January 17, 2025 | aspundir | Leave a comment ब्रह्मवैवर्तपुराण – ब्रह्मखण्ड – अध्याय 23 ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः तेईसवाँ अध्याय ब्रह्माजी से सृष्टि के लिये दार-परिग्रह की प्रेरणा पाकर डरे हुए नारद का स्त्री-संग्रह के दोष बताकर तप के लिये जाने की आज्ञा माँगना सौति कहते हैं — सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने अपने सब बालकों को सृष्टि के कार्य में लगाकर नारदजी को भी सृष्टि करने के लिये प्रेरित किया। उन्होंने वेद-वेदाङ्गों के पारंगत विद्वान् नारद से यह सत्य, हितकर, वेदसारस्वरूप और परिणाम में सुख देने वाली बात कही । ब्रह्माजी बोले — कुल में श्रेष्ठ मेरे प्राणवल्लभ पुत्र नारद! आओ। तुम ज्ञानदीप की शिखा से अज्ञानान्धकार का निवारण करने वाले हो । तुमसे यह बात छिपी नहीं है कि जन्मदाता पिता परम गुरु है। वह सभी वन्दनीय पुरुषों में सबसे श्रेष्ठ है । विद्यादाता और मन्त्र-दाता दोनों समान हैं तथा पिता से भी बढ़कर हैं। बेटा! मैं तुम्हारा पिता, पालक, विद्यादाता एवं मन्त्रदाता भी हूँ । तुम मेरी आज्ञा से मेरी ही प्रसन्नता के लिये विवाह कर लो। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ब्रह्माजी की यह बात सुनकर मुनिवर नारद के कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये। वे भयभीत होकर विनयपूर्वक बोले । नारदजी ने कहा — तात! वही पिता, वही गुरु, वही बन्धु, वही पुत्र और वही मेरा ईश्वर है, जो भगवान् श्रीकृष्ण के चरणारविन्दों में सुदृढ़ भक्ति उत्पन्न करा दे। स पिता स गुरुर्बन्धुः स पुत्रः स मदीश्वरः । यः श्रीकृष्णपादपद्मे दृढां भक्तिं च कारयेत् ॥ (ब्रह्मखण्ड २३ । १७) यदि बालक अज्ञानवश कुमार्ग पर चल रहे हों तो उन्हीं को जो उस मार्ग से हटाता है, वही करुणानिधान पिता है । जो श्रीकृष्ण – चरणों में लगी हुई भक्ति का त्याग कराकर पुत्र को दूसरे किसी विषय में लगाये, वह कैसा पिता है ? स्त्री-संग्रह केवल दुःख का ही कारण है। उससे सुख नहीं मिलता। वह तपस्या, स्वर्ग, भक्ति, मुक्ति एवं सत्कर्मों में विघ्न उपस्थित करने वाला है। ब्रह्मन् ! मूढ-चित्त गृहस्थों के घरों में तीन प्रकार की स्त्रियाँ पायी जाती हैं – साध्वी, भोग्या और कुलटा । वे सब की सब स्वार्थपरायणा होती हैं। साध्वी स्त्री परलोक के भय से, इस लोक में अपने को यश मिलने के लोभ से तथा कामासक्ति से भी निरन्तर स्वामी की सेवा करती है । भोग्या स्त्री भोग की अभिलाषिणी होती है । वह सदा केवल कामासक्ति से ही प्रियतम पति की सेवा करती है । भोग के सिवा और किसी हेतु से वह क्षण भर भी सेवा नहीं करती । भोग्या स्त्री जब तक वस्त्र, आभूषण, सम्भोग तथा सुस्निग्ध एवं उत्तम आहार पाती है, तब तक ही स्वामी के वश में रहकर प्यारी बनी रहती है। कुलटा नारी कुल में अंगार के समान है। वह कुल का नाश करने वाली है । कुलटा स्त्री कपट से ही स्वामी की सेवा करती है, भक्ति से नहीं । वे अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिये सुधा के समान मधुर वचन बोलती हैं। क्रोध होने पर उनके मुख से विष के समान दुःसह वचन निकलता है । यदि उनकी बात पर विश्वास किया जाय तब तो सर्वनाश ही हो जाता है । उनके अभिप्राय को समझना बहुत कठिन है । केवल उनका कर्म छिपा होता है। सर्वज्ञ ! आप सब कुछ जानते हैं; क्योंकि आत्माराम पुरुषों के ईश्वर हैं । प्रभो ! मुझ पर अनुग्रह कीजिये और अब मुझे विदा दीजिये। आप कल्पवृक्ष से भी बढ़कर हैं। मैं आपसे श्रीकृष्ण-भक्ति की याचना करता हूँ । ऐसा कहकर नारदजी ने पिता के चरण-कमलों को पकड़कर मङ्गलमय तप के निमित्त जाने के लिये आज्ञा माँगी। फिर दोनों हाथ जोड़कर भक्तिभाव से मस्तक झुका ब्रह्माजी की परिक्रमा एवं प्रणाम करके वे वहाँ से जाने को उद्यत हुए । (अध्याय २३) ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्त्ते महापुराणे ब्रह्मखण्डे ब्रह्मनारदसंवादे त्रयोविंशतितमोऽध्यायः ॥ २३ ॥ ॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe