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ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – २२
चतुर्थी-व्रत एवं गणेशजी की कथा तथा सामुद्रिक शास्त्र का परिचय


सुमन्तु मुनि ने कहा –
राजन् ! तृतीया-कल्प का वर्णन करने के अनन्तर अब मैं चतुर्थी-कल्प का वर्णन करता हूँ । चतुर्थी-तिथि में सदा निराहार रहकर व्रत करना चाहिये । ब्राह्मण को तिल का दान देकर स्वयं भी तिल का भोजन करना चाहिये । इस प्रकार व्रत करते हुए दो वर्ष व्यतीत होने पर भगवान् विनायक प्रसन्न होकर व्रती को अभीष्ट फल प्रदान करते हैं । उसका भाग्योदय हो जाता है और वह अपार धन-सम्पत्ति का स्वामी हो जाता है तथा परलोक में भी अपने पुण्य-फलों का उपभोग करता है । पुण्य समाप्त होने के पश्चात् इस लोक में पुनः आकर वह दीर्घायु, कान्तिमान्, बुद्धिमान्, धृतिमान,धैर्यवान्, तुष्ट, तृप्त वक्ता, भाग्यवान्, अभीष्ट कार्यों तथा असाध्य-कार्यों को भी क्षण-भर में ही सिद्ध कर लेने वाला और हाथी, घोड़े, रथ, पत्नी-पुत्र से युक्त हो सात जन्मों तक राजा होता हैं ।om, ॐ

राजा शतानीक ने पूछा – मुने ! गणेशजी ने किसके लिये विघ्न उत्पन्न किया था, जिसके कारण उन्हें विघ्नविनायक कहा गया । आप विघ्नेश तथा उनके द्वारा विघ्न उत्पन्न करने के कारण को मुझे बताने का कष्ट करें ।

सुमन्तु मुनि बोले – राजन् ! एक बार अपने लक्षण-शास्त्र के अनुसार स्वामि-कार्तिकेय ने पुरुषों और स्त्रियों के श्रेष्ठ लक्षणों की रचना की, उस समय गणेशजी ने विघ्न किया । इसपर कार्तिकेय क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने गणेश का एक दाँत उखाड़ लिया और उन्हें मारने के लिये उद्धत हो उठे । उस समय भगवान शङ्कर ने उनको रोककर पूछा कि तुम्हारे क्रोध का क्या कारण हैं ?

कार्तिकेय ने कहा – पिताजी ! मैं पुरुषों के लक्षण बनाकर स्त्रियों के लक्षण बना रहा था, उसमे इसने विघ्न किया, जिससे स्त्रियों के लक्षण मैं नहीं बना सका । इस कारण मुझे क्रोध हो आया । यह सुनकर महादेव जी ने कार्तिकेय के क्रोध को शांत किया और हँसते हुए उन्होंने पूछा ।

शङ्कर बोले – पुत्र ! तुम पुरुष के लक्षण जानते हो तो बताओ, मुझमें पुरुष के कौन-से लक्षण हैं ?

कार्तिकेय ने कहा – महाराज ! आप में ऐसा लक्षण हैं कि संसार में आप ‘कपाली’कपाल या ठीकरा लेकर भीख माँगने वाला भिक्षुक के नाम से प्रसिद्ध होंगे । पुत्र का यह वचन सुनकर महादेवजी को क्रोध हो आया और उन्होंने उनके उस लक्षण-ग्रन्थ को उठाकर समुद्र में फेंक दिया और स्वयं अन्तर्धान हो गये ।

बाद में शिवजी ने समुद्र को बुलाकर कहा कि तुम स्त्रियों के आभूषण-स्वरुप विलक्षण लक्षणों की रचना करो और कार्तिकेय ने जो पुरुष-लक्षण के विषय में कहा है उसको कहो ।

समुद्र ने कहा – जो मेरे द्वारा पुरुष-लक्षण का शास्त्र कहा जायगा, वह मेरे ही नाम ‘सामुद्रिक शास्त्र’ से प्रसिद्ध होगा । स्वामिन् ! आपने जो आज्ञा मुझे दी हैं, वह निश्चित ही पूरी होगी ।

शङ्करजी ने पुनः कहा – कार्तिकेय ! इस समय तुमने जो गणेश का दाँत उखाड़ लिया है उसे दे दो । निश्चय ही जो कुछ यह हुआ है, होना ही था । दैवयोग से यह गणेश के बिना सम्भव नहीं था, इसलिये उनके द्वारा यह विघ्न उपस्थित किया गया । यदि तुम्हें लक्षण की अपेक्षा हो तो समुद्र से ग्रहण कर लो, किंतु स्त्री-पुरुषों का यह श्रेष्ठ लक्षण-शास्त्र ‘सामुद्र-शास्त्र’ इस नाम से ही प्रसिद्ध होगा । गणेश को तुम दाँत-युक्त कर दो ।

कार्तिकेय ने भगवान् देवदेवेश्वर से कहा – आपके कहने से मैं दाँत तो विनायक के हाथ में दे देता हूँ, किंतु इन्हें इस दाँत को सदैव धारण करना पड़ेगा । यदि इस दाँत को फेंककर ये इधर-उधर घूमेंगे तो यह फेंका गया दाँत इन्हें भस्म कर देगा । ऐसा कहकर कार्तिकेय ने उनके हाथ में दाँत दे दिया । भगवान् देवदेवेश्वर ने गणेश को कार्तिकेय की इस बात को मानने के लिये सहमत कर लिया ।

सुमन्तु मुनि ने कहा – राजन् ! आज भी भगवान् शंकर के पुत्र विघ्नकर्ता महात्मा विनायक की प्रतिमा हाथ में दाँत लिये देखी जा सकती हैं । देवताओं की यह रहस्यपूर्ण बात मैंने आपसे कहीं । इसको देवता भी नहीं जान पाये थे । पृथ्वी पर इस रहस्य को जानना तो दुर्लभ ही है । प्रसन्न होकर मैंने इस रहस्य को आपसे तो कह दिया है, किंतु गणेश की यह अमृत-कथा चतुर्थी तिथि के संयोग पर ही कहनी चाहिये । जो विद्वान् हो, उसे चाहिये कि वह इस कथा को वेदपारङ्गत श्रेष्ठ द्विजों, अपनी क्षत्रियोचित वृत्ति में लगे हुये क्षत्रियों, वैश्यों और गुणवान् शूद्रों को सुनाये । जो इस चतुर्थी व्रत का पालन करता हैं, उसके लिये इस लोक तथा परलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता । उसकी दुर्गति नहीं होती और न कही वह पराजित होता है । भरतश्रेष्ठ ! निर्विघ्न-रूपसे वह सभी कार्यों को सम्पन्न कर लेता हैं, इसमें संदेह नहीं है । उसे ऋद्धि-वृद्धि-ऐश्वर्य भी प्राप्त हो जाता है ।
(अध्याय २२)

See Also :-

1. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १-२

2. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय 3

3. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४

4. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५

5. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६

6. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७

7. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८-९

8. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १०-१५

9. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १६

10. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १७

11. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १८

12. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १९

13. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २०

14. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१

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