September 12, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-006 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ छठा अध्याय दैत्यों के भार से पीड़ित पृथ्वी का ब्रह्माजी के पास जाकर अपनी व्यथा बताना, ब्रह्मादि देवताओं द्वारा परमात्मा गणेश से अवतार धारण करने की प्रार्थना करना, देवी अदिति और कश्यप के पुत्ररूप में गणेशजी का अवतरण, कश्यप द्वारा उनके जातकर्मादि संस्कार करना और ‘महोत्कट’ यह नाम रखना अथः षष्ठोऽध्यायः विनायकार्भावः भृगु बोले — दुष्टों के अत्याचार से अत्यन्त पीड़ित वह पृथ्वी वेश बदलकर कमल के आसन पर विराजमान रहने वाले ब्रह्माजी के पास गयी और दोनों हाथ जोड़कर दयनीय अवस्थावाली वह पृथ्वी पद्मोद्भव ब्रह्माजी से बोली ॥ ११/२ ॥ भूमि बोली — मैं अत्यन्त दीन और यज्ञ, व्रत आदि से रहित हो गयी हूँ । हे ब्रह्मन् ! ऋषिगणों के साथ इन्द्र आदि सभी देवता अपने-अपने स्थान से च्युत हो गये हैं। दैत्यों के भार से अत्यन्त संतप्त मैं आप ब्रह्माजी की शरण में आयी हूँ ॥ २-३ ॥ जिस किसी उपाय से उन दुष्ट दैत्यों का विनाश हो, वैसा आप करें। अन्यथा पर्वतों तथा वनों से समन्वित मैं पृथ्वी रसातल को चली जाऊँगी ॥ ४ ॥ भृगु बोले — पृथ्वी का यह कथन सुनकर ब्रह्माजी उससे बोले — ‘मैं, सभी लोकपाल, इन्द्र आदि देवता तथा ऋषिगण भी स्वधाकार – स्वाहाकार से रहित होकर अत्यन्त दुखी हैं। हम सभी उसी प्रकार अपने स्थान से भ्रष्ट, मन्त्रों से रहित तथा अपने आचार-विचार से रहित हो गये हैं, जैसे कि प्रलय के समय हो जाते हैं ॥ ५-६ ॥ इसलिये हम सभी मिलकर देवाधिदेव भगवान् गणेश की प्रार्थना करें। वे ब्रह्मरूप हैं, निराकार हैं तथा जगत् के कारण का भी कारण हैं । सौभाग्य से यदि वे लोगों के समक्ष साकाररूप धारणकर प्रकट होंगे तो हे वसुन्धरे ! तभी सब लोगों का और तुम्हारा भी कल्याण होगा’ ॥ ७-८ ॥ भृगु बोले — ऐसा कहकर ब्रह्मा आदि देवताओं और ऋषिगणों ने बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर निराकार तथा साकाररूप उन भगवान् गणेश का स्तवन किया ॥ ९ ॥ नमो नमस्तेऽखिल लोकनाथ नमो नमस्तेऽखिल लोकधामन् । नमो नमस्तेऽखिललोककारिन् नमो नमस्तेऽखिललोकहारिन् ॥ १० ॥ नमो नमस्ते सुरशत्रुनाश नमो नमस्ते हृतभक्तपोष । नमो नमस्ते निजभक्तिपोष नमो नमस्ते लघुभक्तितोष ॥ ११ ॥ निराकृते नित्यनिरस्तमाय परात्परब्रह्ममयस्वरूप । क्षराक्षरातीत गुणैर्विहीन दीनानुकम्पिन् भगवन् नमस्ते ॥ १२ ॥ निरामयायाखिलकामपूर । निरञ्जनायाखिलदैत्यदारिन् । नित्याय सत्याय परोपकारिन् समाय सर्वत्र नमो नमस्ते ॥ १३ ॥ देवता तथा ऋषि बोले — सम्पूर्ण लोकों के स्वामिन् हे गणपति! आपको नमस्कार है, नमस्कार है । सम्पूर्ण लोकों के धाम! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, समस्त लोकों की सृष्टि करने वाले ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सम्पूर्ण लोकों का विनाश करने वाले ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ १० ॥ देवताओं के शत्रुओं का विनाश करने वाले ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। भक्तों के बन्धन को काटने वाले ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। अपने भक्तों का पालन-पोषण करने वाले ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। स्वल्प भक्ति से भी सन्तुष्ट हो जाने वाले ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ११ ॥ हे भगवन्! आप निराकार हैं, नित्य माया से रहित हैं, परात्पर ब्रह्ममय स्वरूप वाले हैं, क्षर तथा अक्षर से अतीत हैं, गुणों से रहित हैं और दीनों पर अनुकम्पा करने वाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ १२ ॥ सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले आप निरामय को नमस्कार है। सम्पूर्ण दैत्यों का विदारण करने वाले निरंजन को नमस्कार है। हे परोपकार करने वाले ! आप नित्य, सत्य स्वरूप को नमस्कार है । सर्वत्र समान भाव रखने वाले ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ १३ ॥ अत्यन्त दुःख से दुखित तथा व्याकुल वे सभी मुनिगण तथा देवता इस प्रकार स्तुति करके उन देवाधिदेव भगवान् विनायक से पुनः बोले — ॥ १४ ॥ [हे भगवन्!] सम्पूर्ण जगत् में हाहाकार हो रहा है। सभी स्वधाकार तथा स्वाहाकार से रहित हो गये हैं। हम लोग मेरुपर्वत की गुफा में उसी प्रकार रह रहे हैं, जैसे वन्य पशु वहाँ रहते हैं ॥ १५ ॥ अतः हे विश्वम्भर! इस समय आप उस महादैत्य का विनाश करें। इस प्रकार से जब वे स्तुति कर रहे थे, उसी समय आकाशवाणी ने कहा — ॥ १६ ॥ ‘इस समय महर्षि कश्यपजी के घर में भगवान् गणेशजी अवतार ग्रहण करेंगे। वे अद्भुत कर्म करेंगे और आप लोगों को अपना-अपना पद प्रदान करेंगे। वे दुष्टों का विनाश तथा सज्जनों की रक्षा करेंगे ‘ ॥ १७१/२ ॥ भृगु बोले — उस आकाशवाणी को सुनकर ब्रह्माजी पृथ्वी से बोले ॥ १८ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे देवि ! हे धरे ! तुम आकाशवाणी पर विश्वास करके स्वस्थ हो जाओ । तुम्हारे लिये सभी देवता मृत्युलोक में अवतार ग्रहण करेंगे। वे गणेशजी अवतार धारण कर तुम्हारे महान् भार को दूर करेंगे ॥ १९१/२ ॥ भृगु बोले — उन ब्रह्माजी द्वारा इस प्रकार कही गयी वह पृथ्वी अत्यन्त स्वस्थ तथा प्रसन्न मनवाली हो गयी और अपने स्थान को चली गयी ॥ २०१/२ ॥ तदनन्तर बहुत समय बीत जाने पर देवी अदिति ने गर्भ धारण किया। उसका वह गर्भ उसी प्रकार वृद्धि को प्राप्त होने लगा, जैसे चन्द्रमा प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त होता है। नौ मास पूर्ण हो जाने पर उसने श्रेष्ठ पुत्र को जन्म दिया ॥ २१-२२ ॥ ब्रह्माजी के पूर्वकथनानुसार वह बालक कश्यपनन्दन नाम से प्रसिद्ध हुआ । [ जन्म के समय ] वह दस भुजाओं वाला था, महान् बल से सम्पन्न था, उसके कानों में कुण्डल सुशोभित हो रहे थे, ललाट पर कस्तूरी का तिलक लगा हुआ था। मस्तक मुकुट से शोभायमान था, वह सिद्धि तथा बुद्धि नामक पत्नियों से समन्वित था, कण्ठ में धारण की हुई रत्नमाला से मण्डित हो रहा था, चिन्तामणि से वक्षःस्थल सुशोभित हो रहा था, उसके अधर जपापुष्प के समान अरुणवर्ण के थे, नासिका उन्नत थी, वह सुन्दर भृकुटी तथा ललाट वाला था, दीप्तिमान् दाँतों से प्रकाशमान था, उसने अपने देह की आभा से समस्त अन्धकार को दूर कर दिया था, दिव्य वस्त्रों को धारण किये था और उसका स्वरूप अत्यन्त मंगलमय था ॥ २३-२५१/२ ॥ इस प्रकार के बालक को देखकर दोनों माता-पिता- अदिति और कश्यप उस समय उसके तेज से अभिभूत दृष्टिवाले हो गये और कुछ भी देखने में समर्थ न हो सके। तब उन्होंने बलपूर्वक आँखों को खोलकर उस उत्तम रूप को देखा। उस समय वे दोनों अत्यन्त आनन्दित हुए। तदनन्तर वह बालरूप गणपति उनसे इस प्रकार बोला — ॥ २६-२७१/२ ॥ बालक बोला — हे मातः ! चूँकि आपने पूर्वकाल में एक हजार वर्ष तक तपस्या करते हुए जिस स्वरूप में मेरा ध्यान किया और मुझे पुत्ररूप में प्राप्त करने का वरदान माँगा था, तब उस समय मैंने आपको विविध वर प्रदान किये थे, और अब इस समय मैंने ही आपके पुत्ररूप में जन्म लिया है। वही अब मैं पृथ्वी के भार का हरण करूँगा, आप दोनों की सेवा करूँगा, ब्रह्मा आदि देवताओं को पुनः उनके पद पर प्रतिष्ठित कराऊँगा और दुष्ट दैत्यों का वध करूँगा ॥ २८-३० ॥ भृगु बोले — इस प्रकार के उसके वचनों को सुनकर उन दोनों के नेत्र आनन्दाश्रुओं से भर गये। जिस प्रकार चकवा-चकवी आकाश में सूर्य को देखकर आनन्दित हो उठते हैं, वैसे ही वे दोनों अति प्रसन्न हो गये ॥ ३१ ॥ तब वे दोनों बोल उठे — ‘निश्चित ही हम दोनों के अद्भुत पुण्य का उदय हुआ है, जिसके फलस्वरूप आप परमात्मा विनायक हमारे पुत्ररूप में उत्पन्न हुए हैं ॥ ३२ ॥ हमारा कुल धन्य हो गया, हमारे माता-पिता धन्य, हो गये, हमारा जन्म लेना सफल हो गया और हमारा ज्ञान धन्य हो गया, जो कि सम्पूर्ण चराचर के गुरु, सबके साक्षी, निराकार, नित्य आनन्दमय तथा सत्यस्वरूप भगवान् गणेश हमारे मंगलमय पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए हैं ॥ ३३१/२ ॥ जिसमें यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सूत्र में पिरोये मणिगणों की भाँति व्याप्त है, जो सर्वत्र व्याप्त तथा सब कुछ जानने वाला है, वही आप हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं गये है। आपका यह रूप अत्यन्त दिव्य है, इस समय इसको ऐन्द्रजालिक की भाँति आप छिपा लें और सामान्य प्राकृत स्वरूप धारण करें। आगे जिस रूप के द्वारा आपको जैसा कर्म करना होगा, वैसा रूप आप धारण करें’ ॥ ३४-३६ ॥ ऐसा वचन सुनकर गणेशजी ने अपना वह दिव्य रूप छिपा लिया और दो हाथों वाले होकर वे सामान्य बालक की भाँति भूमि पर लोटकर रुदन करने लगे ॥ ३७ ॥ उनके रुदन की ध्वनि से उस समय रसातल, आकाश, दिशाएँ, विदिशाएँ निनादित हो उठीं। उस रुदन के शब्द को सुनकर वन्ध्या स्त्रियाँ गर्भवती हो गयीं, शुष्क वृक्ष हरे-भरे हो गये, देवताओं के साथ इन्द्र अत्यन्त हर्षित हो उठे और दैत्यों को अत्यन्त भय हो गया, उस समय धरती की वृद्धि होने लगी। उस समय महर्षि कश्यपजी ने ब्राह्मणों के साथ बालक का जातकर्म-संस्कार सम्पन्न किया। उस बालक को मधु तथा घृत का प्राशन कराके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसका स्पर्श किया ॥ ३८-४० ॥ मन्त्रोच्चारपूर्वक महर्षि कश्यप ने बालक को माता अदिति के स्तनों का पान कराया। बालक का नालच्छेदन करके उसे नहलाकर अदिति ने बालक को सुला दिया ॥ ४१ ॥ उस समय कश्यपमुनि ने ब्राह्मणों को विविध प्रकार के दान दिये। देवी अदिति ने बड़ी प्रसन्नता के साथ सातवें दिन प्रत्येक घर में इक्षुसार (गुड़ आदि) और पाँचवें दिन भेंट भिजवायी। ग्यारहवें दिन पिता कश्यप ने ‘महोत्कट’ यह नाम उस बालक का रखा। वह बालक प्रतिदिन उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्ष में चन्द्रमा प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त होता है। चूँकि वह सभी से अत्यन्त उत्कट (पराक्रमशाली) था, इसीलिये वह बालक गणेश महोत्कट- इस नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ ॥ ४२-४४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत क्रीडाखण्ड में ‘विनायक का आविर्भाव’ नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥ Content is available only for registered users. 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