श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-001
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
पहला अध्याय
देवान्तक और नरान्तक का जन्म तथा नारदजी का उन्हें पंचाक्षरी महाविद्या का उपदेश देना
अथः प्रथमोऽध्यायः
नारदोपदेशो

मुनिगण बोले — हे सूतजी ! हे महामते ! हम सबने आपके द्वारा सम्यक् रूप से वर्णित आख्यान का आदरपूर्वक श्रवण किया; परंतु जैसे प्राणी प्रतिदिन अन्न का भक्षण करने पर भी तृप्त नहीं होते, वैसे ही हमें भी [कथा- श्रवण से] तृप्ति नहीं हो रही है, अतः आप अन्य कथाओं को कहिये, जिससे हम सब तृप्त हो सकें ॥ १-२ ॥

सूतजी बोले — [हे मुनियो !] मैंने उपासनाखण्डका वर्णन किया, अब मैं आप सबके समक्ष क्रीडाखण्डका वर्णन करता हूँ। जिस प्रकारसे गणेशजीने अनेक दैत्योंका वध किया तथा सज्जनों, द्विजों एवं गौओंका पालन किया; उसे मैं अत्यन्त आदरपूर्वक सम्यक् रूपसे कहता हूँ, आप लोग एकाग्र चित्तसे श्रवण करें ॥ ३-४ ॥

मुनिगण बोले — [हे सूतजी!] आप जैसे-जैसे उस [गणेश ] पुराण का वर्णन कर रहे हैं, वैसे-वैसे हमारी श्रवणेच्छा बढ़ती जा रही है, इसलिये आप उसका सम्यक् रूप से कथन करते रहें, जिससे सभी लोग इस संसार-सिन्धु से शीघ्र ही मुक्त हो जायँ ॥ ५ ॥

सूतजी बोले — पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने जिसे अमित तेजस्वी व्यासजी से कहा था और भृगु [मुनि ] -ने जिसका [राजा] सोमकान्त के प्रति कथन किया था; उस [कथा-प्रसंग]-को मैं आप सबसे कहता हूँ ॥ ६ ॥

व्यासजी बोले — हे कमलजन्मा ब्रह्माजी ! हे विभो ! गणेशजी के सुन्दर चरित का वर्णन कीजिये । उन प्रभु ने जो-जो रूप धारण करके जो-जो [लीलाएँ] की हैं; हे ब्रह्मन् ! उन्हें मेरे कहने से आप कृपा करके कहिये। इस उपासनाखण्ड को सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ७-८ ॥ उन गणेशजी ने जिन-जिन अवतारों के द्वारा जिन- जिन महाबली दैत्यों का वध किया है, उनके उन-उन कर्मों को आप कहिये। आपके मुखकमल से उनके बालचरित तथा अनेक प्रकार की लीलाओं का श्रवणकर मेरे मन को विश्राम मिल जायगा ॥ ९-१० ॥

सूतजी बोले — [ हे मुनियो !] व्यासजी के इस प्रकार पूछने पर उनके अनेक प्रश्नों को सुनकर कमलासन ब्रह्माजी ने अनेक प्रकार की दिव्य कथाओं को कहा ॥ ११ ॥

ब्रह्माजी बोले — हृदय को आनन्दित करने वाले हे व्यास ! तुमने उचित प्रश्न किया है। हे मुने! श्रोता के आदरपूर्वक कथा-श्रवण करने से वक्ता की कथा सुनाने के प्रति प्रीति बढ़ जाती है ॥ १२ ॥ [हे व्यासजी! ] तुम्हारे-जैसे पुण्यश्लोक श्रोता के प्रति मैं अत्यन्त गोप्य तथ्यों का भी प्रकाशन कर सकता हूँ; क्योंकि श्रोता के सत्कथाओं के श्रवण में रुचि लेने से वक्ता की कथा सुनाने की शक्ति बढ़ जाती है ॥ १३ ॥ इस समय मैं तुमसे सम्पूर्ण गणेशचरित को कहूँगा, उन प्रभु ने अनेक अवतार ले करके पृथ्वी के भार का हरण किया। उन्होंने अनेक प्रकार से दैत्यों का वध करके देवताओं को उनके स्थान (पद) – पर स्थापित किया । दुष्टों का निर्मूलन करने में सक्षम वे सज्जनों का पालन करने में तत्पर रहते हैं ॥ १४-१५ ॥ हे मुने! श्रवणमात्र से सम्पूर्ण कामनाओं को प्रदान करने वाले गणेशजी के आख्यान पर आधारित इतिहास का श्रवण कीजिये, जिसे भगवान् विष्णु ने कहा था ॥ १६ ॥

[ भगवान् ] विष्णु बोले — पृथक्-पृथक् युगों में गणेशजी भिन्न-भिन्न नाम वाले, भिन्न-भिन्न वाहन वाले, भिन्न-भिन्न कर्मों वाले, भिन्न-भिन्न गुणों वाले और भिन्न- भिन्न दैत्यों का संहार करने वाले हुए हैं ॥ १७ ॥ वे सत्ययुग में सिंहवाहन, दस भुजाओं वाले, तेजोमय स्वरूप वाले, विशाल शरीर वाले, सबको वर देने वाले और जितेन्द्रिय हुए। [ उस समय] उनका नाम ‘विनायक’ था। त्रेतायुग में वे मयूरवाहन, छः भुजाओंवाले और श्वेत वर्णवाले थे। [उस समय] वे ‘मयूरेश्वर’ नाम से त्रिभुवन में विख्यात हुए ॥ १८-१९ ॥ द्वापर में वे रक्त वर्णवाले, मूषकवाहन और चतुर्भुज स्वरूपवाले हुए। [उस समय] देवताओं और मनुष्यों द्वारा पूजित उनकी ‘गजानन’ – इस नाम से प्रसिद्धि हुई ॥ २० ॥ कलियुग में वे धूम्रवर्ण, अश्ववाहन और दो भुजाओं वाले होंगे। म्लेच्छों की सेनाओं का विनाश करने वाले वे ‘ धूम्रकेतु’– इस नाम से विख्यात होंगे ॥ २१ ॥

हे मुने ! उन्होंने जिस-जिस दैत्य का हनन किया था, उस सबका अब मैं वर्णन करता हूँ । अंगदेश के एक नगर में रौद्रकेतु नामक ब्राह्मण हुआ था ॥ २२ ॥ वह सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वार्थ का ज्ञाता, वेद-वेदांगों का पारगामी विद्वान्, बृहस्पति के सदृश [बुद्धिमान् ], अग्निहोत्र करने वाला, देवताओं-गौओं और ब्राह्मणों की पूजा करने वाला, नित्य ईश्वर की उपासना करने वाला और सभी आगम-शास्त्रों का पारंगत विद्वान् था ॥ २३१/२

उसकी पत्नी का नाम शारदा था, जो रूप और कान्ति से सुशोभित थी। उसके सदृश सुन्दर स्त्री न तो अप्सराओं में कोई थी, न आठ प्रकार की नायिकाओं में ही कोई थी। उसके मुख की कान्ति ने चन्द्रमा [ की कान्ति]-को पराजित कर दिया था, मानो जिसके कारण ही चिन्ता से वह क्षयग्रस्त हो गया था ॥ २४-२५ ॥ अनेक दिव्य आभूषणों से आभूषित होकर वह इस धरातल को इस प्रकार जगमगाती थी, जैसे आकाशमण्डल को नक्षत्रमालाएँ द्योतित करती हैं ॥ २६ ॥ शरत् कालीन कमल के समान नेत्रोंवाली वह शारदा शरत् कालीन चन्द्रमा से सुशोभित शारद (कार्तिक) मास में किसी समय गर्भवती हो गयी । [ उस समय ] उसके शरीर के तेज [के आधिक्य ] -से कुछ भी विदित नहीं होता था। उस समय वह साध्वी दोहद-सम्बन्धी जो-जो इच्छाएँ करती थी, उन सभी इच्छाओं को उसका पति पूरा करता था ॥ २७-२८ ॥

इस प्रकार उसने नौवें मास में जुड़वाँ पुत्रों को जन्म दिया। वे दोनों अत्यन्त कान्तिमान् और माता – पिता के अन्तःकरण को आनन्दित करने वाले थे। वे दोनों आजानुबाहु (घुटनों तक लम्बी भुजाओं वाले) और बड़े-बड़े नेत्रोंवाले थे। उन्हें देखकर उनके पिता ( रौद्रकेतु) – ने कहा — ‘ आज मैं पितरों के ऋण से उऋण हो गया। आज मेरा तप धन्य हो गया, वंश धन्य हो गया और जन्म धन्य हो गया; जो मैंने इन दोनों पुत्रों को देख लिया ॥ २९–३०१/२

तत्पश्चात् उसने अर्घ्य आदि से श्रेष्ठ द्विजों का सम्यक् प्रकार से पूजनकर और गणों के स्वामी गणेशजी की पूजा की, इसके बाद मातृकापूजनकर शीघ्र ही स्वस्तिवाचन करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों द्वारा आभ्युदयिक श्राद्ध और जातकर्म – संस्कार सम्पन्न कराया ॥ ३१-३२ ॥ उसने ब्राह्मणों का भक्तिपूर्वक सम्यक् प्रकार से पूजनकर उन्हें अनेक प्रकार के दान दिये तथा वस्त्र, रत्न, धन आदि से सुहृदों को सम्मानित किया । पुत्र- जन्म से अत्यन्त प्रसन्न उसने अनेक प्रकार के बाजे बजवाते हुए घर-घर में शर्करा और ताम्बूल बँटवाया ॥ ३३-३४ ॥ जैसे कोई ध्यानपरायण योगी सद्वस्तु परब्रह्म परमात्मा का दर्शन प्राप्त कर प्रसन्न होता है, [वैसे ही वह पुत्रों के जन्म पर प्रसन्न था ।] तदनन्तर [ सूतक के] दस दिन बीत जाने पर उसने ज्योतिर्विद् श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बुलवाकर परम भक्ति से उनका भलीभाँति पूजनकर उनसे पूछा कि ‘हे श्रेष्ठ द्विजो! इन दोनों का क्या नाम रखना चाहिये, भूत और भविष्य का ज्ञान करके विचारपूर्वक मुझे बतलायें ?’ ॥ ३५–३६१/२

तब उन लोगों ने ध्यानपूर्वक देखकर कहा — हे ब्रह्मन्! हम लोगों के मत से तुम इन दोनों के आचरण के अनुरूप इनके नाम देवान्तक और नरान्तक रखो ॥ ३७१/२

उनके इस प्रकार के वचन सुनकर ब्राह्मणों की भक्ति में संलग्न रहने वाले उस ब्राह्मण रौद्रकेतु ने अपनी शाखा में कही गयी विधि के अनुसार उन दोनों का नामकरण किया तथा ब्राह्मणों एवं सम्पूर्ण नगर- निवासियों को भोजन कराया ॥ ३८-३९ ॥ तदनन्तर सुमेरु और मन्दराचल की भाँति प्रतीत होनेवाले वे दोनों बालक उसी प्रकार बढ़ने लगे, जैसे समुद्र-तट के तालवृक्ष और बाँस के अंकुर तीव्रता से बढ़ते हैं। वे दोनों अपनी स्वाभाविक इच्छा से जहाँ-जहाँ पैर रख देते थे, पातालस्थित शेषनाग का सिर वहाँ-वहाँ झुक जाता था ॥ ४०-४१ ॥ जब वे दोनों खड़े होते थे तो सूर्यमण्डल उनके सिर पर स्थित प्रतीत होता था । वे दोनों अपने माता- पिता को अनेक प्रकार के कौतुक दिखलाया करते थे ॥ ४२ ॥

उन दोनों बालकों की कीर्ति सुनकर किसी समय नारदजी अकस्मात् रौद्रकेतु के घर गये। उन्होंने उत्सुकतापूर्वक उन दोनों बालकों को पकड़कर उन्हें अपनी गोद में बैठाकर उनका मस्तक चूमते हुए उनके माता-पिता से कहा — ॥ ४३१/२

नारदजी बोले — मैं तुम्हारे पुत्रद्वय की अद्भुत और मंगलमयी कीर्ति को सुनकर यहाँ आया हूँ ॥ ४४ ॥ हे मुने! इन दोनों की कीर्ति आगे और अद्भुत होगी । हे मुने! तुम्हारा महान् भाग्य है, जो तुम्हें इस प्रकार के पुत्रद्वय प्राप्त हुए हैं ॥ ४५ ॥ इन्हें देखकर दूसरे लोगों का मन आनन्दित हो जाता है, तो स्वजनों का क्या कहना ! नारदजी द्वारा कहे गये ऐसे मंगलमय वचन को सुनकर तब वे दोनों – माता-पिता उन नारदमुनि को नमनकर बोले — ‘ [ हे मुनिश्रेष्ठ ! ] अब आपकी कृपा से इन दोनों पुत्रों को दीर्घायु की प्राप्ति हो । आप ऐसा अनुग्रह करें, जिससे ये दोनों पराक्रमी, लोक में प्रसिद्ध, सर्वज्ञ और शत्रुओं का दमन करने वाले हों’ ॥ ४६-४८ ॥

ब्रह्माजी बोले — रौद्रकेतु, शारदा और उनके दोनों पुत्रों की भक्ति को देखकर नारदजी ने उन दोनों बालकों को पंचाक्षरी महाविद्या का उपदेश किया ॥ ४९ ॥ उन्होंने कहा कि हे पुत्रो ! इससे तुम कामदेव के शत्रु भगवान् शिव को सम्यक् रूप से प्रसन्न करो तथा उनके सिर पर अपना अभयहस्त रखकर [ पंचाक्षरी महाविद्या के] अनुष्ठान का आदेश दिया । हे ब्रह्मन् ! तब रौद्रकेतु से ऐसा कहकर और उससे विदा लेकर दिव्यदर्शन महामुनि नारद अन्तर्धान हो गये ॥ ५०-५१ ॥ मुनि के अन्तर्धान हो जाने पर दोनों पुत्रों ने प्रसन्नतापूर्वक माता-पिता से कहा कि आप दोनों हम दोनों को अनुष्ठान के लिये आज्ञा प्रदान करें ॥ ५२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत क्रीडाखण्ड में ‘नारदोपदेश’ नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥

श्रीगणेशपुराणे क्रीडाखण्डे प्रथमोऽध्यायः
नारदोपदेशो

॥ मुनय ऊचुः ॥
सम्यगाख्यानमाख्यातं त्वया सूत महामते ।
सादरं श्रुतमस्माभिर्न च तृप्तिं गता वयम् ॥ १ ॥
यथा न तृप्यते जन्तुरन्नमश्नन् दिने दिने ।
अन्यत् कथान्तरं ब्रूहि येन तृप्यामहे वयम् ॥ २ ॥
॥ सूत उवाच ॥
उक्तं चोपासनाखण्डं क्रीडाखण्डं वदामि वः ।
यथा कृतं गणेशेन नानादैत्यविहिंसनम् ॥ ३ ॥
साधुद्विजगवां चैव पालनं परमादरात् ।
तदहं सम्प्रवक्ष्यामि श्रूयतां स्थिरचेतसा ॥ ४ ॥
॥ मुनय ऊचुः ॥
यावद् यावत् कथ्यते तत् पुराणं तावत् तावद् वर्द्धते श्रोतुमिच्छा ।
तस्मात् सम्यक् कथ्यतां सर्वलोकः संसाराब्धेर्येन सद्यः प्रमुच्येत् ॥ ५ ॥
॥ सूत उवाच ॥
यदुक्तं ब्रह्मणा पूर्वं व्यासायामिततेजसे ।
भृगुणा सोमकान्ताय तदेतद् वो ब्रवीम्यहम् ॥ ६ ॥
॥ व्यास उवाच ॥
पद्मयोने वद विभो गणेशचरितं शुभम् ।
यद् यद् रूपं समास्थाय यद्यच्च कृतवान् विभुः ॥ ७ ॥
कृपावता त्वया ब्रह्मन् ममवाक्यादुदीर्यताम् ।
उपासनाखण्डमिदं श्रुत्वा तृप्तिं न यामि च ॥ ८ ॥
येन येनवतारेण यं यं दैत्यं महाबलम् ।
अहनद् विकटस्तत्तत् कर्मास्य वक्तुमर्हसि ॥ ९ ॥
तदीयं बालचरितं लीला नानाविधा अपि ।
श्रुत्वा त्वद् वदनाम्भोजान् मनो निर्वृतिमेष्यति ॥ १० ॥
॥ सूत उवाच ॥
श्रुत्वा नानाविधान् प्रश्नानुवाच कमलासनः ।
कथां नानाविधां दिव्यां व्यासाय परिपृच्छते ॥ ११ ॥
॥ ब्रह्मोवाच ॥
साधु पृष्टं त्वया व्यास हृदयानन्दकारिणा ।
वक्तुर्विवर्धते प्रीतिः सादरे श्रोतरि प्रभो ॥ १२ ॥
अवाच्यमपि वक्तुं मे पुण्यश्लोके भवेत् त्वयि ।
शक्तिर्गरीयसी यद्वद् वक्तुः श्रोतरि कथ्यताम् ॥ १३ ॥
इदानीं सर्वमाख्यासे गणेशचरितं तव ।
नानावतारान् कृत्वा स भूभारं हृतवान् विभुः ॥ १४ ॥
हत्वा नानाविधान् दैत्यान् स्वस्थानेऽस्थापयनत् सुरान् ।
साधूनां पालनरतो दुष्ट निर्मूलनक्षमः ॥ १५ ॥
इतिहासं श‍ृण मुने गणेशाख्यानसंश्रयम् ।
विष्टरश्रवसा प्रोक्तं श्रवणात् सर्व कामदम् ॥ १६ ॥
॥ विष्णुरुवाच ॥
युगे युगे भिन्ननामा गणेशो भिन्नवाहनः ।
भिन्नकर्मा भिन्नगुणो भिन्नदैत्यापहारकः ॥ १७ ॥
सिंहारुढो दशभुजो कृते नाम्ना विनायकः ।
तेजोरुपी महाकायः सर्वेषां वरदो वशी ॥ १८ ॥
त्रेतायुगे बर्हिरुढः षड्भूजोऽप्यर्जुनच्छविः ।
मयूरेश्वरनाम्ना च विख्यातो भुवनत्रये ॥ १९ ॥
द्वापरे रक्तवर्णोऽसावाखुरूढश्चतुर्भुजः ।
गजानन इतिख्यातः पूजितः सूरमानवैः ॥ २० ॥
कलौ तु धूम्रवर्णोऽसावश्वारूढो द्विहस्तवान् ।
धूम्रकेतुरिति ख्यातो म्लेच्छानीकविनाशकृत् ॥ २१ ॥
यं यं स दैत्यं हन्ति स्म तदिदानीं ब्रुवे मुने ।
अङ्गदेशीयनगरे रौद्रकेतुरभूद् द्विजः ॥ २२ ॥
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो वेदवेदाङ्गपारगः ।
समो जीवेष्वग्निहोत्री सुरगोद्विपूजकः ॥ २३ ॥
ईश्वरोपासको नित्यं सर्वागमविशारदः ।
यस्य पत्नी शारदाख्या रूपलावण्यशोभिता ॥ २४ ॥
ईदृशी नाप्सरोमध्ये नाष्टासु नायिकास्वपि ।
यद्वक्त्रनिर्जितश्चन्द्रश्चिन्तया क्षयमीयिवान् ॥ २५ ॥
अनेकदिव्याभरणैर्भासयन्ती धरातलम् ।
यथा नक्षत्रमालाभिर्भासते व्योममण्डलम् ॥ २६ ॥
कदाचित् सा गर्भवती शारदोत्पललोचना ।
शारदा शारदे मासि शरच्चन्द्रसुशोभिते ॥ २७ ॥
शरीरतेजसा यस्या न प्राज्ञायत किञ्चन ।
दोहदान्पूरयत्येष यं यं साऽकामयत् सती ॥ २८ ॥
एवं सा नवमे मासि यमलौ सुषुवे सुतौ ।
अतिकान्ततरौ स्वान्तनन्दनावुभयोरुभौ ॥ २९ ॥
अजानुबाहू दीर्घाक्षौ दृष्ट्वा प्रोवाच तत्पिता ।
अद्याहमनृणो जातो धन्यमद्य तपो मम ॥ ३० ॥
वंशो धन्यो जनुर्धन्यं यत्पुत्रौ विक्षितौ मया ।
अर्घ्याद्यैर्द्विजवर्यान् स सम्पूज्य च गणाधिपम् ॥ ३१ ॥
स्वस्तिवाच्यं चकराशु मातृपूजनपूर्वकम् ।
भक्त्याऽऽभ्युदयिकं श्राद्धं जातकर्माऽकरोद् द्विजैः ॥ ३२ ॥
सम्पूज्य ब्राह्मणान्भक्त्या ददौ दानान्यनेकशः ।
सुहृदो मानयामास वासोरत्नधनादिभिः ॥ ३३ ॥
नानावादित्रनिर्घोषैः शर्करां च गृहे गृहे ।
दापयामास ताम्बूलं पुत्रजन्मसु निर्वृतः ॥ ३४ ॥
यथा धान्यपरो योगी प्राप्य सद्वस्त्वनुत्तमम् ।
ततो दशाहेऽतीतेऽसावाकार्य द्विजपुङ्गवान् ॥ ३५ ॥
समर्च्य परया भक्त्या ज्योतिःशास्त्रविशारदान् ।
पप्रच्छ चैतयोर्नाम किं कार्यं द्विजसत्तमाः ॥ ३६ ॥
अतीतानागतज्ञानाद् विचार्य कथयन्तु मे ।
ते चोचुः प्रणिधानेन देवान्तकनरान्तकौ ॥ ३७ ॥
नामनी ह्यनयोब्रह्मन्नन्वर्थे कुरू नो मते ।
इति तद्वचनं श्रुत्वा द्विजभक्तिरतो द्विजः ॥ ३८ ॥
स्वशाखोक्तेन विधिना नामनी विदधे तथा ।
ब्राह्मणान् भोजयामास सर्वाश्च नागरांस्तथा ॥ ३९ ॥
ववृधाते ततस्तौ तु मेरूमन्दारसन्निभौ ।
यथा कच्छाश्रितौ तालौ यथा वंशाङ्कुरौ बलात् ॥ ४० ॥
यत्र यत्र पदन्यासं कुर्वाते तौ यदृच्छया ।
रसातलगतस्यात्र शेषस्य नमते शिरः ॥ ४१ ॥
दृश्यते मण्डलं भानोस्तिष्ठतोः शिरसि स्थितम् ।
पित्रोः प्रदर्शयन्तौ तौ कौतुकानि भृशं तयोः ॥ ४२ ॥
कदाचिन्नारदोऽकस्माद् रौद्रकेतुगृहं ययौ ।
श्रुत्वा कीर्तिं बालकयोः कौतुकादग्रहीत्तु तौ ॥ ४३ ॥
मूर्ध्न्याङ्घ्रायाङ्कमारोप्य पितराववदत् तयोः ।
॥  नारद उवाच ॥
श्रुत्वा कीर्तिं समायातः पुत्रयोरद्भुतां शुभाम् ॥ ४४ ॥
अग्रेऽद्भुततरा चापि भविष्यत्यनयोर्मुने ।
महद्भाग्यं तव मुने यल्लब्धावीदृशौ सुतौ ॥ ४५ ॥
दृष्ट्वाऽन्यो हर्षमायाति का वार्त्ता स्वजनस्य ह ।
इत्याकर्ण्य शुभं वाक्यं नारदेन समीरितम् ॥ ४६ ॥
तावाहतुर्मुनिं नत्वा पितरौ नारदं तदा ।
तव प्रसादाद् बह्वायुः पुत्रयोरस्तु साम्प्रतम् ॥ ४७ ॥
अनुग्रहं कुरु तथा यथैतौ वीर्यवत्तरौ ।
भवेतां लोकविख्यातौ सर्वज्ञौ रिपुदण्डिनौ ॥ ४८ ॥
॥ ब्रह्मोवाच ॥
रुद्रकेतोः शारदायाः पुत्रयोर्भक्तिमीक्ष्य सः ।
पञ्चाक्षरीं महाविद्यामुभयोरूपदिष्टवान् ॥ ४९ ॥
उवाच पुत्रौ कामारिरनया सम्प्रसाद्यताम् ।
मस्तकेऽभय हस्तं च स्थाप्यानुष्ठानमादिशत् ॥ ५० ॥
एवमुक्त्वा तमामन्त्र्य रौद्रकेतुं महामुनिः ।
ततस्त्वन्तर्दधे ब्रह्मन् नारदो दिव्यदर्शनः ॥ ५१ ॥
अन्तर्हिते मुनौ तौ चावदतां पितरौ मुदा ।
अनुष्ठानाय नावाज्ञां भवद्भ्यां सम्प्रदीयताम् ॥ ५२ ॥
॥ इति श्रीगणेशपुराणे क्रीडाखण्डे नारदोपदेशो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

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