September 2, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-85 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ पचासीवाँ अध्याय भगवान् शिव-पार्वती का क्रीडा-विहार, देवताओं की प्रार्थना पर अग्निदेव का भिक्षुकरूप में उनके समीप जाकर भिक्षा की याचना करना, माता पार्वती का भिक्षा के रूप में उन्हें शिवतेज प्रदान करना, अग्निदेव द्वारा उस तेज को गंगा में प्रवाहित करना, छः कृत्तिकाओं द्वारा शिवतेज का धारण और षण्मुख का प्रादुर्भाव अथः पञ्चाशीतितमोऽध्यायः स्कन्दोपाख्यानं ब्रह्माजी बोले — भगवान् शिव के आलिंगन के प्रभाव से भिल्लीरूपा वे पार्वती कामाग्नि से उद्दीप्त हो उठीं और जैसे मछली जलरहित स्थान में छटपटाती है, वैसे ही उन्हें भी कहीं भी सुख की प्राप्ति नहीं हो रही थी। अपने शरीर में शीतल उशीर (खस) का लेप करके वे जल के मध्य में गयीं, किंतु वहाँ भी उन्हें शान्ति नहीं मिली । स्थल पर भी उन्हें निद्रा नहीं आती थी ॥ १-२ ॥ कपूर तथा चन्दन (-जैसे शीतल पदार्थ) भी उन्हें अधिक ताप प्रदान कर रहे थे। कोई भी शीतल पदार्थ उन्हें सन्तोष नहीं प्रदान कर पा रहा था ॥ ३ ॥ इसी प्रकार बहुत समय बीत जाने पर वे अस्थि और चर्ममात्र शरीर वाली हो गयी थीं। तदनन्तर भगवान् शंकर के पास जाकर गिरिजा ने यह वचन कहा — ॥ ४ ॥ हे देव! आप मेरे विषय में कुछ भी नहीं सोच रहे हैं कि मैं किस अवस्था को प्राप्त हो गयी हूँ। अहो ! बड़े आश्चर्य की बात है कि दग्ध हुआ भी वह कामदेव मुझे अत्यन्त पीड़ा पहुँचा रहा है ॥ ५ ॥ मैंने उसे शान्त करने के नानाविध उपाय किये, किंतु वह शान्त नहीं हुआ। हे मेरे स्वामिन्! जिस उपाय के द्वारा शान्ति प्राप्त हो, आप वह उपाय करें ॥ ६ ॥ अपनी प्रिया का हित करने वाले भगवान् शंकर ने इस प्रकार के वचनों को सुनकर एकान्त स्थान में उनका हाथ पकड़कर उन्हें शय्या पर बैठाया। कामदेव के द्वारा वशीभूत किये गये शंकर ने उनके साथ यथेष्ट रमण किया । कामदेव ने मृत्यु को प्राप्त करके भी देवताओं के द्वारा कहे गये महान् कार्य को सम्पादित कर दिया ॥ ७-८ ॥ [ऐसा करके उसने] ‘कामदेव अतुलनीय धनुर्धर है’ इस प्रसिद्धि को पा लिया। क्रीडाविलास में निमग्न उन उमा-महेश्वर के साठ हजार वर्ष व्यतीत हो गये ॥ ९ ॥ अपने-अपने स्थानों से च्युत हुए देवता तथा मुनिगण कामदेव के ऐसे प्रयत्न को सुनकर पुनः कैलासपर्वत पर आये और वहाँ भगवान् शिव को क्रीडा में निमग्न जानकर वे चिन्ता के कारण व्याकुल चित्तवाले हो गये एवं मौन होकर वहाँ स्थित हो गये । तारकासुर से भयभीत होकर वे पुनः गुफा में चले गये ॥ १०-११ ॥ इस तारकासुर का वध कब होगा, कब हम अपने स्थानों में जायँगे और कब भगवान् शंकर हमारे दुःख का विनाश करेंगे — इसी चिन्तासागर में जब वे ब्रह्मा आदि देवता निमग्न थे, उसी समय देवगुरु बृहस्पतिजी उनसे बोले — ‘हे अनघो! आप लोग मेरे वचन को सुनें ॥ १२-१३ ॥ आप लोग अग्निदेव को अन्य रूप धारण कराकर शिव के पास भेजें, वे शीघ्र ही शंकर को प्रबोधित करें, इससे आपका कार्य बन जायगा । तब देवताओं ने अग्निदेव को बुलाया और विविध प्रकार की स्तुतियों से उनका स्तवन किया ॥ १४१/२ ॥ ॥ देव ऊचुः ॥ त्वत्तो यज्ञक्रिया ब्रह्मन् संस्काराः सर्व एव हि ॥ १५ ॥ अपां त्वमसि हेतुश्च देवानां मुखमेव च । अग्निहोत्रप्रणेता त्वं गार्हपत्यादिनामभिः ॥ १६ ॥ त्वमेव पिबसीशाब्धिवारि नित्यं महत्तरम् । त्वमेव पचसे नॄणां जठरे षड्र्सानपि ॥ १७ ॥ त्वमेव सर्वजन्तूनां सन्धौ सन्धौ विचेष्टसे । त्वया त्यक्तं प्रेतसंज्ञां लभते दह्यते त्वया ॥ १८ ॥ हेतुस्त्वमसि देवेश जन्तूनां प्राणधारणे । त्वयाद्भिश्च विना नान्नं पक्तुं शक्यं न च क्वचित् ॥ १९ ॥ त्वमेव ब्रह्मा रुद्रश्च सूर्यश्चानेकरूपधृक् । त्वमेव जायसे मूलं क्रोधस्य जगदीश्वर ॥ २० ॥ यत्र तत्र भवेत् तेजस्तत् तद्रूपं तवैव च । अतस्त्वां प्रार्थयामोऽद्य त्रिलोक्या उपकारक ॥ २१ ॥ देवता बोले — हे ब्रह्मन् ! आपसे ही समस्त यज्ञक्रियाएँ और सभी संस्कार सम्पन्न होते हैं। आप ही जल के कारणभूत हैं, आप देवताओं के मुख हैं, आप गार्हपत्य आदि नामों से अग्निहोत्र के प्रणेता हैं । हे ईश ! आप ही नित्यप्रति [बडवानलरूप से] समुद्र की महान् जलराशि का पान किया करते हैं । आप ही मनुष्यों के जठरदेश में जठराग्नि नाम से षड्रसों का पाचन करते हैं ॥ १५–१७ ॥ आप ही सभी जीवों की हड्डियों के प्रत्येक जोड़ों में स्थित होकर उन्हें संचालित करते हैं, आपसे रहित होने पर जीव ‘प्रेत’ इस संज्ञा को प्राप्त करता है और आपके द्वारा ही मृत शरीर का दाह किया जाता है ॥ १८ ॥ हे देवेश ! प्रत्येक प्राणियों के प्राण धारण करने में आप ही हेतुभूत हैं। आप अग्नि के बिना तथा जल के बिना कहीं भी अन्न को पकाया नहीं जा सकता ॥ १९ ॥ आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही रुद्र हैं और आप ही अनेक रूप धारण करनेवाले सूर्यदेव के रूप में उत्पन्न होते हैं। हे जगदीश्वर! आप ही क्रोध के मूलकारण हैं ॥ २० ॥ जहाँ-जहाँ भी तेज दिखलायी पड़ता है, वह सब आपका ही रूप है । अतः तीनों लोकों का उपकार करने वाले हे अग्निदेव ! आपसे आज हम देवता प्रार्थना करते हैं ॥ २१ ॥ हे विभो! उस तारकासुर ने अपने आक्रमण द्वारा तीनों लोकों को अपने अधीन कर लिया है। आप उस आकाशवाणी को जानते ही हैं और कामदेव की जो दुर्गति हुई है, वह भी आपको ज्ञात है ॥ २२ ॥ चिरकाल से क्रीडा में निमग्न भगवान् शंकर और पार्वती को आप उबुद्ध करें। आप अपना दूसरा रूप धारणकर वहाँ जाकर भिक्षा की याचना करें। ऐसा करने से सम्पूर्ण जगत् का तथा हमारा भी कल्याण होगा ॥ २३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — देवताओं का ऐसा वचन सुनकर वे अग्निदेव काषाय वस्त्र धारण करके ब्राह्मण का रूप बनाकर उस स्थान पर गये, जहाँ भगवान् शंकर एवं पार्वती क्रीडा में निमग्न थे । उन्होंने बाहर ही स्थित होकर ‘भिक्षा दीजिये’ —इस प्रकार से तीन बार बड़े ही ऊँचे स्वर में कहा। उन दोनों ने वह ध्वनि सुन ली। तदनन्तर अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर वे दोनों आपस में कहने लगे कि वस्त्र धारण कर लो। यह कौन है, जो यहाँ आ गया है, भिक्षा में इसे कौन-सी वस्तु दी जाय —इस प्रकार वे विचार करने लगे ॥ २४-२७ ॥ भगवान् शंकर के तेज को धारण करने में असमर्थ देवी उमा ने उस तेज को अपनी अंजलि में धारण किया और भवितव्यता को भलीभाँति समझते हुए उन्होंने वह तेज उन भिक्षुक अग्निदेव को समर्पित कर दिया ॥ २८ ॥ अग्निदेव ने विचार किया कि इस तेज को यदि मैं भूमि पर गिरा देता हूँ, तो यह चराचर जीवोंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकी को दग्ध कर डालेगा, अतः उन्होंने भगवान् शंकर के उस तेज को उन दोनों के शाप से भयभीत होकर स्वयं पी लिया। इसके फलस्वरूप वे अग्निदेव गर्भवान् हो गये, उन्हें अत्यन्त लज्जा तथा संताप हो उठा। वे अग्नि जहाँ-जहाँ भी जाते, कहीं भी उन्हें शान्ति प्राप्त नहीं हुई ॥ २९-३० ॥ तुला राशि में भगवान् सूर्य के संक्रमण करने पर एक दिन उषाकाल में ही उठकर वे अग्निदेव गंगा में स्नान करने के लिये गये। स्नान से पूर्व वे जब तक शौच आदि क्रियाओंसे निवृत्त हुए, उसी बीच छः स्त्रियाँ भी श्रद्धाभक्ति के साथ कार्तिकमास में गंगाजी में स्नान करने के लिये वहाँ पर आयीं ॥ ३११/२ ॥ तदनन्तर अग्नि ने यह समझकर गंगाजी के शीतल जल में उस तेज को डाल दिया कि ये गंगाजी यदि भगवान् शिव की प्रिया होकर जलरूप में स्थित हैं, तो ये निश्चित ही इस वीर्यरूप तेज को धारण करने में समर्थ होंगी ॥ ३२१/२ ॥ तदनन्तर स्नान के लिये आयी हुई उन छः स्त्रियों ने उस शिववीर्य के छः भागकर पृथक्-पृथक् उसे ग्रहण कर लिया। वे अग्निदेव उसी क्षण अन्तर्धान हो गये और दूर पहुँच जाने पर उनके शरीर का शूल भी दूर हो गया ॥ ३३-३४ ॥ स्नान के अनन्तर वे स्त्रियाँ वस्त्र धारणकर अपने- अपने घर चली गयीं। उनके पतियों ने देखा कि उनकी पत्नियों का मुखमण्डल अत्यन्त प्रकाशमान हो रहा है। उन मुनीश्वरों ने ज्ञानदृष्टि से यह जान लिया कि ये गर्भावस्था को प्राप्त हो गयी हैं। उन्होंने उन्हें गृह से बाहर कर दिया और अपना मुख न दिखलाने को कहा ॥ ३५-३६ ॥ तब वे पुनः एकत्र होकर सरकण्डों से सुशोभित गंगाजी के तट पर पहुँचीं और उन्होंने अपने-अपने गर्भ को उन सरकण्डों में त्याग दिया। तदनन्तर स्नान करके पवित्र होकर वे अपने घरों को गयीं ॥ ३७ ॥ अपने-अपने गर्भ का परित्यागकर जब वे छहों स्त्रियाँ वापस चली गयीं, तो छः मुखों तथा बारह हाथों वाला एक बालक वहाँ प्रादुर्भूत हो गया ॥ ३८ ॥ उसके हुंकारमात्र से ग्रह-नक्षत्र एवं तारे आकाश से पृथ्वी पर गिरने लगे । सम्पूर्ण धरती, शेषनाग तथा पाताललोक काँप उठा। वृक्ष उखड़ने लगे, सूर्य बादलों से आच्छादित हो गये। इसी समय दिव्य दृष्टिवाले देवर्षि नारद वहाँ आ उपस्थित हुए ॥ ३९-४० ॥ नारदजी भगवान् शंकर का दर्शन करने जा रहे थे, मार्ग में उन्होंने उस बालक को देखा। वह बालक अत्यन्त दीप्तिमान्, महान् बलशाली तथा अपने तेज के कारण दुर्दर्शनीय था ॥ ४१ ॥ ध्यान लगाकर उस बालक के विषय में सब कुछ जानकर वे नारद मौन होकर कैलासपर्वत पर चले आये और उन्होंने भगवान् शंकर तथा देवी पार्वती को सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाया ॥ ४२ ॥ उस बालक को भगवान् शिव का पुत्र जानकर सम्पूर्ण पृथिवी आनन्दित हो उठी । देवता दुन्दुभियाँ बजाने लगे और गन्धर्व अद्भुत गान करने लगे ॥ ४३ ॥ नारदजी बोले — हे देवि पार्वती ! मैंने यहाँ आते समय मार्ग में तुम्हारे पुत्र को देखा है। उसके छः मुख हैं, बारह भुजाएँ हैं और वह करोड़ों सूर्यों के समान आभा वाला है ॥ ४४ ॥ वह गंगाजी के तटपर पड़ा हुआ है, क्या आपने उस षण्मुख बालक का परित्याग कर दिया है। वह करोड़ों कामदेवों की शोभा से समन्वित है, और अपनी गर्जना से सम्पूर्ण लोकों को क्षुब्ध कर रहा है। हे गौरि ! उस सुन्दर बालक के प्रति आपने निष्ठुरता क्यों की है ? ।। ४५१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार कहने के अनन्तर उन देवर्षि नारदजी के अन्तर्धान हो जाने पर वे देवी गौरी उस बालक के समीप गयीं ॥ ४६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘स्कन्दोपाख्यान’ नामक पचासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८५ ॥ Content is available only for registered users. 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