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भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय ७ से ८
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(मध्यमपर्व — प्रथम भाग)
अध्याय – ७ से ८
पुराण-श्रवण की विधि तथा पुराण-वाचक की महिमा

श्रीसूतजी बोले — ब्राह्मणों ! पूर्वकाल में महातेजस्वी ब्रह्माजी ने पुराण-श्रवण की जिस विधि को मुझसे कहा था, उसे मैं आपको सुना रहा हूँ, आप सुनें ।

इतिहास पुराणों के भक्तिपूर्वक सुनने से ब्रह्महत्या आदि सभी पापों से मुक्ति हो जाती है, जो प्रातः -सायं तथा रात्रि में पवित्र होकर पुराणों का श्रवण करता हैं,उसपर ब्रह्मा, विष्णु और शंकर संतुष्ट हो जाते हैं ।
इतिहासपुराणानि श्रुत्वा भक्त्याद्विजोत्तमा: ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो ब्रह्महत्याशतं व यत् ॥
सायं प्रातस्तथा रात्रौ शुचिर्भूत्वा शृणोति यः ।
तस्य विष्णुस्तथा ब्रह्मा तुष्यते शङ्करस्तथा ॥
(मध्यमपर्व १ । ७ । ३-४)om, ॐ
प्रातःकाल इसके पढने और सुननेवाले से ब्रह्माजी प्रसन्न होते हैं तथा सायंकाल में भगवान् विष्णु और रात में भगवान् शंकर संतुष्ट होते हैं । पुराण-श्रवण करनेवाले को शुक्ल वस्त्र धारण कर कृष्ण-मृगचर्म तथा कुश के आसनपर बैठना चाहिये । आसन न अधिक ऊँचा हो और न अधिक नीचा । पहले देवता और गुरु की तीन प्रदक्षिणा करे, तदनन्तर द्विक्पालों को नमस्कार करे । फिर ओंकार में अधिष्ठित देवताओं को नमस्कार करे एवं शाश्वत धर्म में अधिष्ठित धर्मशास्त्र ग्रन्थों को भी नमस्कार करे ।

श्रोता का मुख दक्षिण दिशा की ओर और वाचक का मुख उत्तर की ओर हो । पुराण और महाभारत कथा की यहीं विधि कही गयी है । हरिवंश, रामायण और धर्मशास्र के श्रवण की इससे विपरीत विधि कही गयी है । अतः निर्दिष्ट विधि से सुनना या पढना चाहिये । देवालय या तीर्थों में इतिहास पुराण के वाचन के समय सर्वप्रथम उस स्थान और इस तीर्थ के माहात्म्य का वर्णन करना चाहिये । अनन्तर पुराणादि का वाचन करना चाहिये । माहात्म्य के श्रवण से गोदान का फल मिलता है । गुरु की आज्ञा से माता-पिता का अभिवादन करना चाहिये । ये वेद के समान, सर्वधर्ममय तथा सर्वज्ञानमय हैं । अतः द्विजश्रेष्ठ ! माता – पिता की सेवा से ब्रह्म की प्राप्ति होती है ।पुराणादि पुस्तकों का हरण करनेवाला नरक को प्राप्त होता है । वेदादि ग्रन्थों तथा तान्त्रिक मन्त्रो को स्वयं लिखकर उनका वाचन न करें । वाचकों को चाहिये कि वेदमन्त्रों का विपरीत अर्थ न बतलायें और न वेदमन्त्रों का अशुद्ध पाठ करें । क्योंकि ये दोनों अत्यन्त पवित्र हैं, ऐसा करने पर उन्हें पावमानी ऋचाओं (ऋग्वेद का नवम मण्डल जो 114 सूक्तों में निबद्ध हैं, ‘पवमान-मण्डल’ के नाम से विख्यात है। इसकी ऋचाएँ पावमानी ऋचाएँ कहलाती हैं। इन ऋचाओं में सोम देवता की महिमापरक स्तुतियाँ हैं, जिनमें यह बताया गया है कि इन पावमानी ऋचाओं के पाठ से सोम देवताओं का आप्यायन होता है।) का सौ बार जप करना चाहिये । पुराणादि के प्रारम्भ, मध्य और अवसान में तथा मन्त्र में प्रणव का उच्चारण करना चाहिये ।

देवनिर्मित पुस्तक को त्रिदेव स्वरुप समझकर गन्ध पुष्पादि से उसकी पूजा करनी चाहिये । ग्रन्थ के बाँधनेवाले (धागा) सूत्र को नागराज वासुकि का स्वरुप समझना चाहिये । इनका सम्मान न करने पर दोष होता है । अतः उसका कभी भी परित्याग नहीं करना चाहिये । ग्रन्थ के पत्रों को भगवान् ब्रह्मा,अक्षरों को जनार्दन, अक्षरों में लगी मात्राओं को अव्यय प्रकृति, लिपि को महेश तथा लिपि की मात्राओं को सरस्वती समझना चाहिये ।

पुराण-वाचक को चाहिये कि पुराण-संहिताओं में परिगणित सभी व्यास, जैमिनी आदि महर्षियों तथा शंकर, विष्णु आदि देवताओं को आदि, मध्य और अवसान में नमस्कार करे । इनका स्मरण कर धर्म-शास्त्रार्थ-वेत्ता विप्र को पुराणादि का एकाग्रचित्त हो पाठ करना चाहिये । वाचक को स्पष्टाक्षरों में उच्चारण करते हुए सुन्दर ध्वनि में सभी प्रकरणों के तात्त्विक अर्थों को स्पष्ट बतलाना चाहिये । पुराणादि धर्मसंहिता के श्रवण से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र विशेषतः अश्वमेध-यज्ञ का फल प्राप्त करते हैं एवं सभी कामनाओं को भी प्राप्त कर लेते हैं तथा सभी पापों से मुक्त होकर बहुत से पुण्यों की प्राप्ति कर लेते हैं ।जो वाचक सदा सम्पूर्ण ग्रन्थ के अर्थ एवं तात्पर्य को सम्यक् रूप से जानता है, वही उपदेश करने के योग्य है और वही विप्र व्यास कहा जाता है । ऐसे वाचक विप्र जिस नगर या ग्राम में रहते हैं, वह पुण्यक्षेत्र कहा जाता है । वहाँ के निवासी धन्य तथा सफल-आत्मा हैं, कृतार्थ हैं एवं उनके समस्त मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं ।

जैसे सूर्य रहित दिन, चन्द्रशून्य रात्रि, बालकों से शून्य गृह तथा सूर्य के बिना ग्रहों की शोभा नहीं होती, वैसे ही व्यास से रहित सभा की भी शोभा नहीं होती ।

श्रीसूतजी बोले — द्विजोत्तम ! गुरु को चाहिये कि अध्यात्म-विषयक पुराण का अध्यापन ज्ञानी, धार्मिक, पवित्र, भक्त, शान्त, वैष्णव,क्रोधरहित तथा जितेन्द्रिय शिष्य को कराये । अन्याय से धनार्जन करनेवाले, निर्भय, दाम्भिक, द्वेषी, निरर्थक और मन्थर गतिवाले एवं सेवारहित, यज्ञ न करनेवाले, पुरुषत्वहीन, कठोर, क्रुद्ध, कृपण, व्यसनी तथा निन्दक शिष्य को दूर से ही परित्याग कर देना चाहिये । पुत्र-पौत्र आदि के अतिरिक्त नम्र व्यक्ति को भी विद्या देनी चाहिये । विद्या को अपने साथ लेकर मर जाना अच्छा हैं, किन्तु अनधिकारी व्यक्ति को विद्या नहीं देनी चाहिये । विद्या कहती है कि मुझे ‘भक्तिहीन, दुर्जन तथा दुष्टात्मा व्यक्ति को प्रदान मत करो, मुझे अप्रमादी,पवित्र, ब्रह्मचारी, सार्थक तथा विधिज्ञ सज्जन को ही दो । यदि निषिद्ध व्यक्ति को श्रेष्ठ विद्याधन दिया जाता है तो दाता और ग्रहणकर्ता — इन दोनों में से एक स्वल्प समय में ही यमपुरी चला जाता है । पढनेवाले को चाहिये कि वह अध्यात्मिक, वैदिक, अलौकिक विद्या पढ़ानेवाले को प्रथम सादर प्रणाम कर अध्ययन करे । कर्मकाण्ड का अध्ययन बिना ज्योतिषज्ञान के नहीं करना चाहिये । जो विषय शास्त्रों में नहीं कहे गये हैं और जो म्लेच्छों द्वारा कथित हैं, उनका कभी भी अभ्यास नहीं करना चाहिये । जो स्वयं धर्माचरण कर धर्म का उपदेश करता है, वही ज्ञान देनेवाला पिता एवं गुरु-स्वरुप है तथा ऐसे ज्ञानदाता का ही धर्म प्रवर्तित होता है ।
(अध्याय ७-८)

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2.
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय २ से ३
4.
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय ४
5.
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय ५
6.
भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय ६

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