October 1, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-028 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अट्ठाईसवाँ अध्याय राजा साम्ब तथा दुष्टबुद्धि के जन्म-जन्मान्तरों की कथा, उनके द्वारा अनजान में किये गये शमीपत्र के पूजन से गजानन का प्रसन्न होकर उन्हें दिव्य देह प्राप्त कराकर स्वर्गलोक प्राप्त कराना अथः अष्टाविंशतितमोऽध्यायः बालचरिते भीमराक्षसयोर्जन्मवर्णनं ब्रह्माजी बोले — राजा साम्ब का वह दुष्टबुद्धि नामक अमात्य राज्य का कार्य करता था और स्वयं साम्ब केवल सुन्दर स्त्रियों का संग करता था। वह राज्य में जिस स्त्री के विषय में सुनता था कि वह सुन्दर है, चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित हो, सधवा हो अथवा विधवा हो, वह उसके परिजनों के रोने-चिल्लाने पर भी दुराचार करने के लिये बलात् उसका अपहरण कर लेता था। वह विषयलम्पट जातिभेद का भी विचार नहीं करता था ॥ १-२ ॥ जो भी यौवनवती स्त्री उसके दृष्टिपथ में आती थी, वह कामी साम्ब उसके साथ विषयोपभोग में निरत हो जाता था। वह पराये धन तथा परायी स्त्री को बलपूर्वक ग्रहण कर लेता था। उसका वह मन्त्री दुष्टबुद्धि भी उसी के समान दुर्गुणों वाला तथा कुमार्ग में परायण रहने वाला था ॥ ३-४ ॥ इस प्रकार दुराचारपरायण वे दोनों निर्दयी कन्या, माता तथा बहिन का भी परित्याग नहीं करते थे ॥ ५ ॥ वे दोनों न तो ब्रह्महत्या, न स्त्रीहत्या और न बालहत्या का ही विचार करते थे । इस प्रकार पापपरायण तथा दूषितबुद्धिवाले वे दोनों राजा और अमात्य पाप के पर्वत के समान अत्यन्त दुःसह हो गये थे । उनके घर में भिक्षा लेने न कोई ब्राह्मण जाता था और न कोई संन्यासी ही ॥ ६-७ ॥ पूरे राज्य में भी कोई न तो राजा का नाम लेता था और न कोई मन्त्री का । एक बार की बात है, वे दोनों आखेट करने के लिये एक गहन वन में प्रविष्ट हुए ॥ ८ ॥ उन्होंने मृगों के समूहों तथा अनेक प्रकार के पक्षियों के समूहों का वध किया । फिर वे दोनों उन्हें नगर के लिये भेजकर स्वयं घोड़े पर सवार होकर वापस आने लगे ॥ ९ ॥ [तभी] मार्ग में उन्होंने विनायक का एक विशाल मन्दिर देखा, जिसमें देव विनायक की अत्यन्त मंगलमयी जीर्ण मूर्ति विद्यमान थी । श्रीराम के पिता दशरथजी ने पुत्रप्राप्ति के लिये तप करते समय उस मूर्ति को स्थापित किया था। [वहाँ] उन्होंने विनायक के दशाक्षर मन्त्र का जप करते हुए बहुत दिनों तक ध्यान किया था ॥ १०-११ ॥ यहीँ पर भगवान् विनायक उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष रूप से प्रकट हुए थे। उन्हें वर प्रदानकर उन देव ने उनकी मनोकामना पूर्ण की थी तथा आज भी वे अभिलषित वर प्रदान करते हैं ॥ १२ ॥ राजा दशरथ ने महर्षि वसिष्ठ के हाथों इस दृढ़ मूर्ति की स्थापना करवायी थी । तब वसिष्ठमुनि ने ‘वरद विनायक’ इस मूर्ति का नाम रखा। इनके दर्शन से, इनका स्मरण करने से अथवा इनका पूजन करने से मनुष्यों को धर्म-अर्थ-काम तथा मोक्ष — चतुर्विध पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। इसमें कोई संशय नहीं ॥ १३-१४ ॥ इस प्रकार महर्षि वसिष्ठजी के वचन के अनुसार यह स्थान पृथ्वी में प्रसिद्ध हुआ । श्रीगणेशजी की सेवा करने से, उनका स्मरण करने से तथा उनका पूजन करने से श्रीदशरथजी को राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न नामक चार पुत्र एक ही साथ प्राप्त हुए। वे चारों लोक में अत्यन्त प्रसिद्ध, सर्वज्ञ तथा शूरवीरों के मान्य थे ॥ १५-१६ ॥ इस प्रकार अत्यन्त रमणीय तथा राजा (दशरथं) – के द्वारा निर्मित कराये गये उस मन्दिर का दर्शनकर वे दोनों राजा तथा अमात्य घोड़े से उतर पड़े और उन्होंने [पूर्व के पुण्यवश ] सभी पापों को विनष्ट करने वाले प्रभु श्रीगणेशजी का पत्रों तथा पुष्पों द्वारा पूजन किया और उन्हें प्रणाम किया । उन विभु की प्रदक्षिणा करके वे क्षणमात्र में वहाँ से चले गये। उन दोनों का यह पुण्यकार्य दैववश ही हो गया था। इस प्रकार पापपरायण वे दोनों राजा तथा मन्त्री राज्य करने के बाद मृत्यु को प्राप्त हुए ॥ १७–१९ ॥ यमदूतों के द्वारा पाशों से बाँधकर उन्हें यमराज के पास ले जाया गया। तब यमराज ने चित्रगुप्त को बुलाकर उनके शुभ-अशुभ कर्मों के विषय में पूछा ॥ २० ॥ वे बोले — हे सूर्यपुत्र यमराजजी ! इन दोनों का पुण्य तो लेशमात्र भी नहीं है और इनके पापों की गणना भी नहीं है। इसपर यमराज दूतों से बोले । इन दोनों को बाँधो- बाँधो और लोहे के डण्डे से मारो और हजारों वर्षों तक के लिये अवीचिमय नरककुण्ड में डाल दो ॥ २१-२२ ॥ इस प्रकार एक-एक नरककुण्ड में क्रमशः इनके अपने संचित पापकर्मों का भोग करवाकर इन्हें मृत्युलोक में नीच योनि में डाल दो ॥ २३ ॥ हे दूतो! इन दोनों का थोड़ा-सा पुण्यकर्म है। उसे तुम लोग सुनो। इन दोनों ने प्रसंगवश भगवान् गजानन का दर्शन किया है और उनका पूजन भी किया है ॥ २४ ॥ उसी पुण्यकर्म के कारण वे गजानन ही वहाँ से इनका उद्धार करेंगे। यम के इस प्रकार के वचनों को सुनकर उन दूतों ने उन्हें दृढ़तापूर्वक बाँधकर मारा ॥ २५ ॥ तत्पश्चात् दूतों ने उन दोनों को क्रमशः सौ-सौ वर्षों तक कुम्भीपाक, शोणितोद, रौरव, कालकूट, तामिस्र, अन्धतामिस्र, पूयशोणितकर्दम आदि नरकों में डाला । कण्टक नामक नरक में उनके अंग छिद गये, तप्तबालुक नामक नरक में वे संतप्त हो उठे ॥ २६-२७ ॥ सूचीमुख नामक नरक में वे दोनों सूई के समान तीखे मुखवाले कीड़ों के द्वारा बार-बार काटे गये । तदनन्तर उन्हें महाभयंकर असिपत्रवन नामक नरक में डाला गया। वहाँ पर शस्त्रों के आघात से पापियों का शरीर छिन्न-भिन्न हो जाता है । तदनन्तर तप्तशिला नामक नरक में उन दोनों को घन की चोट से पीटा गया ॥ २८-२९ ॥ उन दोनों ने बहुत वर्षों तक इक्कीस नरकों की यातनाएँ सहीं। उन दोनों के सम्पूर्ण दुःखों का वर्णन करने में शेषजी भी समर्थ नहीं हैं। इस प्रकार से हजार वर्षों तक अनेक प्रकार के दुःखों को भोगकर पापों का भोग हो जाने के बाद उन्होंने शेष पापों को भोगने के लिये पृथ्वी पर जन्म लिया ॥ ३०-३१ ॥ इस जन्म में एक ने कौए की योनि में जन्म लिया तो दूसरा उलूक योनि में उत्पन्न हुआ। दूसरे जन्म में एक मेढक हुआ तो दूसरे ने गिरगिट की योनि में जन्म लिया ॥ ३२ ॥ अगले जन्म में एक विषधर सर्प हुआ तो दूसरा बिच्छू बना। उन योनियों में भी उन दोनों ने पापकर्म करते हुए अनेक लोगों को काटा ॥ ३३ ॥ तदनन्तर वे दोनों कुत्ते तथा बिल्ली की योनि में, फिर नेवले तथा सूकर की योनि में, तदनन्तर भेड़िये तथा सियार की योनि में, फिर घोड़े और गधे की योनि में उत्पन्न हुए। इसके पश्चात् वे दोनों ऊँट और हाथी बने, तदनन्तर मगरमच्छ तथा महान् मत्स्य बने, तदनन्तर बाघ और मृग और फिर बैल तथा महिष की योनि में उत्पन्न हुए ॥ ३४-३५ ॥ इस प्रकार से नाना योनियों में भटकते हुए वे चाण्डाल तथा कीटक की योनि में उत्पन्न हुए। इसके पश्चात् अन्त में राक्षस तथा भील (व्याध) – की योनि में उन्होंने जन्म लिया। इस जन्म में साम्ब नामक राजा दुर्बुद्धि (भीम) नामवाला व्याध बना और दुष्टबुद्धि नामक वह अमात्य पिंगाक्ष नामक राक्षस के रूप में भूतल में प्रसिद्ध हुआ । जन्मभर केवल पाप ही करने वाले की चर्चा में बहुत दोष बताये गये हैं ॥ ३६-३७ ॥ जब वे दोनों राजा साम्ब और दुष्टबुद्धि नामक अमात्य पूर्वकाल में पापपरायण थे, तो उन्हीं दिनों एक बार आखेट के लिये जाते समय उन दोनों से एक पुण्यकर्म भी बन गया था ॥ ३८ ॥ उन्होंने भगवान् विनायक का दर्शन किया। उन्हें प्रणाम किया और उनकी प्रदक्षिणा की, साथ ही फल, पुष्प आदि द्वारा उनका अर्चन किया। जिसके कारण गजानन उनपर सन्तुष्ट हो गये ॥ ३९ ॥ उन दोनों के उस जन्म का वह संचित पुण्य अगाध था। पूर्वकाल में जब वह राक्षस उस भीम नामक व्याध को खाने के लिये आया, तो वह शमी के वृक्ष पर चढ़ गया। वहाँ हिलने से शमी के पत्ते गणेशजी के मस्तक पर गिर पड़े। तब गणेशजी दोनों पर बड़े ही प्रसन्न हुए ॥ ४०-४१ ॥ उन दोनों को दिव्य देह प्रदानकर उन विभु गजानन ने उन्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति करा दी थी। इस प्रकार उन दोनों के पूर्वजन्म में किये गये कर्म के विषय में आपको बताया। केवल शमीपत्र मात्र के द्वारा [अज्ञान में ही हुए ] पूजन से वे गजानन प्रसन्न हो गये। जिस प्रकार कश्यपपुत्र वामन ने उन गणेश की स्थापना की थी और उनके द्वारा किये गये अनुष्ठान के विषय में तथा जिस प्रकार से गणनाथ ने प्रसन्न होकर उन्हें वर प्रदान किये, हे मुनि व्यासजी! वह सब मैं आपको बताता हूँ ॥ ४२-४४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘बालचरित के अन्तर्गत भीम तथा राक्षस के पूर्वजन्म का वर्णन ‘ नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥ Content is available only for registered users. 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