श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-143
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय
गणेशगीता – श्रीगणेशजी का राजा वरेण्य को अपने तात्त्विक स्वरूप का परिचय देना
अथः त्रिचत्वारिंशादधिकशततमोऽध्यायः ।
गणेशगीता – “बुद्धियोगो” नाम षष्टोऽध्यायः

श्रीगणेशजी बोले — [ हे राजन् ! ] इस प्रकार मुझमें मन लगाकर मेरा वह तत्त्व जानो, जिसको जानने से मुझे सर्वगत और यथार्थ जानकर मुक्त हो जाओगे ॥ १ ॥ हे राजन्! लोगों के ऊपर अनुग्रह की इच्छा से वह तत्त्व मैं तुमसे वर्णन करता हूँ, जिसको जानने से दूसरे मुक्ति के साधन को जानने की आवश्यकता नहीं रहती ॥ २ ॥

प्रथम तो मेरी प्रकृति को जानना चाहिये, उससे ज्ञान प्राप्त होता है, इसके उपरान्त मेरा ज्ञान होने से प्राणियों को विज्ञान-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥ पृथ्वी, अग्नि, आकाश, अहंकार, जल, चित्त, बुद्धि, वायु, रवि, चन्द्र, यजमान — यह ग्यारह प्रकार की मेरी (अपरा) प्रकृति है ॥ ४ ॥ और भी वृद्ध मुनिजन ऐसा वर्णन करते हैं कि आने-जाने वाली, जीवत्व को प्राप्त हुई तथा त्रिलोकी में व्याप्त भी मेरी दूसरी (परा) प्रकृति है ॥ ५ ॥

इन दोनों से ही समस्त चराचर जगत् उत्पन्न होता है और इस जगत् की उत्पत्ति, पालन और नाशकाकर्ता मैं ही हूँ। मेरे इस तत्त्व को जानने के निमित्त वर्णाश्रमी पुरुषों में पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार कोई एक यत्न करता है ॥ ६-७ ॥ उन यत्नवानों में कोई एक मेरा साक्षात् करता है, मुझसे अन्य और किसी को वह नहीं देखता और मुझमें सम्पूर्ण जगत् को देखता है ॥ ८ ॥ पृथ्वी में सुगन्धिरूप से, अग्नि में तेजरूप से, सूर्य और चन्द्र में प्रभारूप से, जल में रसरूप से, बुद्धिमान्, तपस्वी एवं बलिष्ठों में बुद्धि, तप और बलरूप से मैं ही स्थित हूँ और मुझसे ही उत्पन्न हुए तीन प्रकार के विकारों में भी मैं ही स्थित हूँ। माया से मोहित चित्तवाले पापी मुझे नहीं जानते, तीन प्रकार के विकार (सत्, रज, तम) – वाली मेरी प्रकृति त्रिलोकी को मोहित करती रहती है ॥ ९-११ ॥

जो मेरे तत्त्व को जानता है, वह सम्पूर्ण मोह का त्याग कर देता है और अनेक जन्मों में [की गयी साधना के अनन्तर] मुझे जानकर प्राणी मुक्त हो जाता है ॥ १२ ॥ जो अनेक प्रकार के देवताओं का भजन करते हैं, वे उन्हीं को प्राप्त होते हैं। सम्पूर्ण मनुष्य जैसी जैसी मति करके मेरा भजन करते हैं, उसी प्रकार से मैं उनके भाव को पूर्ण करता हूँ। मैं सबको जानता हूँ, किंतु मुझे कोई पूरी तरह नहीं जानता ॥ १३-१४ ॥ मुझ अव्यक्त के व्यक्त स्वरूप को काम से मोहित दृष्टि वाले नहीं जानते, अज्ञानी और पापी पुरुषों के लिये मैं प्रकट नहीं होता हूँ। जो अन्त समय में श्रद्धायुक्त होकर मेरा स्मरण करते हुए अपना शरीर त्याग करता है, हे राजन्! वह मेरी कृपा से मुक्त हो जाता है ॥ १५-१६ ॥

भक्तिपूर्वक जिस-जिस देवता को स्मरण करता हुआ प्राणी अपने कलेवर का त्याग करता है, हे राजन् ! उन देवताओं की भक्ति करने से वह उन्हीं के लोक को प्राप्त होता है । इस कारण हे राजन् ! रात-दिन मेरे अनेक रूप स्मरण करने योग्य हैं, उन सबसे मैं ही उसी प्रकार प्राप्त होता हूँ, जैसे नदियों का जल सागर में ही जाता है ॥ १७-१८ ॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्रादि लोकों को प्राप्त होकर वह फिर संसार में जन्म लेता है, किंतु जो असन्दिग्ध होकर मुझको प्राप्त होता है, उसका फिर जन्म नहीं होता। हे राजन्! जो अनन्यशरण होकर भक्ति से मेरा भजन करता है, मैं सदा उसके योगक्षेम (मंगल) – का विधान करता हूँ ॥ १९-२० ॥ हे राजन्! मनुष्यों की कृष्ण और शुक्ल के भेद से दो प्रकार की गतियाँ हैं, एक से प्राणी संसार में आता है और दूसरी से परब्रह्म को प्राप्त होता है ॥ २१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘बुद्धियोग का वर्णन’ नामक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४३ ॥

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