श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-45
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
पैंतालीसवाँ अध्याय
शिवकृत गणपतिस्तुति
अथः पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः
शिवस्य वरदानं

[ व्यास ] मुनि बोले — [हे ब्रह्मन्!] तब प्रसन्न हुए विघ्नहर्ता देवाधिदेव विघ्नेश्वर के भगवान् शंकर को वर देने के लिये उत्सुक होने पर उन सदाशिव ने क्या-क्या वर माँगे थे?॥ १ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे व्यासजी ! ] गणेशजी के वचन को सुनकर उन वर प्रदान करने वाले अपने ही सदृश स्वरूप वाले (पंचमुखस्वरूप वाले) गजानन की वन्दना करके शिवजी ने ये वाक्य कहे — ॥ २ ॥

शिवजी बोले — हे देव! [आपका दर्शनकर ] आज मेरे दसों नेत्र धन्य हो गये, आज आपका पूजनकर मेरी [दसों] भुजाएँ धन्य हो गयीं। आपको नमन करने से [मेरे] पाँचों सिर धन्य हो गये और आपकी स्तुति करने से मेरे पाँचों मुख धन्य हो गये ॥ ३ ॥ पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश (पंच महाभूत); गन्ध, रस, स्पर्श, रूप और शब्द (पंचतन्मात्राएँ); मन एवं इन्द्रियाँ [^1] , दिशाएँ, गणनात्मक काल (समय), गन्धर्व, यक्ष, पितर, मनुष्य, देवर्षि, सभी देवगण, ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र [^2] , वसुगण [^3] , साध्यगण [^4]  — सम्पूर्ण स्थावर- जंगम प्राणी आपसे ही उत्पन्न हुए हैं ॥ ४-५ ॥ हे अनन्यबुद्धे! आप रजोगुण का आश्रय लेकर इस विश्व का सृजन करते हैं, सत्त्वगुण का आश्रय लेकर इसकी रक्षा करते हैं और तमोगुण का आश्रय लेकर इसका संहार करते हैं। हे गुणेश ! आप शाश्वत, निष्काम और सम्पूर्ण कर्मों के साक्षी हैं ॥ ६ ॥

ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यासजी !] तदनन्तर मैंने शिवजी की आज्ञा से उन भगवान् गणेश से जो कुछ कहा था और जो उनका नाम रखा; हे महामते ! उसे सुनिये । [मैंने गणेशजी से कहा —] मातृकाओं [^5]  में जो प्रथम बीज अक्षर ‘ॐ’ है, जो कि श्रुति का मूल है, वही आपका नाम है; क्योंकि आप गणों के ईश हैं, इसलिये आपका ‘गणेश’ नाम हो । गणाधिपति के द्वारा ‘ओम्’ – इस प्रकार कहे जाने पर भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये और उन्होंने ये वरदान प्रदान किये — ॥ ७–८१/२

शिवजी बोले — हे ईश! जो [अपने] सम्पूर्ण कार्यों [-के आरम्भ]-में आपका स्मरण करता है, उसे कार्यसिद्धि में अविघ्नता की प्राप्ति होती है ॥ ९ ॥ बिना आपकी स्मृति के कृमि-कीटों को भी अपनी मनोकामना की सिद्धि नहीं प्राप्त होती । शैव, आपके भक्त (गणेश-उपासक), वैष्णव, शाक्त और सूर्योपासक — सभी के सम्पूर्ण कार्यों में, चाहे वे वैदिक हों या लौकिक, शुभ हों या अशुभ — सबमें आप ही प्रयत्नपूर्वक सर्वप्रथम अर्चनीय हैं। हे देव! चूँकि आप यक्षों, विद्याधरों और सर्पों सहित सभी लोगों के मंगल (हित, कल्याण, क्षेम) – के अधिपति हैं और [विशेषरूप से] अपने भक्तों का मंगल करने वाले हैं, इसीलिये आप मंगलमूर्ति [कहे जाते ] हैं ॥ १०-१११/२

हे ईश! पूर्वकाल में दैत्यश्रेष्ठ [त्रिपुरासुर]-के साथ युद्ध में आपका अर्चन, आपका स्मरण और आपका वन्दन न करने के कारण मैं पराभव को प्राप्त हुआ, इसलिये मैं आपके चरणों की शरण में आया हूँ । हे सर्वशक्तिमान् ! आप मेरे अपराध को क्षमा करें और सम्पूर्ण युद्धों के समय मुझे जय प्रदान करें ॥ १२-१३ ॥ हे देव! जो आपका सर्वथा भजन नहीं करते, वे मूर्ख और दरिद्र होंगे। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक आपका भजन करते हैं, वे सम्पूर्ण कामनाओं को प्रदान करने वाली सिद्धि प्राप्त करेंगे ॥ १४ ॥

ब्रह्माजी कहते हैं — [ हे व्यासजी ! ] यह सुनकर अखिलवाक्यार्थविशारद गणेशजी ने शिवजी से कहा कि उमेश ! आप जब-जब मेरा स्मरण करेंगे, तब-तब मैं [शीघ्र ही] आपके पास आ जाऊँगा ॥ १५ ॥ हे महेश्वर! आप मेरे नाम के बीजमन्त्र [^6]  से एक बाण को अभिमन्त्रित करके उससे उस दैत्य त्रिपुरासुरसहित उसके तीनों पुरों को मेरे प्रताप से गिराकर भस्मसात् कर दें ॥ १६ ॥

तदनन्तर भक्ति से परितुष्ट चित्तवाले गणाधिपति गणेशजी ने उन विनम्र शिवजी को सम्यग् रूप से अपने सहस्र नाम बतलाये, जो सभी लोगों के लिये विजय प्रदान करने वाले और मनोकामना पूर्ण करने वाले हैं ॥ १७ ॥ और उन्होंने यह भी कहा कि [हे शिव!] युद्ध के समय आप इसका पाठ करें, इससे आप शीघ्र ही दैत्यों का वध कर देंगे। तीनों सन्ध्याओं में इसका जप करने से मनुष्यों की सभी कामनाएँ और सम्पूर्ण अभीष्ट कार्य सिद्ध हो जाते हैं ॥ १८ ॥

गजानन गणेशजी के वचन सुनकर शिवजी ने उनका सम्यक् रूप से पूजन किया और अत्यन्त हर्षित हुए। उन्होंने महागणेश की [मूर्ति की ] स्थापना की और शीघ्र ही उनके सुदृढ़ एवं उच्च प्रासाद (मन्दिर) – का निर्माण करा दिया ॥ १९ ॥ तदनन्तर शिवजी ने देवताओं, मुनियों और सिद्धगणों को भलीभाँति तृप्त करके और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को विविध प्रकार के दान देकर वरदाता देव गणेशजी का भलीभाँति पूजन करके उन्हें पुनः नमस्कार किया ॥ २० ॥ तब [देवताओं, मुनियों, सिद्धों और ब्राह्मणों-] सभी ने कहा कि यह मणिपूर [^7]  [गणपति-क्षेत्र के रूप में ] सम्पूर्ण लोकों में विख्यात हो । भगवान् गणेश तथा अन्य सबके द्वारा ‘तथास्तु’ कहे जाने के उपरान्त वे देवगण और गणाधिपति गणेशजी अन्तर्धान हो गये ॥ २१ ॥

मुनिगणों और देवताओं सहित गणेशजी के अन्तर्धान हो जाने पर अपने गणों से घिरे हुए शिवजी भी अपने निवास-स्थल को चले आये; जो गन्धर्वों, यक्षगणों और देवांगनाओं से घिरा हुआ था । वहाँ उन्होंने परम प्रसन्नतापूर्वक गिरिराजनन्दिनी पार्वती से अपना सारा वृत्तान्त कहा। शिवजी के मुख से निकली उस अमृतमयी वाणी को सुनकर पत्नियोंसहित सभी देवेश्वर, मुनिगण, मुनिपत्नियाँ और योगीश्वर प्रसन्न हो गये, उन्होंने त्रिपुरासुर को मरा हुआ और भगवान् शिव के अनुग्रह से अपने अधिकारों को पुनः प्राप्त हुआ मान लिया ॥ २२-२३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘शिव को वरदान’ नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥

[^1]: इन्द्रियाँ दो प्रकार की होती हैं – १. ज्ञानेन्द्रियाँ और २. कर्मेन्द्रियाँ । ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं – १. श्रोत्र, २. त्वक्, ३. चक्षु, ४. रसना और घ्राण। कर्मेन्द्रियाँ भी पाँच हैं – १. वाक्, २. पाणि, ३. पाद, ४. पायु और उपस्थ । इस प्रकार कुल दस इन्द्रियाँ हैं ।

[^2]: रुद्र एकादश हैं —
हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः ।
वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा ॥
मृगव्याधश्च शर्वश्च कपाली च विशांपते ।
एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः ॥
(हरिवंशपुराण १ । ३ । ५१-५२)
हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली — ये ग्यारह रुद्र कहलाते हैं।

[^3]: वसु आठ हैं —
धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः ।
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥

(महा० आदि० ६६ । १८)
धर, ध्रुव, सोम, अहः, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास — इन आठों को वसु कहते हैं। इनमें अनल (अग्नि) वसुओं के राजा, देवताओं को हवि पहुँचाने वाले और भगवान् के मुख माने जाते हैं।

[^4]: साध्यदेवता बारह हैं —
मनोऽनुमन्ता प्राणश्च नरो यानश्च वीर्यवान् ॥
चित्तिर्हयो नयश्चैव हंसो नारायणस्तथा ।
प्रभवोऽथ विभुश्चैव साध्या द्वादश जज्ञिरे ॥

(वायुपुराण ६६ । १५-१६)
मन, अनुमन्ता, प्राण, नर, यान, चित्ति, हय, नय, हंस, नारायण, प्रभव और विभु —ये बारह साध्यदेवता हैं।

[^5]: ‘अ’ से ‘क्ष’ तक कुल ५२ मातृकाएँ हैं। ‘ॐ’ =अ+उ+म्’ होने से ‘ॐ’ को प्रथम बीजाक्षर कहा गया है।
ओंकारमाद्यं प्रवदन्ति संतो वाचः श्रुतीनामपि यं गृणन्ति ।
गजाननं देवगणानताङ्घ्रि भजेऽहमर्धेन्दुकृतावतंसम् ॥

[^6]: गणेशजी का बीजमन्त्र ‘गं’ है।

[^7]: महाराष्ट्र के पूना जिले में पूना से ३१ मील की दूरी पर स्थित ‘राजणगाँव’ को मणिपूरक्षेत्र कहा जाता है। यह अष्ट गणपति-क्षेत्रों में से एक है। यहाँ के श्रीविग्रह को ‘महागणपति’ कहते हैं। ये अष्ट विनायकों में से एक हैं। मन्दिर के तहखाने में रखी मूर्ति ‘महोत्कट’ कहलाती है, उसके दस सूँड़ और बीस भुजाएँ हैं।

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