October 6, 2015 | aspundir | 3 Comments बगलामुखी अष्ट त्रिंशदक्षर मंत्र – || ॐ ह्ल्रीं (ह्लीं) बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं गतिं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्ल्रीं (ह्लीं) ॐ स्वाहा || बगलामुखी त्रि-चत्वारिंशदक्षर मंत्र – || ह्लीं हूं ग्लौं बगलामुखि वाचं मुखं पदं ग्रस ग्रस खाहि खाहि भक्ष भक्ष शोणितं पिब पिब बगलामुखि ह्लीं ग्लौं हुं फट् || (सांख्यायन-तंत्र) इस मंत्र में अमुक का उल्लेख नहीं है, अतः ‘श्रीबगला-कल्प-तरु’ का नीचे दिया गया मंत्र जपना श्रेयष्कर है । बगलामुखी पञ्च-चत्वारिंशदक्षर मंत्र – || ह्लीं हूं ग्लौं बगलामुखि मम शत्रून् वाचं मुखं ग्रस ग्रस खाहि खाहि भक्ष भक्ष शोणितं पिब पिब बगलामुखि ह्लीं ग्लौं हुं फट् || (श्रीबगला-कल्प-तरु) बगलामुखी सप्त-चत्वारिंशदक्षर मंत्र – Content is available only for registered users. Please login or register इसके प्रयोग अमोघ हैं । इससे प्रेतादिक उपद्रव दूर होते हैं, बंद होने वाले व्यापार पुनः चालू व स्थिर वृद्धि प्राप्त करते हैं । शत्रु-नाश व अर्थ-प्राप्ति दोनों ही फल हैं । दुर्गा-सप्तशती के सम्पुट पाठ से अधिक फल प्राप्ति होती है । विशेष बाधा में शत-चण्डी प्रयोग करना चाहिये । विनियोगः- ॐ अस्य श्रीबगलामुखी मंत्रस्य भैरव ऋषिः, विराट् छन्दः, श्रीबगलामुखी देवता, क्लीं बीजं, सौः शक्तिः, ऐं कीलकं अमुक रोग शांति, अभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः । ऋष्यादि-न्यासः- भैरव ऋषये नमः शिरसि, विराट् छन्दसे नमः मुखे, श्रीबगलामुखी देवतायै नमः हृदि, क्लीं बीजाय नमः गुह्ये, सौः शक्तये नमः पादयो, ऐं कीलकाय नमः नाभौ अमुक रोग शांति, अभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे । षडङ्ग-न्यास कर-न्यास अंग-न्यास ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः श्रीबगलामुखि तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा मम रिपून् नाशय नाशय मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वषट् ममैश्वर्याणि देहि देहि अनामिकाभ्यां नमः कवचाय हुं शीघ्रं मनोवाञ्छितं कनिष्ठिकाभ्यां नमः नेत्र-त्रयाय वौषट् कार्यं साधय साधय ह्रीं स्वाहा करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः अस्त्राय फट् ध्यानः- हाथ में पीले फूल, पीले अक्षत और जल लेकर ‘ध्यान’ करे – सौवर्णासन संस्थिता त्रिनयनां पीतांशुकोल्लासिनीम्, हेमाभांगरुचिं शशांक मुकुटां सच्चम्पक स्रग्युताम् । हस्तैर्मुद्गर पाश वज्र रसनाः संबिभ्रतीं भूषणै र्व्याप्तांगीं, बगलामुखीं त्रिजगतां संस्तम्भिनीं चिंतयेत् ।। गंभीरा च मदोन्मत्तां तप्त-काञ्चन-सन्निभां, चतुर्भुजां त्रिनयनां कमलासन संस्थिताम् । मुद्गरं दक्षिणे पाशं वामे जिह्वां च वज्रकं, पीताम्बरधरां सान्द्र-वृत्त पीन-पयोधराम् ।। हेमकुण्डलभूषां च पीत चन्द्रार्द्ध शेखरां, पीतभूषणभूषां च स्वर्ण-सिंहासने स्थिताम् ।। Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe ← Previous page Next page →
BAGLAMUKHI GAYTRI KA PURA MANTRA SAHIT PUJA VIDHI CHAHIYE NYAS SAHIT OR BGLAMUKHI MARNTUJAY BHERAV DHYAN SAHIT MANTRA Reply
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