श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-अष्टमः स्कन्धः-अध्याय-24
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
उत्तरार्ध-अष्टमः स्कन्धः-चतुर्विंशोऽध्यायः
चौबीसवाँ अध्याय
देवी की उपासना के विविध प्रसंगों का वर्णन
देवीपूजनविधिनिरूपणम्

नारदजी बोले हे तात! देवी के आराधनरूपी धर्म का स्वरूप क्या है ? किस प्रकार से उपासना करने पर वे देवी परम पद प्रदान करती हैं ? उनकी आराधना की विधि क्या है? कैसे, कब और किस स्तोत्र से आराधना करने पर वे भगवती दुर्गा कष्टप्रद नरकरूपी दुर्ग से उद्धार करके त्राणदायिनी होती हैं ? ॥ १-२ ॥

श्रीनारायण बोले हे विद्वद्वर! हे देवर्षे ! जिस प्रकार धर्मपूर्वक आराधना करने से देवी स्वयं प्रसन्न हो जाती हैं, उसे अब आप एकाग्रचित्त होकर मुझसे सुनिये। हे नारद! जैसा स्वधर्म का स्वरूप बताया गया है, उसे भी आप मुझसे सुनिये ॥ ३१/२

मुने! इस अनादि संसार में सम्यक् रूप से पूजित होने पर वे देवी घोर संकटों में स्वयं रक्षा करती हैं । वे भगवती जिस प्रकार लोक में पूजी जाती हैं, वह विधि सुनिये ॥ ४-५ ॥

[ शुक्लपक्ष की] प्रतिपदा तिथि में घृत से देवी की पूजा करनी चाहिये और ब्राह्मण को घृत का दान करना चाहिये; ऐसा करने वाला सदा निरोग रहता है ॥ ६ ॥ द्वितीया तिथि को शर्करा से जगदम्बा का पूजन करना चाहिये और विप्र को शर्करा का ही दान करना चाहिये; ऐसा करने वाला मनुष्य दीर्घजीवी होता है ॥ ७ ॥ तृतीया तिथि को भगवती के पूजनकर्म में उन्हें दुग्ध अर्पण करना चाहिये और श्रेष्ठ ब्राह्मण को दुग्ध का दान करना चाहिये; ऐसा करने से मनुष्य सभी प्रकार के दुःखों से मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥ चतुर्थी के दिन पूआ अर्पण करके देवी का पूजन करना चाहिये और ब्राह्मण को पूआ ही दान करना चाहिये; ऐसा करने से मनुष्य विघ्न-बाधाओं से आक्रान्त नहीं होता ॥ ९ ॥ पंचमी तिथि को भगवती का पूजन करके उन्हें केला अर्पण करे और ब्राह्मण को केले का ही दान करे; ऐसा करने से मनुष्य बुद्धिमान् होता है ॥ १० ॥ षष्ठी तिथि को भगवती के पूजनकर्म में मधु को प्रधान बताया गया है। ब्राह्मण को मधु ही देना चाहिये; ऐसा करने से मनुष्य दिव्य कान्तिवाला हो जाता है ॥ ११ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ ! सप्तमी तिथि को भगवती को गुड़ का नैवेद्य अर्पण करके ब्राह्मण को गुड़ का दान करने से मनुष्य सभी प्रका रके शोकों से मुक्त हो जाता है ॥ १२ ॥ अष्टमी को भगवती को नारियल का नैवेद्य अर्पित करना चाहिये और ब्राह्मण को भी नारियल का दान करना चाहिये; ऐसा करने वाला मनुष्य सभी सन्तापों से रहित हो जाता है ॥ १३ ॥ नवमी के दिन भगवती को लावा अर्पण करने के बाद ब्राह्मण को भी लावा का दान करने से मनुष्य इस लोक में तथा परलोक में परम सुखी रहता है ॥ १४ ॥ हे मुने! दशमी तिथि को भगवती को काले तिल अर्पित करने और ब्राह्मण को उसी तिल का दान करने से मनुष्य को यमलोक का भय नहीं रह जाता ॥ १५ ॥ जो मनुष्य एकादशी तिथि को भगवती को दधि अर्पित करता है और ब्राह्मण को भी दधि प्रदान करता है, वह देवी का परम प्रिय हो जाता है ॥ १६ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! जो द्वादशी के दिन भगवती को चिउड़े का भोग लगाकर आचार्य को भी चिउड़े का दान करता है, वह भगवती का प्रियपात्र बन जाता है ॥ १७ ॥ जो त्रयोदशी को भगवती को चना अर्पित करता है और ब्राह्मण को चने का दान करता है, वह प्रजाओं तथा सन्तानों से सदा सम्पन्न रहता है ॥ १८ ॥ हे देवर्षे ! जो मनुष्य चतुर्दशी के दिन भगवती को सत्तू अर्पण करता है और ब्राह्मण को भी सत्तू प्रदान करता है, वह भगवान् शंकर का प्रिय हो जाता है ॥ १९ ॥ जो पूर्णिमा तिथि को भगवती अपर्णा को खीर का भोग लगाता है और श्रेष्ठ ब्राह्मण को खीर प्रदान करता है, वह अपने सभी पितरों का उद्धार कर देता है ॥ २० ॥

हे महामुने! देवी की प्रसन्नता के लिये उसी तिथि को हवन भी बताया गया है । जिस तिथि में नैवेद्य के लिये जो वस्तु बतायी गयी है, उसी वस्तु से उन-उन तिथियों में हवन करने से सभी विपत्तियों का नाश हो जाता है ॥ २१ ॥

रविवार को खीर का नैवेद्य अर्पण करना चाहिये । सोमवार को दूध और मंगलवार को केले का भोग लगाना बताया गया है ॥ २२ ॥ हे द्विज ! बुध को ताजा मक्खन भोग के लिये कहा गया है। गुरुवार को रक्त शर्करा, शुक्रवार को श्वेत शर्करा और शनिवार को गाय का घृत नैवेद्य के रूप में बताया गया है ॥ २३१/२

हे मुने ! अब सत्ताईस नक्षत्रों में दिये जाने वाले नैवेद्य विषय में सुनिये। दूध, घी, तिल, चीनी, दही, मलाई, लस्सी, फेणिका, घृतमण्ड (शक्करपारा), कंसार (गेहूँ के आटे तथा गुड़ से निर्मित पदार्थ विशेष ), वटपत्र (पापड़), घेवर, वटक (बड़ा), कोकरस (खजूरका रस), घृतमिश्रित चनेका चूर्ण, मधु, सूरन, गुड़, चिउड़ा, दाख, खजूर, चारक, पूआ, मक्खन, मूँगका लड्डू और विजौरा नींबू हे नारद! ये सत्ताईस नक्षत्रों के नैवेद्य बताये गये हैं ॥ २४- २७१/२

अब विष्कम्भ आदि योगों में नैवेद्य अर्पण के विषय में कहूँगा। इन पदार्थों को अर्पित करने से जगदम्बिका प्रसन्न होती हैं। गुड़, मधु, घी, दूध, दही, मट्ठा, पूआ, मक्खन, ककड़ी, कोंहड़ा, लड्डू, कटहल, केला, जामुन, आम, तिल, संतरा, अनार, बेरका फल, आमला, खीर, चिउड़ा, चना, नारियल, जम्भफल (जम्भीरा), कसेरू और सूरन हे विप्र ! ये शुभ नैवेद्य क्रमशः विष्कम्भ आदि योगोंमें [भगवतीको] अर्पण करनेके लिये विद्वानोंके द्वारा निश्चित किये गये हैं ॥ २८–३२१/२

मुने! इसके बाद अब मैं भिन्न-भिन्न करणों के नैवेद्य के बारे में बताऊँगा । कंसार, मण्डक, फेनी, मोदक, वटपत्र, लड्डू, घृतपूर, तिल, दही, घी और मधु ये करणों के नैवेद्य बताये गये हैं, जिन्हें आदरपूर्वक भगवती को अर्पण करना चाहिये ॥ ३३-३४१/२

हे नारदमुने ! अब मैं देवी को प्रसन्न करने वाले दूसरे श्रेष्ठ विधान का वर्णन करूँगा, उस सम्पूर्ण विधान को आदरपूर्वक सुनिये। चैत्रमास के शुक्ल-पक्ष में तृतीया तिथि को महुए के वृक्ष में भगवती की भावना करके उनका पूजन करे और नैवेद्य में पाँच प्रकार के भोज्य-पदार्थ अर्पित करे । इसी प्रकार बारहों महीनों के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को पूजन-विधान के साथ क्रमशः नैवेद्य अर्पित करे । हे नारद! वैशाख-मास में गुड़मिश्रित पदार्थ निवेदित करना चाहिये । ज्येष्ठ महीने में भगवती की प्रसन्नता के लिये मधु अर्पित करना चाहिये। आषाढ़ महीने में नवनीत और महुए के रस से बना हुआ पदार्थ अर्पित करना चाहिये ॥ ३५–३९ ॥ श्रावण-मास में दही, भाद्रपद – मास में शर्करा, आश्विन मास में खीर तथा कार्तिक मास में दूध का घी का नैवेद्य उत्तम कहा गया है। मार्गशीर्ष – महीने में फेनी एवं पौष-माह में दधिकूर्चिका (लस्सी)- का नैवेद्य उत्तम कहा गया है । माघ के महीने में गाय के नैवेद्य अर्पण करना चाहिये; फाल्गुन के महीने में नारियल का नैवेद्य बताया गया है। इस प्रकार बारह महीनों में बारह नैवेद्यों से क्रमशः भगवती की पूजा करनी चाहिये ॥ ४०–४२ ॥

मंगला, वैष्णवी, माया, कालरात्रि, दुरत्यया, महामाया, मतंगी, काली, कमलवासिनी, शिवा, सहस्रचरणा और सर्वमंगलरूपिणी इन नामों का उच्चारण करते हुए महुए के वृक्ष में भगवती की पूजा करनी चाहिये । तत्पश्चात् सभी कामनाओं की सिद्धि तथा व्रत की पूर्णता के लिये महुए के वृक्ष में स्थित देवेशी महेश्वरी की इस प्रकार स्तुति करनी चाहिये ॥ ४३–४५ ॥

नमः पुष्करनेत्रायै जगद्धात्र्यै नमोऽस्तु ते ।
माहेश्वर्यं महादेव्यै महामङ्गलमूर्तये ॥ ४६ ॥
परमा पापहन्त्री च परमार्गप्रदायिनी ।
परमेश्वरी प्रजोत्पत्तिः परब्रह्मस्वरूपिणी ॥ ४७ ॥
मददात्री मदोन्मत्ता मानगम्या महोन्नता ।
मनस्विनी मुनिध्येया मार्तण्डसहचारिणी ॥ ४८ ॥
जय लोकेश्वरि प्राज्ञे प्रलयाम्बुदसन्निभे ।
महामोहविनाशार्थं पूजितासि सुरासुरैः ॥ ४९ ॥
यमलोकाभावकर्त्री यमपूज्या यमाग्रजा ।
यमनिग्रहरूपा च यजनीये नमो नमः ॥ ५० ॥
समस्वभावा सर्वेशी सर्वसङ्गविवर्जिता ।
सङ्गनाशकरी काम्यरूपा कारुण्यविग्रहा ॥ ५१ ॥
कङ्कालक्रूरा कामाक्षी मीनाक्षी मर्मभेदिनी ।
माधुर्यरूपशीला च मधुरस्वरपूजिता ॥ ५२ ॥
महामन्त्रवती मन्त्रगम्या मन्त्रप्रियङ्करी ।
मनुष्यमानसगमा मन्मथारिप्रियङ्करी ॥ ५३ ॥
अश्वत्थवटनिम्बाम्रकपित्थबदरीगते ।
पनसार्ककरीरादिक्षीरवृक्षस्वरूपिणी ॥ ५४ ॥
दुग्धवल्लीनिवासार्हे दयनीये दयाधिके ।
दाक्षिण्यकरुणारूपे जय सर्वज्ञवल्लभे ॥ ५५ ॥
एवं स्तवेन देवेशीं पूजनान्ते स्तुवीत ताम् ।
व्रतस्य सकलं पुण्यं लभते सर्वदा नरः ॥ ५६ ॥
नित्यं यः पठते स्तोत्रं देवीप्रीतिकरं नरः ।
आधिव्याधिभयं नास्ति रिपुभीतिर्न तस्य हि ॥ ५७ ॥
अर्थार्थी चार्थमाप्नोति धर्मार्थी धर्ममाप्नुयात् ।
कामानवाप्नुयात्कामी मोक्षार्थी मोक्षमाजप्नुयात् ॥ ५८ ॥
ब्राह्मणो वेदसम्पनो विजयी क्षत्रियो भवेत् ।
वैश्यश्च धनधान्याढ्यो भवेच्छूद्रः सुखाधिकः ॥ ५९ ॥
स्तोत्रमेतच्छ्राद्धकाले यः पठेत्प्रयतो नरः ।
पितॄणामक्षया तृप्तिर्जायते कल्पवर्तिनी ॥ ६० ॥

कमल के समान नेत्रोंवाली आप जगद्धात्री को नमस्कार है। आप महामंगलमूर्तिस्वरूपा महेश्वरी महादेवीको नमस्कार है । [ हे देवि !] परमा, पापहन्त्री, परमार्गप्रदायिनी, परमेश्वरी, प्रजोत्पत्ति, परब्रह्मस्वरूपिणी, मददात्री, मदोन्मत्ता, मानगम्या, महोन्नता, मनस्विनी, मुनिध्येया, मार्तण्डसहचारिणी ये आपके नाम हैं । हे लोकेश्वर ! हे प्राज्ञे ! आपकी जय हो । हे प्रलयकालीन मेघ के समान प्रतीत होने वाली ! देवता और दानव महामोह के विनाश के लिये आपकी उपासना करते हैं ॥ ४६–४९ ॥ आप यमलोक मिटाने वाली, यमराजपूज्या, यम की अग्रजा और यमनिग्रहस्वरूपिणी हैं । हे परमाराध्ये ! आपको बार-बार नमस्कार है। आप समस्वभावा, सर्वेशी, सर्वसंगविवर्जिता, संगनाशकरी, काम्यरूपा, कारुण्यविग्रहा, कंकालक्रूरा, कामाक्षी, मीनाक्षी, मर्मभेदिनी, माधुर्यरूपशीला, मधुरस्वरपूजिता, महामन्त्रवती, मन्त्रगम्या, मन्त्रप्रियंकरी, मनुष्य- मानसगमा और मन्मथारिप्रियंकरी इन नामों से विख्यात हैं ॥ ५०–५३ ॥ पीपल, वट, नीम, आम, कैथ एवं बेरमें निवास करने वाली आप कटहल, मदार, करील, जामुन आदि क्षीरवृक्षस्वरूपिणी हैं। दुग्धवल्ली में निवास करने वाली, दयनीय, महान् दयालु, कृपालुता एवं करुणा की साक्षात् मूर्तिस्वरूपा एवं सर्वज्ञजनों की प्रियस्वरूपिणि ! आपकी जय हो ॥ ५४-५५ ॥

इस प्रकार पूजन के पश्चात् इस स्तोत्र से उन देवेश्वरी की स्तुति करनी चाहिये। ऐसा करने वाला मनुष्य व्रतका सम्पूर्ण पुण्य प्राप्त कर लेता है ॥ ५६ ॥ जो मनुष्य भगवती को प्रसन्न करने वाले इस स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, उसे किसी प्रकार के शारीरिक या मानसिक रोग का भय नहीं होता और उसे शत्रुओं का भी कोई भय नहीं रहता । इस स्तोत्र के प्रभाव से अर्थ चाहने वाला अर्थ प्राप्त कर लेता है, धर्म के अभिलाषी को धर्म की प्राप्ति हो जाती है, कामी को काम सुलभ हो जाते हैं और मोक्ष की इच्छा रखने वाले को मोक्ष प्राप्त हो जाता है । इस स्तोत्र पाठ से ब्राह्मण वेदसम्पन्न, क्षत्रिय विजयी, वैश्य धनधान्य से परिपूर्ण और शूद्र परम सुखी हो जाता है। जो मनुष्य श्राद्ध के समय मन को एकाग्र करके इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके पितरों की एक कल्पत क स्थायी रहने वाली अक्षय तृप्ति हो जाती है ॥ ५७-६० ॥

[ हे नारद!] इस प्रकार मैंने देवताओं के द्वारा देवी की की गयी आराधना तथा पूजा के विषय में आपको भलीभाँति बता दिया । जो मनुष्य भक्तिपूर्वक भगवती की उपासना करता है, वह देवी लोक का अधिकारी हो जाता है ॥ ६१ ॥ हे विप्र ! भगवती के पूजन से मनुष्य की सभी कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं और अन्त में उसकी बुद्धि सभी पापों से रहित होकर निर्मल हो जाती है ॥ ६२ ॥ हे ब्रह्मपुत्र ! भगवती के अनुग्रह से मनुष्य जहाँ-तहाँ पूजित होता है और मान को ही धन मानने वाले पुरुषों में सम्माननीय हो जाता है। उसे स्वप्न में भी नरकों का भय नहीं रहता। महामाया भगवती की कृपा से देवी का भक्त पुत्र तथा पौत्रों से सदा सम्पन्न रहता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ६३-६४१/२

[ हे नारद!] यह जो मैंने आपसे महादेवी के पूजन का वर्णन किया है, वह नरक से उद्धार करने वाला तथा सम्पूर्ण रूप से मंगलकारी है । हे मुने ! चैत्र आदि महीनों में क्रम से महुए के वृक्ष में भगवती की पूजा करनी चाहिये। हे अनघ! जो मनुष्य मधूक नामक वृक्ष में सम्यक् रूप से पूजन करता है; उसे रोग, बाधा आदि का कोई भय उत्पन्न नहीं होता ॥ ६५–६७ ॥ अब मैं देवी मूलप्रकृति के श्रेष्ठ पंचक से सम्बन्धित अन्य प्रसंग का वर्णन कर रहा हूँ। यह प्रसंग अपने नाम, रूप और प्रादुर्भाव से सम्पूर्ण जगत् ‌को आनन्दित कर देने वाला है। हे मुने ! यह प्रकृतिपंचक कुतूहल उत्पन्न करने वाला तथा मुक्तिप्रदायक है; आख्यान तथा माहात्म्यसहित इसका श्रवण कीजिये ॥ ६८-६९ ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत आठवें स्कन्ध का ‘देवीपूजन- विधिनिरूपण’ नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥
॥ अष्टम स्कन्ध समाप्त ॥

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