May 29, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-एकादशः स्कन्धः-अध्याय-07 ॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ उत्तरार्ध-एकादशः स्कन्धः-सप्तमोऽध्यायः सातवाँ अध्याय विभिन्न प्रकार के रुद्राक्ष और उनके अधिदेवता रुद्राक्षमाहात्म्यवर्णनम् श्रीनारायण बोले — हे नारद! इस प्रकार गिरिशायी भगवान् शिव ने षडानन को रुद्राक्ष के विषय में बताया और इस रुद्राक्षमहिमा को जानकर वे भी कृतार्थ हो गये। इस प्रकार के माहात्म्य वाले रुद्राक्ष के विषय में मैंने आपसे वर्णन कर दिया। अब सदाचार के प्रसंग में रुद्राक्षसम्बन्धी अन्य बातें एकाग्रचित्त होकर सुनिये ॥ १-२ ॥ जिस प्रकार मैंने अनन्त पुण्य प्रदान करने वाली रुद्राक्ष-महिमा का वर्णन किया है, उसी प्रकार मैं रुद्राक्ष के लक्षण तथा मन्त्र-विन्यास का वर्णन आपसे करूँगा ॥ ३ ॥ रुद्राक्ष के दर्शन से एक लाख गुना तथा स्पर्श से करोड़ गुना पुण्य होता है । रुद्राक्ष धारण कर लेने पर मनुष्य उसका करोड़ गुना पुण्य प्राप्त करता है ॥ ४ ॥ रुद्राक्ष धारण करने की अपेक्षा उसके द्वारा जप से मनुष्य एक सौ लाख करोड़ गुना और हजार लाख करोड़ गुना पुण्य प्राप्त करता है ॥ ५ ॥ भद्राक्ष धारण करने की अपेक्षा रुद्राक्ष धारण करने का महान् फल होता है । जो रुद्राक्ष आँवले के फल के परिमाण का होता है, वह श्रेष्ठ माना गया है ॥ ६ ॥ विद्वानों ने बेर के फल के परिमाण वाले रुद्राक्ष को मध्यम तथा चने के परिमाण-तुल्य रुद्राक्ष को अधम कहा है; यह एक सिद्धान्त है, जिसका वर्णन मैंने आपसे किया है ॥ ७ ॥ शिवजी की आज्ञा से पृथ्वीतल पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र-भेदानुसार उन-उन जातियों वाले रुद्राक्ष के श्रेष्ठ वृक्ष उत्पन्न हुए। श्वेत रुद्राक्षों को ब्राह्मण, रक्त वर्ण के रुद्राक्षों को क्षत्रिय तथा पीले वर्ण के रुद्राक्षों को वैश्य जानना चाहिये। इसी प्रकार काले रंग के रुद्राक्ष शूद्र कहे जाते हैं ॥ ८-९ ॥ ब्राह्मण को श्वेत वर्ण तथा राजा (क्षत्रिय ) – को लाल वर्ण के रुद्राक्ष धारण करने चाहिये । इसी तरह वैश्य को पीले वर्ण तथा शूद्र को काले वर्ण के रुद्राक्ष धारण करने चाहिये ॥ १० ॥ समरूप, चिकने, दृढ़ तथा स्पष्टरूप से कंटक (काँटों) – की रेखाओं से युक्त रुद्राक्ष श्रेष्ठ होते हैं; किंतु कीड़ों द्वारा खाये गये, टूटे हुए, फूटे हुए, काँटों की रेखाओं से रहित, व्रणयुक्त तथा परत से आवृत — इन छः तरहके रुद्राक्षोंको नहीं धारण करना चाहिये ॥ १११/२ ॥ जिस रुद्राक्ष में स्वयं ही छिद्र बना हो, वह उत्तम रुद्राक्ष होता है और जिसमें मनुष्य के प्रयत्न से छिद्र किया गया हो, वह मध्यम रुद्राक्ष होता है । सब ओर से समान, चिकने, मजबूत और गोल रुद्राक्षों को रेशम के डोरे में पिरोकर धारण करना चाहिये । शरीर के सभी (पूर्वोक्त) अंगों पर उन्हें समानरूप से धारण करना चाहिये। जिस रुद्राक्ष को घिसने से समान तथा अति विलक्षण स्वर्ण रेखा की आभा के समान रेखा दिखायी दे, वह उत्तम रुद्राक्ष होता है । उसे शिवभक्तों को अवश्य धारण करना चाहिये ॥ १२-१४१/२ ॥ एक रुद्राक्ष शिखा में, तीस रुद्राक्ष सिर पर, छत्तीस रुद्राक्ष गले में, दोनों भुजाओं पर सोलह-सोलह, मणि- बन्ध में बारह तथा कन्धे पर पचास रुद्राक्ष धारण करना चाहिये ॥ १५-१६ ॥ एक सौ आठ रुद्राक्षों की माला का यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये और दो लड़ी या तीन लड़ी वाली रुद्राक्ष की माला गले में पहननी चाहिये ॥ १७ ॥ मनुष्य को कुण्डल में, मुकुट में, कर्णिका में, हार में, केयूर में, कटक में तथा करधनी में, शयन तथा भोजनपानादि सभी कालों में रुद्राक्ष धारण करना चाहिये ॥ १८१/२ ॥ तीन सौ रुद्राक्षों का धारण करना अधम तथा पाँच सौ रुद्राक्षों का धारण करना मध्यम कहा जाता है और एक हजार रुद्राक्षों का धारण करना उत्तम कहा गया है। इस प्रकार उत्तम, मध्यम तथा अधम- भेद से रुद्राक्ष धारण करना चाहिये ॥ १९१/२ ॥ पचास रुद्राक्षों की माला बनाकर ईशानमन्त्र से सिर पर, तत्पुरुषमन्त्र से कान में, अघोरमन्त्र से ललाट तथा हृदय पर और अघोरबीजमन्त्र से दोनों हाथों पर और वामदेवमन्त्र से उदर पर धारण करना चाहिये । इस प्रकार ईशान आदि पाँच ब्रह्ममन्त्र तथा छ: षडंग मन्त्र से रुद्राक्ष धारण करना चाहिये। मूलमन्त्र का उच्चारण करके गूँथे गये सभी रुद्राक्षों को धारण करना चाहिये ॥ २०-२२१/२ ॥ एकमुखी रुद्राक्ष परमतत्त्व का प्रकाशक है। अतः इस परमतत्त्वमय एकमुखी रुद्राक्ष के धारण से उस ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है ॥ २३१/२ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! दो मुख वाला रुद्राक्ष अर्धनारीश्वर होता है। इसे धारण करने से उस व्यक्ति र भगवान् अर्धनारीश्वर सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ २४१/२ ॥ तीनमुखी रुद्राक्ष साक्षात् अग्निस्वरूप होता है। यह स्त्री-हत्या के पाप को क्षणभर में भस्म कर देता है । यह तीनमुखी रुद्राक्ष अग्नित्रय (गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि) – के भी स्वरूपवाला है। उसे धारण करने से उस व्यक्ति पर अग्निदेवता सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ २५-२६ ॥ चतुर्मुखी रुद्राक्ष ब्रह्मास्वरूप है । उसे धारण करने से महान् वैभव, अत्यन्त उत्तम आरोग्य तथा विशद ज्ञान – सम्पदा की प्राप्ति होती है। मनुष्य को आत्मशुद्धि के लिये इसे धारण करना चाहिये ॥ २७१/२ ॥ पंचमुखी रुद्राक्ष साक्षात् पंचब्रह्म स्वरूप है । उसके धारणमात्र से ही महेश्वर शिव उस व्यक्ति पर प्रसन्न हो जाते हैं ॥ २८१/२ ॥ छ: मुखी रुद्राक्ष के अधिदेवता कार्तिकेय हैं और कुछ मनीषिगण विनायक गणेश को भी इस रुद्राक्ष के देवता रूप में बताते हैं ॥ २९१/२ ॥ सातमुखी रुद्राक्ष की अधिदेवी सात मातृकाएँ हैं। इसके अधिदेवता सूर्य तथा सप्तर्षि भी हैं। इसे धारण करने से विपुल सम्पदा, उत्तम आरोग्य तथा महान् ज्ञान-राशि की प्राप्ति होती है। पवित्र होकर ही मनुष्य को इसे धारण करना चाहिये ॥ ३०-३११/२ ॥ आठमुखी रुद्राक्ष के अधिदेवता अष्टमातृकाएँ हैं। यह शुभ रुद्राक्ष आठों वसुओं तथा गंगा के लिये प्रीतिकर है। उसे धारण करने से ये सत्यवादी देवता प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ३२-३३ ॥ नौमुखी रुद्राक्ष साक्षात् यमदेव के तुल्य माना गया है । उसे धारण करने से यम का कोई भय नहीं रहता ॥ ३४ ॥ दसमुखी रुद्राक्ष के देवता दसों दिशाएँ कही गयी हैं । उसे धारण करने से मनुष्य दसों दिशाओं के लिये प्रीतिजनक होता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३५ ॥ ग्यारहमुखी रुद्राक्ष के अधिदेवता एकादश रुद्र हैं। कुछ लोग इन्द्र को भी निरन्तर सौख्य की वृद्धि करने वाले इस रुद्राक्ष का देवता कहते हैं ॥ ३६ ॥ बारहमुखी रुद्राक्ष महाविष्णु का स्वरूप है । इसके अधिदेवता बारह सूर्य हैं। ये देवगण उसे धारण करने वाले का सदा भरण-पोषण करते हैं ॥ ३७ ॥ तेरह मुख वाला रुद्राक्ष समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाला, सिद्धियाँ प्रदान करने वाला तथा कल्याण करने वाला है । उसे धारण करने मात्र से कामदेव प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ३८ ॥ चौदह मुखवाला रुद्राक्ष भगवान् शंकर के नेत्र से उत्पन्न हुआ है। यह सभी प्रकार की व्याधियों को नष्ट करने-वाला तथा सर्वविध आरोग्य प्रदान करने वाला है ॥ ३९ ॥ रुद्राक्ष धारण करने वाले को मद्य, मांस, लहसुन, प्याज, सहिजन, लिसोडा तथा विड्वराह का आहार में त्याग कर देना चाहिये । ग्रहण के समय, सूर्य के विषुवत् रेखापर, संक्रमणकाल में, उत्तरायण तथा दक्षिणायन के संक्रान्तिकाल में, अमावास्या तथा पूर्णिमा के समय तथा अन्यान्य पुण्य दिवसों में रुद्राक्ष धारण करने से मनुष्य शीघ्र समस्त पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ४०-४१ ॥ ॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत ग्यारहवें स्कन्ध का ‘रुद्राक्षमाहात्म्यवर्णन’ नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥ Content is available only for registered users. 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