श्रीमद्देवीभागवत-महापुराण-चतुर्थ स्कन्धः-अध्याय-18
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
पूर्वार्द्ध-चतुर्थ: स्कन्धः-अष्टादशोऽध्यायः
अठारहवाँ अध्याय
पापभार से व्यथित पृथ्वी का देवलोक जाना, इन्द्र का देवताओं और पृथ्वी के साथ ब्रह्मलोक जाना, ब्रह्माजी का पृथ्वी तथा इन्द्रादि देवताओं सहित विष्णुलोक जाकर विष्णु की स्तुति करना, विष्णु द्वारा अपने को भगवती के अधीन बताना
ब्रह्माणं प्रति विष्णुवाक्यम्

व्यासजी बोले — हे राजन् ! सुनिये, अब मैं श्रीकृष्ण के महान् चरित्र, उनके अवतार के कारण और भगवती के अद्भुत चरित्र का वर्णन करूँगा ॥ १ ॥ एक समय की बात है – [ पापियों के] भार से व्यथित, अत्यधिक कृश, दीन तथा भयभीत पृथ्वी गौ का रूप धारण करके रोती हुई स्वर्गलोक गयी ॥ २ ॥

वहाँ इन्द्र ने पूछा — हे वसुन्धरे ! इस समय तुम्हें कौन- सा भय है, तुम्हें किसने पीड़ा पहुँचायी है और तुम्हें क्या दुःख है ? ॥ ३ ॥

यह सुनकर पृथ्वी ने कहा — हे देवेश ! यदि आप पूछ ही रहे हैं तो मेरा सारा दुःख सुन लीजिये। हे मानद ! मैं भार से दबी हुई हूँ ॥ ४ ॥ मगधदेश का राजा महापापी जरासन्ध, चेदिनरेश शिशुपाल, प्रतापी काशिराज, रुक्मी, बलवान् कंस, महाबली नरकासुर, सौभनरेश शाल्व, क्रूर केशी, धेनुकासुर और वत्सासुर ये सभी राजागण धर्महीन, परस्पर विरोध रखने वाले, पापाचारी, मदोन्मत्त और साक्षात् कालस्वरूप हो गये हैं ॥ ५-७ ॥ हे इन्द्र ! उनसे मुझे बहुत व्यथा हो रही है। मैं उनके भार से दबी हुई हूँ और अब [ उनका भार सहने में ] मैं असमर्थ हो गयी हूँ। हे विभो ! मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ ? मुझे यही महान् चिन्ता है ॥ ८ ॥

हे इन्द्र ! पूर्व में मैं [दानव हिरण्याक्ष से] पीड़ित थी । उस समय परम ऐश्वर्यशाली वराहरूपधारी भगवान् विष्णु ने मेरा उद्धार किया था । यदि वे वराहरूप धारण करके मेरा उद्धार न किये होते तो उससे भी अधिक दुःख की स्थिति में मैं न पहुँचती – आप ऐसा जानिये ॥ ९ ॥ कश्यप के पुत्र दुष्ट दैत्य हिरण्याक्ष ने मुझे चुरा लिया था और उस महासमुद्र में डुबो दिया था। उस समय भगवान् विष्णु ने सूकर का रूप धारणकर उसका संहार किया और मेरा उद्धार किया । तदनन्तर उन वराहरूपधारी विष्णु ने मुझे स्थापित करके स्थिर कर दिया अन्यथा मैं इस समय पाताल में स्वस्थचित्त रहकर सुखपूर्वक सोयी रहती । हे देवेश ! अब मैं दुष्टात्मा राजाओं का भार वहन करने में समर्थ नहीं हूँ ॥ १०-१२ ॥ हे इन्द्र ! अब आगे अट्ठाईसवाँ दुष्ट कलियुग आ रहा है। उस समय मैं और भी पीड़ित हो जाऊँगी तब तो मैं शीघ्र ही रसातल में चली जाऊँगी। अतएव हे देवदेवेश ! इस दुःखरूपी महासागर से मुझे पार कर दीजिये मेरा बोझ उतार दीजिये, मैं आपके चरणों में नमन करती
हूँ ॥ १३-१४ ॥

इन्द्र बोले — हे वसुन्धरे ! मैं इस समय तुम्हारे लिये क्या कर सकता हूँ ! तुम ब्रह्मा की शरण में जाओ, वे ही तुम्हारा दुःख दूर करेंगे, मैं भी वहाँ आ जाऊँगा ॥ १५ ॥

यह सुनकर पृथ्वी ने तत्काल ब्रह्मलोक के लिये प्रस्थान कर दिया। उसके पीछे-पीछे इन्द्र भी सभी देवताओं के साथ वहाँ पहुँच गये ॥ १६ ॥

उस आयी हुई धेनु को अपने सम्मुख उपस्थित देखकर तथा ध्यान – दृष्टि द्वारा उसे पृथ्वी जान करके ब्रह्माजी ने कहा — हे कल्याणि ! तुम किसलिये रो रही हो और तुम्हें कौन-सा दुःख है; मुझे अभी बताओ । हे पृथ्वि ! किस पापाचारी ने तुम्हें पीड़ा पहुँचायी है, मुझे बताओ ॥ १७-१८ ॥

धरा बोली — हे जगत्पते ! यह दुष्ट कलि अब आनेवाला है। मैं उसी के आतंक से डर रही हूँ; क्योंकि उस समय सभी लोग पापाचारी हो जायँगे। सभी राजालोग दुराचारी हो जायँगे, आपस में विरोध करने वाले होंगे और चोरी के कर्म में संलग्न रहेंगे। वे राक्षस के रूप में एक-दूसरे के पूर्णरूप से शत्रु बन जायँगे। हे पितामह! उन राजाओं का वध करके मेरा भार उतार दीजिये। हे महाराज ! मैं राजाओं की सेना के भार से दबी हुई हूँ ॥ १९-२१ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे देवि! तुम्हारा भार उतारने में मैं सर्वथा समर्थ नहीं हूँ। अब हम दोनों चक्रधारी देवाधिदेव भगवान् विष्णु के धाम चलते हैं। वे जनार्दन तुम्हारा भार अवश्य उतार देंगे। मैंने पहले से ही भलीभाँति विचार करके तुम्हारा कार्य करने की योजना बनायी है। [ उन्होंने इन्द्र से कहा ] हे सुरश्रेष्ठ! जहाँ पर भगवान् जनार्दन विद्यमान हैं, अब आप वहीं पर चलें ॥ २२-२३१/२

व्यासजी बोले — ऐसा कहकर वे वेदकर्ता चतुर्मुख ब्रह्माजी हंस पर आरूढ़ हुए और देवताओं तथा गोरूपधारिणी पृथ्वी को साथ में लेकर विष्णुलोक के लिये प्रस्थित हो गये । [वहाँ पहुँचकर] भक्ति से परिपूर्ण हृदय वाले ब्रह्माजी वेदवाक्यों से उनकी स्तुति करने लगे ॥ २४-२५ ॥

ब्रह्माजी बोले — आप हजार मस्तकों वाले, हजार नेत्रोंवाले और हजार पैरों वाले हैं। आप देवताओं के भी आदिदेव तथा सनातन वेदपुरुष हैं। हे विभो ! हे रमापते ! भूतकाल, भविष्यकाल तथा वर्तमानकाल का जो भी हमारा अमरत्व है, उसे आपने ही हमें प्रदान किया है। आपकी इतनी बड़ी महिमा है कि उसे त्रिलोकी में कौन नहीं जानता? आप ही सृष्टि करने वाले, पालन करने वाले और
संहार करने वाले हैं। आप सर्वव्यापी और सर्वशक्तिसम्पन्न हैँ ॥ २६–२८ ॥

व्यासजी बोले — इस प्रकार स्तुति करने पर पवित्र हृदय वाले वे गरुडध्वज भगवान् विष्णु प्रसन्न हो गये और उन्होंने ब्रह्मा आदि देवताओं को अपने दर्शन दिये। प्रसन्न मुखमण्डल वाले भगवान् विष्णु ने देवताओं का स्वागत किया और विस्तारपूर्वक उनके आगमन का कारण पूछा ॥ २९-३० ॥

तदनन्तर पद्मयोनि ब्रह्माजी ने उन्हें प्रणाम करने के उपरान्त पृथ्वी के दुःख का स्मरण करते हुए उनसे कहा हे विष्णो! हे जनार्दन ! अब पृथ्वी का भार दूर कर देना आपका कर्तव्य है। अतः हे दयानिधे ! द्वापर का अन्तिम समय उपस्थित होने पर आप पृथ्वी पर अवतार लेकर दुष्ट राजाओं को मारकर पृथ्वी का भार उतार दीजिये ॥ ३१-३२ ॥

विष्णु बोले — इस विषय में मैं (विष्णु), ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र, अग्नि, यम, त्वष्टा, सूर्य और वरुण कोई भी स्वतन्त्र नहीं है । यह सम्पूर्ण चराचर जगत् योगमाया के अधीन रहता है। ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त सब कुछ [ सात्त्विक, राजस, तामस ] गुणों के सूत्रों द्वारा उन्हीं में गुँथा हुआ है ॥ ३३-३४ ॥ हे सुव्रत ! वे हितकारिणी भगवती सर्वप्रथम स्वेच्छापूर्वक जैसा करना चाहती हैं, वैसा ही करती हैं। हमलोग भी सदा उनके ही अधीन रहते हैं ॥ ३५ ॥ अब आप लोग स्वयं अपनी बुद्धि से विचार करें कि यदि मैं स्वतन्त्र होता तो महासमुद्र में मत्स्य और कच्छपरूपधारी क्यों बनता ? तिर्यक्-योनियों में कौन-सा भोग प्राप्त होता है, क्या यश मिलता है, कौन – सा सुख होता है और कौन-सा पुण्य प्राप्त होता है ? [ इस प्रकार ]. क्षुद्रयोनियों में जन्म लेने वाले मुझ विष्णु को क्या फल मिला ? ॥ ३६-३७ ॥ यदि मैं स्वतन्त्र होता तो सूकर, नृसिंह और वामन क्यों बनता ? इसी प्रकार हे पितामह! मैं जमदग्निपुत्र (परशुराम ) – के रूप में उत्पन्न क्यों होता ? इस भूतल पर मैं [क्षत्रियों के संहार जैसा ] नृशंस कर्म क्यों करता और उनके रुधिर से समस्त सरोवरों को क्यों भर डालता ? उस समय मैं जमदग्निपुत्र परशुराम के रूप में जन्म लेकर एक श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी युद्ध में क्षत्रियों का संहार क्यों करता और घोर निर्दयी बनकर गर्भस्थ शिशुओं तक को भला क्यों मारता ? ॥ ३८- ४० ॥

हे देवेन्द्र ! राम का अवतार लेकर मुझे दण्डकवन में पैदल विचरण करना पड़ा, गेरुआ वस्त्र धारण करना पड़ा और जटा – वल्कलधारी बनना पड़ा। उस निर्जन वन में असहाय रहते हुए तथा पास में बिना किसी भोज्य-सामग्री के ही निर्लज्ज होकर आखेट करते हुए मैं इधर-उधर भटकता रहा ॥ ४१-४२ ॥ उस समय माया से आच्छादित रहने के कारण मैं उस मायावी स्वर्ण मृग को नहीं पहचान सका और जानकी को पर्णकुटी में छोड़कर उस मृग के पीछे-पीछे निकल पड़ा ॥ ४३ ॥ मेरे बहुत मना करने पर भी प्राकृत गुणों से व्यामुग्ध होने के कारण लक्ष्मण भी उस सीता को छोड़कर मेरे पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए वहाँ से निकल पड़े ॥ ४४ ॥ तदनन्तर कपटस्वभाव राक्षस रावण ने भिक्षुक का रूप धारण करके शोक से व्याकुल जानकी का तत्काल हरण कर लिया ॥ ४५ ॥ तब दुःख से व्याकुल होकर मैं वन-वन भटकता हुआ रोता रहा और अपना कार्य सिद्ध करने के लिये मैंने सुग्रीव से मित्रता की। मैंने अन्यायपूर्वक वाली का वध किया तथा उसे शाप से मुक्ति दिलायी और इसके बाद वानरों को अपना सहायक बनाकर लंका की ओर प्रस्थान किया ॥ ४६-४७ ॥

[ वहाँ युद्ध में ] मैं तथा मेरा छोटा भाई लक्ष्मण दोनों ही नागपाशों से बाँध दिये गये। हम दोनों को अचेत पड़ा देखकर सभी वानर आश्चर्यचकित हो गये। तब गरुड़ ने आकर हम दोनों भाइयों को छुड़ाया। उस समय मुझे महान् चिन्ता होने लगी कि दैव अब न जाने क्या करेगा ? राज्य छिन गया, वन में वास करना पड़ा, पिता की मृत्यु हो गयी और प्रिय सीता हर ली गयी। युद्ध कष्ट दे ही रहा है, अब आगे दैव न जाने क्या करेगा ! ॥ ४८-५० ॥ हे देवतागण ! सर्वप्रथम दुःख तो मुझ राज्यविहीन का वनवास हुआ। वन के लिये चलते समय (राजकुमारी सीता मेरे साथ थीं और) मेरे पास धन भी नहीं था । उस समय क्षत्रियधर्म का त्याग करके वन्यवृत्ति के द्वारा मैंने उस महावन में चौदह वर्ष व्यतीत किये ॥ ५१-५३ ॥ तदनन्तर भाग्यवश युद्ध में मुझे विजय प्राप्त हुई और वह महान् असुर रावण मारा गया। इसके बाद मैं सीता को ले आया और मुझे अयोध्या फिर से प्राप्त हो गयी। इस प्रकार जब मुझे सम्पूर्ण राज्य मिल गया, तब कोसलदेश पर अधिष्ठित रहते हुए मैंने वहाँ पर कुछ वर्षों तक सांसारिक सुख का भोग किया ॥ ५४-५५ ॥ इस प्रकार पूर्वकाल में जब मुझे राज्य प्राप्त हो गया तब मैंने लोकनिन्दा के भय से वन में सीता का परित्याग कर दिया। इसके बाद मुझे पुनः पत्नी वियोग से होने वाला भयंकर दुःख प्राप्त हुआ। वह धरानन्दिनी सीता पृथ्वी को भेदकर पाताल में चली गयी ॥ ५६-५७ ॥ इस प्रकार रामावतार में भी मैं परतन्त्र होकर निरन्तर दुःख पाता रहा। तब भला दूसरा कौन स्वतन्त्र हो सकता है ? तत्पश्चात् काल के वशीभूत होकर मुझे अपने भाइयों के साथ स्वर्ग जाना पड़ा। अतः कोई भी विद्वान् पराधीन व्यक्ति की क्या बात करेगा ? हे कमलोद्भव ! आप यह जान लीजिये कि जैसे मैं परतन्त्र हूँ वैसे ही आप, शंकर तथा अन्य सभी बड़े-बड़े देवता भी निश्चितरूप से परतन्त्र हैं ॥ ५८-६० ॥

॥ इस प्रकार अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्देवीभागवत महापुराण संहिता के अन्तर्गत चतुर्थ स्कन्ध का ‘ब्रह्मा के प्रति विष्णुवचन’ नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥

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