May 14, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-01 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-प्रथमोऽध्यायः पहला अध्याय प्रजा की सृष्टि के लिये ब्रह्माजी की प्रेरणा से मनु का देवी की आराधना करना तथा देवी का उन्हें वरदान देना भुवनकोशप्रसङ्गे देव्या मनवे वरदानवर्णनम् जनमेजय बोले — [ हे मुने!] आपने सूर्यवंश तथा चन्द्रवंश में उत्पन्न राजाओं का जो उत्तम कथाओं से अन्वित तथा अमृतमय चरित्र वर्णित किया, उसे सुना ॥ १ ॥ मैंने सम्पूर्ण मन्वन्तरों में जिस-जिस स्थान पर तथा जिस-जिस कर्म से एवं जिस-जिस रूप से उन देवी जगदम्बा की पूजा की जाती है, अब उसे मैं सुनना चाहता हूँ। (सभी फल प्रदान करने वाली वे पूज्या देवीश्वरी जिस बीज-मन्त्र से, जहाँ-जहाँ तथा जिस रूप में पूजी जाती हैं, उसे सुनाइये ।) साथ ही भगवती के विराट् स्वरूप का वर्णन यथार्थरूप में सुनना चाहता हूँ ॥ २-३ ॥ हे विप्रर्षे ! जिस ध्यान से उन भगवती के सूक्ष्म स्वरूप में बुद्धि स्थिर हो जाय, वह सब मुझे बतलाइये जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ ॥ ४ ॥ व्यासजी बोले — हे राजन् ! सुनिये, अब मैं देवी की उत्तम आराधना के विषय में कह रहा हूँ, जिसे करने अथवा सुनने से भी मनुष्य इस लोक में कल्याण प्राप्त कर लेता है ॥ ५ ॥ इसी प्रकार पूर्वकाल में नारदजी के द्वारा योगचर्या के प्रवर्तक भगवान् नारायण से पूछे जाने पर उन्होंने नारदजी से जो कहा था, वही मैं बता रहा हूँ ॥ ६ ॥ एक बार श्रीमान् नारद इस पृथ्वी पर विचरण करते हुए नारायण के आश्रम पर पहुँचे और वहाँ निश्चिन्त होकर बैठ गये। हे अनघ ! तत्पश्चात् उन योगात्मा नारायण को प्रणाम करके ब्रह्माजी के पुत्र नारद ने उनसे यही प्रश्न पूछा था, जो आपने मुझसे पूछा है ॥ ७-८ ॥ नारदजी बोले — हे देवदेव ! हे महादेव ! हे पुराणपुरुषोत्तम! हे जगदाधार! हे सर्वज्ञ ! हे श्लाघनीय ! हे विपुल सद्गुणों से सम्पन्न ! इस जगत् का जो आदितत्त्व है, उसे आप यथेच्छ रूप से मुझे बताइये । यह जगत् किससे उत्पन्न होता है, किससे इसकी रक्षा होती है, किसके द्वारा इसका संहार होता है, किस समय सभी कर्मों का फल उदित होता है तथा किस ज्ञान के हो जाने पर इस मोहमयी माया का नाश हो जाता है ?॥ ९–११ ॥ हे देव! किस पूजा से, किस जप से और किस ध्यान से अन्धकार में सूर्योदय की भाँति अपने हृदयकमल में प्रकाश उत्पन्न होता है ? ॥ १२ ॥ हे देव! इन सभी प्रश्नों का उत्तर पूर्णरूप से बताइये, जिससे इस संसार के प्राणी अज्ञानान्धकारमय जगत् को शीघ्रता से पार कर लें ॥ १३ ॥ व्यासजी बोले — [ हे राजन्!] देवर्षि नारद के इस प्रकार पूछने पर महायोगी, मुनिश्रेष्ठ तथा सनातन पुरुष भगवान् नारायण ने साधुवाद देकर यह वचन कहा ॥ १४ ॥ श्रीनारायण बोले — हे देवर्षिश्रेष्ठ! अब आप जगत् का उत्तम तत्त्व सुनिये, जिसे जान लेने पर मनुष्य सांसारिक भ्रम में नहीं पड़ता ॥ १५ ॥ इस जगत् का एकमात्र तत्त्व भगवती जगदम्बा ही हैं —ऐसा मैं बता चुका हूँ और ऋषियों, देवताओं, गन्धर्वों तथा अन्य मनीषियों ने भी ऐसा ही कहा है ॥ १६ ॥ तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम)-से युक्त होने के कारण वे भगवती ही सम्पूर्ण जगत् की रचना करती हैं, वे ही पालन करती हैं और वे ही संहार करती हैं — ऐसा कहा गया है ॥ १७ ॥ अब मैं भगवती के सिद्ध-ऋषिपूजित स्वरूप का वर्णन करूँगा; जो स्मरण करने वालों के सभी पापों का नाश करने वाला, उनके मनोरथों को पूर्ण करने वाला तथा उन्हें मोक्ष प्रदान करने वाला है ॥ १८ ॥ ब्रह्मा के पुत्र तथा शतरूपा के पति स्वायम्भुव मनु आदि मनु हैं । उन प्रतापी तथा श्रीमान् मनु को समस्त मन्वन्तरों का अधिपति कहा जाता है ॥ १९ ॥ पूर्वकाल में एक बार वे स्वायम्भुव मनु अपने पुण्यात्मा पिता प्रजापति ब्रह्मा के पास भक्तिपूर्वक सेवामें संलग्न थे। तब ब्रह्माजी ने उन पुत्र मनु से कहा — हे पुत्र ! हे पुत्र ! तुम्हें भगवती की उत्तम आराधना करनी चाहिये। हे तात! उन्हीं के अनुग्रह से प्रजासृष्टि का तुम्हारा कार्य सिद्ध हो सकेगा ॥ २०-२१ ॥ प्रजाओं की सृष्टि करने वाले ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर महान् ऐश्वर्यशाली स्वायम्भुव मनु अपनी तपस्या से जगत् की योनिरूपा भगवती को प्रसन्न करने में तत्पर हो गये। उन्होंने एकाग्रचित्त होकर मायास्वरूपिणी, सर्वशक्तिमयी, सभी कारणों की भी कारण, देवेश्वरी आद्या भगवती का स्तवन आरम्भ किया ॥ २२-२३ ॥ ॥ मनुरुवाच ॥ नमो नमस्ते देवेशि जगत्कारणकारणे । शङ्खचक्रगदाहस्ते नारायणहृदाश्रिते ॥ २४ ॥ वेदमूर्त्ते जगन्मातः कारणस्थानरूपिणि । वेदत्रयप्रमाणज्ञे सर्वदेवनुते शिवे ॥ २५ ॥ माहेश्वरि महाभागे महामाये महोदये । महादेवप्रियावासे महादेवप्रियंकरि ॥ २६ ॥ गोपेन्द्रस्य प्रिये ज्येष्ठे महानन्दे महोत्सवे । महामारीभयहरे नमो देवादिपूजिते ॥ २७ ॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ २८ ॥ यतश्चेदं यया विश्वमोतं प्रोतं च सर्वदा । चैतन्यमेकमाद्यन्तरहितं तेजसां निधिम् ॥ २९ ॥ ब्रह्मा यदीक्षणात्सर्वं करोति च हरिः सदा । पालयत्यपि विश्वेशः संहर्ता यदनुग्रहात् ॥ ३० ॥ मधुकैटभसम्भूतभयार्तः पद्मसम्भवः । यस्याः स्तवेन मुमुचे घोरदैत्यभवाम्बुधेः ॥ ३१ ॥ त्वं ह्रीः कीर्तिः स्मृतिः कान्तिः कमला गिरिजा सती । दाक्षायणी वेदगर्भा सिद्धिदात्री सदाभया ॥ ३२ ॥ स्तोष्ये त्वां च नमस्यामि पूजयामि जपामि च । ध्यायामि भावये वीक्षे श्रोष्ये देवि प्रसीद मे ॥ ३३ ॥ ब्रह्मा वेदनिधिः कृष्णो लक्ष्यावासः पुरन्दरः । त्रिलोकाधिपतिः पाशी यादसाम्पतिरुत्तमः ॥ ३४ ॥ कुबेरो निधिनाथोऽभूद्यमो जातः परेतराट् । नैर्ऋतो रक्षसां नाथः सोमो जातो ह्यपोमयः ॥ ३५ ॥ त्रिलोकवन्द्ये लोकेशि महामाङ्गल्यरूपिणि । नमस्तेऽस्तु पुनर्भूयो जगन्मातर्नमो नमः ॥ ३६ ॥ मनु बोले — जगत् के कारणों की भी कारण, नारायण के हृदय में विराजमान तथा हाथों में शंख- चक्र-गदा धारण करने वाली हे देवेश्वरि ! आपको बार-बार नमस्कार है ॥ २४ ॥ वेदमूर्ति-स्वरूपिणी, जगज्जननी, कारणस्थान-स्वरूपा, तीनों वेदों के प्रमाण जानने वाली, समस्त देवों द्वारा नमस्कृत, कल्याणमयी, परमेश्वरी, परमभाग्यशालिनी, अनन्त माया से सम्पन्न, महान् अभ्युदयवाली, महादेव की प्रिय आवासरूपिणी, महादेव का प्रिय करने वाली, गोपेन्द्र की प्रिया, ज्येष्ठा, महान् आनन्दस्वरूपिणी, महोत्सवा महामारी के भय का नाश करने वाली तथा देवता आदि के द्वारा पूजित हे भगवति ! आपको नमस्कार है ॥ २५–२७ ॥ सभी मंगलों का भी मंगल करने वाली, सबका कल्याण करने वाली, सभी पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागत-जनों की रक्षा करने वाली तथा तीन नेत्रों वाली हे गौरि ! हे नारायणि! आपको नमस्कार है ॥ २८ ॥ यह जगत् जिनसे उत्पन्न हुआ है तथा जिनसे पूर्णतया ओतप्रोत है; उन भगवती के चैतन्यमय, अद्वितीय आदि-अन्त से रहित तथा तेजों के निधानभूत रूप को नमस्कार है ॥ २९ ॥ जिनकी कृपादृष्टि से ब्रह्मा सम्पूर्ण सृष्टि करते हैं, विष्णु सदा पालन करते हैं और जिनके अनुग्रह से विश्वेश्वर शिव संहार करते हैं, उन जगदम्बा को नमस्कार है ॥ ३० ॥ मधु-कैटभ के द्वारा उत्पन्न किये गये भय से व्याकुल ब्रह्मा ने जिनकी स्तुति करके भयंकर दैत्यरूपी भव-सागर से मुक्ति प्राप्त की थी, ( उन भगवती को नमस्कार है | ) ॥ ३१ ॥ आप ही, कीर्ति, स्मृति, कान्ति, कमला, गिरिजा, सती, दाक्षायणी, वेदगर्भा, सिद्धिदात्री तथा अभया नाम से सर्वदा प्रसिद्ध हैं । हे देवि ! मैं आपकी स्तुति करता हूँ, आपको नमस्कार करता हूँ, आपकी पूजा करता हूँ, आपका जप करता हूँ, आपका ध्यान करता हूँ, आपकी भावना करता हूँ, आपका दर्शन करता हूँ तथा आपका चरित्र सुनता हूँ; आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइये ॥ ३२-३३ ॥ आपके ही अनुग्रह से ब्रह्माजी वेद के निधि, श्रीहरि लक्ष्मी के स्वामी, इन्द्र त्रिलोकी के अधिपति, वरुण जलचर जन्तुओं के श्रेष्ठ नायक, कुबेर धन के स्वामी, यमराज प्रेतों के अधिपति, नैर्ऋत राक्षसों नाथ और चन्द्रमा रसमय बन गये हैं ॥ ३४-३५ ॥ हे त्रिलोकवन्द्ये ! हे लोकेश्वरि ! हे महामांगल्यस्वरूपिणि! आपको नमस्कार है । हे जगन्मातः ! आपको बार-बार प्रणाम है ॥ ३६ ॥ श्रीनारायण बोले — हे देवर्षे ! इस प्रकार स्तुति करने पर परारूपा नारायणी भगवती दुर्गा प्रसन्न होकर ब्रह्मा के पुत्र मनु से यह वचन कहने लगीं ॥ ३७ ॥ देवी बोलीं — हे राजेन्द्र ! मैं आपके द्वारा भक्तिपूर्वक की गयी इस स्तुति तथा आराधना से प्रसन्न हूँ। अतः हे ब्रह्मपुत्र ! आप जो वर चाहते हैं, उसे माँग लें ॥ ३८ ॥ मनु बोले — [भक्तों पर ] महान् अनुकम्पा करने वाली हे देवि! यदि आप मेरी भक्ति से प्रसन्न हैं तो मेरी यही याचना है कि आपकी आज्ञा से प्रजा की सृष्टि निर्विघ्नतापूर्वक सम्पन्न हो ॥ ३९ ॥ देवी बोलीं — हे राजेन्द्र ! मेरे अनुग्रह से प्रजासृष्टि अवश्य सम्पन्न होगी और निर्विघ्नतापूर्वक निरन्तर उसकी वृद्धि भी होती रहेगी ॥ ४० ॥ जो कोई भी मनुष्य मेरी भक्ति से युक्त होकर आपके द्वारा की गयी इस स्तुति का पाठ करेगा; उसकी विद्या, सन्तान सुख तथा कीर्ति बढ़ेगी तथा कान्ति का उदय होगा और धन-धान्य निरन्तर बढ़ते रहेंगे। हे राजन् ! उन मनुष्यों की शक्ति कभी निष्फल नहीं होगी, सर्वत्र उनकी विजय होगी, उनके शत्रुओं का नाश होगा और वे सदा सुखी रहेंगे ॥ ४१-४२ ॥ श्रीनारायण बोले — ब्रह्माजी के पुत्र स्वायम्भुव मनु को इस प्रकार के वर देकर उन बुद्धिमान् मनु के देखते-देखते भगवती अन्तर्धान हो गयीं ॥ ४३ ॥ तत्पश्चात् वर प्राप्त करके महान् प्रतापी ब्रह्मापुत्र राजा स्वायम्भुव मनु ने ब्रह्मा से कहा — हे तात ! आप मुझे कोई ऐसा एकान्त स्थान दीजिये, जहाँ रहकर प्रचुर प्रजाओं की सृष्टि और यज्ञों के द्वारा देवेश्वर की उपासना कर सकूँ । अतः अविलम्ब आदेश दीजिये ॥ ४४-४५ ॥ अपने पुत्र की यह बात सुनकर प्रजापतियों के भी स्वामी ऐश्वर्यशाली ब्रह्मा देरत क सोचने लगे कि यह कार्य कैसे सम्पन्न हो । प्रजा की सृष्टि करते हुए मेरा अनन्तकाल का बहुत समय बीत गया । सम्पूर्ण प्राणियों को आश्रय प्रदान करने वाली यह पृथ्वी जल के द्वारा आप्लावित हो गयी और जलमय होकर डूब गयी । अतः अब वे भगवान् आदिपुरुष मेरे सहायक बनकर मेरा यह सुचिन्तित कार्य सम्पन्न करेंगे, जिनके आदेश पर मैं आश्रित हूँ ॥ ४६–४८ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत आठवें स्कन्ध का ‘भुवनकोश प्रसंग में देवी का मनु को वरदानवर्णन’ नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥ Content is available only for registered users. 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