श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-53
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
तिरपनवाँ अध्याय
भगवान् श्रीकृष्ण की बाललीला – धेनुकासुरवध, कालियमर्दन, रासलीला तथा वृषभासुर वध
अथः त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
श्रीमहादेवनारदसंवादे राधया सह रासक्रीडावर्णने कंसप्रेरितवृषभासुरवधः

श्रीनारद जी बोले — पार्वती प्राणवल्लभ महेश्वर ! श्रीकृष्ण-रूपवाली भगवती के चरित्र का संक्षेप में मुझसे वर्णन कीजिए ॥ १ ॥ जिस प्रकार उन्होंने गोकुल में राधा के साथ विहार किया और पृथ्वी के भारस्वरूप बहुत-से वीरों का रण में तथा अन्यत्र कुरुक्षेत्र आदि में भी संहार किया, स्वयं अपने बन्धु-बान्धवों, यदुवंशियों तथा समस्त ऋषियों के साथ जिस प्रकार वे पृथ्वी पर विराजमान रहे और अन्त में जिस प्रकार श्रीकृष्ण ने स्वर्गारोहण किया; वह सब आप मुझे बताइए ॥ २-३१/२

श्रीमहादेव जी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! सभी ग्वाल-बालों के साथ गोकुल में विहार करते हुए श्रीकृष्ण ने बाल्यावस्था में ही उन धेनुकासुर आदि महान् दैत्यों को मारकर तथा कालियदमन करके अपने अद्भुत प्रभाव का प्रदर्शन करते हुए रमणीक वृन्दावन में राधा के साथ विहार किया। भगवती काली के ही पुरुष रूप भगवान् श्रीकृष्ण ने भैरव के अंश से उत्पन्न अन्य गोपियों के साथ उनके सौन्दर्य की वृद्धि करते हुए विहार किया। दिन में गोकुल से मङ्गलमय वृन्दावन में जाकर उन्होंने अपनी बाँसुरी की मधुर ध्वनि से सभी गोपियों को बुलाकर और राधा को प्रधान महिषी बनाकर वहाँ अपनी लीला से ‘रास’ रचाया ॥ ४-८ ॥

अनेक प्रकार के वन्य-पुष्पों से माला बनाकर गोपियाँ श्रीकृष्ण के गले में डाल देती थी और अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें देखने लगती थीं। अपने मुख पर मुस्कान लिये श्रीकृष्ण भी उन गोपियों को सुन्दर माला पहनाकर उनके हर्षित मुख कमल को निरन्तर देखते रहते थे ॥ ९-१० ॥ कभी दिव्य सिंहासन पर बैठे हुए श्रीकृष्ण परम सुन्दरी राधा को अपने बाएँ भाग में बिठाकर करोड़ों चन्द्रों की कान्ति के सदृश उनके मुख-कमल का स्नेहपूर्वक स्पर्श करते थे। वे यदुनन्दन श्रीकृष्ण गोपिका-समूहों के साथ कभी यमुना के तट पर और कभी जल में क्रीडा किया करते थे। वे श्रीकृष्ण रात्रिकाल में अपनी बाँसुरी की ध्वनि से गोपियों का चित्त आकृष्ट करके और उन्हें वन में बुलाकर उनके साथ आनन्दपूर्वक विहार करते थे। मुने ! कभी राधिका जी कमल सदृश पाँच मुखवाले भगवान् शिव का सुन्दर रूप धारण कर लेती थीं और स्वयं श्रीकृष्ण गौरी के रूप में होकर उनके साथ विहार करने लगते थे ॥ ११-१५ ॥

महामुने ! इस प्रकार राधा के साथ रमण करते हुए परिपूर्ण आनन्दस्वरूप साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण गोकुल में रहते थे ॥ १६ ॥ एक समय शरत्पूर्णिमा की महानिशा में विहार करने का मन में निश्चय करके श्रीकृष्ण वृन्दावन आए। वह वृन्दावन मल्लिका, कुन्द, चमेली, चम्पा और रङ्गन आदि खिले हुए पुष्पों से परिपूर्ण था; मन्द-मन्द सुगन्धित वायु से अत्यन्त रमणीय था; मधुर ध्वनि के द्वारा गुञ्जार करने वाले मधुमत्त भौंरों से सुशोभित था और काम से व्याकुल-चित्त वाले कोकिल तथा क्रौंच पक्षियों से निनादित था ॥ १७-१९ ॥

नारद ! उस वन में खिले हुए श्वेत कमल, कुमुद, पंकज आदि पुष्पों से युक्त अत्यन्त मनोहर सरोवर विद्यमान थे। उस समय सभी प्राणियों को हर्षित करने वाला तथा स्त्रियों के मन को द्रवीभूत करता हुआ अत्यन्त निर्मल चन्द्रमा आकाश में उदित हुआ। मुने ! इस प्रकार के प्रिय वन तथा अत्यन्त स्वच्छ चन्द्रमा को देखकर अत्यन्त प्रसन्न मनवाले स्वयं श्रीकृष्ण ने वंशी की मधुर ध्वनि की। उसे सुनकर श्रीकृष्ण की ओर आकृष्ट मनवाली सभी सुन्दर गोपाङ्गनाएँ अपने-अपने घर के काम-काज छोड़कर उनके पास आ गयीं ॥ २०-२३ ॥ सुन्दर अङ्गों वाली राधा, जो स्त्रीरूप में साक्षात् पूर्णब्रह्म शिवजी थे, उनके आगे-आगे वहाँ पहुँच गयी। मुनिश्रेष्ठ ! उन सभी गोपिकाओं को आया हुआ देखकर वे कमलनयन श्रीकृष्ण उनके साथ महारास करने का उद्योग करने लगे। भगवान् श्रीकृष्ण ने कामदेव को जीतकर अनेकविध क्रीड़ाएँ करते हुए उनके साथ लीला-विहार किया। उस समय नवीन मेघ के समान प्रभा वाले परमानन्दस्वरूप पूर्णात्मा श्रीकृष्ण अपने मुख पर मुस्कान के साथ आठ विग्रह में विभक्त हो गये थे। यह देखकर क्षण भर में राधा भी चन्द्रमा के समान कान्तिवाले तथा मन्द-मन्द हासयुक्त सुन्दर मुखवाले प्रेमोन्मत्त आठ विग्रहों में होकर सुशोभित होने लगीं ॥ २४-२८ ॥

महामुने ! राधा की उन आठ मूर्तियों के साथ विहार करने के लिये आठ विग्रह वाले प्रसन्नात्मा वे श्रीकृष्ण क्षण भर में अन्तर्धान हो गये और महामुने ! अन्य सभी सुन्दर गोपिकाओं को वहीं पर विरह-व्यथित छोड़कर वे अन्तरिक्ष में चले गये तथा राधा के साथ वहाँ रासलीला करने लगे। परमानन्द स्वरूप पूर्णात्मा कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण कौतूहलयुक्त होकर लीला से उनके साथ आनन्द-विहार करते थे। मुनिश्रेष्ठ ! भेरी, मृदङ्ग, तुरही आदि की तीव्र ध्वनि के साथ उनके ऊपर आकाश से भारी पुष्प वृष्टि होने लगी और आकाश के मध्य इस प्रकार विहार कर रहे राधा तथा कृष्ण को न देखकर उस सुरम्य वन में स्थित अन्य गोपिकाएँ रोने लगीं। मुनिवर ! उन गोपिकाओं का विलाप सुनकर श्रीकृष्ण राधा के उस कानन में पुनः प्रकट हो गये और उनकी मनोवाञ्छा पूर्ण करने के लिये श्रीकृष्ण ने अपनी महिमा से अनेक रूपों में होकर उस महावन में उनके साथ लीला की ॥ २९-३६ ॥

महामुने ! श्रीकृष्ण की रासक्रीड़ा देखकर देवता तथा गंधर्व परम आनन्दित हुए और भारी पुष्पवर्षा करने लगे ॥ ३७ ॥ इस प्रकार श्रीकृष्ण ने कार्तिक की पूर्णिमा तिथि से आरम्भ करके बहुत दिनों तक रात्रिवेला में उस वन में गोपिकाओं के साथ रासलीला की ॥ ३८ ॥ इसी प्रकार श्रीकृष्ण रूप परमेश्वरी ने स्त्रीरूप शम्भु के साथ चीरहरण आदि अन्य महाक्रीड़ाएँ भी कीं ॥ ३९ ॥ मुने ! नन्द आदि गोपवृन्द उनकी लोकोत्तर लीलाओं से देवीरूप श्रीकृष्ण को ब्रह्म — ऐसा समझकर स्नेहपूर्वक उनका पालन करने लगे ॥ ४० ॥ नारद ! राधा भी सौन्दर्यवर्धन करती हुईं-सी उन श्रीकृष्ण के साथ रमण करती थीं ॥ ४१ ॥

एक बार कंस के द्वारा भेजा गया वृषभासुर नामक बलशाली दैत्य बलराम और श्रीकृष्ण को मारने के लिये गोकुल आया। मुने ! चाँदी के पर्वत के समान प्रतीत होने वाले उस दैत्य को समक्ष आता हुआ देखकर गोकुल में रहने वाले सभी पशु चारों ओर भागने लगे। अन्य लोग भी उस दुष्टात्मा राक्षस के भय से दिशाओं तथा विदिशाओं में उसी प्रकार भागने लगे जैसे सिंह को देखकर हाथी भाग जाते हैं ॥ ४२-४४ ॥ इस प्रकार गोकुलवासियों को भागते हुए देखकर श्रीकृष्ण वृषभासुर नामक उस महान् दैत्य के पास पहुंचे। मुनिश्रेष्ठ ! वह वृषभासुर भी श्रीकृष्ण को सामने आया देखकर अपने खुरों से पृथ्वी को कंपित करता हुआ जोर-जोर से हुंकार मारने लगा। श्रीकृष्ण ने उसके दोनों सींगों को पकड़कर अपनी ओर खींचा और धरती पर फेंककर पटक दिया तथा पृथ्वी पर उसने प्राण त्याग दिए ॥ ४५-४७ ॥ तत्पश्चात् अत्यन्त विस्मय को प्राप्त उन गोपगणो ने प्रसन्नचित्त होकर अनेक स्तुतियों के द्वारा आदरपूर्वक उन श्रीकृष्ण का पूजन किया ॥ ४८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अन्तर्गत राधा के साथ रास क्रीडा वर्णन में ‘कंसप्रेरितवृषभासुरवध’ नामक तरेपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥

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