श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-38
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
अड़तीसवाँ अध्याय
गृत्समद की छींक से एक बालक का जन्म, उसके द्वारा गणेशाराधन, गणेशजी का प्रसन्न होकर त्रैलोक्य-विजय का वरदान और तीन पुर प्रदान करना
अथः अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः
गृत्समदस्याद्भुत (त्रिपुरासुरस्य) त्रिपुरस्य तपः, गणेशेन दत्तं वरदानञ्च

व्यासजी बोले — हे सुरेश्वर! हे कमलजन्मा ब्रह्माजी! उसके बाद गृत्समद ने क्या किया-वह सब मुझ श्रद्धालु को प्रयत्नपूर्वक बतलाइये ॥ १ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे ब्रह्मन्‌! तदनन्तर (गणेशजी से वरदान प्राप्त करने पर) सभी मुनिगणों ने श्रेष्ठ मुनियों में भी श्रेष्ठ गृत्समद को आदरपूर्वक सम्मानित किया और उन्हें नमस्कार किया ॥ २ ॥ गणेशजी के वरदान के प्रभाव से [उन मुनियों ने] यज्ञ- कर्म में उनका वरण किया तथा समस्त अनुष्ठानात्मक कर्मों के प्रारम्भ में गणेश-पूजन से पहले उनका स्मरण किया ॥ ३ ॥ इस प्रकार चे मुनि गृत्समद विख्यात हो गये। वे गणनायक गणेशजी के मन्त्र का सुस्थिर मन से जप करते हुए उनमें परम भक्ति करने लगे ॥ ४ ॥

हे व्यासजी! किसी समय उन मुनि ने बहुत जोर से छींका, जिससे सभी दिशाएँ, पृथ्वी और गिरि-कन्दराएँ अनुनादित हो उठीं ॥ ५ ॥ जब उन मुनि ने अपने सामने देखा तो उन्हें एक भयंकर बालक दिखायी दिया, जो महान्‌ नाद कर रहा था; उसका वर्ण जपाकुसुम के सदृश रक्तवर्ण का था ॥ ६ ॥ वह बालक तेज का पुंजीभूत स्वरूप था और दृष्टिपथ को चुराये-सा ले रहा था। वे मुनि उस बालक को देखकर भय से विह्वल होकर काँपने लगे ॥ ७ ॥ वे मन-ही-मन तर्क-वितर्क करने लगे कि यह कौन-सा विघ्न आ गया? न जाने गणों के स्वामी गाणेशजी ने मुझे यह अद्भुत पुत्र तो नहीं दे दिया ॥ ८ ॥

जब उन्होंने पुनः देखा तो वह बालक उन्हें सुन्दर मुख और सुन्दर नेत्रों वाला दिखायी दिया। उसने सुवर्ण-निर्मित सुन्दर बाजूबन्द, सुन्दर मुकुट और सुन्दर नूपुर धारण कर रखे थे। उस पुत्र का कटिप्रदेश सुन्दर करधनी से सुशोभित हो रहा था। तब मुनि ने उससे पूछा कि तुम कौन हो? किसके पुत्र हो और क्या करना चाहते हो? हे तेज के निधान बालक! बताओ, तुम्हारे माता-पिता कौन हैं और तुम्हारा निवास-स्थान कहाँ है ?॥ ९-१०१/२

ब्रह्माजी कहते हैं — [ हे व्यास !] उन मुनि के इस प्रकार के वचन सुनकर बालक ने कहा— ॥ ११ ॥

बालक बोला — आप भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान रखने वाले होकर भी मुझसे क्यों पूछ रहे हैं ? फिर भी मैं आपके आज्ञानुसार बताता हँ कि आपकी छींक से मेरा जन्म हुआ है ॥ १२ ॥ हे मुने! आप ही मेरे पिता और माता हैं, मेरे ऊपर कृपा करें। हे पिता! आप मेरा कुछ दिन तक पालन करें। तब मैं त्रैलोक्य पर आक्रमण करने में सक्षम हो जाऊँगा और देवराज इन्द्र को भी अपना वशवर्ती कर लूँगा। मेरी बात पर सन्देह न करें, मेरे पौरुष को आप देख लीजियेगा ॥ १३-१४ ॥

ब्रह्माजी कहते हैं — [हे व्यास |] उस बालक का इस प्रकार का वचन सुनकर भय और हर्ष से युक्त मुनि गृत्समद ने स्नेह-सिक्त वाणी में कहा — ॥ १५ ॥

यदि यह जन्म लेते ही त्रैलोक्य का अतिक्रमण करनेमें सक्षम है. तो मैं अपने इस पुत्र को अपना मन्त्र [जिसका मैं जप करता हूँ] प्रदान करूँगा, जिससे जगत् के स्वामी विनायकदेव प्रसन्न होकर इसकी मनोकामनाको पूर्ण करेंगे और मेरी भी कीर्ति का विस्तार होगा ॥ १६-१७ ॥

मन-ही-मन ऐसा विचार करके उन्होंने अपने मन्त्र “गणानां त्वा०’ का उसे उपदेश दिया और कहा कि इसका आदरपूर्वक अनुष्ठान करो ॥ १८ ॥ मन को गजानन गणेशजी में स्थापित करके इस वैदिक मन्त्र का जप करो। हे पुत्र! जब वे सन्तुष्ट हो जायेगे, तो तुम्हें सभी कामनाओं को प्रदान करेंगे ॥ १९ ॥

इस प्रकार उस महामन्त्र को प्राप्तकर वह तपस्या करने के लिये वन को चला गया और वहाँ इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर निराहार रहते हुए एक अंगूठे पर खड़े होकर स्थिर मन से भगवान्‌ गजानन का ध्यान करते हुए पन्द्रह हजार वर्षों तक उस मन्त्र का जप करता रहा। इससे उसके मुख से दिशाओं को जलाने वाली अग्नि निकलने लगी। उससे देवताओं और पाताल में रहने वाले दैत्यों को भय हो गया ॥ २०-२२ ॥ तदनन्तर उसके उस तप से प्रसन्न होकर गजानन गणेशजी दिशाओं को अन्धकाररहित और सूर्यमण्डल को आच्छादित-सा करते हुए आविर्भूत हो गये ॥ २३ ॥ वे अपनी सुन्दर सूँड़ को घुमा रहे थे। सुन्दर दाँत से युक्त उनके मुख की मुद्रा प्रसन्‍नतापूर्ण थी। उनके चिंग्घाड़ की ध्वनि सुनकर विह्वल-से होते हुए उस बालक ने नेत्र खोले तो अपने समक्ष भगवान्‌ गणेश को देखा, जो चार भुजाओ से युक्त, विशाल शरीरवाले और अनेक आभूषणों से विभूषित थे ॥ २४-२५ ॥ उनके हाथ परशु, कमल, माला और मोदक से सुशोभित हो रहे थे। तब उस बालक ने उनके तेज से पराभूत होकर धैर्य धारण करके उन प्रभु को हाथ जोड़कर नमस्कार किया और उनकी प्रार्थना की ॥ २६१/२

बालक ने कहा — हे देव! मुझ शरणागत भक्त को क्यो धर्षित कर रहे हैं? हे देव! आप सौम्य स्वरूप धारण करें और मेरी सम्पूर्ण मनोकामनाओं को प्रदान करें ॥ २७१/२

ब्रह्माजी कहते हैं — [हे व्यासजी!] उसके इस प्रकार के वचन को सुनकर उन्होंने अपने तेज को समेट लिया और परम प्रसन्नतापूर्वक बोले — हे बालक! सावधान हो जाओ। जिसका तुम दिन-रात ध्यान करते हो, वही मैं इस समय तुम्हें वर देने के लिये आया हूँ ॥ २८-२९ ॥ मेरे इस स्वयंप्रकाशरूप जगन्मय परम रूप को ब्रह्मा, रुद्र आदि भी नहीं जानते तो मनुष्य इसे कैसे जान सकते हैं ॥ ३० ॥ देवता, मुनि, राजर्षि, असुर, सिद्ध, गन्धर्व, नाग और दानव भी मेरे इस स्वरूप को नहीं जान पाते ॥ ३१ ॥ वही मैं तुम्हारे तपरूपी बन्धन में बँधकर यहाँ वर देने के लिये आया हूँ। तुम्हारे मनमें जो-जो अभिलाषा हो, वे वर मुझसे माँग लो ॥ ३२ ॥

तब उस बालक ने कहा — आपके दर्शन से मैं धन्य हो गया हूँ, मुझसे अधिक मेरे पिता धन्य हैं; मेरा जन्म लेना और तप करना सार्थक हो गया है ॥ ३३ ॥ हे सुरेश्वर! बालभाव होने के कारण मैं स्तुति करना नहीं जानता हूँ, जबकि आप सम्पूर्ण जगत् के कर्ता, पालक और संहारक हैं ॥ ३४ ॥ आपके ही प्रकाश से सूर्य, अग्नि और चन्द्रमा प्रकाशित होते हैं। हे महामते! आप अपनी महिमा से स्थावर-जंगमरूप जगत् को चैतन्य प्रदान करते हैं ॥ ३५ ॥ हे गजानन! आपकी महान्‌ महिमा को ब्रह्मा, विष्णु और ईश (शिव) भी नहीं जानते हैं। यदि आप मुझे वरदान देना चाहते हैं, तो मुझे तीनों लोकों का अतिक्रमण कर सकने की विशेष शक्ति प्रदान करें। हे विभो! देवता, दानव, गन्धर्व, मनुष्य, सर्प, राक्षस, मुनि, किन्नर और चारण सदा मेरे वशवर्ती हों। जिन-जिन कामनाओं का मैं मानसिक चिन्तन करूँ, वे सब सदा सिद्ध हों ॥ ३६-३८ ॥ इन्द्रादि लोकपाल सदा मेरी सेवा करें। [आप] इहलोक में अनेक प्रकार के भोग और अन्त में मुझे मोक्ष प्रदान करें ॥ ३९ ॥ आपसे एक अन्य वर की भी मैं याचना करता हूँ, इस पुर में, जहाँ मैंने उग्र तपस्या की थी, वह आपकी आज्ञा से “गणेशपुर’ इस नाम से विख्यात हो जाय और लोगों को मनोवांछित फल देनेवाला हो ॥ ४०१/२

गणेशजी बोले — तुम तीनों लोकों का अतिक्रमण करोगे। तुम्हें सबसे अभय होगा। सभी तुम्हारे सदा वशवर्ती होंगे। मैं तुम्हें लोहे, सोने और चाँदी के तीन पुर देता हूँ ॥ ४१-४२ ॥ ये तीनों पुर तुम्हारी इच्छा के अनुसार गति करने वाले और भगवान्‌ शंकर के अतिरिक्त सभी देवताओं के लिये अभेद्य होंगे। संसार में “त्रिपुर’ नाम से तुम्हारी प्रसिद्धि होगी ॥ ४३ ॥ जब भगवान्‌ शिव एक ही बाण से तुम्हारे तीनों पुरों को भेद देंगे, तभी तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति हो जायगी इस विषय मे किसी प्रकार का विचार करने की आवश्यकता नहीं है। मेरी कृपा से तुम्हें अन्य सभी वांछित प्राप्त होंगे ॥ ४४ ॥

ब्रह्माजी कहते हैं — [हे व्यासजी!] इस प्रकार उसको वरदान देकर वे सर्वव्यापक देव गणेश वहाँ अन्तर्धान हो गये। उनके वियोग से त्रिपुरासुर विषाद- ग्रस्त हो गया। साथ ही उसे मनोवांछित वरों की प्राप्ति से अत्यन्त हर्ष भी हुआ। तब वह बलपूर्वक त्रैलोक्य- विजय में संलग्न हो गया ॥ ४५-४६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में “वरप्रदान” नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥

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