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भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १९५
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय १९५
दशविध धान्यपर्वतदान विधि का वर्णन

युधिष्ठिर ने कहा — भगवन् ! मैं दान का उत्तम माहात्म्य सुनना चाहता हूँ, जो देवर्षिगण पूजित एवं परलोक में अक्षय फल प्रदान करता है ।

श्रीकृष्ण बोले — राजन् ! इसी विषय को शंकर ने नारद को और मत्स्य ने मनु को जिस प्रकार बताया था वही मैं तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ! मैं तुम्हें दश प्रकार का मेरु पर्वतदान बता रहा हूँ, जिसके प्रदान करने से सुरपूजित देवलोकों की प्राप्ति होती है । क्योंकि पुराणों, वेदों के अध्ययन तथा यज्ञों के अनुष्ठान सुसम्पन्न करने से वे फल कदापि नहीं प्राप्त होते हैं, जो इस दान द्वारा सुलभ होते हैं om, ॐ। इसलिए सर्वप्रथम पर्वतों का क्रमशः विधान बता रहा हूँ, सुनो ! प्रथम धान्य शैल, दूसरा लवणाचल, तीसरा गुडाचल, चौथा हेमा (सुवर्णा) चल, पाँचवा तिलशैल, छठाँ कार्पास (रुई) का पर्वत, सातवाँ घृतशैल, आठवाँ रसशैल नवाँ रजत (चाँदी) का पर्वत और दसवाँ शक्कर का पर्वत दान किया जाता है । अयन-संक्रान्ति, विषुवयोग, पुण्य अवसर, व्यतीपातयोग, शुक्ल तृतीया, चन्द्र-सूर्य ग्रहण, अमावस्या, विवाहोत्सव, यज्ञ, द्वादशी, शुक्ल पञ्चमी अथवा किसी पुण्य नक्षत्र के दिन इन धान्यशैलादि का दान शास्त्रानुकूल करना चाहिए । किसी तीर्थ, देवमन्दिर, गोशाला, या संगम के स्थल पर उत्तरमुख या पूर्वमुख वाले एक चौकोर मण्डप का सविधान निर्माण, जिसकी भूमि उत्तर में कुश (ईशान) की ओर निम्न (नीची) हो, उसके भीतर गोबर से लिपी हुई भूमि में कुश बिछाकर उसके मध्य भाग में विष्कम्भ पर्वत की भाँति उस पर्वत की रचना करे । सहस्र द्रोण धान्य का उत्तम पर्वत, पाँच सौ का मध्यम और तीन सौ द्रोणि का पर्वत कनिष्ठ (निकृष्ट) बताया गया है ।

उस धान्य राशि महामेरु के मध्य सुवर्ण के तीन वृक्ष स्थापित होने चाहिए । वह पर्वत पूर्व की ओर मोती एवं हीरे से विभूषित, दक्षिण की ओर गोमेदक और पुष्पराग (पीत) मणियों से अलंकृत, पश्चिम में मारुत्मत् (मरकत), तथा नीलममणि तथा उत्तर की ओर वैदूर्य और पद्मरागमणि से विभूषित रहता है । इसी प्रकार उसे चारों ओर से भी खंड (चन्दन) के खण्डों से भूषित प्रवाललताओं से आवेष्टित (घिरा) करते हुए उसकी भूमि शुद्ध शिलातल से सुसज्जित करनी चाहिए । इस पर्वत में ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, शिव, और सूर्य की सुवर्ण प्रतिमाएँ भी स्थापित होनी चाहिए । उसके एक ओर कन्दरा और चारो दिशाओं में घृत उदक के झरने बनाये । पर्वत के पूर्व भाग श्वेत वस्त्र, दक्षिण काले वस्त्र, पश्चिम पीत वस्त्र और उत्तर की ओर रक्त वस्त्र से विभूषित कर महेन्द्र आदि आठों लोकपालो की क्रमशः चाँदी की प्रतिमाएँ स्थापित करे और पर्वत के चारों ओर मनोरम माला, विलेपन आदि से सुशोभित अनेक फलों की सजावट करे तथा ऊपर पाँच रंग का वितान (चॅदोवा) और श्वेत रंग पुष्पों के आभरणों से सुसज्जित करे । इस प्रकार (प्रथम) अमरगिरि की रचना करके उसके चारों ओर उक्त मात्रा के चौथाई भाग में क्रमशः विष्कम्भ (नामक़ पर्वत) गणों की रचना करे, जो पुष्प-विलेपन आदि से विभूषित हों । (पर्वत) की दिशा में मन्दर गिरि की रचना करे, जो अनेक फलों से युक्त एवं कनकभद्र (देवदारु) और कदम्ब के वृक्षों से सुशोभित हो तथा काञ्चन मूर्ति कामदेव समेत उसे पुष्प, वस्त्र, और विलेपन से समृद्ध करे । इसी भाँति यथाशक्ति चाँदी निर्मित वन तथा अरुणोदक नामक क्षीर के सरोवर से सुशोभित करे । दक्षिण की ओर गेहूँ की राशि अथवा कलधौत (सुवर्ण) निर्मित गन्धमादन पर्वत की रचना कर, जो सुवर्ण से यज्ञपति और घृत के मानसरोवर से युक्त हो, उसे सुशोभित करे । (पर्वत के) पश्चिम ओर तिलाचल (तिल के पर्वत) की रचना कर उसे अनेक भाँति के सुगन्धित पुष्पों, सुवर्ण के पीपल वृक्ष, पक्षी, और हिरण्यमय हंस से विभूषित करे । इसे भी चाँदी के पुष्पवाले वन और वस्त्र से सुसमृद्ध करते हुए पर्वत के अगले भाग में शतोद नामक दधि सरोवर का निर्माण करे । विपुलतिल शैल उसकी स्थापना के उपरांत उत्तर की ओर उरद द्वारा सुपार्श्व नामक पर्वत की रचना करे, जो पुष्पों, सुवर्ण के वटवृक्ष, तथा अन्यान्य वृक्षों सुवर्ण निर्मित धेनु से सुशोभित होते हैं । उसे भी मधु और भद्ररस के सरोवर और चाँदी के बने हुए देदीप्यमान वन आदि से विभूषित करके अन्त में वेद-पुराण के मर्मज्ञ, अनिन्द्य और सुरुपवान् चार ब्राह्मणों द्वारा वन कार्य के सुसम्पन्न होने के निमित्त पूर्व की ओर एक हाथ से कुण्ड की रचना करके तिल, घृत, समिधा (लकड़ी) और कुश द्वारा कुशकण्डिका करते हुए हवन कार्य सम्पन्न कराये । पश्चात् मधुर गीत और तुरही की ध्वनि द्वारा रात्रि में जागरण करता रहे । अब तुम्हें पर्वतों का आवाहन भी बता रहा हूँ —

त्वं सर्वदेवगणधामनिधे च विघ्नमस्मद्गृहेष्वमरपर्वतनाशयाशु ।
क्षेमं विधत्स्व कुरु शांतिमनुत्तमां नः
सम्पूजितः परमभक्तिमतः प्रदेहि ।।
त्वमेव भगवानीशो ब्रह्मा विष्णुर्दिनाकरः ।
मूर्तामूर्तपरं बीजमतः पाहि सनातन ॥
यस्मात्त्वं लोकपालनां विश्वमूर्तेश्च मंदिरम् ।
केशवार्कवसूनां च तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे ॥
यस्मादशून्यममरैर्गन्धर्वैश्च शिवेन च ।
तस्मान्मामुद्धराशेषदुःखसंसारसागरात् ।।
(उत्तरपर्व १९५ । २८-३१)

‘अमरगिरि ! तू समस्त देवगणों के धाम निधान हो, हमारे घर के विघ्नों को शीघ्र नष्ट करो, एवं कल्याण प्रदान करते हुए परमोत्तम शान्ति प्रदान करो । मैंने आप की सविधान अर्चा की है अतः मुझे-परमभक्ति प्रदान करने की कृपा करें । सनातन देव ! तुम्हीं भगवान् शंकर, ब्रह्मा, विष्णु और दिवाकर देव हो, रस मूर्ताभूत (संसार) के बीज हो, अतः मेरी रक्षा करो । अतः तुम लोकपाल, विश्व मूर्ति (ईश), केशव सूर्य और वसुगणों के मन्दिर हो, तुम मुझे शान्ति प्रदान करो । तुम्हारा शिरोभाग सदैव देवों और गन्धर्वों से अशून्य रहा करता है, इसलिए इस दुःखमय संसार सागर से उद्धार करने की कृपा करो ।’

इस भाँति उस मेरु की अर्चा करके उस मन्दराचल की भी अर्चना करे —

यस्माच्चैत्ररथेनाथ भद्राश्ववरिषेण च ।। ३२ ।।
शोभसे मन्दरक्षिप्रमतस्तुष्टिकरो भव ।।
यस्माच्चूडामणिर्जंबूद्वीपे त्वं गन्धमादनः ।। ३३ ।।
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च गीयमानं यशोऽस्तु मे ।।
यस्मात्त्वं केतुमालेन वैभ्राजेन वनेन च ।। ३४ ।।
हिरण्यमयपाषाणस्तस्माच्छांतिं प्रयच्छ मे ।।
उत्तरैः कुरुभिर्यस्मात्सावित्रेण वनेन च ।। ३५ ।।
सुपार्श्व राजसे नित्यमतः श्रीरक्षयास्तु मे ।।
‘मन्दर (पर्वत) ! तुम चैत्र रथ और भद्राश्व नामक वर्ष से सुशोभित हो, शीघ्रतया मुझे तुष्टि प्रदान करो । इस जम्बूद्वीप में चूड़ामणि की भाँति विभूषित कहाने वाले गन्धमादन ! गन्धर्व और अप्सराएँ मेरे यश की भी सदैव गान करें । यह वर प्रदान करो । तुम केतुमाल और वैभ्राज नामक वनों एवं हिरण्यमय पाषाण से सुशोभित हो, मुझे शांति प्रदान करने की कृपा करो । उत्तर कुरु एवं सावित्र वन से विभूषित सुपार्श्व नामक अचल ! मुझे अक्षय भी प्रदान करने की कृपा करो ।

नृप ! इस प्रकार उन सब को आमन्त्रित करने के अनन्तर प्रातःकाल विमल जल में स्नान आदि करके मध्य में स्थित (मेरु) पर्वत गुरु को सादर समर्पित करे और शेष पाँच क्रमशः ऋत्विजों को चौंतीस, दश अथवा यथाशक्ति सात, आठ गौ का दान करते हुए एक कपिला गौ, जो अत्यन्त दूध देने वाली हों, अवश्य गुरुचरण में अर्पित करना चाहिए । सम्पूर्ण पर्वतों का यही दान विधान बताया गया है । इन पर्वतों के साथ सुशोभित होने वाले समस्त ग्रह, लोकपाल और ब्रह्मादि देवगणों के पूजन मंत्र उनके उपस्कर में भी उच्चारित होते हैं । पर्वतों के यज्ञ में सभी प्रतिष्ठित देवों की आहुति उनके मंत्रों द्वारा अर्पित करनी चाहिए । कर्ता को नित्य उपवास अथवा परमार्थ होने पर नक्तव्रत करना चाहिए । भारत ! मैं समस्त पर्वतों का क्रमशः विधान बता रहा हूँ, सुनो ! उसी प्रकार दानकाल के मन्त्र और पर्वतों के दान करने का फल भी कह रहा हूँ ।

अन्न को ब्रह्म इसलिए कहा गया है कि अन्न में ही प्राणियों के प्राण प्रतिष्ठित हैं । क्योंकि अन्न द्वारा जीवों की सृष्टि होती है और यह सारा संसार मण्डल अन्न द्वारा ही उन्नतिशील है । अन्न ही लक्ष्मी और अन्न ही जनार्दन देव हैं । नरोत्तम ! इसलिए इस धान्यपर्वत के रूप से आप मेरी रक्षा करो । इस विधान द्वारा धान्यमय पर्वत का सविधान दान करने वाला मनुष्य देव लोक के अग्रभाग में सौ मन्वन्तरों के समय तक सुसम्मानित होता है । पश्चातू वह ऋषियों द्वारा सुसेवित होकर अप्सराओं और गन्धर्वो से आच्छन्न विमान पर सुशोभित होते हुए स्वर्ग लोक की यात्रा करता है और कदाचित् पुण्य क्षीण होने पर महाराज-राज्य की प्राप्ति करता है इसमें संशय नहीं । इस प्रकार सुवर्ण वृक्ष से सुशोभित और निष्काम पर्वतों से युक्त उस धान्याचल का, जो सुरसिद्धों से सदैव सुशोभित रहता है, नमस्कार पूर्वक ब्राह्मणों को दान करने वाले बुद्धिमान् मनुष्य ब्रह्मलोक की प्राप्ति करते हैं ।
(अध्याय १९५)

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