठ सामन्त की तलवार को काठ की बताते लज्जा नहीं आयी ? अब तैयार हो जा अपना सिर उतरवाने को ।”
यह सुन किशनसिंह जी से न रहा गया । उन्होने कहा- ”महाराज । इनका दोष नहीं, मेरी तलवार काठ की ही थी । पर न जाने कैसे मैं स्वयं इस समय लोहे की देखकर विस्मय में डूब रहा हूँ । यह मेरे मुरलीधर के चमत्कार के सिवा और कुछ नहीं हैं । उन्होंने ही मेरी लाज रखने को इसे काठ से लोहे की कर दिया है । मुझे उस दिन शिकार मे निरपराध हिरनी को मार कर बड़ा पश्चाताप हुआ था । तभी से लोहे की तलवार छोड़कर काठ की रखना शुरू कर दिया था ।
महाराब का क्रोध जाता रहा । उनकी श्रद्धा किशनसिह जी और मुरलीधर के प्रति चौगुनी हो गयी । उन्होने किशनसिंह जी से कहा-‘ ‘किशनसिंह जी । अब आपको मेरे साथ शिकार पर जाने की आवश्यकता नहीं । दरबार में आने की भी आवश्यकता नहीं । मै स्वयं ही आपसे मिल लिया करूंगा ।
किशनसिह जी की वह तलवार आज भी गारबदेसर मे सुरक्षित है । दीपावली के दिन आज भी लोग श्रद्धापूर्वक उसके दर्शन कर उस पर माथा टेकते है, क्योंकि वह मुरलीधर की बनाई तलवार है ।
इस प्रकार कौतुकी और लीलामय मुरलीधर ने किशनसिंह जी के साथ न जाने कितनी लीलाएँ की । उनमें से कुछ भक्तों के भाग्य से प्रकाश मे आ गयी, कुछ अप्रकाशित रह गयी । संवत् 1717, चैत सुदी एकादशी को मुरलीधर आये और उन्हें अपने धाम में ले गये ।
राजस्थान के लोग मीराबाई के बाद किशनसिह जी का नाम ही सर्वाधिक श्रद्धा और भक्ति से लेते है ।

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