श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-80
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
अस्सीवाँ अध्याय
माता रेणुका के स्मरण करने पर परशुराम का आगमन, माता द्वारा सारा वृत्तान्त जानकर परशुराम का दुखी होना और माता द्वारा प्राप्त इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियविहीन बनाने की आज्ञा को स्वीकार करना, परशुराम द्वारा माता-पिता का और्ध्वदैहिक संस्कार करना
अथः अशीतितमोऽध्यायः
रामोपाख्याने और्ध्वदैहिकसंस्कारोपदेश

ब्रह्माजी बोले — राजा कार्तवीर्य के चले जाने पर मुनिपत्नी रेणुका शोकग्रस्त तथा अत्यन्त विह्वल हो उठी। इस युद्ध के उपस्थित होने पर वे मेरे पुत्र कहाँ चले गये — ऐसा वह कहने लगी ॥ १ ॥

पति के मृत्युप्राप्त हो जाने पर बाणों से आबद्ध मैं इस समय क्या करूँ? मेरा अत्यन्त क्रोधी वह प्रिय पुत्र परशुराम भी न जाने कहाँ चला गया? ॥ २ ॥ उसे देख लेने पर ही मेरे प्राण देवलोक को जायँगे । तदनन्तर स्मरणमात्र करने से ही उस समय परशुराम माता के पास उपस्थित हो गये ॥ ३ ॥

उन्होंने माता को बाणसमूहों से बिँधा हुआ तथा पिता को मृत-अवस्था में देखा, जिन्हें दुष्ट कार्तवीर्य ने हृदय में कठोर बाण मारकर आहत कर दिया था ॥ ४ ॥ परशुराम उस समय मूर्च्छा से उसी प्रकार भूमि पर गिर पड़े, जैसे कि आँधी के द्वारा वृक्ष भूमि पर गिरा दिया जाता है। वे अत्यन्त दुखी होकर अपने माता-पिता के लिये विलाप करने लगे ॥ ५ ॥

परशुराम बोले आज सभी ओर मुझे अन्धकार दिखायी पड़ रहा है। आज मेरे लिये दसों दिशाएँ शून्य- सी हो गयी हैं। जिस प्रकार पृथ्वी सुमेरुपर्वत से रहित हो जाती है, और जिस प्रकार अमरावतीपुरी देवराज इन्द्र से रहित हो जाती है, वैसे ही पिता के बिना मेरे लिये आज यह आश्रम सुशोभित नहीं हो रहा है। जिस प्रकार तीनों लोक गंगा के बिना शून्य हो जाते हैं, वैसे ही यह आश्रम – मण्डली भी सूनी-सूनी-सी हो गयी है ॥ ६-७ ॥ माता रेणुका के बिना यह आश्रम – मण्डली शोभित नहीं हो रही है। अब देवताओं का भय दूर चला गया है और सभी मुनिगण अनाथ हो गये हैं। देवताओं को यह भय था कि ये जमदग्नि तपस्या के प्रभाव से न जाने हमारा क्या ग्रहण कर लेंगे ॥ ८ ॥

इस प्रकार से उन्होंने बहुत विलाप किया। वे परशुराम उसी प्रकार चेष्टाहीन हो गये, जैसे कि मछली जल के बिना हो जाती है । तदनन्तर रोते हुए वे पुनः माता के समीप चले आये और माता की गरदन को गोद में रख करके उसके शरीर से बाणों को निकालने लगे ॥ ९-१० ॥ माता के दुख से दुखित हो परशुराम पुनः रुदन करने लगे। तीनों लोकों को भस्म कर देने की क्षमता रखने वाली मेरी माता आज उस दुष्ट के बाणों से पीड़ित होकर भूमि पर पड़ी हुई है । [ हे मातः!] कुछ समय पूर्व की बात है, मेरे खेलने के लिये जाने पर तुम क्षणभर भी मेरा विस्मरण नहीं करती थी, आज वही तुम मुझे छोड़कर कहाँ जाने को उद्यत हो ? हे शोभने ! तुम मुझे दुग्ध तथा अनेकों वस्त्र, अन्न प्रदान करती थी, सुन्दर-सुन्दर फल- मूलों को देती थी, आज वही तुम मुझे छोड़कर कहाँ जा रही हो? माता-पिता से हीन मेरे जीवन को आज धिक्कार है! ॥ ११–१४ ॥

ब्रह्माजी बोले — पुत्र के इस प्रकार के वचनों को सुनकर माता रेणुका अत्यन्त दुःख में भर गयीं, उन्होंने पुत्र के आँसू पोंछकर बहुत व्याकुल होते हुए कहा ॥ १५ ॥

[हे पुत्र!] मैं तुम्हारे निकट ही रहूँगी, अतः तुम शोक न करो। अब तुम पूर्व में घटी हुई घटना को सुनो। कुछ समय पहले की बात है कि कृतवीर्य का पुत्र राजा कार्तवीर्य मध्याह्नकाल में अपनी सेना के साथ इस आश्रम – मण्डल में आया । तुम्हारे पिता ने उसका बहुत स्वागत- सत्कार किया और सेनासहित उसे भलीभाँति भोजन कराया ॥ १६-१७ ॥ कामधेनु के कृपा-प्रसाद से वैसी व्यवस्था देखकर भोजन करने के अनन्तर राजा ने मुनि से कामधेनु की याचना की। मुनि के मौन रहने पर उसने क्रोध करके कामधेनु को बन्धन से मुक्त कर दिया ॥ १८ ॥ सैनिकों द्वारा स्पर्श हो जाने मात्र से उस धेनु ने अत्यन्त बलशाली चतुरंगिणी सेना को उत्पन्न किया । तदनन्तर राजा के सैनिकों के साथ कामधेनु के द्वारा उत्पन्न सैनिकों का महान् युद्ध छिड़ गया ॥ १९ ॥

घायल होकर राजा के वे सैनिक जब भाग उठे तो स्वयं राजा कार्तवीर्य युद्ध के लिये आ डटा । उसने पाँच- पाँच सौ बाणों को कई बार छोड़ा ॥ २० ॥ जब वह भी पराजित हो गया तो वह घर की ओर लौट चला। कामधेनु भी स्वर्ग को चली गयी। पुनः आकर उस दुष्ट ने एक बाण से तुम्हारे पिता के वक्षःस्थल पर प्रहार करके उन्हें मार डाला और इक्कीस बाणों द्वारा मुझ निरपराध को विद्ध करके वह दुष्ट वापस चला गया ॥ २१-२२ ॥ इसलिये आज तुम्हें उस दुष्ट का शीघ्र ही विनाश करना चाहिये। चूँकि उसने मेरी देह में इक्कीस बाण मारे हैं, अत: तुम भी इक्कीस बार इस पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन बना दो। हे पुत्र ! तुमको मैं एक बात और कहती हूँ, तुम मेरी आज्ञा का पालन करते हुए अवश्य करो ॥ २३-२४ ॥

तुम ऐसे स्थान पर हम दोनों का और्ध्वदैहिक संस्कार करो, जहाँ पर किसी का दाहसंस्कार न हुआ हो। उसके बाद तुम सर्वज्ञ मुनिश्रेष्ठ दत्तात्रेयजी को बुलाकर उनसे त्रयोदशाहपर्यन्त हम दोनों के और्ध्वदैहिक कर्म कराओ । उन दत्तात्रेयमुनि के समान कोई वक्ता नहीं है, तभी हम दोनों सद्गति को प्राप्त करेंगे ॥ २५-२६ ॥

इतना कहकर रेणुका अपने शरीर को छोड़कर दुर्गम [परम] धाम को प्राप्त हुईं। तब महामना परशुराम ने माता की आज्ञा के अनुसार ही सभी कर्मों को किया ॥ २७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘परशुरामोपाख्यान में’ अस्सीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८० ॥

Content is available only for registered users. Please login or register

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.