भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व चतुर्थ – अध्याय ९
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — चतुर्थ भाग)
अध्याय ९
धन्वंतरि, सुश्रुत, जयदेव समुत्पति का वर्णन

सूतजी बोले — प्रयाग तीर्थ में भगवान् बृहस्पति ने देवों को सूर्य का उत्तम माहात्म्य सुनाकर पुनः कहना आरम्भ किया । सुरोत्तम ! पहले त्रेतायुग के अन्त समय में भगवान शंकर की आज्ञा से सूर्य ने प्रतिष्ठानपुर (झूसी) में जन्म ग्रहण किया था । मैं उसे बता रहा हूँ, सुनो ! त्रेतायुग के अन्त समय में सिंहलद्वीप का राजा परीक्षित था, जो वेद-धर्म का अनुयायी और देवों तथा अतिथियों की नित्य पूजा करता था । om, ॐउसकी भानुमती नामक कन्या सूर्यव्रत का परायण करती थी । उसके भक्तिभाव से प्रसन्न होकर — सूर्यदेव प्रतिदिन उसके घर स्वयं आकर मध्याह्न समय उसके द्वारा समर्पित भक्ष्य पदार्थ का भोजन करते थे ।

एक बार रविवार के दिन उस कमलाङ्गी कुमारी ने सागर में स्नानार्थ प्रस्थान किया । उसके वहाँ पहुँचने पर नारद जी वहाँ आये । जल के मध्य स्नान करती हुई उस मनोरमा कुमारी को अकेली देखकर नारद ने उसके वस्त्र पकड़कर निर्भीक होकर कहा — शुभ्रे ! मैं तुम्हारे कटाक्ष-पात से अधीर हो गया हूँ, अतः मेरा हाथ ग्रहण करो ! ऐसा कहने पर उस कुमारी ने शिर झुकाकर उस मुनि से कहा — देवर्षे ! मेरी एक बात सुनने की कृपा करें — मैं कुमारी हूँ और आप पुत्र प्रदाता हैं तथा आकाश मण्डल में स्थित होकर देवाङ्गनाएँ आपकी प्रार्थना करती हैं । इसलिए कहाँ वह मेनका और कहाँ मानुषी मैं । क्योंकि मनुष्यों के नवद्वारों वाली इस देह में सदैव दुर्गन्ध ही स्थित रहती है और देवस्त्रियों के अंगों में नहीं । इसलिए मेरी उनकी समता अत्यन्त दुर्लभ है । इतना सुनकर नारद अत्यन्त लज्जित तथा रोगग्रस्त हो गये । तत्पश्चात् महादेव जी के पास जाकर समस्त वृत्तान्त का वर्णन किया । लोक-कल्याणकर्ता शिवजी ने उन्हें कुष्ठरोग से ग्रस्त देखकर भास्करदेव की आराधना की । उस समय सूर्यदेव ने साक्षात् प्रकट होकर नारद के शरीर को नीरोग करते हुए शिवजी से कहा — महादेव ! आप आज्ञा प्रदान करें की मैं आपका कौन-सा कार्य करूँ ? उनके इस प्रकार कहने पर शिव जी ने कहा — आप ब्राह्मण का वेष धारणकर उस कन्या का ग्रहण करें । पश्चात् सूर्य ने वैसा ही किया । सविता (सूर्य) ने उस भानुमती के साथ पाणिग्रहण करने के उपरान्त तप करना आरम्भ किया, जिससे सूर्यलोक की पुनः प्राप्ति की । वही प्रत्येक पौष में सविता के रुप में प्रकाश प्रदान करते हैं । अतः महेन्द्र ! उन्हीं सूर्य की आराधना द्वारा देवकार्य शीघ्र सफल करो ।

सूत जी बोले — गुरु की ऐसी बात सुनकर सुरेश ने देवों के साथ शुभपूजन द्वारा पौष मास के उस सूर्य की आराधना आरम्भ की । उस समय प्रसन्न होकर भगवान सूर्य ने शुभ वाणी द्वारा देवों से कहा — मैं काशीपुरी में धन्वन्तरि के नाम से उत्पन्न होऊँगा । वहाँ रहकर कलि द्वारा उत्पन्न रोगों से पीड़ित प्राणियों को नीरोग करूँगा, जिससे देवकार्य स्वयं सिद्ध हो जायेगा । इतना कहकर भगवान् सूर्य काशीपुरी में आकर कल्पदत्त ब्राह्मण के घर पुत्ररूप में उत्पन्न हुए और प्रसन्न होकर उन्होंने वृद्ध ब्राह्मण समेत उस सुश्रुत राजपुत्र को शिष्य बनाकर ‘कल्पवेद’ की रचना की, जिससे रोग द्वारा नष्ट देह (कायाकल्प) नवीन हो जाती है । उस कल्पवेद का समस्त ज्ञान इस तंत्र में निहित हैं । उस समय वे सूर्य उस रूप में धन्वन्तरि के नाम से इस भूतल में प्रख्यात हुए, जिसके दर्शनमात्र से उसी समय रोग नष्ट हो जाते हैं । सुश्रुत ने धन्वन्तरि द्वारा रचित उस कल्पवेद के सौ अध्याय का अध्ययन करके ‘सौश्रुततन्त्र’ की रचना की ।

बृहस्पति जी बोले — पहले समय में रम्य पम्पापुर में एक हेली नामक ब्राह्मण रहता था, जो चौंसठ कलाओं में निपुण और नित्यसूर्य का उपासक था । प्रतिग्रह (दान) वृत्ति का त्यागकर उसने कलावृत्ति स्वीकार की । वस्त्रकला, लोह-कला, चित्रकला एवं धातुओं की मूर्तिकला को अपनाकर वह समस्त कलाओं का कार्य करता था, जिससे उसे पाँच सहस्र मुद्रा की प्राप्ति हुई । उस धन से उसने माघ मास में यज्ञानुष्ठान द्वारा सूर्यदेव को प्रसन्न किया, जिससे विश्वकर्मा के नाम से सूर्यदेव प्रत्येक माघमास में प्रकाश करते रहते हैं । उस हेली ब्राह्मण ने अनेक यज्ञों द्वारा सूर्य को अत्यन्त प्रसन्न किया, जिससे पम्पासरोवर में उसके द्वारा निर्मित स्तम्भ के स्थापित होने पर सूर्य वहाँ अत्यन्त सुरम्य ज्योतिरूप में स्वयं उस स्तम्भ पर मध्याह्न समय पहुँचकर उसके दिये हुए भक्ष्य का ग्रहण करते हैं । इस प्रकार प्रत्येक मास के उस देवप्रिय भक्ष्यपदार्थ को ग्रहणकर सूर्यदेव सर्वदेवमय होकर वहाँ त्रैलोक्य की कल्याण भावना करते रहते हैं । पश्चात् सहस्र वर्ष की आयु के उपरान्त उस ब्राह्मण ने प्राण परित्यागकर सूर्य के रूप में मण्डल के मध्य पहुँचकर माघ मास में सूर्य को सन्तुष्ट किया । अतः देवेन्द्र ! तुम उसी सूर्य की आराधना करो, वही तुम्हारा कार्य सिद्ध करेंगे ।

सूत जी बोले — बृहस्पति की ऐसी बातें सुनकर देवों समेत इन्द्र ने उस विश्वकर्मा सूर्य की आराधना की । उस समय प्रसन्न होकर त्वष्टा रूप सूर्य ने भी उन देवों को प्रसन्न किया । उन्होंने देवताओं से मधुर वाणीद्वारा कहा — सुरोत्तम वृन्द ! मेरी बात सुनो ! वंगदेश के बिल्व नामक ग्राम में मैं निरुक्तकार के रूप में उत्पन्न होकर जयदेव नामक कवि शिरोमणि होऊँगा । इतना कहकर भगवान सूर्य ने वंग प्रदेश में पहुँचकर कन्दुकी ब्राह्मण के घर जन्म ग्रहण किया । पाँच वर्ष की अवस्था से उन्होंने अपने माता-पिता की अनवरत सेवा बारह वर्ष तक की । पश्चात् उन दोनों के निधन हो जाने पर उन्होंने उनकी अन्त्येष्टिक्रिया द्वारा भी उन्हें सन्तुष्ट किया और गया जी में श्राद्ध करके स्वर्ग का निवासी बनाया । तदनन्तर यज्ञोपवीत होने पर जयदेव ने वैराग्य धारणकर उसी स्थान के एक महारण्य में निवास करना आरम्भ किया । उस समय उनकी तेईस वर्ष की अवस्था आरम्भ थी ।

किसी ब्राह्मण ने अपनी शुभ-कन्या जगन्नाथ जी को अर्पित कर पूजा करने के उपरान्त सनातन अनिरुद्ध भगवान् ने, जो ब्रह्ममय काष्ठरूप में स्थित थे, साक्षात् अपनी बाणी द्वारा उस ब्राह्मण से कहा — सत्यदेव ! मेरी बात सुनो ! जयदेव की शरीर मेरा ही शरीर है, अतः मेरी आज्ञा से तुम अपनी इस पद्मावती को उन्हें समर्पित करो । इतना कहने पर उस ब्राह्मण ने शीघ्र वहाँ जाकर उन वैरागी जयदेव के पास अपनी पुत्री को छोड़कर हर्षमग्न होकर अपने घर को प्रस्थान किया ।

उस पद्मावती कन्या ने भी उन्हें अपना सुन्दर पति समझकर उनकी बहुत वर्षों तक सेवा की । जयदेव जी ने समाधिस्थ होकर वैदिक अंगभूत निरुक्त की कल्पना की, जो गवेन द की सिद्धि में गो+इन्द्र अवस्था में ओ के प्रस्थान पर ‘अव’ आदेश रूप वणीगम ‘सिंह’ में हसिं की अवस्था में सिं का प्रथम आना, वर्ण विपर्यय (उलटफेर) षोडश में षष + दश अवस्था में ष के स्थान पर उकार और द के स्थान पर ड्र रूप वर्ण विकार, एवं पृषतोदर में पृष उदर में त का लोप रूपवर्णनाश के क्रम से वर्ण विकार वर्णनाश और मयूर तथा भ्रमरपदों की सिद्धि में धातु के अतिशयित्व रूप योग विद्वानों द्वारा बताया गया है। इस प्रकार पाँच प्रकार के निरुक्त की रचना उनके द्वारा की गई है । कलियुग में नागवंशीय शूद्रों द्वारा भ्रष्ट की गई उस प्राकृत भाषा के उन कलिप्रिय एवं मूर्खों को पराजित कर इन्होंने देवों के निमित्त ‘पाणिनि शास्त्र’ की रचना की । एक बार धूर्त कलि ने चोरों के हृदय में स्थित होकर उन चोरों द्वारा इन जयदेव ब्राह्मण के धन को, जिसे राजा ने प्रदान किया था, लुटवाकर पद्मावती को सती समझकर छोड़ दिया किन्तु इनके हाथ-पाँव भी कटा लिए । उससे दुःखी होकर उनकी पत्नी ने गड्ढे में गिरे हुए अपने पति को करुण क्रन्दन करती हुई किसी भाँति हाथ के सहारे उस गड्ढे से निकाला । उसी समय राजा शिकार के लिए जा रहे थे, मार्ग में जयदेव को कर-चरणहीन देखकर उन्होंने उनसे पूछा — किसने आपकी यह दशा की है । उन्होंने कहा — महाराज ! मैं अपने कर्म द्वारा ही इस अवस्था को प्राप्त हुआ हूँ, इसमें किसी अन्य का अपराध नहीं है । इसे सुनकर राजा धर्मपाल ने पत्नी समेत उन्हें पालकी पर बैठाकर अपने घर को प्रस्थान किया । वहाँ पहुँचकर राजा ने उनसे दीक्षा ग्रहण की, पश्चात् एक धर्मशाला का निर्माण कराया।

एक बार कलिनिर्मित उन चोरों ने वैष्णव के रूप में राजा धर्मपाल के गृह आकर उनसे कहा — हम लोग शास्त्र के निपुण विद्वान् हैं, किन्तु इस समय तुम्हारे यहाँ आये हैं । नृपसत्तम ! हम लोगों के बनाये हुए भोज्य पदार्थ को शालग्राम शिलामय विष्णु भगवान् स्वयं सप्रेम भक्षण करते हैं, उसे आज आप भी देखिये मैं दिखाऊँगा । इतना कहकर उन कलिभक्त वैष्णवों ने अपनी माया द्वारा भोजन करते हुए भगवान विष्णु का दर्शन राजा को करा दिया, जिससे आश्चर्य चकित होकर धर्मपाल ने जयदेव से कहा — गुरो ! मेरे घर में विष्णुभक्त वैष्णव लोग आये हुए हैं, जो भगवान् का साक्षात् दर्शन करा रहे हैं, अतः आप भी वहाँ शीघ्र चलने की कृपा करें । इसे सुनकर जयदेव वहाँ पहुँचे किन्तु राजा को उस समय महान् आश्चर्य हुआ, जब उन पाखण्डियों ने हँसते हुए जयदेव को देखकर राजा से कहना आरम्भ किया — यह ब्राह्मण गौड़ देश निवासी राजा के यहाँ पाचक (रसोइया) था । एक बार इस पाखण्डी ने धन के लोभ से मुझे विषमिश्रित भोजन कराया, जिसके विदित हो जाने पर राजा ने इसे शूली पर चढ़ाना चाहा, उसी समय हम लोगों ने वहाँ पहुँचकर इस ब्राह्मण को अपराधी समझते हुए भी राजा को अनेक भाँति से ज्ञान प्रदान किया, तथापि राजा ने शूली से हटाकर इसके हाथ-पैर कटवा लिये, क्योंकि राजा हम लोगों का शिष्य था, इसलिए हम लोगों ने ऐसा ही बताया था । इतना कहते ही उन चोरों को अत्यन्त कष्ट हुआ हृदयविदीर्ण-सा प्रतीत होने लगा तथा वे पृथ्वी में समा गये । यह देखकर जयदेव ने रुदन किया । उनके करुणक्रन्दन करने पर उनके हाथ-पैर पूर्व की भाँति स्वस्थ हो गये । इसे देखकर राजा को महान् आश्चर्य हुआ, उस समय जयदेव ने उनसे सभी कारणों का वर्णन किया । उसे सुनकर राजा को अत्यन्त प्रसन्नता हुई । पश्चात् उस राजा ने जयदेव के मुख से निकले उस ‘गीत गोविन्द’ के गायन-भजन द्वारा मोक्ष प्राप्त किया ।
(अध्याय ९)

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