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श्रीराधा-षडक्षरी महाविद्या की उपासना

षडक्षरी महाविद्या-उपासनाके अन्तर्गत श्रीराधा-सम्बन्धी मन्त्र, ध्यान, पूजा-विधान और कवच आदि का यथाक्रम विवरण नारदपंचरात्र के द्वितीय रात्रि विभाग में तीसरे, चौथे और पाँचवें अध्याय में उपलब्ध होता है ।  श्रीशंकरजी का नारद के प्रति कथन है कि ‘श्रीराधा| [श्रीकृष्ण के] प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं ।’
‘प्राणाधिष्ठात्री या देवी राधारूपा च सा मुने।।
(नारदपंचरात्र २ । ३।५५)
जो कार्य बहुत काल तक श्रीकृष्ण की आराधना करने के बाद सिद्ध होता है, वह श्रीराधा की उपासना से स्वल्पकाल में ही सम्पन्न हो जाता है ।
श्रीनारद ने शंकरजी से पूछा कि ‘षडक्षरी महाविद्या की उपासना किन-किनने की थी ?’ शंकरजी ने कहा कि ‘यह षडक्षरी महाविद्या वेदों में भी सुदुर्लभ है; इसके सम्बन्ध में कुछ भी कहने का हरि द्वारा निषेध किया गया है । पार्वती के भी पूछने पर मैंने कुछ नहीं कहा; मेरे और परमात्मा श्रीकृष्ण के लिये यह प्राणतुल्य है; सर्वसिद्धिप्रद और भक्ति-मुक्ति देनेवाली है ।


षडक्षरी महाविद्या वेदेषु च सुदुर्लभा ।
निषिद्धा हरिणा पूर्वं वक्तुमेव हि नारद ॥
पार्वत्या परिपृष्टेन मया नोक्ता पुरा मुने ।
अस्माकं प्राणतुल्या च कृष्णस्य परमात्मनः ॥

(नारदपंचरात्र २।३।७६-७७)
‘श्रीकृष्ण इस षडक्षरी महाविद्या का नित्य भक्तिपूर्वक जप करते हैं । यह परम दुर्लभ मन्त्र है –
‘षडक्षरी महाविद्यां नित्यं भक्त्या जपेद्धरिः ।’
(नारदपंचरात्र २।५।४)
‘षडक्षरी महाविद्या कामधेनुस्वरूपिणी है । इसकी उपासना से बल, पुत्र, लक्ष्मी तथा दास्यभक्ति और गोलोक में ईप्सित स्थान की प्राप्ति होती है ।
‘रां ओं आं यं स्वाहा’ — यही षडक्षरी महाविद्या का बीजमन्त्र है । यह राधाशक्ति की पूर्णतम जागृति का द्योतक है; मूलाधार चक्र से जाग्रत् होकर कुण्डलिनी महाशक्ति सहस्रारचक्र में अवस्थित हो जाती है –
भूतवर्गात्परो वर्णो द्वितीयो दीर्घवान्मुने ।
चतुर्वर्गतुरीयश्च दीर्घवांश्च फलप्रदः ॥
भूतवर्गात्परो वर्णो वाणीवान् सर्वसिद्धिदः ।
सर्वशुद्धप्रियान्ता च तस्या बीजादिकाः स्मृताः ॥

(नारदपंचरात्र २।३।९१-९२)
उपर्युक्त श्लोक का अभिप्राय यह है कि ‘भूतवर्गात्पर वर्णो द्वितीयो – ‘र’ है । भूत का अर्थ है – पाँच; इनके क वर्ग च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग और प वर्ग के बाद ‘य’ अक्षर के बाद दूसरा अक्षर ‘र’ है ।‘दीर्घवान्’ शब्द का तात्पर्य है ‘आं’ । ‘र’ और ‘ आं’ के मिलाने पर ‘रां’ बना । ‘चतुर्वर्गतुरीयः का तात्पर्य है ‘मोक्षदः’ । इसका अभिप्राय ‘ओम्’ है । ‘दीर्घवान् का अभिप्राय’ आं’ है । भूतवर्गात्परो वर्ण:’ का तात्पर्य ‘य’ से है । ‘वाणीवान् ‘यं’ का द्योतक है । ‘सर्व-शुद्धप्रियान्ता’ का तात्पर्य ‘स्वाहा’ है । इस तरह षडक्षरी महाविद्यामन्त्र का रूप‘रां ओं आं यं स्वाहा ।’ सिद्ध हुआ ।

इस मन्त्रानुष्ठान में श्रीकृष्ण की प्राणप्रियतमा रासेश्वरी राधा का देवतारूप में ध्यान इस प्रकार किया जाता है —
‘भगवती श्रीराधा का वर्ण श्वेत चम्पा की आभा के समान है । वे करोड़ों चन्द्रमा की प्रभा से संयुक्त हैं. उनकी कवरी — काले-काले केशों का जूड़ा मालती की माला से विभूषित है । उन्होंने वह्निपरिशुद्ध — अग्नि के तपाये हुए पवित्र रेशमी वस्त्रों को धारण किया है । वे रत्न-भूषणों से अलंकृत हैं । मन्द-मन्द मुसकरा रही हैं और उनकी मुखमुद्रा प्रसन्न है । वे भक्तों पर अनुग्रह करनेवाली हैं । वे ब्रह्मस्वरूपिणी हैं, परमेश्वरी हैं, श्रीकृष्ण की रमणी हैं, परम सुन्दरी हैं । वे श्रीकृष्ण के लिये प्राण से भी अधिक प्रिय हैं । वे देवी हैं, श्रीकृष्णवक्षोविलासिनी हैं । श्रीकृष्ण सदा उनकी स्तुति करते हैं । वे गोलोक में निवास करती हैं । वे गोप्त्री—रक्षिका हैं, विधाता की सृष्टि करनेवाली हैं, वृन्दा हैं, वृन्दावन में विचरण करती हैं, वृन्दावन में केलि करती रहती हैं । वे तुलसी की अधिष्ठात्री देवी हैं । श्रीगंगा उनके चरणकमल की अर्चना करती हैं, वे समस्त सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं, सिद्ध हैं, सिद्धेश्वरी हैं, सिद्धयोगिनी हैं । वे सयज्ञ के यज्ञ की अधिष्ठात्री देवी हैं, सुयज्ञ को वरदान देनेवाली हैं । वे वरदात्री हैं और सज्जनों को समस्त सम्पत्ति देती हैं । श्वेत चँवर के द्वारा प्रिय गोपियाँ उनकी सेवा में लगी रहती हैं । वे रत्न-सिंहासन पर स्थित हैं, अपने दोनों हाथों में क्रीड़ा के लिये कमल धारण करती हैं । ऐसी कष्णप्रिया परमेश्वरी राधा का मैं ध्यान करता हूँ ।’ (नारदपंचरात्र २।४। ३-११)

ध्यान के पश्चात् हाथ धोकर पुष्प समर्पण करना चाहिये । स्तोत्र पढ़ना चाहिये —

नारायणि महामाये विष्णुमाये सनातनि ॥
प्राणाधिदेवि कृष्णस्य मामुद्धर भवार्णवात् ।
संसारसागरे घोरे भीतं मां शरणागतम् ॥
प्रपन्नं पतितं मातर्मामुद्धर हरिप्रिये ।
असंख्ययोनिभ्रमणादज्ञानान्धतमोऽन्वितम् ॥
ज्वलभिर्ज्ञानदीपैश्च मां सुवर्म प्रदर्शय ।
सर्वेभ्योऽपि विनिर्मुक्तं कुरु राधे सुरेश्वरि ॥
मां भक्तमनुरक्तं च कातरं यमताडनात् ।
त्वत्पादपद्मयुगले पाद्मपद्मालयार्चिते ॥
देहि मह्यं परां भक्तिं कृष्णेन परिसेविते ।
स्निग्धदूर्वाङ्करैः शुक्लपुष्पैः कुसुमचन्दनैः ॥

(नारदपंचरात्र २।४। १५-२०)
‘हे नारायणि ! विष्णुमाये ! महामाये ! सनातनi ! श्रीकृष्ण के लिये प्राण से भी अधिक प्रिय देवि ! संसारसागर से मेरा उद्धार कीजिये । मैं इस बोर संसारसागर तट में पतित होकर भयभीत हो गया हूँ मैं शरणागत हूँ । हे माँ ! श्रीकृष्ण की प्राण प्रियतमे ! आप मेरा उद्धार कीजिये । असंख्य योनियों में जन्म लेकर भ्रमण करते करते अज्ञान-अन्धकार से मैं युक्त हूँ । आप देदीप्यमान नदी के आलोक में मेरा पथ-प्रदर्शन कीजिये । मैं यम की ताड़ना से दुखी हूँ । मैं आपका भक्त हूँ । आपके चरणकमल में अनुरक्त हूँ । मुझे सारे विघ्नों से मुक्त कर दीजिये । ब्रह्माजी तथा लक्ष्मीजी (आदि उपासक) आपके चरणकमलों की अर्चना करते हैं । कोमल दूर्वादल और श्वेतपुष्य तथा चन्दन आदि से स्वयं श्रीकृष्ण भी आपकी पूजा करते हैं, आप अपने चरणों में मुझे परा-उत्तम भक्ति प्रदान कीजिये ।’

॥ पुष्पांजलि-प्रणाम ॥

यथोपलब्ध सामग्री से षोडशोपचार पूजन करना चाहिये । इसके बाद तीन पुष्पांजलि समर्पित करनी चाहिये । तत्पश्चात् दासीवर्ग — मालती, माधवी, रत्नमालावती, चम्पावती, मधुमती, सुशीला, वनमालिका, चन्द्रावली, चन्द्रमुखी, पद्मा, पद्ममुखी, कमला, कालिका, कृष्णप्रिया, विद्याधरी तथा वटुवर्ग — सानन्द, परमानन्द, सुमित्र, सन्तनु आदि की यथाक्रम पाद्यादि उपचारोंसे पूजाकर प्रणाम करना चाहिये ।
इसके बाद षडक्षरी महाविद्या मन्त्र — ‘रां ओं आं यं स्वाहा ।’ का जप करना चाहिये । जप पूर्ण कर लेने के बाद स्तोत्र और राधा-कवच का पाठ करना चाहिये ।

॥ स्तोत्र ॥
राधा रासेश्वरी रम्या रामा च परमात्मनः ॥
रासोद्भवा कृष्णकान्ता कृष्णवक्षःस्थलस्थिता ।
कृष्णप्राणाधिदेवी च महाविष्णोः प्रसूरपि ।
सर्वाद्या विष्णुमाया च सत्या नित्या सनातनी ।
ब्रह्मस्वरूपा परमा निर्लिप्ता निर्गुणा परा ॥
वृन्दा वृन्दावने सा च विरजातटवासिनी ।
गोलोकवासिनी गोपी गोपीशा गोपमातृका ॥
सानन्दा परमानन्दा नन्दनन्दनकामिनी ।
वृषभानुसुता शान्ता कान्ता पूर्णतमा च सा ॥
काम्या कलावती कन्या तीर्थपूता सती शुभा ।

(नारदपंचरात्र २।४। ४८-५३)

श्रीराधा के इन सैंतीस नामों से युक्त स्तोत्र का पाठ करने वाला इस लोक में अचल लक्ष्मी और परलोक में हरि के चरणों में भक्ति प्राप्त करता है ।

॥ कवच ॥
स्तोत्र पाठ के पश्चात् कवच का पाठ करना चाहिये । यह राधा-कवच है । इसका दूसरा नाम ‘परमानन्दसन्दोह’ कवच है । भगवान् श्रीकृष्ण ने इस ‘परमानन्दसन्दोह’ कवच को रत्नपुट में रखकर कण्ठ में धारण किया है । ये नित्य षडक्षरी महाविद्या मन्त्र का जप करते हैं । इस कवच के ऋषि नारायण हैं, श्रीकृष्ण की दास्यभक्ति में इसका विनियोग होता है —  अथ श्रीराधा भक्तिज्ञान कवचम्

सर्वाद्या में शिरः पातु केशं केशवकामिनी ।
भालं भगवती पातु लोला लोचनयुग्मकम् ॥
नासां नारायणी पातु सानन्दा चाधरोष्ठकम् ।
जिह्वां पातु जगन्माता दन्तं दामोदरप्रिया ॥
कपोलयुग्मं कृष्णेशा कण्ठं कृष्णप्रियाऽवतु ।
कर्णयुग्मं सदा पातु कालिन्दीकूलवासिनी ॥
वसुन्धरेशा वक्षो मे परमा सा पयोधरम् ।
पद्मनाभप्रिया नाभिं जठरं जाह्नवीश्वरी ॥
नित्या नितम्बयुग्मं मे कङ्कालं कृष्णसेविता ।
परात्परा पातु पृष्ठं सुश्रोणी श्रोणिकायुगम् ॥
परमाद्या पादयुग्मं नखरांश्च नरोत्तमा ।
सर्वाङ्गं मे सदा पातु सर्वेशा सर्वमङ्गला ॥
पातु रासेश्वरी राधा स्वप्ने जागरणे च माम् ।
जले स्थले चान्तरिक्षे सेविता जलशायिनी ॥
प्राच्यां मे सततं पातु परिपूर्णतमप्रिया ।
वह्नीश्वरी वह्निकोणे दक्षिणे दुःखनाशिनी ॥
नैऋत्ये सततं पातु नरकार्णवतारिणी ।
वारुणे वनमालीशा वायव्यां वायुपूजिता ॥
कौबेरे मां सदा पातु कूर्मेण परिसेविता ।
ईशान्यामीश्वरी पातु शतशृङ्गनिवासिनी ॥
वने वनचरी पातु वृन्दावनविनोदिनी ।
सर्वत्र सततं पातु सर्वेशा विरजेश्वरी ॥
प्रथमे पूजिता या च कृष्णेन परमात्मना ।
षडक्षर्या विद्यया च सा मां रक्षतु कातरम् ॥

(नारदपंचरात्र २ । ५। २४-३५)

षडक्षरी विद्या की उपासना सिद्धिप्रदा और अमोघफलदा है । इसके द्वारा भगवती श्रीराधा का पुण्यचिन्तन होता है ।
त्रैलोक्यपावनीं राधां सन्तोऽसेवन्त नित्यशः ।
यत्पादपद्ये भक्त्यार्थ्यं नित्यं कृष्णो ददाति च ॥

(नारदपंचरात्र २।६। ११)
‘श्रीराधा के चिन्तन से तीनों लोक पावन होते हैं । श्रीकृष्ण भक्तिपूर्वक उनके चरण-कमल में अर्घ्य समर्पित करते हैं । संत उनका निर्मल मन से नित्यप्रति भजन करते हैं ।’

 

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