श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-86
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
छियासीवाँ अध्याय
ब्रह्मा तथा बृहस्पति द्वारा स्कन्द का नामकरण, देवताओं द्वारा स्कन्द का ‘सेनापति’ पद पर अभिषेक, स्कन्द का वरदचतुर्थी के माहात्म्य के विषय में शिवजी से प्रश्न करना
अथः षडशीतितमोऽध्यायः
स्कन्दोपाख्याने शङ्करेण स्कन्दाय गणेशव्रतकथनम्

ब्रह्माजी बोले — उस प्रकार के बालक को देखकर देवी पार्वती के स्तनों से दूध टपकने लगा । देवी सती ने प्रसन्नतापूर्वक बालक का आलिंगन किया, उस समय बालक उनके हृदयदेश में स्थित था। उसी समय गम्भीर स्वरवाली देवी गंगा ने उनसे कहा कि ‘यह बालक मेरा है’, अग्निदेव ने उपस्थित होकर उन गिरिकन्या पार्वती से कहा — ‘यह मेरा पुत्र है ‘ ॥ १-२ ॥ कृत्तिका आदि छः स्त्रियों ने उनसे कहा कि बालक हमसे उत्पन्न हुआ है’, रोते हुए व्याकुल होकर ‘यह वे स्त्रियाँ कहने लगीं —‘यह बालक हमारा ही है’ ॥ ३ ॥ इस प्रकार विवाद करती हुई वे स्त्रियाँ अग्निदेव को आगे करके देवताओं के निवास-स्थल कैलासपर्वत पर चन्द्रमा को शिर पर धारण करने वाले भगवान् शिव के पास गयीं ॥ ४ ॥

उन सबसे भी पहले देवी पार्वती वहाँ पहुँचीं, वे अपनी गोद में अपने उस बालक को लिये हुए थीं । भगवान् शिव ने उस बालक को अपनी गोद में धारण करके मन्त्रोच्चार-पूर्वक उसके सिर को सूँघा और वे भगवान् त्रिलोचन उस बालक के साथ बड़ी प्रसन्नतापूर्वक क्रीडा करने लगे। देवी गंगा, अग्निदेव और वे कृत्तिका आदि छहों स्त्रियाँ जैसे आयी थीं, वैसे ही अपने घरों को चली गयीं ॥ ५-६ ॥

उसका नामकरण-संस्कार करने के लिये भगवान् शिव ने ब्रह्माजी और देवगुरु बृहस्पति को बुलाकर उन दोनों से कहा कि ‘ आप लोग इस बालक का नाम रखें’ ॥ ७ ॥ ब्रह्मा तथा बृहस्पति बोले —  हे भगवन् ! चूँकि यह बालक कार्तिकमास में उत्पन्न हुआ है, इसलिये इसका ‘कार्तिकेय’ यह प्रथम नाम विख्यात होगा । इसका अन्य दूसरा नाम ‘पार्वतीनन्दन’ भी होगा। इसका जन्म शरकण्डों में हुआ है, अतः यह ‘शरजन्मा’ भी कहलायेगा। कृत्तिकाओं से उत्पन्न होने से भी यह ‘कार्तिकेय’ इस नाम से प्रसिद्ध होगा ॥ ८-९ ॥ चूँकि [कृत्तिका आदि ] इसकी छ: माताएँ हैं, इसलिये ‘षाण्मातुर’ भी इसका नाम होगा। आपका यह पुत्र दैत्य तारक पर विजय प्राप्त करेगा, इसलिये यह ‘तारकजित् ‘ नाम से भी प्रसिद्ध होगा ॥ १० ॥ यह भविष्य में देवों की सेना का पति होगा, इसलिये ‘सेनानी’ नाम से भी इसे पुकारा जायगा । सेनापति होने के कारण यह ‘महासेन’ कहलायेगा । इसके छः मुख होने से यह ‘षडानन’ भी कहा जायगा। चूँकि भगवान् शिव का रेत तीन बार स्खलित हुआ, इसलिये यह ‘स्कन्द’ कहा जायगा । ब्रह्मा और बृहस्पति के  द्वारा इस प्रकार कहे जाते समय इन्द्र आदि देवता भी वहाँ उपस्थित हो गये ॥ ११-१२ ॥

उन सभी देवताओं ने वहाँ हर्ष प्रकट किया, उन कार्तिकेय की पूजा की तथा उनका स्तवन – वन्दन किया । दिव्य वाद्यों की ध्वनि पृथ्वी, आकाश और रसातल में गूँज उठी। तदनन्तर देवताओं ने उन सेनानी कार्तिकेय को प्रणामकर उनसे कहा — ‘हे देव! तीनों लोकों के लिये कंटक बने तारकासुर का विनाश करें’ ॥ १३-१४ ॥

उन्होंने अभिषेक की विविध सामग्रियों से अनेक मुनियों द्वारा उच्चरित किये गये वैदिक तथा तान्त्रिक मन्त्रों द्वारा उनका सेनापति पद पर अभिषेक किया ॥ १५ ॥ तदनन्तर उनकी आज्ञा प्राप्तकर वे सभी देवता अपने स्थानों पर आ गये । उद्वेगरहित ऋषिगण भी पहले की भाँति तप करने लगे। कार्तिकेय के सेनापति होने पर अब देवताओं तथा मुनियों को कहीं भी भय नहीं रह गया था। वह बालक उसी प्रकार वृद्धि को प्राप्त करने लगा, जैसे शुक्लपक्ष में चन्द्रमा बढ़ता रहता है ॥ १६-१७ ॥

एक दिन की बात है, बालस्वभाववश वह बालक कार्तिकेय चन्द्रमा को पकड़ने के लिये उड़ चला, तब ब्रह्माजी ने उसे रोका और कहा — ‘ऐसा साहस मत करो’। उस बालक ने अपनी बुद्धि के द्वारा देवगुरु बृहस्पति को और अपने पराक्रम द्वारा देवराज इन्द्र को भी जीत लिया। एक बार की बात है, जब पार्वती के साथ भगवान् शंकर सुखपूर्वक बैठे हुए थे, तो कार्तिकेय ने उन्हें प्रणाम करके सभी कामनाओं की सिद्धि के लिये उनसे पूछा — ॥ १८–१९१/२

स्कन्द बोले — हे पिताजी ! आप तीनों लोकों के गुरु के द्वारा मैंने नाना प्रकार की मंगलमयी महान् कथाओं को सुना है, तथापि मुझे पूर्ण सन्तुष्टि प्राप्त नहीं हुई है, है देव! आप मुझे कोई मंगलमय व्रत बतलाइये, जो सभी प्रकार की सिद्धियों को देनेवाला हो, पुत्र, सम्पत्ति को बढ़ाने वाला हो, सभी प्रकार के पापों का विनाशक, धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष को देने वाला हो और सभी शत्रुओं पर विजय दिलाने वाला हो ॥ २०–२२ ॥

ईश्वर बोले — हे स्कन्द ! तुमने सभी लोगों का उपकार करने वाले व्रत के विषय में बहुत अच्छी बात पूछी है । मैं तुम्हें उस व्रत के विषय में बता रहा हूँ, जो मानवों को सब प्रकार की सिद्धि प्रदान करने वाला है। वह व्रत सभी पापों का हरण करने वाला, धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष — चारों पुरुषार्थों को देने वाला, सभी शत्रुओं का विनाश करने वाला, पुत्र, सम्पत्ति को बढ़ाने वाला, अलक्ष्मी द्वारा उत्पन्न संकट को दूर करने वाला और भगवान् गणेशजी को प्रसन्न करने वाला है ॥ २३-२४१/२

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस व्रत को करता है, वह देवताओं के लिये भी पूज्य हो जाता है, अपनी स्वेच्छा से जहाँ-कहीं भी विचरण करने की शक्ति से सम्पन्न हो जाता है, इतना ही नहीं; वह सृष्टि, पालन तथा संहार करने में भी समर्थ हो जाता है। उसका दर्शन करने वाले दूसरे लोगों का महापाप भी विनष्ट हो जाता है ॥ २५-२६ ॥ हे स्कन्द ! इस वरदचतुर्थीव्रत की तुलना अन्य किसी व्रत से नहीं की जा सकती। भगवान् शंकर द्वारा कही गयी ऐसी वाणी सुनकर सेनानी स्कन्द ने पिता शंकरजी से पुनः वरदचतुर्थीव्रत की महिमा के विषय में पूछा- ॥ २७१/२

स्कन्द बोले — हे हर! इस वरदचतुर्थीव्रत के माहात्म्य को आप मुझे विस्तार से बतलाइये। इस व्रत का प्रारम्भ किस दिन से किया जाता है, इस व्रत की विधि क्या है, इसका फल क्या है और इस व्रत की महिमा का किसे प्रत्यक्ष हुआ है? हे शंकर! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो सभी मानवों के कल्याण के लिये तथा इस व्रत की प्रसिद्धि के लिये यह सब मुझे पूर्ण रूप से बताइये ॥ २८–३० ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘स्कन्दोपाख्यान’ नामक छियासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८६ ॥

Content is available only for registered users. Please login or register

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.