श्रीमहाभागवत [देवीपुराण]-अध्याय-66
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
छाछठवाँ अध्याय
ब्रह्माजी द्वारा भगवती गङ्गा की प्रार्थना करना तथा गङ्गा द्वारा पुनः तीनों लोकों में आने का आश्वासन देना, भगीरथ द्वारा भगवान् विष्णु, भगवती गङ्गा और भगवान् शिव की आराधना
अथः षट्षष्टितमोऽध्यायः
भगीरथगङ्गासंवादे श्रीशिवदर्शनप्राप्तिः

श्रीमहादेवजी बोले — मुनि श्रेष्ठ ! देववन्दित पितामह ब्रह्माजी ने भगवती गङ्गा को भगवान् विष्णु के चरणकमल में स्थित जानकर अपने कमण्डलु को जलविहीन देखकर कुछ क्षण के लिये मन में विचार किया कि ये द्रवमयी गङ्गा तीनों लोकों में अब दुर्लभ हो गयीं ॥ १-२ ॥ मेरे कमण्डलु में स्थित ये गङ्गा भगवान् विष्णु के चरणकमल को प्राप्त करके अत्यन्त पुण्यमयी और धन्य होकर वहीं स्थिर हो गयीं । निश्चय ही ये स्वयं नदी होकर स्वर्लोक, मृत्युलोक तथा पाताल- लोक को पवित्र करती हुई सिद्धजनों के सांनिध्य को प्राप्त करेंगी। इसलिये मैं शीघ्र ही तप के द्वारा सुरेश्वरी देवी गङ्गा को पुनः भगवान् विष्णु के चरणकमल से निश्चय ही द्रवित करूँगा ॥ ३-५ ॥ मुने ! ऐसा विचार कर ब्रह्मा भी वैकुण्ठलोक आये और भगवान् विष्णु के चरणकमल में स्थित गङ्गा की प्रार्थना करने लगे। उनके चिरकाल तक प्रार्थना करने पर त्रैलोक्यपावनी गङ्गा ने प्रत्यक्ष होकर इस प्रकार कहा — ॥ ६-७ ॥

गङ्गाजी बोलीं — ब्रह्मन् ! मैं कुछ समय तक निश्चितरूप से भगवान् विष्णु के श्रीविग्रह में निवास करूँगी, उसके बाद भगवान् विष्णु के चरणकमलों से निकलकर द्रवमयी होकर पुनः तीनों लोकों को पवित्र करूँगी, इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है ॥ ८ ॥ अमित तेजस्वी राजा भगीरथ के द्वारा स्तुति करने पर ‘ भागीरथी’ के नाम से विख्यात होकर मैं पृथ्वीलोक में जाऊँगी तथा उनके सम्पूर्ण पूर्वजों का उद्धार कर और सिद्धजनों के सांनिध्य को प्राप्त करने के उपरान्त त्रिलोकी की रक्षा के लिये पाताललोक में प्रवेश करूँगी ॥ ९-१० ॥

ब्रह्माजी बोले — सुरोत्तमे ! मैं भी अपनी ज्ञानदृष्टि से यह जानता हूँ कि आप राजा भगीरथ की कीर्ति को बढ़ायेंगी। शिवसुन्दरी ! मैं भी इसीलिये आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप भगवान् विष्णु के चरणकमलों से निकलकर पुनः त्रिलोकी में विराजमान हों ॥ ११-१२ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — तब भगवती गङ्गा शीघ्र ही अन्तर्धान हो गयीं तथा लोकपितामह ब्रह्माजी भी अपने ब्रह्मलोक को प्रस्थान कर गये ॥ १३ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! अतितेजस्वी मुनिवर कपिल के शाप से भस्मीभूत अपने पितरों का उद्धार करने की इच्छा से गुरु वसिष्ठ के द्वारा आदिष्ट होकर सगर के वंशज जितेन्द्रिय राजा भगीरथ ने विष्णुपद को प्राप्त द्रवमयी गङ्गा को पृथ्वी पर लाने के लिये लोकनाथाधिपति परमात्मा भगवान् विष्णु की चिरकाल पर्यन्त आराधना की ॥ १४–१६ ॥ तब परमात्मा भगवान् पुरुषोत्तम प्रसन्न होकर अत्यन्त पुण्यात्मा राजा भगीरथ के सामने प्रकट हो गये ॥ १७ ॥ गरुड पर विराजमान, वनमाला से विभूषित, पीताम्बरधारी, हाथ में शङ्ख, चक्र और गदा को धारण किये हुए उन जगन्नाथ विष्णु भगवान्‌ को देखकर एवं साष्टाङ्ग प्रणाम कर राजा भगीरथ ने इस प्रकार उनकी स्तुति की — ॥ १८-१९ ॥

॥ भगीरथ प्रोक्तं श्रीविष्णु स्तवन ॥
॥ भगीरथ उवाच ॥
त्रैलोक्यपावन जगत्परिवन्द्यपाद
विश्वेश विश्वग महापुरुषप्रधान ।
नारायणाच्युत हरे मधुकैटभारे
विष्णो प्रसीद परमेश्वर ते नमोऽस्तु ॥ २० ॥
विश्वैककारण पुराण जगन्निधान
श्रीवत्सलाञ्छन विभो मधुसूदनाख्य ।
गोविन्द वामन जनार्दन विश्वमूर्ते
विष्णो प्रसीद परमेश्वर ते नमोऽस्तु ॥ २१ ॥
अत्यन्तविक्रम जगन्मय वासुदेव
दैत्यान्तकान्तक भयान्तक कान्त पूर्ण ।
वैकुण्ठ माधव धराधर चारुरूप
विष्णो प्रसीद परमेश्वर ते नमोऽस्तु ॥ २२ ॥
लक्ष्मीपतेऽमरपते जगदेकनाथ
मायाश्रयैक करुणामय केशवेश ।
आनन्दसान्द्र कमलेक्षण शुद्धबोध
वाणीपतेऽखिलपते सततं नतोऽस्मि ॥ २३ ॥
नमस्ते विश्वरूपाय विष्णवेऽमिततेजसे ।
सच्चिदानन्दरूपाय शुद्धज्ञानात्मने नमः ॥ २४ ॥
अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं तपः ।
यत्त्वां पश्यामि नेत्राभ्यां देवैरपि सुदुर्लभम् ॥ २५ ॥

भगीरथ बोले — तीनों लोकों को पवित्र करने वाले, विश्व के पालनहार, जगत् के द्वारा वन्दित चरण वाले, महापुरुषों में श्रेष्ठ, विश्वेश, नारायण, अच्युत, हरि, मधुकैटभ के शत्रु विष्णो! आप हम पर प्रसन्न हों, परमेश्वर ! आपको नमस्कार है ॥ २० ॥ विश्व के एकमात्र कारण, सनातन, जगदाधार, श्रीवत्स के चिह्न से सुशोभित, विभो, मधुसूदन, गोविन्द, वामन, जनार्दन, विश्वमूर्ति, विष्णो! आप हम पर प्रसन्न हों, परमेश्वर! आपको नमस्कार है ॥ २१ ॥ वासुदेव! आप अत्यन्त पराक्रमी, विश्वरूप, दैत्यों का नाश करने वाले, यमस्वरूप, भय को दूर करने वाले हैं। कान्तिमय, पूर्णस्वरूप, वैकुण्ठ, माधव, पृथ्वी को धारण करने वाले, सुन्दरस्वरूप वाले विष्णो! आप हम पर प्रसन्न हों, परमेश्वर! आपको नमस्कार है ॥ २२ ॥ लक्ष्मीकान्त, सुरश्रेष्ठ, विश्व के एकमात्र स्वामी, माया के एकमात्र आश्रय, करुणामय, केशव, ईश, घनानन्दस्वरूप, कमलनयन, शुद्ध ज्ञानस्वरूप, वाणी के स्वामी तथा सम्पूर्ण विश्व के स्वामी को मैं निरन्तर नमस्कार करता हूँ ॥ २३ ॥ अत्यन्त तेजस्वरूप, विश्वरूप विष्णु को नमस्कार है, शुद्ध ज्ञानात्मा सच्चिदानन्दस्वरूप को नमस्कार है । आज मेरा जन्म और तप दोनों सफल हुआ; क्योंकि देवताओं के लिये भी दुर्लभ आप को मैं अपने नेत्रों से देख रहा हूँ ॥ २४-२५ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — इन स्तुतिवाक्यों से स्तवन किये जाने पर भगवान् विष्णु ने शत्रुसूदन नृपश्रेष्ठ भगीरथ से कहा — ॥ २६ ॥

श्रीभगवान् बोले — राजन्! आपका क्या अभीष्ट है, उसे अब माँग लीजिये, आपकी भक्ति से प्रसन्न मैं उसे निश्चितरूप से प्रदान करूँगा ॥ २७ ॥

भगीरथ बोले — प्रभो ! मेरे पूर्वज ब्रह्मशाप से भस्मीभूत होकर अधोगति को प्राप्त हो गये हैं, उनके उद्धार के लिये मैं द्रवमयी पवित्र गङ्गा को पृथ्वी पर ले जाना चाहता हूँ ॥ २८-२९ ॥ परमेश्वर ब्रह्मा के कमण्डलु में निवास करने वाली वे त्रैलोक्यपावनी गङ्गा आपके श्रीविग्रह को प्राप्त होकर स्थित हो गयी हैं। आप अपने शरीर में स्थित उन गङ्गा को यदि प्रदान कर देंगे तो मेरे सभी पूर्वज परमपद को प्राप्त हो जायँगे। भक्तों पर सब प्रकार से कृपा करने वाले देव ! जगन्नाथ! आपसे यही मेरी अभिलाषा है ॥ ३०-३२ ॥

श्रीभगवान् बोले — वत्स ! ये द्रवमयी गङ्गा मेरे शरीर से निकलकर स्वयं पृथ्वी पर जाकर आपके पूर्वजों का उद्धार करेंगी। महाराज भगीरथ ! आप उन परमाराध्या, देवताओं के लिये भी दुर्लभ गङ्गा तथा भगवान् विश्वनाथ की प्रार्थना करें। तब आपका सारा अभीष्ट सिद्ध हो जायगा ॥ ३३-३४ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार भगवान् पुरुषोत्तम राजा भगीरथ को वर प्रदान कर वहाँ से अन्तर्धान हो गये ॥ ३५ ॥ मुनिसत्तम ! वे संयतेन्द्रिय महाराज भगीरथ हिमालय के उत्तरी शिखर पर जाकर भगवती गङ्गा की आराधना करने लगे। उनके हजारों वर्ष तपस्या करने पर स्मितमुखी शिवशक्ति-स्वरूपिणी भगवती गङ्गा प्रसन्न हो गयीं । भगवती गङ्गा ने संयतेन्द्रिय राजा के समक्ष प्रकट होकर कहा — राजन् ! आपका जो अभिलषित वर हो उसे माँग लीजिये ॥ ३६- ३८ ॥

भगीरथ बोले — माता, शिवसुन्दरी ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो भगवान् विष्णु के चरणकमल से निकलकर पृथ्वीतल पर चलें और पृथ्वी को पवित्र करके विवर में प्रविष्ट होकर मुनि के द्वारा भस्मसात् किये गये मेरे पूर्वजों का उद्धार करें। देवताओं की वन्दनीया! यदि आप मेरे पूर्वजों का उद्धार कर दें तो मैं कृतार्थ हो जाऊँगा, यही मेरी मङ्गलमयी अभिलाषा है ॥ ३९-४१ ॥

गङ्गाजी बोलीं — महाराज ! ‘ऐसा ही होगा ‘ । मैं भगवान् विष्णु के चरणकमल से निकलकर आपके सभी पूर्वजों का उद्धार करूँगी ॥ ४२ ॥ आपसे प्रार्थित होकर मैं भगवान् विष्णु के चरणकमल से निकलकर पृथ्वी पर अवतरित होऊँगी। इसीलिये आपकी कन्या होऊँगी और इस संसार में ‘भागीरथी’ इस नाम से प्रसिद्ध होऊँगी, आप जाकर विश्वनाथ भगवान् शंकर को प्रसन्न करें। प्रभो ! वे मेरे प्रियतम पति हैं तथा मैं उनकी वशवर्तिनी हूँ, इसलिये मैं उनकी आज्ञा के बिना नहीं जा सकती ॥ ४३–४५ ॥ भूपते ! आप पर भगवान् शिव के प्रसन्न हो जाने से मेरु शिखर पर चढ़कर जब आप मेघगर्जन के समान शङ्खध्वनि करेंगे, राजन् ! तब भगवान् विष्णु के चरणकमल से निकलकर ब्रह्माण्ड को अत्यन्त वेगपूर्वक विदीर्ण करके जलरूप में मैं आपके पीछे-पीछे पृथ्वी पर जाऊँगी और विवर में प्रविष्ट होकर आपके सभी पूर्वजों का उद्धार करके आपकी कीर्ति को बढ़ाने वाली मैं पाताल में चली जाऊँगी ॥ ४६–४८ ॥

श्रीमहादेवजी बोले — ऐसा कहकर वे शंकरप्रिया भगवती गङ्गा राजा भगीरथ के देखते-ही-देखते क्षणभर में अन्तर्धान हो गयीं और अपने पूर्वजों की कीर्ति को बढ़ाने वाले राजा भगीरथ भगवती गङ्गा के दर्शन से अपने को कृतार्थ मानने लगे ॥ ४९-५० ॥ महामते ! धर्मात्मा राजा भगीरथ ने भगवती गङ्गा की आज्ञा से उसी श्रेष्ठ कैलासपर्वत पर जाकर जितेन्द्रिय तथा निराहार रहते हुए सौ वर्षों तक भगवान् शंकर की प्रार्थना की। तब देवेश्वर, अविनाशी, पञ्चानन, वृषभध्वज भगवान् शंकर ने प्रसन्न होकर उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिये ॥ ५१-५२ ॥

रजत की तरह कान्तिवाले, पञ्चानन, शूलधारी, व्याघ्रचर्म धारण किये हुए, जटा से विभूषित मस्तक वाले, समस्त शरीर में विभूति धारण किये हुए, स्मितवदन नीलकण्ठ, भुजङ्गभूषण, शिरोभूषण के रूप में सुन्दर अर्धचन्द्र को धारण किये हुए भगवान् शंकर को देखकर राजा भगीरथ साष्टाङ्ग प्रणाम करके एक हजार आठ नामों से उन देवदेवेश पूर्णब्रह्म सर्वसुरोत्तम की स्तुति करने लगे ॥ ५३-५५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराणके अन्तर्गत भगीरथ- गङ्गा-संवादमें’ श्रीशिवदर्शनप्राप्ति’ नामक छाछठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६६ ॥

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