June 4, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 015 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ पंद्रहवाँ अध्याय यदुकुल का संहार और पाण्डवों का स्वर्गगमन पाण्डवस्वर्गरोहणवर्णनम् अग्निदेव कहते हैं — ब्रह्मन् ! जब युधिष्ठिर राजसिंहासन पर विराजमान हो गये, तब धृतराष्ट्र गृहस्थ आश्रम से वानप्रस्थ आश्रम में प्रविष्ट हो वन में चले गये। [अथवा ऋषियों के एक आश्रम से दूसरे आश्रमों में होते हुए वे वन को गये।] उनके साथ देवी गान्धारी और पृथा (कुन्ती) भी थीं। विदुरजी दावानल से दग्ध हो स्वर्ग सिधारे। इस प्रकार भगवान् विष्णु ने पृथ्वी का भार उतारा और धर्म की स्थापना तथा अधर्म का नाश करने के लिये पाण्डवों को निमित्त बनाकर दानव-दैत्य आदि का संहार किया। तत्पश्चात् भूमि का भार बढ़ाने वाले यादवकुल का भी ब्राह्मणों के शाप के बहाने मूसल के द्वारा संहार कर डाला। अनिरुद्ध के पुत्र वज्र को राजा के पद पर अभिषिक्त किया। तदनन्तर देवताओं के अनुरोध से प्रभासक्षेत्र में श्रीहरि स्वयं ही स्थूल शरीर की लीला का संवरण करके अपने धाम को पधारे ॥ १-४ ॥’ वे इन्द्रलोक और ब्रह्मलोक में स्वर्गवासी देवताओं द्वारा पूजित होते हैं। बलभद्रजी शेषनाग के स्वरूप थे; अतः उन्होंने पातालरूपी स्वर्ग का आश्रय लिया। अविनाशी भगवान् श्रीहरि ध्यानी पुरुषों के ध्येय हैं। उनके अन्तर्धान हो जाने पर समुद्र ने उनके निजी निवासस्थान को छोड़कर शेष द्वारकापुरी को अपने जल में डुबा दिया । अर्जुन ने मरे हुए यादवों का दाह-संस्कार करके उनके लिये जलाञ्जलि दी और धन आदि का दान किया। भगवान् श्रीकृष्ण की रानियों को, जो पहले अप्सराएँ थीं और अष्टावक्र के शाप से मानवीरूप में प्रकट हुई थीं, लेकर हस्तिनापुर को चले। मार्ग में डंडे लिये हुए ग्वालों ने अर्जुन का तिरस्कार करके उन सबको छीन लिया। यह भी अष्टावक्र के शाप से ही सम्भव हुआ था। इससे अर्जुन के मन में बड़ा शोक हुआ ॥ ५-८ ॥ फिर महर्षि व्यास के सान्त्वना देने पर उन्हें यह निश्चय हुआ कि ‘भगवान् श्रीकृष्ण के समीप रहने से ही मुझमें बल था।’ हस्तिनापुर में आकर उन्होंने भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिर से, जो उस समय प्रजावर्ग का पालन करते थे, यह सब समाचार निवेदन किया। वे बोले — ‘भैया! वही धनुष है, वे ही बाण हैं, वही रथ है और वे ही घोड़े हैं; किंतु भगवान् श्रीकृष्ण के बिना सब कुछ उसी प्रकार नष्ट हो गया, जैसे अश्रोत्रिय को दिया हुआ दान।’ यह सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने राज्य पर परीक्षित् को स्थापित कर दिया ॥ ९-११ ॥ इसके बाद बुद्धिमान् राजा संसार की अनित्यता का विचार करके द्रौपदी तथा भाइयों को साथ ले महाप्रस्थान के पथ पर अग्रसर हुए। मार्ग में वे श्रीहरि के अष्टोत्तरशत नामों का जप करते हुए यात्रा करते थे। उस महापथ में क्रमशः द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीमसेन एक-एक करके गिर पड़े। इससे राजा शोकमग्न हो गये। तदनन्तर वे इन्द्र के द्वारा लाये हुए रथ पर आरूढ़ हो [दिव्यरूपधारी ] भाइयोंसहित स्वर्ग को चले गये। वहाँ उन्होंने दुर्योधन आदि सभी धृतराष्ट्रपुत्रों को देखा। तदनन्तर [उन पर कृपा करने के लिये अपने धाम से पधारे हुए] भगवान् वासुदेव का भी दर्शन किया। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। यह मैंने तुम्हें महाभारत का प्रसङ्ग सुनाया है जो इसका पाठ करेगा, वह स्वर्गलोक में सम्मानित होगा ॥ १२-१४ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘आश्रमवासिक पर्व से लेकर स्वर्गारोहण पर्यन्त महाभारत-कथा का संक्षिप्त वर्णन’ नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe