श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-48
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
अड़तालीसवाँ अध्याय
श्रीराम और देवगणों द्वारा देवी का स्तवन, ब्रह्माजी द्वारा भगवती का पूजन, देवी के शारदीय पूजा-अनुष्ठान की अनिवार्यता
अथः अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः
देव्याः शारदीयपूजानुष्ठाने श्रीमद्रामायरणवर्णनं

श्रीमहादेवजी बोले — तदनन्तर श्रीरामचन्द्र जी दण्डवत् प्रणाम करके परम भक्ति से युक्त होकर प्रसन्नमन से भगवती की स्तुति करने लगे। महामुने ! अन्य श्रेष्ठ देवगण भी वहाँ आकर सृजन, पालन तथा संहार करनेवाली महादेवी का स्तवन करने लगे। उन सभी के द्वारा भक्तिभाव से स्तुति, पूजन करने पर जगज्जनी महादेवी अत्यन्त प्रसन्न हो गयी ॥ १-३ ॥

मुने ! उस समय देवी के अति प्रसन्न होने से स्वर्गलोक, मर्त्यलोक तथा रसातल — इन तीनों लोकों के निवासियों को महान् हर्ष हुआ। सभी वानर नृत्य करने लगे तथा मनोहर गीत गाने लगे। भगवती की प्रसन्नता से आप्तकाम श्रीराम जी आनन्दमग्न हो गये ॥ ४-५ ॥

नारद ! इस प्रकार नवमी तिथि को श्रीरामचन्द्र जी तथा अन्य देवताओं के इस महान् हर्षपूर्ण महोत्सव के बीतने पर पितामह ब्रह्माजी ने दशमी तिथि को प्रातःकाल भगवती की पूजा करके उनकी मूर्ति समुद्र में विसर्जित कर दी और उसके बाद वे अपने लोक को लौट आए ॥ ६-७ ॥ इसके बाद श्रीरामचन्द्र जी ने विभीषण को लङ्का का राजा बनाया। तत्पश्चात् रघुश्रेष्ठ श्रीमान् रामचन्द्रजी सीता, लक्ष्मण, वानरेन्द्र सुग्रीव, समस्त वानरगण तथा राक्षसेश्वर विभीषण के साथ पुष्पक विमान पर आरूढ़ हुए। उस विमान में देवगणों तथा करोड़ों-करोड़ों भालुओं से घिरे हुए उन श्रीराम ने भगवती महेश्वरी को प्रणाम करके अपने पुर अयोध्या को जाने हेतु यात्रा आरम्भ की ॥ ८-१० ॥

मुनिवर ! इस प्रकार जब अविनाशी पुरुष भगवान् श्रीराम ने शरत्काल में विधानपूर्वक स्वयं भगवती की आराधना की थी तो फिर महामते ! वत्स ! अन्य देवताओं, यक्षों, राक्षसों, मनुष्यों, सिद्धों, गन्धर्वों तथा नागों के बारे में क्या कहना ? ॥ ११-१२ ॥

मुने ! भगवती के समान परमाराध्य इस लोक में कोई नहीं है। जो प्राणी अविवेक के कारण उनकी उपासना नहीं करता, वह निःसंदेह पापात्मा है। मुनिश्रेष्ठ ! जो उनकी पूजा का लोप करता है वह पापी है और उसके लिए कहीं भी स्थान नहीं है। अतः कोई शाक्त हो, शैव हो, सूर्योपासक हो अथवा वैष्णव हो, उसे शारदीय महोत्सव में जगदीश्वरी की प्रसन्नता के लिए अनेकविध पूजनोपचारों से भगवती की पूजा अवश्य करनी चाहिये। शारदीय महोत्सव में सभी लोगों को सावधान होकर आदरपूर्वक देवी की पूजा सर्वतोभाव से अवश्य ही करनी चाहिये। इसमें वित्तशाठ्य (धन की कृपणता) नहीं करना चाहिये। मुने ! जो लोग प्रत्येक वर्ष देवी का पूजन-अर्चन करते हैं, इन्द्र आदि सभी प्रधान देवता उनकी आज्ञा के वशीभूत हो जाते हैं। महामुने ! अधिक कहने से क्या लाभ? मैंने जो भी कहा है, वह सत्य ही है। भगवती की आराधना से मिलने वाले पुण्य से बढ़कर तीनों लोकों में कोई भी पुण्य नहीं है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस उत्कृष्ट रामायण तथा महापातकों का नाश करने वाले भगवती के विस्तृत माहात्म्य का श्रवण करता है, वह ब्रह्मा आदि के लिए भी अत्यन्त दुर्लभ देवीलोक प्राप्त कर लेता है॥ १३-२२ ॥

मुनिश्रेष्ठ ! जिस प्रकार से उन भगवान् श्रीहरि ने मानवदेह धारण कर इस पृथ्वीलोक में जन्म लिया और शत्रु के निधन की इच्छा करते हुए असमय में भी विधानपूर्वक भगवती का पूजन किया – वह सब कुछ मैंने आपसे कह दिया है। अब आप आगे क्या सुनना चाहते हैं? ॥ २३-२४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत देवी के शारदीय पूजानुष्ठान में ‘श्रीमद्रामायणवर्णन’ नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४८ ॥

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