July 19, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 340 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ चालीसवाँ अध्याय रीति-निरूपण रीतिनिरूपणम् अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ! अब मैं ‘वाग्विद्या’ (काव्यशास्त्र) के सम्यक् परिज्ञान के लिये ‘रीति’ का वर्णन करता हूँ। उसके भी चार भेद होते हैं — पाञ्चाली, गौडी, वैदर्भी तथा लाटी। इनमें ‘पाञ्चाली रीति’ उपचारयुक्त, कोमल एवं लघु-समासों से समन्वित होती है। ‘गौडी रीति में संदर्भ की अधिकता और लंबे-लंबे समासों की बहुलता होती है। वह अधिक उपचारों से युक्त नहीं होती। ‘वैदर्भी रीति’ उपचाररहित, सामान्यतः कोमल संदर्भो से युक्त एवं समासवर्जित होती है। ‘लाटी रीति’ संदर्भ की स्पष्टता से युक्त होती है, किंतु उसमें समास अत्यन्त स्पष्ट नहीं होते। वह यद्यपि अनेक विद्वानों द्वारा परित्यक्त है, तथापि अतिबहुल उपचारयुक्त लाटी रीति की रचना उपलब्ध होती है ॥ १-४ ॥’ (अब वृत्तियों का वर्णन किया जाता है —) जो क्रियाओं में विषमता को प्राप्त नहीं होती, वह वाक्यरचना ‘वृत्ति’ कही गयी है। उसके चार भेद हैं — भारती, आरभटी, कैशिकी एवं सात्वती । ‘भारती वृत्ति’ वाचिक अभिनय की प्रधानता से युक्त होती है। यह प्रायः (नट) पुरुष के आश्रित होती है, किंतु कभी-कभी स्त्री (नटी) के आश्रित होने पर यह प्राकृत उक्तियों से संयुक्त होती है। भरत के द्वारा प्रयुक्त होने के कारण इसे ‘भारती’ कहा जाता है। भारती के चार अङ्ग माने गये हैं — वीथी, प्रहसन, आमुख एवं नाटकादि की प्ररोचना। वीथी के तेरह अङ्ग होते हैं — उद्धातक, लपित, असत्प्रलाप, वाक्श्रेणी, नालिका, विपण, व्याहार, त्रिगत, छल, अवस्यन्दित, गण्ड, मृदव एवं उचित। तापस आदिके परिहासयुक्त वचन को ‘प्रहसन’ कहते हैं। ‘आरभटी वृत्ति ‘में माया, इन्द्रजाल और युद्ध आदि की बहुलता मानी गयी है। आरभटी वृत्ति के भेद निम्नलिखित हैं — संक्षिप्तकार, पात तथा वस्तूत्थापन [^1] ॥ ५-११ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘रीतिनिरूपण’ नामक तीन सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४० ॥ [^1]: अग्निपुराण में काव्यशास्त्र के सम्यक् ज्ञान के लिये रीतिज्ञान आवश्यक बतलाया है; इसी का सहारा लेकर आचार्य वामन ने ‘रीतिरात्मा काव्यस्य ।’ – इस सूत्र के द्वारा रीति को ‘काव्य का आत्मा’ कहा है और विशिष्ट पद-रचना का नाम ‘रीति’ दिया है। अग्निपुराण में रीति के चार भेद उपलब्ध होते हैं — पाञ्चाली, गौड़ी, वैदर्भी और लाटी और इन चारों के पृथक्-पृथक् लक्षण भी दिये हैं। यद्यपि वामन ने इन चार भेदों में से ‘लाटी’ को ग्रहण नहीं किया है, तथापि परवर्ती आलोचकों ने लाटी पर भी विचार किया है । वामन ने ‘पाञ्चाली ‘ का लक्षण किया है — ‘माधुर्यसौकुमार्योपपन्ना पाञ्चाली।’ अर्थात् ‘माधुर्य तथा सौकुमार्य गुण से सम्पन्न रचना ‘पाञ्चाली रीति’ है ।’ अग्निपुराण में ‘उपचारयुता मृद्वी पाञ्चाली ह्रस्वविग्रहा । ‘ – यों कहकर छोटे समासवाली मृदु रचना को ‘पाञ्चाली’ बताया गया है। इसकी मृदुता को ही वामन ने ‘माधुर्य’ नाम से व्यक्त किया है। छोटे समास वाली रचना में कर्कशता का अभाव होता है, अतः वह ‘सुकुमार’ मानी गयी है। इसी गुण का वामन ने ‘सौकुमार्य’ शब्द से बोध कराया है। व्यासजी ने लंबे समासवाली रचना को ‘गौड़ीया’ कहा है; उसी को शब्दान्तर से वामन ने ‘ओजः कान्तिमती’ कहकर व्यक्त किया है । दीर्घसमास वाली रचना में ही ‘ओज’ और ‘कान्ति’ नामक गुण प्रकट होते हैं । जो समास से शून्य तथा कोमल संदर्भ वाली रचना होती है, उसको ‘वैदर्भी’ कहा गया है । वैदर्भी के इसी लक्षण को वामन ने ‘समग्रगुणोपेता’ कहकर व्यक्त किया है। उनकी राय में वैदर्भी रीति सम्पूर्ण दोषों से रहित और समग्र गुणों से गुम्फित होती है। यथा — अस्पृष्टा दोषमात्राभिः समग्रगुणगुम्फिता । विपञ्चीस्वरसौभाग्या वैदर्भ रीतिरिष्यते ॥ भरतमुनि ने वृत्तियों की उत्पत्ति भगवान् नारायण से बतायी है और उनके चार भेद किये हैं — ‘भारती’, ‘सात्वती’, ‘कैशिकी’ तथा ‘आरभटी’। ‘भारती’ का प्राकट्य ऋग्वेद से, ‘सात्वती’ का यजुर्वेद से, ‘कैशिकी’ का सामवेद से और ‘आरभटी’ का अथर्ववेद से आविर्भाव माना है। जो प्रधान वाणी पुरुष द्वारा प्रयोग में लायी जाने वाली, स्त्रीरहित, संस्कृत वाक्यों से युक्त तथा भरतमुनि के शिष्यों से प्रयुक्त है, वह ‘भारती’ नामवाली वृत्ति है; उसके चार अङ्ग हैं — प्ररोचना, आमुख, वीथी और प्रहसन (द्रष्टव्यः – नाट्यशास्त्रका बीसवाँ अध्याय) । अग्निपुराण वृत्तिविचार भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र पर ही आधारित तथा अत्यन्त संक्षिप्त है। Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe