September 2, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-81 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ इक्यासीवाँ अध्याय परशुराम का माता-पिता का दाह-संस्कार करके महर्षि दत्तात्रेयजी को आमन्त्रित करने उनके आश्रम पर जाना और अपने आगमन का प्रयोजन बताना, तदनन्तर दोनों का वापस आश्रम पर आना, दत्तात्रेयजी के निर्देशानुसार परशुराम द्वारा त्रयोदशाहपर्यन्त अपने माता-पिता का और्ध्वदैहिक संस्कार सम्पन्न करना और पिता-माता की सद्गति अथः एकाशीतितमोऽध्यायः रामोपाख्याने और्ध्वदैहिकसंस्कारसम्पादनं ब्रह्माजी बोले — परशुरामजी ने मुण्डन कराकर भलीभाँति विधि-विधान से स्नान किया, तदनन्तर उन्होंने ब्राह्मणों के कथनानुसार उत्थान श्राद्ध 1 (मृतिस्थान पर किया जानेवाला श्राद्ध) किया। तत्पश्चात् विश्रामस्थान पर किये जानेवाले श्राद्ध से लेकर चितादाह तक के सभी श्राद्धों को किया और मन्त्रपूर्वक दोनों को मुखाग्नि दी। तदनन्तर शीघ्र ही वे दत्तात्रेयमुनि के पास गये ॥ १-२ ॥ ध्यानपूर्वक उन्होंने देखा कि दत्तात्रेयजी कुत्सित वेश धारण करके शिष्यों के साथ बैठे हैं, उन्होंने हाथ में कुत्ते को पकड़ रखा वे मलिन तथा कृशकाय हैं, तब परशुरामजी ने उन मुनिश्रेष्ठ के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया । परशुरामजी आधे पहर तक हाथ जोड़े हुए उनके समक्ष स्थित रहे। सर्वज्ञ मुनि दत्तात्रेय ने उनके आगमन प्रयोजन को भलीभाँति जान लेने पर भी परशुरामजी को अपने समीप बुलाकर कहा — ‘यद्यपि मैं तुम्हारे आगमन का प्रयोजन जान चुका हूँ, तथापि मैं पूछता हूँ, कि तुम किस कारण से यहाँ आये हो ? ‘ ॥ ३–५ ॥ ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर परशुरामजी ने प्रारम्भ से लेकर अन्त तक का सम्पूर्ण वृत्तान्त उन्हें स्पष्टरूप से बता दिया ॥ ५१/२ ॥ परशुराम बोले — कृतवीर्य का पुत्र राजा कार्तवीर्य मेरे पिता जमदग्नि के आश्रम में आया । मेरे पिताजी ने उसे नाना पक्वान्नयुक्त श्रेष्ठ व्यंजनों द्वारा भोजन कराया। उसने अपनी सम्पूर्ण सेना के साथ भोजन कर लेने के अनन्तर कामधेनु की याचना की ॥ ६-७ ॥ जब पिताजी ने कामधेनु को नहीं दिया, तो उसने बलपूर्वक उसे ले जाने का मन बनाया । तदुपरान्त उसके सैनिकों द्वारा प्रताड़ित होने पर कामधेनु ने अनेक सैनिक- गणों की सृष्टि कर डाली । उन पराक्रमी सैनिकों के द्वारा परास्त राजा कार्तवीर्य अपनी सेनासहित अपने घर को चल दिया, इधर जब कामधेनु स्वर्ग चली गयी, तो कार्तवीर्य अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा ॥ ८-९ ॥ तदनन्तर उसने पुनः आकर पिता जमदग्नि के हृदय में बड़े वेग से एक तीखा बाण मारा और क्रोध में आकर उसने इक्कीस बाणों द्वारा माता के शरीर को बींध डाला। हे ब्रह्मन्! उस समय मैं वहाँ नहीं था, बाद में आकर मैंने वह सब देखा। मैंने मन्त्रपूर्वक माता-पिता का दाहसंस्कार कर दिया है और माता द्वारा प्राप्त आज्ञा के अनुसार मैं यहाँ आपके पास आया हूँ ॥ १०-११ ॥ माता ने मुझे बताया था कि मुनि दत्तात्रेय के अतिरिक्त इस और्ध्वदैहिक कर्म में किसी और को नियुक्त न करना । त्रयोदशाहपर्यन्त सभी कर्मों के कर लेने के पश्चात् तुम कृतवीर्य के पुत्र राजा कार्तवीर्य का वध कर डालना और तुम्हारे द्वारा इक्कीस बार इस पृथ्वी को क्षत्रियहीन बना देना चाहिये। मेरी माता रेणुका ने इस प्रकार की आज्ञा मुझे प्रदान की थी, इसी कारण मैं यहाँ आया हूँ, आप मुझपर कृपा करें ॥ १२–१४ ॥ ब्रह्माजी बोले — परशुराम के इस प्रकार के वचनों को सुनकर रेणुका के मित्र मुनि दत्तात्रेयजी शोक से संविग्न हृदयवाले हो गये और वे परशुराम से इस प्रकार बोले — जिसके घर में उत्तम भोजन किया हो, उससे विरोध करना ठीक नहीं है। यदि उस दुष्ट कार्तवीर्य ने ऐसा किया है, तो उसका फल वह शीघ्र ही देखेगा। इस समय तुम अपने माता-पिताका और्ध्वदैहिक संस्कार करो ॥ १५–१६१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — तब वे परशुराम दत्तात्रेयजी को साथ लेकर अपने आश्रम में आये । तदनन्तर परशुरामजी ने बड़ी श्रद्धा-भक्तिपूर्वक अपने माता-पिता का उत्तर कर्म- द्वितीय दिन से की जाने वाली दशगात्र, एकादशाह तथा द्वादशाह-श्राद्धादि क्रियाएँ दत्तात्रेयजी के उच्चारित मन्त्रों से सम्पन्न कीं ॥ १७-१८ ॥ श्राद्धादि कर्म के सम्पन्न हो जाने पर मुनि दत्तात्रेयजी ने कोल्हापुर जाने का मन बनाया। तब परशुरामजी उनसे बोले — ‘अब आप पुनः कब दर्शन देंगे ? ‘ ॥ १९ ॥ मुनि बोले — हे अनघ ! जब तुम ‘दत्तात्रेयजी यहाँ आइये’ इस प्रकार कहते हुए मेरा स्मरण करोगे, तब तुम मुझे अपने पास देखोगे। वे दत्तात्रेय श्राद्धकर्म करके प्रत्येक दिन भिक्षा माँगने जाते थे, क्योंकि वे यह विचार करते थे कि अशौचवाले के घर का अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिये ॥ २०-२१ ॥ पाँचवे दिन का कर्म सम्पन्न कर जब वे मुनिश्रेष्ठ दत्तात्रेय परशुरामजी की अनुमति लेकर भिक्षा माँगने के लिये चले गये, तो उसी समय एक व्याघ्र वहाँ आ गया। तब भयभीत होकर वे ‘हे माँ! हे माँ! अब मैं कहाँ जाऊँ’ – इस प्रकार से चिल्लाने लगे। उनका ‘माँ-माँ’– यह वचन सुनकर माता रेणुका उनके सामने प्रकट हो गयीं ॥ २२-२३ ॥ शरीर तथा सिर के पूरा न होने पर 2 भी वे रेणुका पुत्रस्नेह के वशीभूत होकर आ गयीं। यदि परशुरामजी के द्वारा द्वादशाह के बाद अर्थात् सपिण्डीकरण के बाद उनका आवाहन किया गया होता, तो वे सम्पूर्ण अवयवों से सुशोभित होकर उपस्थित होतीं। माता उनसे बोलीं — हे वत्स! मुझे किस कारण से बुलाया, प्रयोजन बतलाओ ? पुत्रस्नेह के वशीभूत हो उनके स्तनों से दूध टपकने लगा । उन्होंने उन्हें गले लगाया ॥ २४-२५१/२ ॥ छठे दिन मुनि दत्तात्रेयजी पुनः वहाँ आये और उन्होंने उस अवस्था में अर्थात् अपूर्ण गात्रवाली उन रेणुका को देखा तो वे परशुराम से बोले — ‘तुमने दशगात्र के बीच में ही अपनी माता को क्यों बुलाया, ये असम्पूर्ण गात्रवाली होकर आ गयी हैं ॥ २६-२७ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! यदि सपिण्डीकरण श्राद्ध अर्थात् द्वादशाह के बाद बुलाया होता तो तुम्हारे स्नेह के वशीभूत हो ये रेणुका पूर्ण शरीरवाली होकर आतीं ‘ ॥ २८ ॥ परशुराम बोले — हे ब्रह्मन् ! मैंने भयभीत होकर बालभाव से स्वभाववश ‘हे मात:’ इस प्रकार से पुकारा था, तब हे मुनिश्रेष्ठ! मैंने इन्हें इस अवस्था में देखा ॥ २९ ॥ परशुरामजी ने एकादशाह के दिन वृषोत्सर्ग किया तथा बारहवें दिन माता-पिता दोनों का सपिण्डीकरण श्राद्ध किया । तदनन्तर दूसरे दिन अर्थात् त्रयोदशाह श्राद्ध को पाथेय अर्थात् वर्षाशन प्रदानकर ब्राह्मणों द्वारा पुण्याहवाचन कराया और ब्राह्मणों को यथायोग्य अनेक प्रकार के दान प्रदान किये ॥ ३०-३१ ॥ उनके पिता जमदग्नि (श्राद्ध से संतृप्त होकर) दिव्य देह धारणकर ब्रह्मलोक को गये और माता रेणुका उसी रूप में पृथ्वी पर अनेक स्थानों पर स्थित हो गयीं ॥ ३२ ॥ जो लोग श्रद्धा-भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करते हैं, वे उन लोगों के सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण कर देती हैं । हे मुनिश्रेष्ठ ! इन रेणुकाजी का विशेष माहात्म्य स्कन्दपुराण में विस्तारपूर्वक कहा गया है । अत्यन्त विस्तार के भय से उसे मैंने यहाँ नहीं बतलाया ॥ ३३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में रामोपाख्यान में इक्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८१ ॥ 1. ‘मृतस्योत्क्रान्तिसमयात् षट्पिण्डान् क्रमशो ददेत्’ – पिण्डदान के छः स्थान इस प्रकार हैं — १ – मृतस्थान, २-द्वारदेश, ३- चत्वर (चौराहा), ४- विश्रामस्थान, ५-काष्ठचयन तथा ६ – अस्थिसंचयन । मृतस्थाने तथा द्वारे चत्वरे तार्क्ष्य कारणात् ॥ विश्रामे काष्ठचयने तथा सञ्चयने च षट् । (ग० पु०, प्रेतखण्ड १५ । ३०-३१) 2. दशगात्र के प्रथम पिण्ड से सिर, द्वितीय पिण्ड से कर्ण, नेत्र और नासिका, तृतीय पिण्ड से गला, स्कन्ध, भुजा तथा वक्ष:स्थल, नाभि, लिंग अथवा योनि तथा गुदा, पंचम पिण्ड से जानु, जंघा तथा पैर, षष्ठ पिण्ड से सभी मर्मस्थान, सप्तम पिण्ड से सभी नाड़ियाँ, अष्ट दन्त, लोम आदि, नवम पिण्ड से वीर्य अथवा रज और दशम पिण्ड से शरीर की पूर्णता, तृप्तता तथा क्षुद्विपर्यय होता है। शिरस्त्वाद्येन पिण्डेन प्रेतस्य क्रियते सदा । द्वितीयेन तु कर्णाक्षिनासिकाश्च समासतः ॥ गलांसभुजवक्षांसि तृतीयेन यथाक्रमात् । चतुर्थेन तु पिण्डेन नाभिलिङ्गगुदानि च ॥ जानुजङ्घे तथा पादौ पञ्चमेन तु सर्वदा । सर्वमर्माणि षष्ठेन सप्तमेन तु नाडयः ॥ दन्तलोमाद्यष्टमेन वीर्यं तु नवमेन च । दशमेन तु पूर्णत्वं तृप्तता क्षुद्विपर्ययः ॥ (श्राद्ध विवेक, द्वितीय परि॰) Content is available only for registered users. 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