September 20, 2024 | aspundir | Leave a comment शिवमहापुराण – शतरुद्रसंहिता – अध्याय 05 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ श्रीशिवमहापुराण शतरुद्रसंहिता पाँचवाँ अध्याय वाराहकल्पके दसवेंसे अट्ठाईसवें द्वापरतक होनेवाले व्यासों एवं शिवावतारोंका वर्णन शिवजी बोले – [ हे ब्रह्मन् ! ] दसवें द्वापरयुगमें जब त्रिधामा नामक मुनि व्यास होंगे, उस समय मैं हिमालय पर्वतके मनोहर भृगुतुंग नामक ऊँचे शिखरपर अवतार ग्रहण करूँगा। उस समय भी मेरे श्रुतिसम्मित तथा तपस्वी भृगु, बलबन्धु, नरामित्र तथा केतुभृंग नामक पुत्र होंगे ॥ १-२ ॥ ग्यारहवें द्वापरयुगमें जब त्रिवृत नामक व्यास होंगे, उस समय मैं कलियुगमें गंगाद्वार पर तप नामसे अवतरित होऊँगा। उस समय भी लम्बोदर, लम्बाक्ष, केशलम्ब एवं प्रलम्बक नामक चार दृढव्रती मेरे शिष्य होंगे ॥ ३-४ ॥ बारहवें द्वापरयुगके आनेपर वेदोंके विभाग करनेवाले शततेजा नामक व्यास होंगे, तब मैं द्वापरके अन्त होनेपर कलियुगमें यहाँ पृथिवीपर अवतार ग्रहण करूँगा। उस समय हेमकंचुक नामक स्थानपर आविर्भूत हुआ । मैं अत्रि के नामसे प्रसिद्ध होकर व्यासजीके सहायतार्थ निवृत्तिमार्गको दृढ़ करूँगा ॥ ५-६ ॥ हे महामुने ! उस समय सर्वज्ञ, समबुद्धि, साध्य एवं शर्व नामक मेरे परम योगी चार पुत्र होंगे ॥ ७ ॥ महानन्दमनन्तलीलं महेश्वरं सर्वविभुं महान्तम् ।गौरीप्रियं कार्तिकविघ्नराज-समुद्भवं शङ्करमादिदेवम् ॥ तेरहवें द्वापरयुगमें धर्मस्वरूप नारायण नामक व्यास होंगे, उस समय मैं वालखिल्यके आश्रममें उत्तम गन्धमादन पर्वतपर बलि नामक महामुनिके रूपमें अवतार ग्रहण करूँगा। वहाँपर सुधामा, काश्यप, वसिष्ठ और विरजा नामक मेरे चार श्रेष्ठ पुत्र होंगे ॥ ८-९ ॥ चौदहवें द्वापरयुगके आनेपर जब रक्ष नामक व्यास होंगे, तब मैं आंगिरस वंशमें गौतम नामसे अवतार ग्रहण करूँगा। उस समय भी कलियुगमें अत्रि, वशद, श्रवण और श्रविष्कट नामक मेरे चार पुत्र होंगे ॥ १०-११ ॥ पन्द्रहवें द्वापरयुगमें जब त्रय्यारुणि नामक व्यास होंगे, उस समय मैं वेदशिरा नामसे अवतरित होऊँगा । वेदशिरा नामक महावीर्यवान् मेरा अस्त्र होगा और सरस्वतीके उत्तर तथा हिमालयके पृष्ठभागमें मैं वेदशीर्ष पर्वतपर निवास करूँगा। उस समय भी कुणि, कुणिबाहु, कुशरीर और कुनेत्र नामक मेरे चार शक्तिशाली पुत्र होंगे ॥ १२–१४ ॥ सोलहवें द्वापरयुगमें जब देव नामक व्यास होंगे, उस समय मैं योगमार्गका उपदेश देनेके लिये गोकर्ण नामसे उत्पन्न होऊँगा । वहींपर परम पुण्यप्रद गोकर्ण नामक वन है। वहाँपर भी जलके समान निर्मल अन्तःकरणवाले काश्यप, उशना, च्यवन और बृहस्पति नामक मेरे चार योगपरायण पुत्र होंगे और वे पुत्र योगमार्गसे शिवपदको प्राप्त करेंगे ॥ १५-१६ ॥ सत्रहवें द्वापरयुगके आगमनपर देवकृतंजय नामक व्यास होंगे, उस समय मैं हिमालयके उत्तम तथा ऊँचे शिखरपर, हिमसे व्याप्त जो महालय नामका शिवक्षेत्र है, वहाँ गुहावासी नामसे अवतार धारण करूँगा और वहाँ भी उतथ्य, वामदेव, महायोग एवं महाबल नामक मेरे चार पुत्र होंगे ॥ १७–१९ ॥ अठारहवें द्वापरयुगके आनेपर जब ऋतंजय नामक व्यास होंगे, तब मैं उस हिमालयके मनोहर शिखरपर शिखण्डी नामसे प्रकट होऊँगा । उस महापुण्यप्रद सिद्धक्षेत्रमें शिखण्डी नामक पर्वत है और उसी नामवाला वन भी है, जहाँ सिद्ध निवास करते हैं, वहाँ भी वाचः श्रवा, रुचीक, श्यावास्य एवं यतीश्वर – ये मेरे चार महातपस्वी पुत्र होंगे॥ २०–२२ ॥ उन्नीसवें द्वापरयुगमें जब भरद्वाज मुनि व्यास होंगे, तब हिमालयके शिखरपर जटाएँ धारण किया हुआ मैं माली नामसे अवतार ग्रहण करूँगा । वहाँ समुद्रके समान गम्भीर हिरण्यनामा, कौशल्य, लोकाक्षी तथा प्रधिमि नामक मेरे चार पुत्र होंगे ॥ २३-२४ ॥ बीसवें द्वापरमें गौतम नामक व्यास होंगे, तब मैं हिमालयपर्वतपर अट्टहास नामसे अवतीर्ण होऊँगा । वहीं हिमालयके पृष्ठभागपर अट्टहास नामक महापर्वत है, जहाँ अट्टहासप्रिय मनुष्य निवास करते हैं और जो देव, मनुष्य, यक्षराज, सिद्ध और चारणोंसे सेवित है। वहाँ भी सुमन्तु, विद्वान् बर्बरि, कबन्ध तथा कुशिकन्धर नामक मेरे चार महायोगी पुत्र होंगे ॥ २५ – २७ ॥ इक्कीसवें द्वापरमें जब वाचः श्रवा नामक व्यास होंगे, तब मैं दारुक नामसे अवतरित होऊँगा । इसलिये उस उत्तम वनका नाम भी दारुवन होगा । वहाँपर भी प्लक्ष, दार्भायणी, केतुमान् और गौतम नामक मेरे चार महायोगी पुत्र होंगे ॥ २८-२९ ॥ बाईसवें द्वापरयुगके आनेपर जब शुष्मायण नामक व्यास होंगे, तब मैं लांगली भीम नामक महामुनिके रूपमें वाराणसीमें अवतरित होऊँगा, जहाँ कलियुगमें इन्द्रसहित समस्त देवगण मुझ हलायुध शिवका दर्शन करेंगे। वहाँ भी भल्लवी, मधु, पिंग तथा श्वेतकेतु नामक मेरे चार परम धार्मिक पुत्र होंगे ॥ ३० – ३२ ॥ तेईसवें द्वापरयुगके आनेपर जब मुनि तृणबिन्दु व्यास होंगे, तब मैं उत्तम कालंजरपर्वतपर श्वेत नामसे अवतार लूँगा। उस समय उशिक, बृहदश्व, देवल एवं कवि नामक मेरे चार तपस्वी पुत्र होंगे ॥ ३३-३४ ॥ चौबीसवें द्वापरयुगके प्राप्त होनेपर जब यक्ष नामक व्यास होंगे, उस समय मैं नैमिषक्षेत्रमें शूली नामक महायोगीके रूपमें अवतार ग्रहण करूँगा । वहाँपर भी शालिहोत्र, अग्निवेश, युवनाश्व एवं शरद्वसु नामक मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे ॥ ३५-३६ ॥ पच्चीसवें द्वापरयुगमें जब शक्ति नामक व्यास होंगे, तब मैं दण्डधारी महायोगी मुण्डीश्वर प्रभु के रूपमें अवतार ग्रहण करूँगा। उस समय भी छगल, कुण्डकर्ण, कुम्भाण्ड एवं प्रवाहक नामक चार तपस्वी शिष्य होंगे ॥ ३७-३८ ॥ छब्बीसवें द्वापरयुगमें जब पराशर नामक व्यास होंगे, उस समय मैं भद्रवटपुरमें आकर सहिष्णु नामसे अवतरित होऊँगा । वहाँपर भी उलूक, विद्युत, शम्बूक और आश्वलायन नामवाले मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे ॥ ३९-४०॥ सत्ताईसवें द्वापरयुगमें जब जातूकर्ण्य व्यास होंगे, उस समय मैं प्रभासतीर्थमें आकर सोमशर्मा नामसे प्रकट होऊँगा। वहाँपर भी अक्षपाद, कुमार, उलूक एवं वत्स नामक मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे ॥ ४१-४२ ॥ अट्ठाईसवें द्वापरयुगमें जब महाविष्णु पराशरके पुत्ररूपमें जन्म लेकर द्वैपायन नामक व्यास होंगे, तब छठे अंशसे पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण भी वासुदेवके नामसे प्रसिद्ध और वसुदेवके पुत्ररूपमें अवतरित होंगे। उस समय मैं भी योगमायासे संसारको विस्मित करनेके लिये योगात्मा नामक ब्रह्मचारीका रूप धारण करूँगा और शरीरको अनामय समझकर इसे मृतकी भाँति श्मशानमें छोड़कर ब्राह्मणोंके हितके लिये योगमायासे आप ब्रह्मा एवं विष्णुके साथ दिव्य तथा पवित्र मेरुगुहामें प्रवेश करूँगा हे ब्रह्मन् ! उस समय मैं लंकुली नामसे अवतार ग्रहण करूँगा। मेरे उत्पन्न होनेसे यह कायावतार तीर्थ सिद्धक्षेत्र नामसे उस समयतक विख्यात रहेगा, जबतक यह पृथ्वी रहेगी। उस समय भी कुशिक, गर्ग, मित्र एवं कौरुष्य नामक मेरे तपस्वी शिष्य होंगे। ये सभी योगी, ब्रह्मनिष्ठ, वेदके पारगामी विद्वान् तथा ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी होकर माहेश्वर योगको प्राप्तकर शिवलोकको जायँगे ॥ ४३–५० ॥ [ सूतजी बोले – ] हे उत्तम व्रतवाले मुनियो ! इस प्रकार परमात्मा शिवने वैवस्वत मन्वन्तरके प्रत्येक कलियुगमें होनेवाले अपने योगावतारोंका सम्यक् वर्णन किया॥ ५१ ॥ हे विभो ! इसी प्रकार प्रत्येक द्वापरयुगमें अट्ठाईस व्यास तथा प्रत्येक कलियुगके प्रारम्भमें योगेश्वरके अवतार होते रहते हैं ॥ ५२ ॥ प्रत्येक महायोगेश्वरके अवतारोंमें उनके चार महाशैव शिष्य भी होते रहते हैं, जो योगमार्गकी वृद्धि करनेवाले तथा अविनाशी होते हैं ॥ ५३ ॥ ये सभी शिष्य पाशुपतव्रतका आचरण करनेवाले, शरीरमें भस्मलेपन करनेवाले, रुद्राक्षकी माला धारण करनेवाले तथा त्रिपुण्ड्रसे सुशोभित मस्तकवाले होते हैं। सभी शिष्य धर्मपरायण, वेद-वेदांगके ज्ञाता, लिंगार्चनमें सदा तत्पर, बाहर तथा भीतरसे मुझमें भक्ति रखनेवाले योगध्यानपरायण तथा जितेन्द्रिय होते हैं। विद्वानोंद्वारा इनकी संख्या एक सौ बारह कही गयी है॥५४–५६॥ इस प्रकार मैंने अट्ठाईस युगोंके क्रमसे मनुसे लेकर श्रीकृष्णावतारपर्यन्त [शिवजीके ] अवतारोंका लक्षण कह दिया। इस कल्पमें जब कृष्णद्वैपायन व्यास होंगे, तब श्रुतिसमूहोंका ब्रह्मलक्षणसम्पन्न विधान अर्थात् वेदान्तके रूपमें प्रयोग होगा ॥ ५७-५८ ॥ [हे सनत्कुमार!] देवेश्वर शिव ब्रह्मासे इतना कहकर उनपर कृपा करके उनकी ओर पुनः देखकर वहींपर अन्तर्हित हो गये ॥ ५९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत तृतीय शतरुद्रसंहिताके शिवावतारोपाख्यानमें शिवके उन्नीस अवतारोंका वर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥ Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. 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