December 14, 2025 | aspundir | Leave a comment गणपतिस्तोत्रं श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितम् परिवार में पारस्परिक प्रेम-प्राप्ति के लिये ॥ गणपति स्तोत्रम् ॥ सुवर्णवर्णसुन्दरं सितैकदन्तबन्धुरं गृहीतपाशकाङ्कुशं वरप्रदाभयप्रदम् । चतुर्भुजं त्रिलोचनं भुजङ्गमोपवीतिनं प्रफुल्लवारिजासनं भजामि सिन्धुराननम् ॥ किरीटहारकुण्डलं प्रदीप्तबाहुभूषणं प्रचण्डरत्नकङ्कणं प्रशोभिताङ्घ्रियष्टिकम् । प्रभातसूर्यसुन्दराम्बरद्वयप्रधारिणं सरत्नहेमनूपुरप्रशोभिताङ्घ्रिपङ्कजम् ॥ सुवर्णदण्डमण्डितप्रचण्डचारुचामरं गृहप्रदेन्दुसुन्दरं युगक्षणप्रमोदितम् । कवीन्द्रचित्तरञ्जकं महाविपत्तिभञ्जकं षडक्षरस्वरूपिणं भजे गजेन्द्ररूपिणम् ॥ विरिञ्चिविष्णुवन्दितं विरूपलोचनस्तुतं गिरीशदर्शनेच्छया समर्पितं पराम्बया । निरन्तरं सुरासुरैः सपुत्रवामलोचनैः महामखेष्टकर्मसु स्मृतं भजामि तुन्दिलम् ॥ मदौघलुब्धचञ्चलालिमञ्जुगुञ्जितारवं प्रबुद्धचित्तरञ्जकं प्रमोदकर्णचालकम् । अनन्यभक्तिमानवं प्रचण्डमुक्तिदायकं नमामि नित्यमादरेण वक्रतुण्डनायकम् ॥ दारिद्र्यविद्रावणमाशु कामदं स्तोत्रं पठेदेतदजस्त्रमादरात् । पुत्री कलत्रस्वजनेषु मैत्री पुमान् भवेदेकवरप्रसादात् ॥ ॥ इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं गणपतिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ जो सुवर्ण के समान गौरवर्ण से सुन्दर प्रतीत होते हैं; एक ही श्वेत दन्त के द्वारा मनोहर जान पड़ते हैं; जिन्होंने हाथों में पाश और अंकुश ले रखे हैं; जो वर तथा अभय प्रदान करने वाले हैं; जिनके चार भुजाएँ और तीन नेत्र हैं; जो सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करते हैं और प्रफुल्ल कमल के आसन पर बैठते हैं, उन गजानन का मैं भजन करता हूँ। जो किरीट, हार और कुण्डल के साथ उद्दीप्त बाहुभूषण धारण करते हैं; चमकीले रत्नों का कंगन पहनते हैं; जिनके दण्डोपम चरण अत्यन्त शोभाशाली हैं जो प्रभातकाल के सूर्य के समान सुन्दर और लाल दो वस्त्र धारण करते हैं तथा जिनके युगल चरणारविन्द रत्नजटित सुवर्णनिर्मित नुपूरों से सुशोभित हैं, उन गणेशजी का मैं भजन करता हूँ। जिनका विशाल एवं मनोहर चँवर सुवर्णमय दण्ड से मण्डित है; जो सकाम भक्तों को गृह-सुख प्रदान करने वाले एवं चन्द्रमा के समान सुन्दर हैं; युगों में क्षण का आनन्द लेने वाले हैं; जिनसे कवीश्वरों के चित्त का रंजन होता है; जो बड़ी-बड़ी विपत्तियों का भंजन करने वाले और षडक्षर मन्त्रस्वरूप हैं, उन गजराजरूपधारी गणेश का मैं भजन करता हूँ। ब्रह्मा और विष्णु जिनकी वन्दना तथा विरूपलोचन शिव जिनकी स्तुति करते हैं; जो गिरीश (शिव) – के दर्शन की इच्छा से परा अम्बा पार्वती द्वारा समर्पित हैं; देवता और असुर अपने पुत्रों और वामलोचना पत्नियों के साथ बड़े-बड़े यज्ञों तथा अभीष्ट कर्मों में निरन्तर जिनका स्मरण करते हैं; उन तुन्दिल देवता गणेश का मैं भजन करता हूँ। जिनकी मदराशि पर लुभाये हुए चंचल भ्रमर मंजु गुंजारव करते रहते हैं; जो ज्ञानीजनों के चित्त को आनन्द प्रदान करने वाले हैं; अपने कानों को सानन्द हिलाया करते हैं और अनन्यभक्ति रखने वाले मनुष्यों को उत्कृष्ट मुक्ति देने वाले हैं, उन वक्रतुण्ड गणनायक का मैं प्रतिदिन आदरपूर्वक भजन करता हूँ। यह स्तोत्र दरिद्रता को शीघ्र भगाने वाला और अभीष्ट वस्तु को देने वाला है। जो निरन्तर आदरपूर्वक इसका पाठ करेगा, वह मनुष्य एकेश्वर गणेश की कृपा से पुत्रवान् तथा स्त्री एवं स्वजनों के प्रति मित्रभाव से युक्त होगा । ॥ इस प्रकार श्रीशंकराचार्यद्वारा विरचित ‘गणपतिस्तोत्र’ पूरा हुआ ॥ Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe