September 21, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-014 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ चौदहवाँ अध्याय धर्मदत्त नामक ब्राह्मण का काशिराज के यहाँ आना और विनायक की स्तुति करना, विनायक का धर्मदत्त के साथ उनके घर को प्रस्थान, मार्ग में आये काम-क्रोध नामक राक्षसों का विनायक द्वारा वध, विनायक की बाललीला के प्रसंग में मदोन्मत्त हाथी का वध, धर्मदत्त द्वारा सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो कन्याओं को विनायक को सौंपना, विनायक द्वारा जृम्भा राक्षसी का वध, विनायक के बालचरित के श्रवण की महिमा अथः चतुर्दशोऽध्यायः बालचरित्र ब्रह्माजी बोले — बालक विनायक ने प्रातः काल उठकर यथाविधि शौच आदि कृत्य करके स्नान किया, तदनन्तर विधिपूर्वक सन्ध्यावन्दन किया। तत्पश्चात् समिधाओं के द्वारा नित्य होम सम्पन्न कर विनायक ने शुभ कृष्ण मृगचर्म और दण्ड को एक स्थान पर रखकर बालकों के साथ क्रीड़ा करना प्रारम्भ किया ॥ १-२ ॥ [तभी] वेद-शास्त्रों के ज्ञाता और धर्मदत्त नाम से विख्यात ब्राह्मण, जो वहाँ निवास करने वाले थे, वे बालक विनायक की कीर्ति को सुनकर उन मुनि कश्यपजी के पुत्र के दर्शन की इच्छा से नृपश्रेष्ठ काशिराज के भवन में आये। राजा से भलीभाँति सम्मान प्राप्त किये उन ब्राह्मण ने नृपश्रेष्ठ से पूछा — ॥ ३-४ ॥ मुझे बतलाइये कि महर्षि कश्यप का वह बलशाली पुत्र कहाँ है? तब लोगों ने कहा कि वह बालकों के साथ खेल रहा है । तदनन्तर वे ब्राह्मण धर्मदत्त उठे और उन्होंने बालक विनायक का हाथ पकड़कर उससे कहा — ‘आप मेरे मित्र के पुत्र हैं, मैंने आपकी कीर्ति सुन रखी है ॥ ५-६ ॥ इसलिये मैं आपको अपने घर ले जाने के लिये आया हूँ, इसमें कोई संशय नहीं है। आप अपने चरणों की धूलि से हमें पवित्र करें और सभी मनोरथों को पूर्ण करें। आप परब्रह्मस्वरूप हैं, परमात्मा हैं, पर से भी परे हैं, पृथ्वी के भार को हलका करने के लिये आपने महर्षि कश्यपजी के घर में जन्म लिया है ॥ ७-८ ॥ आप क्रीडा करने के लिये मनुष्यरूप में अवतरित हैं। हे बालक! मैं आपको यथार्थरूप से जानता हूँ ।’ तदनन्तर बालक विनायक ने उनसे कहा — ‘आपने क्यों यहाँ आने का कष्ट किया ? हे तात! मैं आपकी आज्ञा प्राप्त करते ही क्यों नहीं आपके पास आ जाता’, ऐसा कहकर वे विनायक शीघ्र ही ब्राह्मण धर्मदत्त के साथ चल पड़े ॥ ९-१० ॥ उन पराक्रमी विनायक के पीछे-पीछे धूल उड़ाते हुए बालक चल रहे थे। मार्ग में जाते हुए उन विनायक के समीप असुर नरान्तक द्वारा भेजे हुए दो अधम राक्षस आये, जिनका नाम काम और क्रोध था। वे आपस में [मायामय] युद्ध करते हुए उन बालक विनायक के वध की इच्छा से आये थे ॥ ११-१२ ॥ गधे का रूप धारण किये हुए और दूषित मनोवृत्तिवाले वे दोनों मदोन्मत्त राक्षस आपस में युद्ध करते हुए उसी प्रकार उन बालक विनायक के ऊपर गिरे, जैसे कि अग्नि में पतिंगा गिर पड़ता है ॥ १३ ॥ तब साथ में आये सभी बालक दसों दिशाओं की ओर भाग चले । तदनन्तर विनायक ने बलपूर्वक उन दोनों के पैरों को पकड़कर बहुत बार घुमाया और फिर जमीन पर पटक दिया। तब लोगों ने देखा कि जमीन पर गिरे हुए उन दोनों के प्राण निकल चुके हैं ॥ १४-१५ ॥ उस समय उनके देहपात द्वारा हुई ध्वनि से तीनों लोक प्रकम्पित हो उठे। उन विनायक के महान् पराक्रम को आज प्रत्यक्ष देखकर महामुनि धर्मदत्त को लोक में प्रचलित विनायक की प्रसिद्धि की वार्ता के विषयमें पूर्ण विश्वास हो गया। तदनन्तर ब्राह्मण धर्मदत्त उन बालक विनायक के साथ आगे बढ़े। उसी समय उन्होंने छद्मवेश धारण करने वाले एक मदोन्मत्त महान् बलशाली हाथी (-के रूपवाले कुण्ड नामक दैत्य ) – को देखा, जो इधर-उधर भागते हुए लोगों को मारने के लिये उद्यत हो रहा था ॥ १६-१८ ॥ महान् वीर भी उस हाथी को देखकर इधर-उधर भागने लगे। वहाँ उस समय दौड़ते हुए लोगों का महान् कोलाहल व्याप्त हो गया ॥ १९ ॥ सर्वत्र धूल उसी प्रकार छा गयी, जैसे कि कोहरे के द्वारा पर्वत ढक दिये जाते हैं । तदनन्तर वह महाबलशाली हाथी राजा के मदोन्मत्त हाथियों को मारने चल पड़ा ॥ २० ॥ महल के भीतर निवास करने वाले लोगों ने हाथियों के उस अत्यन्त भयंकर युद्ध को देखा। वहाँ बँधे हुए घोड़ों को देखकर उन हाथियों ने अश्वशाला को भी तहस-नहस कर दिया ॥ २१ ॥ बन्धन मुक्त हुए घोड़े तथा हाथी दसों दिशाओं में भाग चले। ब्राह्मण धर्मदत्त उन बालक विनायक को साथ लेकर ज्यों-ही घर के अन्दर जाने को उद्यत हुए, उसी समय बालक विनायक ने उस हाथी की सूँड़ को मरोड़ डाला और वे बलपूर्वक उसके ऊपर आरूढ़ हो गये । बालक विनायक ने अंकुश के द्वारा उस हाथी के गण्डस्थल को बार-बार वेध डाला ॥ २२-२३ ॥ [उसके कारण] चारों ओर रक्त बहने लगा और वह हाथी सभी लोगों को भयभीत करने वाली चिंघाड़ की ध्वनि करते हुए भूमितल पर गिर पड़ा ॥ २४ ॥ विशाल शरीरवाले उस हाथी के गिरने से सभी सामानों सहित असंख्य संख्या में वहाँ के भवन टूट गये ॥ २५ ॥ पर्वतों, वनों तथा खानोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठी। धूल के छा जाने से हुए अन्धकार के छँट जाने पर नगर में निवास करने वाले लोग वहाँ आये । महान् भयंकर आकृति वाले उस हाथी को मरा हुआ देखकर वे भय से व्याकुल हो उठे। कुछ बलशाली पुरुष उसके पास गये और उन्होंने बलपूर्वक उस हाथी से बालक को नीचे उतारा ॥ २६-२७ ॥ ब्राह्मण धर्मदत्त ने बालक विनायक को पुनः अपनी गोद में ले लिया। फिर से कोई नया उत्पात न हो जाय, इस शंका से वे शीघ्र ही बालक को घर के अन्दर ले गये । उस अपशकुन के शान्त हो जाने पर ब्राह्मण धर्मदत्त ने ब्राह्मणों को धन प्रदान किया और पृथक्-पृथक् उपचारों के द्वारा बालक विनायक की पूजा की ॥ २८-२९ ॥ उन्होंने वस्त्र, अलंकार एवं पुष्पों से पूजन किया और विविध प्रकार के एकत्रित नैवेद्यों का उन्हें भोग लगाया। दक्षिणा निमित्त धर्मदत्त ने सिद्धि तथा बुद्धि नामक अपनी दो कन्याएँ उन्हें समर्पित कीं और भूमि पर गिरकर दण्डवत् प्रणाम किया, तदनन्तर प्रसन्न मन वाले ब्राह्मण धर्मदत्त ने आनन्दातिरेक से गद्गद वाणी में कहा — ॥ ३०-३१ ॥ आज मेरा भाग्य सफल हो गया है, जो कि मैंने आपके चरणाम्बुजका दर्शन किया। आप जगत् के स्वामी हैं, जगत् की सृष्टि करने वाले हैं, जगत् के साक्षीरूप हैं। समस्त जगत् के गुरु हैं, आप मेरे कहने से मेरे पूर्वजों का उद्धार करने के लिये यहाँ आये हैं ॥ ३२१/२ ॥ ऐसा कहते हुए उन मुनि धर्मदत्त को विनायकदेव ने एक उत्तम आसन पर बैठाया और [ अपने पिता कश्यपजी के मित्र होने के कारण पितृभाव से स्वयं भी ] अत्यन्त भक्तिपूर्वक मुनि की पूजा की ॥ ३३१/२ ॥ सिद्धि तथा बुद्धि से समन्वित वे बालक विनायक देवी गंगा तथा पार्वती से युक्त, त्रिशूल हाथ में धारण करने वाले त्रिनेत्र भगवान् शिव के समान अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे। उसी समय एक जृम्भा नामक सुन्दरी वहाँ आयी ॥ ३४-३५ ॥ वह पीले रंग के वस्त्र धारण की हुई थी, उसने सुन्दर कंकण तथा मनोहर आभूषण पहन रखे थे। वह धूम्राक्ष नामक राक्षस की पत्नी थी और अत्यन्त दुष्ट मनोभाव रखने वाली थी ॥ ३६ ॥ वह अत्यन्त मधुरवाणी में बोली — ‘यह उत्तम निधान है। यहाँ बहुत से अरिष्ट हो रहे हैं, उन्हें प्रयत्न करके नष्ट किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में इस बालक को तथा इसके माता-पिता को कैसे सुखभोग हो सकता है?’, सभी स्त्रियों से ऐसा कहकर वह बालक विनायक से कहने लगी — ॥ ३७-३८ ॥ हे विभो! यह मेरा महान् भाग्य है, जो कि मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ। हे देवेश्वर ! बहुत से दुष्टों का वध करते-करते आप थक गये हैं । अतः हे महामते ! इस सुगन्धित तैल का उबटन लगाइये। मैं तुम्हारे अंगों की मालिश कर दूँगी तथा तेल और उबटन भी लगा दूँगी । तब बालक विनायक के द्वारा ‘ठीक है’- ऐसा कहे जाने पर हाथ में विष ली हुई उस स्त्री ने विष के प्रभावकी उत्कटता का वर्धन करने वाले उस तेल को उनके चरणों में लगाया ॥ ३९-४१ ॥ जँभाई लेती हुई वह जृम्भा उस तेल के द्वारा बालक विनायक की मालिश करने लगी। वहाँ उपस्थित लोगों ने उसे भली स्त्री माना । वह दुष्ट भाववाली स्त्री जृम्भा बालक विनायक की उसी प्रकार सेवा करने लगी, जैसे शुभ भाववाली स्त्री अपने पति की सेवा करती है ॥ ४२ ॥ तदनन्तर उस विषमिश्रित तेल के प्रभाव से बालक विनायक के शरीर में अत्यधिक जलन होने लगी। तब विनायक ने ज्ञानयोग के बल पर यह जान लिया कि यह तो दूषित मनोवृत्तिवाली राक्षसी है ॥ ४३ ॥ तब शीघ्र ही विनायक ने एक नारियल के फल से उसके मस्तक पर प्रहार किया, जिससे वह जमीन पर गिर पड़ी और अपने वास्तविक निशाचरीरूप में आ गयी। अपने शरीर से बहने वाले रक्त के मध्य में वह दो योजन दूर तक फैल गयी। उस समय वे ब्राह्मण धर्मदत्त तथा अन्य सभी उपस्थित लोग अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये ॥ ४४-४५ ॥ तदनन्तर ब्राह्मण धर्मदत्त ने बालक विनायक की विधिवत् पूजा की और उन्हें छः रसों से समन्वित अत्यन्त स्वादुपूर्ण विविध प्रकार के पक्वान्नों का भोजन कराया ॥ ४६ ॥ उस अवसर पर देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की तथा स्त्रियों ने उनकी पूजा की, आरती की और लाजाओं की उनपर वर्षा की ॥ ४७ ॥ तदनन्तर वे काशीनरेश उन विनायक को ले जाने के लिये वहाँ आये और उन्होंने उन्हें रथ पर बैठाया । तदुपरान्त विविध वाद्यों की ध्वनि, गन्धर्वों के गायन तथा अप्सराओं के द्वारा आगे-आगे किये जाते हुए नृत्य के साथ राजा उन विनायक को सकुशल अपने भवन में ले गये ॥ ४८-४९ ॥ अनेक वीरों से घिरे हुए तथा काशिराज के रथ पर विराजमान वे बालक विनायक उसी प्रकार प्रतीत हो रहे थे, मानो सिंह पर आरूढ़ और हाथ में शस्त्र धारण किये हुए एवं देवताओं से घिरे हुए इन्द्र हों ॥ ५० ॥ उस समय सिद्धि तथा बुद्धि से समन्वित वे विनायक उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जैसे कि गंगा तथा पार्वती से समन्वित शिव सुशोभित होते हैं। अनेक बन्दीजनों द्वारा स्तुति किये जाते हुए उन विनायक ने राजा के भवन में प्रवेश किया। जगदीश्वर विनायक के इस प्रकार के बालचरित्रों का जो श्रवण करेगा, वह सभी प्रकार के मनोरथों को प्राप्त कर लेगा और कभी भी शत्रुओं के द्वारा प्रपीड़ित नहीं होगा ॥ ५१-५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में बालचरित के अन्तर्गत ‘काम-क्रोध आदि दैत्यों के वध का वर्णन’ नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥ Content is available only for registered users. 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