August 26, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-60 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ साठवाँ अध्याय भूमिपुत्र मंगल की उत्पत्ति की कथा, उसकी उग्र तपस्या से गणेशजी का प्रसन्न होकर वर देना, अंगारकचतुर्थीव्रत की महिमा अथः षष्टितमोऽध्यायः अङ्गारक चतुर्थी व्रतोपाख्यान ब्रह्माजी बोले — हे राजन् ! मैं अंगारक चतुर्थी की महिमा को संक्षेप में कहता हूँ, तुम इसे सावधान होकर श्रवण करो ॥ १ ॥ हे राजन्! अवन्तीनगर में भारद्वाज नाम के एक महान् मुनि थे। वे वेद-वेदांग के विद्वान्, अत्यन्त बुद्धिमान्, सर्वशास्त्रविशारद, अग्निहोत्रपरायण और नित्य शिष्यों के अध्यापन में तत्पर रहने वाले थे ॥ २१/२ ॥ एक समय वे मुनि नदी के किनारे बैठकर अनुष्ठान में रत थे, तभी उन्होंने एक सुन्दर अप्सरा को देखा। उसे देखकर उन्होंने उसके साथ रमण करने का मन बनाया ॥ ३-४ ॥ अकस्मात् उस कामिनी को देखकर मुनि कामासक्त हो गये। कामदेव के बाणों से अभिभूत होकर वे भूतल पर गिर पड़े। उनका शरीर अत्यन्त विह्वल हो गया, जिसके कारण उनका तेज स्खलित हो गया। उनका वह तेज एक बिल के मार्ग से पृथ्वी में प्रविष्ट हो गया ॥ ५-६ ॥ तदनन्तर उससे एक कुमार का जन्म हुआ, जिसकी कान्ति जपाकुसुम के समान [ अरुणवर्ण की ] थी। पृथ्वी ने स्नेहवश उसका आदरपूर्वक पालन किया ॥ ७ ॥ ऐसा करते हुए पृथ्वी ने अपने जन्म, माता-पिता और कुल को धन्य माना । तदनन्तर वह (बालक) जब सात वर्ष का हो गया, तब उसने अपनी माता से पूछा कि मनुष्यदेहधारी होने पर भी मेरे शरीर का वर्ण रक्तिम क्यों है ? हे माता ! सम्प्रति यह बतलाओ कि मेरे पिता कौन हैं ? ॥ ८-९ ॥ पृथ्वी बोली — हे पुत्र ! भरद्वाजमुनि का शुभ तेज स्खलित होकर मुझमें प्रविष्ट हो गया, उसीसे तुम्हारा जन्म हुआ और मैंने तुम्हारा पालन-पोषण कर तुम्हें बड़ा किया ॥ १० ॥ वह (बालक) बोला — हे माता ! तब तुम मुझे तपस्या के निधिरूप उन मुनि का दर्शन कराओ ॥ १०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — तब वे पृथ्वीदेवी उसे लेकर भारद्वाजमुनि के पास गयीं ॥ ११ ॥ उन्हें प्रणामकर कहा कि [हे मुनिवर ! ] यह पुत्र आपके तेज से उत्पन्न है। इसे मैंने पाल-पोसकर बड़ा कर दिया है। हे मुने! अब यह आपके समक्ष है, इसे स्वीकार करें। भारद्वाजमुनि उस पुत्र को प्राप्तकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका आलिंगन किया। तदनन्तर उनकी आज्ञा लेकर पृथ्वी देवी भी अपने सुन्दर धाम को चली गयीं ॥ १२-१३ ॥ मुनि ने प्रसन्नतापूर्वक उस बालक का सिर सूँघा, उसे गोदमें बैठाया और शुभ मुहूर्त एवं शुभ लग्न में उसका उपनयन-संस्कार किया। उन्होंने उसे वेद, शास्त्र और मंगलमय गणेशमन्त्र का उपदेश देकर कहा — [ हे पुत्र ! ] तुम चिरकाल तक गणेशजी की प्रसन्नता के लिये अनुष्ठान करो, वे सन्तुष्ट होकर तुम्हारी सभी मनोकामनाओं को प्रदान करेंगे ॥ १४–१५१/२ ॥ तदनन्तर वह मुनिकुमार नर्मदा नदी के किनारे पद्मासन लगाकर बैठ गया। वह शीघ्र ही अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रणकर भगवान् गणेश का अन्तःकरण में ध्यान करते हुए उनके श्रेष्ठ मन्त्र का जप करने लगा । उस समय वह मात्र वायु का ही भक्षण कर रहा था, अतः अत्यन्त कृश हो गया था ॥ १६-१७ ॥ इस प्रकार उसने सहस्र वर्षों तक अत्यन्त कठोर तप किया, तब माघमास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को जब स्वच्छ चन्द्रमा का उदय हुआ तो उस समय गणेशजी ने उसे अपने दसभुजाओं वाले स्वरूप का दर्शन कराया। उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे, उनके मस्तक पर चन्द्रमा शोभायमान था, उनके हाथ अनेक प्रकार के आयुधों से सुशोभित हो रहे थे। उनकी सूँड़ सुन्दर थी तथा [मुख में] एक दाँत शोभायमान हो रहा था । शूर्पसदृश उनके [बड़े-बड़े] कान कुण्डलों से युक्त थे। उनका श्रीविग्रह करोड़ों सूर्यो की आभावाला और अनेक प्रकार के अलंकारों से अलंकृत था ॥ १८-२० ॥ अपने इष्टदेव भगवान् गणेश के सुन्दर स्वरूप को सामने विद्यमान देखकर वह बालक उठकर उनके चरणों में गिर पड़ा और उन जगदीश्वर की स्तुति करने लगा ॥ २१ ॥ ॥ भौम उवाच ॥ नमस्ते विघ्ननाशाय नमस्ते विघ्नकारिणे । सुरासुराणामीशाय सर्वशक्त्युपबृंहिणे ॥ २२ ॥ निरामयाय नित्याय निर्गुणाय गुणच्छिदे । नमो ब्रह्मविदां श्रेष्ठ स्थितिसंहारकारिणे ॥ २३ ॥ नमस्ते जगदाधार नमस्त्रैलोक्यपालक । ब्रह्मादये ब्रह्मविदे ब्रह्मणे ब्रह्मरूपिणे ॥ २४ ॥ लक्ष्यालक्ष्यस्वरूपाय दुर्लक्षणभिदे नमः । नमः श्रीगणनाथाय परेशाय नमो नमः । इति स्तुतः प्रसन्नात्मा परमात्मा गजाननः ॥ २५ ॥ भौम (भूमिपुत्र ) बोला — आप विघ्ननाशक को नमस्कार है, आप विघ्नकर्ता को नमस्कार है, देवताओं एवं असुरों के स्वामी, सम्पूर्ण शक्तियों का उपबृंहण करने वाले, निरामय, नित्य, निर्गुण, गुणों का उच्छेद करने वाले, ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ [ इस जगत् की रचना ] पालन और संहार करने वाले को नमस्कार है ॥ २२-२३ ॥ हे जगत् के आधार ! आपको नमस्कार है, हे त्रैलोक्य के पालक ! आपको नमस्कार है । ब्रह्मा के आदि कर्तारूप, ब्रह्मज्ञानी, ब्रह्मारूप, ब्रह्मरूप, लक्ष्यालक्ष्य- स्वरूप, दुर्लक्षणों के नाशक के लिये नमस्कार है । परमेश्वर श्रीगणेशजी को बारम्बार नमस्कार है ॥ २४-२५ ॥ इस प्रकार की स्तुति से प्रसन्न हुए परमात्मा गजानन गणेशजी ने बालक को हर्षित करते हुए मधुर वाणी से कहा — ॥ २६ ॥ गजानन (गणेशजी ) बोले — तुम्हारी उग्र तपस्या, भक्ति और इस स्तुति से भी मैं बहुत प्रसन्न हूँ। बाल्यावस्था होते हुए भी तुममें [बहुत ] धैर्य है । मैं तुम्हें वांछित वर देता हूँ। [गणेशजीद्वारा] ऐसा कहे जाने पर भूमिपुत्र (मंगल)-ने गजानन से यह वचन कहा — ॥ २७ ॥ भूमिपुत्र बोला — हे विभो ! हे [इन्द्रादि] देवताओं के स्वामी! आपके दर्शन से मेरी दृष्टि धन्य हो गयी, मेरा जन्म लेना भी धन्य हो गया; मेरा ज्ञान, मेरा कुल और पर्वतों सहित यह [मेरी माता ] पृथ्वी भी धन्य हो गयी । मेरी यह सम्पूर्ण तपस्या भी धन्य हो गयी, जो मैंने आप अखिलेश का दर्शन प्राप्त किया। मेरी यह निवास-स्थली और यह वाणी भी धन्य हो गयी, जिसके द्वारा मैंने मूढ़भाव से आपकी स्तुति की। हे देवेश ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो स्वर्ग में मेरा निवास हो जाय । हे गजानन ! मैं देवताओं के साथ अमृत पीना चाहता हूँ ॥ २८-२९ ॥ त्रैलोक्य में मेरा नाम कल्याणकारक के रूप में विख्यात हो जाय। हे विभो ! चतुर्थी तिथि को मुझे आपका पुण्यप्रद दर्शन प्राप्त हुआ है, अतः वह पुण्यदात्री तिथि सदा सम्पूर्ण संकटों का हरण करने वाली हो तथा आपके कृपाप्रसाद से यह तिथि व्रत करने वालों की समस्त कामनाओं को प्रदान करने वाली हो जाय ॥ ३०-३१ ॥ गणेशजी बोले — हे पृथ्वीपुत्र ! तुम देवताओं के साथ सम्यक् रूप से अमृत का पान करोगे और ‘मंगल’– इस नाम से लोक में तुम्हारी ख्याति होगी ॥ ३२ ॥ [अंगार के सदृश] रक्तवर्ण का होने के कारण तुम अंगारक नाम से प्रसिद्ध होओगे । [ भौम, कुज, धरापुत्र आदि भी तुम्हारे नाम होंगे] क्योंकि तुम पृथिवी के पुत्र हो। जो मनुष्य अंगारक चतुर्थी का व्रत करेंगे, उन्हें वर्षभर संकष्टचतुर्थी व्रत करने से होने वाले पुण्य के समतुल्य पुण्य प्राप्त होगा। उनके सम्पूर्ण कार्यों में निर्विघ्नता होगी, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ३३-३४ ॥ शत्रुओं को सन्तप्त करने वाले ! क्योंकि तुमने व्रतों में सर्वश्रेष्ठ [संकष्टचतुर्थी] व्रत का अनुष्ठान किया है, अत: तुम [उसके प्रभाव से] अवन्ती नगरी के राजा होओगे। तुम्हारे नाम के संकीर्तनमात्र से मनुष्य अपनी सभी कामनाओं को प्राप्त करेगा ॥ ३५१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यासजी !] इस प्रकार वर देकर गजानन भगवान् गणेशजी अन्तर्धान हो गये ॥ ३६ ॥ तदनन्तर मंगल ने भगवान् गणेश की सम्पूर्ण सुन्दर अंगोंवाली, शुण्ड से युक्त मुख और दश भुजाओं वाली प्रतिमा की भक्तिपूर्वक स्थापना की। उसने भगवान् गजानन को आनन्द देने वाले [सुन्दर ] मन्दिर का निर्माण कराया और उन देवाधिदेव का ‘मंगलमूर्ति’ नाम रखा ॥ ३७-३८ ॥ तब से वह क्षेत्र सभी मनुष्यों के लिये कामनाओं को पूर्ण करने वाला हो गया। वह अनुष्ठान, पूजन एवं दर्शन करने से भोग और मोक्ष की प्राप्ति कराने वाला है ॥ ३९ ॥ तदनन्तर भगवान् विनायक ने उस भूमिपुत्र मंगल को अपने पास लाने के लिये अपने गणों के साथ एक सुन्दर और श्रेष्ठ विमान भेजा। हे राजन् ! वे गणेशजी के दूत उस भूमिपुत्र मंगल के पास जाकर आग्रहपूर्वक उसे उसी देह से गणेशजी के निकट ले आये । यह एक अद्भुत-सी घटना घटित हुई ! ॥ ४०-४१ ॥ तत्पश्चात् वह भूमिपुत्र स्थावर-जंगमात्मक इस जगत्-सहित तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो गया; उस भूमिपुत्र ने मंगलवार से युक्त संकष्टचतुर्थीका व्रत किया था, इसलिये उसे स्वर्ग की प्राप्ति हुई और उसने देवताओं के साथ अमृतपान किया । तभी से मंगलवार से युक्त चतुर्थी तिथि भी पृथ्वी पर अंगारकचतुर्थी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी ॥ ४२-४३ ॥ मन में चिन्तित वस्तु (मनोकामना) – को प्रदान करने के कारण सबपर अनुग्रह करने वाले मंगलमूर्ति गणेशजी ‘चिन्तामणि’ – इस नाम से प्रसिद्ध हुए ॥ ४४ ॥ पारिनेर नगर से पश्चिम में स्थित सम्पूर्ण विघ्नों का निवारण करने वाले गणेशजी चिन्तामणि [विनायक ] नाम से प्रसिद्ध हुए। आज भी [कृष्णपक्ष की चतुर्थी को] चन्द्रमा के उदय होने के समय सिद्धों और गन्धर्वो द्वारा उनकी पूजा की जाती है। वे [चिन्तामणि विनायक ] पुत्र-पौत्र, धन-सम्पत्ति आदि सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं ॥ ४५-४६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘अंगारकचतुर्थीव्रतोपाख्यान’ नामक साठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६० ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe