शिवमहापुराण – शतरुद्रसंहिता – अध्याय 13
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
श्रीशिवमहापुराण
शतरुद्रसंहिता
तेरहवाँ अध्याय
भगवान् शंकरके गृहपति – अवतारकी कथा

नन्दीश्वर बोले – हे ब्रह्मपुत्र ! अब चन्द्रमाको सिरपर धारण करनेवाले शिवके एक अन्य चरित्रको प्रसन्नतापूर्वक सुनिये, जिस प्रकार उन्होंने प्रेमपूर्वक विश्वानरके घरमें जन्म लिया ॥ १ ॥ हे मुने! गृहपति नामवाले वे अग्निलोकके स्वामी हुए, वे अग्निके सदृश, तेजस्वी, सर्वात्मा एवं परम प्रभु थे। पूर्वकालमें नर्मदाके तटपर नर्मपुरमें शिवजीके भक्त विश्वानर नामवाले पुण्यात्मा मुनि हुए ॥ २३ ॥ वे सदा ब्रह्मचर्याश्रम धर्मका पालन करते हुए नित्य – प्रति ब्रह्मयज्ञ किया करते थे । वे शाण्डिल्यगोत्री थे और बड़े पवित्र, ब्रह्मतेजस्वी तथा जितेन्द्रिय थे ॥ ४ ॥ वे सभी शास्त्रोंके अर्थोंके ज्ञाता, सर्वदा सदाचारमें तत्पर, शैव आचारमें अति प्रवीण तथा लौकिक आचारके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ थे ॥ ५ ॥

महानन्दमनन्तलीलं महेश्वरं सर्वविभुं महान्तम् ।
गौरीप्रियं कार्तिकविघ्नराज-समुद्भवं शङ्करमादिदेवम् ॥


उन्होंने भार्याके उत्तम गुणोंपर विचारकर उचित समयमें विधिपूर्वक अपने योग्य कुलीन कन्यासे विवाह किया ॥ ६ ॥ वे प्रतिदिन अग्निशुश्रूषा, पंचयज्ञ तथा षट्कर्ममें संलग्न रहते थे और देवता, पितर एवं अतिथियोंका पूजन करते थे ॥ ७ ॥ इस प्रकार बहुत समय बीत जानेके उपरान्त [ एक दिन] उन ब्राह्मणकी शुचिष्मती नामक पतिव्रता पत्नीने पतिसे कहा- ॥ ८ ॥ हे नाथ! मैंने आपकी कृपासे आपके साथ उन सभी भोगोंको भोग लिया है, जो स्त्रियोंके योग्य तथा आनन्ददायक हैं ॥ ९ ॥ हे नाथ! अब मेरी एक ही विशेष अभिलाषा है, जो मेरे हृदयमें चिरकालसे स्थित है और वह गृहस्थोंके लिये उचित भी है, उसे देनेकी कृपा करें ॥ १० ॥

विश्वानर बोले- हे सुश्रोणि ! हे प्रियहितैषिणि ! मुझे तुम्हारे लिये कुछ भी अदेय नहीं है । हे महाभागे ! तुम उसे माँगो, मैं शीघ्र ही प्रदान करूँगा । हे कल्याणि ! सम्पूर्ण कल्याण करनेवाले महेश्वरकी कृपासे मुझे इस लोक एवं परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ११-१२ ॥

नन्दीश्वर बोले – पतिके इस वचनको सुनकर प्रसन्न मुखवाली वह पतिव्रता स्त्री प्रसन्नतासे विनीत हो दोनों हाथ जोड़कर कहने लगी- ॥ १३ ॥

शुचिष्मती बोली- हे नाथ! यदि मैं वरके योग्य हूँ और यदि आपको मुझे वर प्रदान करना है तो मुझे शिवके समान पुत्र दीजिये, मैं कोई अन्य वर नहीं चाहती हूँ ॥ १४ ॥

नन्दीश्वर बोले— उसके इस वचनको सुनकर वे पवित्रात्मा ब्राह्मण क्षणभरके लिये समाधिस्थ होकर अपने हृदयमें विचार करने लगे । अहो ! मेरी इस स्त्रीने अत्यन्त दुर्लभ तथा मनोरथ मार्गसे दूर कैसी वस्तु माँगी है अथवा वे शिवजी ही सब कुछ पूरा करनेवाले हैं ॥ १५-१६ ॥ उन शम्भुने ही इसके मुखमें वाणीरूपसे स्थित होकर ऐसा कहा है । शिवजीकी यदि ऐसी इच्छा है, तो उसे अन्यथा करनेमें कौन समर्थ हो सकता है !॥ १७ ॥ ऐसा विचारकर उदार बुद्धिवाले तथा एकपत्नी- व्रतमें परायण रहनेवाले विश्वानर मुनिने बादमें उस पत्नीसे कहा – ॥ १८ ॥

नन्दीश्वर बोले— इस प्रकार अपनी पत्नीको [ अनेक प्रकारसे ] आश्वस्त करके मुनि तप करनेके लिये वहाँ चले गये, जहाँ साक्षात् काशीनाथ विश्वेश्वर स्थित हैं ॥ १९ ॥ उन्होंने शीघ्र ही वाराणसी पहुँचकर मणिकर्णिकाका दर्शन करके अपने सैकड़ों जन्मोंके अर्जित तीनों तापोंसे मुक्ति प्राप्त कर ली ॥ २० ॥ उसके बाद उन्होंने विश्वेश्वर आदि सभी लिंगोंका दर्शन करके काशीस्थ सभी कुण्डों, वापियों एवं सरोवरोंमें स्नान करके, सभी विनायकोंको नमस्कार करके, शिवा गौरीको प्रणाम करके, पापोंका भक्षण करनेवाले कालराज भैरवका भी पूजन किया, फिर प्रयत्नपूर्वक दण्डपाणि विनायक आदि प्रमुख गणोंकी स्तुतिकर, आदिकेशव आदि [ मुख्य द्वादश केशवों ] – को प्रसन्न करके फिर लोलार्क आदि प्रमुख सूर्योको बार-बार प्रणाम किया, पुनः सभी तीर्थोंमें समाहितचित्त होकर पिण्डदान करके हजारों प्रकारके भोजनादिसे मुनियों तथा ब्राह्मणोंको सन्तुष्टकर महापूजोपचारसे भक्तिपूर्वक [ अनेक ] लिंगोंका पूजन करके वे बार-बार विचार करने लगे कि शीघ्र ही सिद्धि प्रदान करनेवाला कौन – सा लिंग है, जहाँ पुत्रकी कामनासे मेरा तप सफल होगा ॥ २१–२६ ॥

उन बुद्धिमान् विश्वानर मुनिने कुछ क्षण ऐसा विचार करके शीघ्र ही पुत्र देनेवाले वीरेश [ नामक ] लिंगकी प्रशंसा की । [ उन्होंने अपने मनमें विचार किया कि] यह वीरेश्वर सिद्ध लिंग है, [ इसकी पूजाके प्रभावसे] असंख्य साधक सिद्धिको प्राप्त किये हैं, इसीलिये यह श्रेष्ठ लिंग सबसे अधिक प्रसिद्ध है । लोग भक्तिभावसे समन्वित होकर वर्षपर्यन्त इस वीरेश्वर महालिंगकी पूजा करके आयु तथा पुत्रादि सभी मनोरथ प्राप्त करते हैं । अतः मैं भी यहीं वीरेश लिंगकी त्रिकाल आराधनाकर शीघ्र वैसा ही पुत्र प्राप्त करूँगा, जैसे कि मेरी स्त्रीने अभिलाषा की है ॥ २७–३० ॥

नन्दीश्वर बोले- ऐसा विचारकर बुद्धिमान्, पुण्यात्मा तथा व्रती ब्राह्मण विश्वानरने चन्द्रकूपके जलमें स्नानकर नियम धारण किया ॥ ३१ ॥ उन्होंने एक मासपर्यन्त दिनमें एकाहार, एक मासपर्यन्त रात्रिमें एकाहार, एक मासपर्यन्त अयाचित आहार पुनः एक मासतक निराहार रहकर तप किया ॥ ३२ ॥ वे एक महीनेतक दूध पीकर, एक महीनेतक शाक-फल खाकर, एक महीनेतक मुट्ठीभर तिल खाकर और एक महीने पानी पीकर रहे ॥ ३३ ॥ वे एक महीनेतक पंचगव्य पीकर, एक मासतक चान्द्रायणव्रतकर, एक मासतक कुशाग्रका जल पीकर पुनः एक महीने वायु भक्षणकर रहने लगे ॥ ३४ ॥ उत्तम वीरेश्वरलिंगकी भक्तिपूर्वक पूजा करते हुए इस प्रकार उन्होंने एक वर्षतक अद्भुत तप किया ॥ ३५ ॥

उसके बाद तेरहवें महीनेमें गंगाके जलमें प्रात:काल स्नानकर ज्यों ही वे ब्राह्मण वीरेश्वरकी ओर आये, उसी समय उन तपोधनने [वीरेश्वर] लिंगके मध्यमें विभूतिसे विभूषित, आठ वर्षकी आकृतिवाले एक बालकको देखा। उस बालककी आँखें कानोंतक फैली हुई थीं, उसके ओठ गहरे लाल थे, मस्तकपर अत्यन्त पिंगलवर्णकी जटा शोभा पा रही थी, वह नग्न तथा प्रसन्नमुख था और बालोचित वेशभूषा तथा चिताका भस्म धारण किये हुए श्रुतिके सूक्तोंका पाठ करता हुआ लीलापूर्वक हँस रहा था ॥ ३६ – ३९ ॥ उसे देखकर आनन्दित होकर रोमांचयुक्त विश्वानर मुनिने बार – बार हृदयसे ‘नमोऽस्तु’ कहकर प्रणाम किया । तदनन्तर विश्वानर मुनि कृतार्थ होकर अभिलाषा पूर्ण करनेवाले आठ पद्योंसे बालकरूपधारी परमानन्दस्वरूप शिवकी स्तुति करने लगे ॥ ४०-४१ ॥

॥ विश्वानर उवाच ।
एकम्ब्रह्मैवाद्वितीयं समस्तं सत्यंसत्यं नेह नानास्ति किञ्चित् ।
एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे तस्मादेकन्त्वाम्प्रपद्ये महेशम् ॥ ४२ ॥
कर्ता हर्त्ता त्वं हि सर्वस्य शम्भो नानारूपेष्वेकरूपोऽप्यरूपः ।
यद्वत्प्रत्यग्धर्म एकोऽप्यनेकस्तस्मान्नान्यन्त्वां विनेशम्प्रपद्ये ॥ ४३ ॥
रज्जो सर्पश्शुक्तिकायां च रौप्यं नैरः पूरस्तन्मृगाख्ये मरीचौ ।
यद्यत्सद्वद्विष्वगेव प्रपञ्चो यस्मिञ्ज्ञाते तम्प्रपद्ये महेशम् ॥ ४४ ॥
तोये शैत्यं दाहकत्वं च वह्नौ तापो भानौ शीतभानौ प्रसादः ।
पुष्पे गन्धो दुग्धमध्येऽपि सर्पिर्यत्तच्छंभो त्वं ततस्त्वाम्प्रपद्ये ॥ ४५ ॥
शब्दं गृह्णास्यश्रवास्त्वं हि जिघ्रस्यप्राणस्त्वं त्र्यंघ्रिरायासि दूरात् ।
त्र्यक्षः पश्येस्त्वं रसज्ञोऽप्यजिह्वः कस्त्वां सम्यग्वेत्त्यतस्त्वाम्प्रपद्ये ॥ ४६ ॥
नो वेद त्वामीश साक्षाद्धि वेदो नो वा विष्णुर्नो विधाताखिलस्य ।
नो योगीन्द्रानेन्द्रमुख्याश्च देवा भक्तो वेदस्त्वामतस्त्वाम्प्रपद्ये ॥ ४७ ॥
नो ते गोत्रं नो सजन्मापि नाशो नो वा रूपं नैव शीलन्न देशः ।
इत्थम्भूतोऽपीश्वरस्त्वं त्रिलोक्यास्सर्वान्कामान्पूरयेस्त्वं भजे त्वाम् ॥ ४८ ॥
त्वत्तस्सर्वं त्वं हि सर्वं स्मरारे त्वं गौरीशस्त्वं च नग्नोऽतिशान्तः ।
त्वं वै वृद्धस्त्वं युवा त्वं च बालस्तत्त्वं यत्किं नान्यतस्त्वां नतोऽहम् ॥ ४९ ॥

अभिलाषाष्टकस्तोत्र

विश्वानर बोले- यह सब कुछ एक अद्वितीय ब्रह्म ही है, वही सत्य है, वही सत्य है, सर्वत्र उस ब्रह्मके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । वह ब्रह्म एकमात्र ही है और दूसरा कोई नहीं है, इसलिये मैं एकमात्र आप महेश्वरकी शरण प्राप्त करता हूँ ॥ ४२ ॥ हे शम्भो ! एक आप ही सबका सृजन करनेवाले तथा हरण करनेवाले हैं, आप रूपविहीन होकर भी अनेक रूपोंमें एक रूपवाले हैं, जैसे आत्मधर्म एक होता हुआ भी अनेक रूपोंवाला है, इसलिये मैं आप महेश्वरको छोड़कर किसी अन्यकी शरण नहीं प्राप्त करना चाहता हूँ ॥ ४३ ॥ जिस प्रकार रस्सीमें साँप, सीपीमें चाँदी और मृगमरीचिकामें जलप्रवाह [ मिथ्या ] भासित होता है, उसी प्रकार [आपमें ] यह सारा प्रपंच भासित हो रहा है। जिसके जान लेनेपर इस प्रपंचका मिथ्यात्व भलीभाँति ज्ञात हो जाता है, मैं उन महेश्वरकी शरण प्राप्त करता हूँ ॥ ४४ ॥

हे शम्भो ! जिस प्रकार जलमें शीतलता, अग्निमें दाहकता, सूर्यमें ताप, चन्द्रमामें आह्लादकत्व, पुष्पमें गन्ध एवं दुग्धमें घृत व्याप्त रहता है, उसी प्रकार सर्वत्र आप ही व्याप्त हैं, अतः मैं आपकी शरण प्राप्त करता हूँ ॥ ४५ ॥ हे प्रभो! आप कानोंके बिना सुनते हैं, नाकके बिना सूँघते हैं, बिना पैरके दूरसे आते हैं, बिना आँखके देखते हैं और बिना जिह्वाके रस ग्रहण करते हैं, अतः आपको भलीभाँति कौन जान सकता है । इस प्रकार मैं आपकी शरण प्राप्त करता हूँ ॥ ४६ ॥ हे ईश ! आपको न साक्षात् वेद, न विष्णु, न सर्वस्रष्टा ब्रह्मा, न योगीन्द्र और न तो इन्द्रादि देवगण ही जान सकते हैं, केवल भक्त ही आपको जान पाता है, अतः मैं आपकी शरण प्राप्त करता हूँ ॥ ४७ ॥ हे ईश ! आपका न तो गोत्र है, न जन्म है, न आपका नाम है, न आपका रूप है, न शील है एवं न देश | ऐसा होते हुए भी आप तीनों लोकोंके स्वामी हैं और आप समस्त मनोरथोंको पूर्ण करते हैं, अतः मैं आपका भजन करता हूँ ॥ ४८ ॥ हे कामशत्रो ! सब कुछ आपसे है और आप ही सब कुछ हैं, आप पार्वतीपति हैं, आप दिगम्बर एवं अत्यन्त शान्त हैं। आप वृद्ध, युवा और बालक हैं। कौन ऐसा पदार्थ है, जो आप नहीं हैं, अतः मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ४९ ॥

नन्दीश्वर बोले – इस प्रकार स्तुतिकर हाथ जोड़े हुए वे ब्राह्मण जबतक पृथ्वीपर गिरते, तबतक वह बालक वृद्धोंके भी वृद्ध पुरातन पुरुषके रूपमें अत्यन्त प्रसन्न होकर ब्राह्मणसे कहने लगा- ॥ ५० ॥

बालक बोला- हे विश्वानर ! हे मुनिश्रेष्ठ ! हे ब्राह्मण! आपने आज मुझे अत्यन्त सन्तुष्ट कर दिया । अतः आप प्रसन्नचित्त होकर उत्तम वर माँगिये ॥ ५१ ॥ तब मुनियोंमें श्रेष्ठ वे विश्वानर मुनि प्रसन्नचित्त हो उठकर बालकरूपी शिवजीसे कहने लगे ॥ ५२ ॥

विश्वानर बोले- हे महेश्वर ! आप तो सर्वज्ञ हैं, अतः आपसे कौन ऐसी बात है, जो छिपी रह सकती है। हे प्रभो! आप सर्वान्तरात्मा, भगवान्, शर्व तथा सब कुछ प्रदान करनेवाले हैं ॥ ५३ ॥ दीनता प्रकट करनेवाली याचनाके लिये मुझे नियुक्त करके आप मुझसे क्या कहलाना चाहते हैं, हे महेशान! ऐसा जानकर आप जैसा चाहते हैं, वैसा करें ॥ ५४ ॥

नन्दीश्वर बोले- पवित्र व्रत करनेवाले उन विश्वानरके इस पवित्र वचनको सुनकर परम पवित्र उस बालकरूप महादेवने मन्द मन्द मुसकराकर कहा- ॥ ५५ ॥ हे शुचे ! आपने शुचिष्मतीमें हृदयसे जो इच्छा की है, वह थोड़े ही दिनोंमें निःसन्देह पूर्ण हो जायगी ॥ ५६ ॥ हे महामते ! मैं शुचिष्मतीके गर्भसे आपके पुत्ररूपमें जन्म लूँगा और शुद्धात्मा तथा सभी देवताओंको प्रिय मैं गृहपति नामसे प्रसिद्ध होऊँगा ॥ ५७ ॥

आपके द्वारा कहा गया यह पवित्र अभिलाषाष्टक- स्तोत्र एक वर्षपर्यन्त तीनों कालमें शिवकी सन्निधिमें पढ़ते रहनेपर [मनुष्योंको] सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला होगा ॥ ५८ ॥ इस स्तोत्रका पाठ पुत्र-पौत्र – धन प्रदान करनेवाला, सभी प्रकारकी शान्ति करनेवाला तथा सम्पूर्ण आपत्तियोंका विनाश करनेवाला है और यह स्वर्ग, मोक्ष तथा सम्पत्ति देनेवाला है, इसमें संशय नहीं है । यह स्तोत्र अकेला ही सभी स्तोत्रोंके तुल्य है तथा सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाला है ॥ ५९-६० ॥

प्रात:काल उठकर भली-भाँति स्नान करके शिव- लिंगकी पूजाकर वर्षपर्यन्त इस स्तोत्रका पाठ करता हुआ पुत्रहीन मनुष्य पुत्रवान् हो जाता है ॥ ६१ ॥ इस अभिलाषाष्टकस्तोत्र को जिस किसीको नहीं बताना चाहिये और इसे प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये, यह महावन्ध्या स्त्रीको भी सन्तान देनेवाला है ॥ ६२ ॥ जो स्त्री अथवा पुरुष नियमपूर्वक शिवलिंगके समीप एक वर्षपर्यन्त इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसे यह स्तोत्र पुत्र प्रदान करता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ६३ ॥

नन्दीश्वर बोले- ऐसा कहकर सज्जनोंको गति प्रदान करनेवाले बालक – रूपधारी शिवजी अन्तर्धान हो गये और वे विश्वानर ब्राह्मण भी प्रसन्नचित्त होकर अपने घर चले गये ॥ ६४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहितामें गृहपत्यवतारवर्णन नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥

विश्वानर उवाच ।
एकब्रह्मैवाद्वितीयं समस्तं सत्यं सत्यं नेहनानास्ति किंचित् ।
एको रुद्रो न द्वितीयोवतस्थे तस्मादेकं त्वां प्रपद्ये महेशम् ॥ २६ ॥
एकः कर्ता त्वं हि सर्वस्य शंभो नानारूपेष्वेकरूपोस्य रूपः ।
यद्वत्प्रत्यप्स्वर्क एकोप्यनेकस्तस्मान्नान्यं त्वां विनेशं प्रपद्ये ॥ २७ ॥
रज्जौ सर्पः शुक्तिकायां च रूप्यंनैरःपूरस्तन्मृगाख्ये मरीचौ ।
यद्वत्तद्वद्विष्वगेष प्रपंचो यस्मिञ्ज्ञाते तं प्रपद्ये महेशम् ॥ २८ ॥
तोये शैत्यं दाहकत्वं च वह्नौ तापो भानौ शीत भानौप्रसादः ।
पुष्पे गंधो दुग्धमध्येपि सर्पिर्यत्तच्छंभो त्वं ततस्त्वां प्रपद्ये ॥ २९ ॥
शब्दं गृह्णास्यश्रवास्त्वं हि जिघ्रेरघ्राणस्त्वं व्यंघ्रिरायासि दूरात् ।
व्यक्षः पश्येस्त्वं रसज्ञोप्यजिह्वः कस्त्वां सम्यग्वेत्त्यतस्त्वां प्रपद्ये ॥ १३० ॥
नोवेदस्त्वामीश साक्षाद्धिवेदनो वा विष्णुर्नोविधाताऽखिलस्य ।
नो योगींद्रानेंद्रमुख्याश्च देवा भक्तो वेद त्वामतस्त्वां प्रपद्ये ॥ ३१ ॥
नो ते गोत्रं नेशजन्मापिनाख्यानो वा रूपं नैव शीलं न देशः ।
इत्थंभूतोपीश्वरस्त्वं त्रिलोक्याः सर्वान्कामान्पूरयेस्तद्भजे त्वाम् ॥ ३२ ॥
त्वत्तः सर्वं त्वं हि सर्वं स्मरारे त्वं गौरीशस्त्वं च नग्नोऽतिशांतः ।
त्वं वै वृद्धस्त्वं युवा त्वं च बालस्तत्त्वं यत्किंनास्यतस्त्वां नतोस्मि ॥ ३३ ॥

(श्रीस्कन्दपुराणे काशीखण्ड पूर्वार्द्ध १०/१२६-१३३)

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