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भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ३१
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नम:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(ब्राह्मपर्व)
अध्याय – ३१
चतुर्थी – कल्प में शिवा, शान्ता तथा सुखा – तीन प्रकार की चतुर्थी का फल और उनका व्रत-विधान

सुमन्तु मुनिने कहा – राजन् ! चतुर्थी तिथि तीन प्रकार की होती है – शिवा, शान्ता और सुखा । अब मैं इनका लक्षण कहता हूँ, उसे सुने –

भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी का नाम ‘शिवा’ हैं, इस दिन जो स्नान, दान उपवास, जप आदि सत्कर्म किया जाता हैं, वह गणपति के प्रसाद से सौ गुना हो जाता हैं । इस चतुर्थी को गुड़, लवण और घृत का दान करना चाहिये, यह शुभकर माना गया है और गुड़ के अपूपों (मालपुआ) -से ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये तथा उनकी पूजा करनी चाहिये । इस दिन जो स्त्री अपने सास और ससुर को गुड़ के पुए तथा नमकीन पुए खिलाती है वह गणपति के अनुग्रह से सौभाग्यवती होती है । पति की कामना करनेवाली कन्या विशेषरूप से इस चतुर्थी का व्रत करे और गणेशजी की पूजा करे । राजन् ! यह ‘शिवा – चतुर्थी’ का विधान है ।om, ॐ

माघ मास की शुक्ल चतुर्थी को ‘शान्ता’ कहते हैं । यह शान्ता तिथि नित्य शान्ति प्रदान करने के कारण ‘शान्ता’ कही गयी है । इस दिन किये हुए स्नान – दानादि सत्कर्म गणेशजी की कृपा से हजार गुना फलदायक हो जाते है । इस ‘शान्ता’ नामक चतुर्थी तिथि को उपवास कर गणेशजी का पूजन तथा हवन करे और लवण, गुड़, शाक तथा गुड़ के पुए ब्राह्मणों को दान में दे । विशेषरूप से स्त्रियाँ अपने ससुर आदि पूज्य-जनों का पूजन करें एवं उन्हें भोजन करायें । इस व्रत के करने से अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होती है, समस्त विघ्न दूर होते हैं और गणेशजी की कृपा प्राप्त होती है ।

किसी भी महीने के भौमवार युक्त शुक्ला चतुर्थी को ‘सुखा’ कहते हैं । यह व्रत स्त्रियों को सौभाग्य, उत्तम रूप और सुख देनेवाला है । भगवान शङ्कर एवं माता पार्वती के संयुक्त तेज से भूमि द्वारा रक्तवर्ण के “मङ्गल” की उत्पत्ति हुई । भूमि का पुत्र होने से वह ‘भौम’ कहलाया और कुज, रक्त, वीर, अङ्गारक आदि नामों से प्रसिद्ध हुआ । वह शरीर के अङ्गों की रक्षा करनेवाला तथा सौभाग्य आदि देनेवाला हैं, इसलिए ‘अङ्गारक’ कहलाया । जो पुरुष अथवा स्त्री भौमवार युक्त शुक्ला चतुर्थी को उपवास करके भक्तिपूर्वक प्रथम गणेशजी का तदनन्तर रक्त-चन्दन, रक्त-पुष्प आदि से भौम का पूजन करते हैं, उन्हें सौभाग्य और उत्तम रूप-सम्पत्ति की प्राप्ति होती हैं ।
प्रथम संकल्प कर स्नान करे, अनन्तर गणेश-स्मरणपूर्वक हाथ में शुद्ध मृत्तिका लेकर इस मन्त्र को पढ़े –

“इह त्वं वन्दिता पूर्वं कृष्णेनोद्धरता किल ।
तस्मान्मे दह पाप्मानं यन्मया पूर्वसंचितम् ॥” (ब्राह्मपर्व ३१ । २४)

इसके बाद मृत्तिका को गङ्गाजल से मिश्रित कर सूर्य के सामने करे, तदनन्तर अपने सिर आदि अङ्गों में लगाये और फिर जल के मध्य खड़ा होकर इस मन्त्र को पढकर नमस्कार करे –

“त्वमापो योनिः सर्वेषां दैत्यदानवद्यौकसाम् ।
स्वेदाण्डजोद्भिदां चैव रसानां पतये नम: ॥” (ब्राह्मपर्व ३१ । २७)

अनन्तर सभी तीर्थों, नदियों, सरोवरों, झरनों और तालाबों में मैंने स्नान किया – इस प्रकार भावना करता हुआ गोते लगाकर स्नान करे, फिर पवित्र होकर घर में आकर दूर्वा, पीपल (अश्वत्थ), शमी (खेजड़ी) तथा गौ का स्पर्श करे । इनके स्पर्श करने के मन्त्र इस प्रकार है –

दूर्वा स्पर्श करने का मन्त्र
“त्वं दूर्वेऽमृतनामासि सर्वदेवैस्तु वन्दिता ॥
वन्दिता दह तत्सर्वं दुरितं यन्मया कृतम् ।” (ब्राह्मपर्व ३१ । ३१-३२)

शमी स्पर्श करने का मन्त्र
“पवित्राणां पवित्रा त्वं काश्यपी प्रथिता श्रुतौ ।
शमी शमय मे पापं नूनं वेत्सि धराधरान् ॥” (ब्राह्मपर्व ३१ । ३३)

पीपल-वृक्ष स्पर्श करने का मन्त्र
“नेत्रस्पन्दादिजं दुःखं दुःखप्नं दुर्विचिन्तनम् ।
शक्तानां च स्मुद्योगमश्वत्थ त्वं क्षमस्व में ॥” (ब्राह्मपर्व ३१ । ३४)

गौ को स्पर्श करने का मन्त्र
“सर्वदेवमयी देवि मुनिभिस्तु सुपूजिता ।
तस्मात् स्पृशामि वन्दे त्वां वन्दिता पापहा भव ॥” (ब्राह्मपर्व ३१ । ३६)

श्रद्धापूर्वक पहले गौ की प्रदक्षिणा कर उपर्युक्त मन्त्र को पढ़े और गौ का स्पर्श करें । जो गौ की प्रदक्षिणा करता हैं, उसे सम्पूर्ण पृथ्वी की प्रदक्षिणा का फल प्राप्त होता है ।

इसप्रकार इनको स्पर्शकर, हाथ-पैर धोकर, आसन पर बैठकर आचमन करें । अनन्तर खदिर (खैर) की समिधाओं से अग्नि प्रज्वलित कर, घृत, दुग्ध, यव, तिल तथा विविध भक्ष्य पदार्थों से मन्त्र पढ़ते हुए हवन करे । आहुति इन मन्त्रों से दे – ॐ शर्वाय स्वाहा, ॐ शर्वपुत्राय स्वाहा, ॐ क्षोण्युत्सङ्गभवाय स्वाहा, ॐ कुजाय स्वाहा, ॐ ललिताङ्गाय स्वाहा तथा ॐ लोहिताङ्गाय स्वाहा । इन प्रत्येक मन्त्रों से १०८ या अपनी शक्ति के अनुसार आहुति दे । अनन्तर सुवर्ण, चाँदी, चन्दन या देवदारु के काष्ठ की मङ्गल की मूर्ति बनाकर ताँबे अथवा चाँदी के पात्र में उसे स्थापित करे । घी, कुंकुम, रक्त-चन्दन रक्त-पुष्प, नैवेद्य आदि से उसकी पूजा करे अथवा अपनी शक्ति के अनुसार पूजा करे । अथवा ताम्र, मृत्तिका या बाँस से बने पात्र में कुंकुम, केसर आदि से मूर्ति अङ्कित कर पूजा करे । ‘अग्निर्मूर्धा॰’ इत्यादि वैदिक मन्त्रों से सभी उपचारों को समर्पित कर वह मूर्ति ब्राह्मणों को दे दे और यथाशक्ति घी, दूध, चावल, गेहूँ, गुड़ आदि वस्तु भी ब्राह्मणों को दे । धन रहनेपर कृपणता नहीं करनी चाहिये, क्योंकि कंजूसी करने से फल नहीं प्राप्त होता ।

इस प्रकार चार बार भौमयुक्त चतुर्थी का व्रतकर श्रद्धापूर्वक दस अथवा पाँच तोले भारतीय उपमहाद्वीप का एक पारम्परिक वज़न का माप है, जो आज भी ज़ेवर तोलने के लिए जोहरियों द्वारा प्रयोग किया जाता है। आधुनिक वज़न के हिसाब से एक तोला = ११.६६३८०३८ ग्राम * सोने की मङ्गल और गणपतिजी की मूर्ति बनवाये । उसे बीस पल 1 पल = 69.0048333333 ml या दस पल के सोने, चाँदी अथवा ताम्र आदि के पात्र में भक्तिपूर्वक स्थापित करें । सभी उपचारों से पूजा करने के बाद दक्षिणा के साथ सत्पात्र ब्राह्मण को उसे दे, इससे इस व्रत का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है । राजन् ! इस प्रकार इस उत्तम तिथि को मैंने कहा । इस दिन जो व्रत करता हैं, वह चन्द्रमा के समान कान्तिमान्, सूर्य के समान तेजस्वी एवं प्रभावान् तथा वायु के समान बलवान् होता है और अन्त में महागणपति के अनुग्रह से भौमलोक में निवास करता हैं । इस तिथि के माहात्म्य को जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक पढ़ता-सुनता है, वह महापातकादि से मुक्त होकर श्रेष्ठ सम्पत्तियों को प्राप्त करता हैं ।
(अध्याय ३१)
* तोला

See Also :-

1. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १-२

2. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय 3

3. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४

4. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ५

5. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ६

6. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ७

7. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ८-९

8. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १०-१५

9. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १६

10. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १७

11. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १८

12. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय १९

13. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २०

14. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१

15. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २२

16. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २३

17. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २४ से २६

18. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २७

19. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २८

20. भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २९ से ३०

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