November 10, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-104 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ चारवाँ अध्याय ब्रह्माजी द्वारा मयूरेश की स्तुति, स्तुति का माहात्म्य, ‘कमण्डलुभवा’ नामक नदी का प्राकट्य, मयूरेश की माया से ब्रह्मा का मोहित होना, मयूरेश की परीक्षा के लिये ब्रह्मा द्वारा सृष्टि का तिरोधान, मयूरेश द्वारा पुनः सृष्टि कर लेना और ब्रह्माजी को अपने विश्वरूप का दर्शन कराना अथः चतुरधिकशततमोऽध्यायः विश्वरूपदर्शनं ब्रह्माजी बोले — हे द्विजश्रेष्ठ व्यासजी ! मैं भी गुप्तरूप से उन मयूरेश्वर का दर्शन करने गया था, वहाँ मैंने पार्वती के साथ उन प्रभु मयूरेश्वर का दर्शन किया ॥ १ ॥ वे स्नान करने के अनन्तर आसन पर बैठे हुए थे और सनातन परब्रह्म (गायत्रीमन्त्र) – का जप कर रहे थे। तब मैंने उन मयूरेश्वर नाम वाले देव की स्तुति की ॥ २ ॥ ॥ श्री मयूरेश्वर स्तोत्र ॥ ॥ ब्रह्मोवाच ॥ पुराणपुरुषं देवं नाना क्रीडाकरं मुदा । मायाविनं दुर्विभाव्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ३ ॥ परात्परं चिदानन्दं निर्विकारं हृदि स्थितम् । गुणातीतं गुणमयं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ४ ॥ सृजन्तं पालयन्तं च संहरन्तं निजेच्छया । सर्वविघ्नहरं देवं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ५ ॥ इन्द्रादिदेवतावृन्दैरभिष्टुतमहर्निशम् । सदसद्व्यक्तमव्यक्तं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ६ ॥ नानादैत्यनिहन्तारं नानारूपाणि बिभ्रतम् । नानायुधधरं भक्त्या मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ०७ ॥ सर्वशक्तिमयं देवं सर्वरूपधरं विभुम् । सर्वविद्या प्रवक्तारं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ८ ॥ पार्वतीनन्दनं शम्भोरानन्दपरिवर्धनम् । भक्तानन्दकरं नित्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ९ ॥ मुनिध्येयं मुनीनुतं मुनिकामप्रपूरकम् । समष्टिव्यष्टिरूपं त्वां मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ १० ॥ सर्वाऽज्ञाननिहन्तारं सर्वज्ञानकरं शुचिम् । सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ ११ ॥ अनेककोटिब्रह्मांण्डनायकं जगदीश्वरम् । अनन्तविभवं विष्णु मयूरेशं नमाम्यहम् ॥ १२ ॥ त्वद्दर्शनेन पूतोऽहं परमानन्दनिर्भरः । आश्चर्यं परमं प्राप्तस्तस्य दैत्यस्य मारणात् ॥ १३ ॥ जो पुराणपुरुष हैं, प्रसन्नतापूर्वक नाना प्रकार की क्रीडाएँ करते हैं, अनेक प्रकार की माया रचने वाले हैं और सर्वथा अचिन्त्य हैं, उन देव मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ। जो पर से भी परे हैं, चिदानन्दस्वरूप हैं, निर्विकार हैं, भक्तजनों के हृदय में निवास करनेवाले हैं, गुणातीत हैं, और गुणमय हैं, उन मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३-४ ॥ जो अपनी इच्छा के अनुसार इस जगत् की सृष्टि करते हैं, उसका पालन-पोषण करते हैं और पुनः उसका संहार भी कर डालते हैं, उन सब प्रकार के विघ्नों का नाश करने वाले देव मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५ ॥ जो इन्द्र आदि देवताओं के द्वारा रात-दिन वन्दित होते रहते हैं, जो सत् तथा असत् रूप हैं और व्यक्त तथा अव्यक्त हैं, उन मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ६ ॥ जो अनेकों दैत्यों का वध करने वाले हैं, विविध प्रकार के स्वरूपों को धारण करने वाले हैं और नाना प्रकार के आयुधों को धारण करते हैं, उन मयूरेश को मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ ॥ ७ ॥ जो सभी प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न हैं, सभी रूपों में अभिव्यक्त हैं, सब प्रकार से समर्थ हैं और सभी विद्याओं के उपदेष्टा हैं, उन देव मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ। जो माता पार्वती के पुत्र हैं, भगवान् शंकर के आनन्द की अभिवृद्धि करने वाले हैं और भक्तों को आनन्द प्रदान करनेवाले हैं तथा नित्य हैं, उन मयूरेश्वर को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ८-९ ॥ जो मुनियों के द्वारा ध्येय हैं, मुनियों के द्वारा वन्दित हैं, मुनिजनों की कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं, ऐसे उन आप समष्टि-व्यष्टिरूप मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ। जो सभी प्रकार के अज्ञान का निवारण करने वाले हैं, सभी प्रकार का ज्ञान प्रदान करने वाले हैं, सर्वथा पवित्र हैं, सत्य एवं ज्ञानमय हैं तथा सत्यस्वरूप हैं, उन मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १०-११ ॥ जो अनेकों करोड़ ब्रह्माण्डों के अधिनायक हैं, जगत् के ईश्वर हैं, अनन्त विभवस्वरूप हैं और विष्णुरूप हैं, उन मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १२ ॥ [हे देव!] आपका दर्शन प्राप्त कर मैं सर्वथा पवित्र हो गया हूँ और परमानन्द में निमग्न हो गया हूँ । आपके द्वारा उस कमलासुर नामक दैत्य के मारे जाने पर मैं परम आश्चर्यान्वित हो गया हूँ ॥ १३ ॥ जिस दैत्य कमलासुर ने देवराज इन्द्र, यमराज, सभी देवता और लोकपालों को बलपूर्वक जीत लिया था, जो हजारों, सैकड़ों वीरों से एक साथ युद्ध करने वाला तथा असंख्य देह धारण करने वाला था, उसे आपने युद्ध में मार गिराया है, और वह कमलासुर तीन टुकड़ों में विभक्त होकर तीन अलग-अलग स्थानों पर गिरा है ॥ १४१/२ ॥ ऐसा कहकर उन मयूरेश का मैंने पूजन किया। मैंने अपने कमण्डलु में स्थित सभी तीर्थों के पापनाशक एवं पवित्र जलों से उनका अभिषेक किया। दिव्य दो वस्त्रों को धारण कराया, दिव्य गन्ध का अनुलेपन किया, अत्यन्त शुभ दिव्य पुष्पों से निर्मित वनमाला उनके कण्ठ में पहनायी और सब प्रकार के मंगलों का जनक ‘वनमाली’ यह सभी लोकों में विख्यात नाम मैंने उनका रखा ॥ १५–१७ ॥ इस प्रकार से पूजा की विधि सम्पन्न करने के अनन्तर मैंने उनकी प्रदक्षिणा की। प्रदक्षिणा करते समय मेरे चरणों की ठोकर लगने से वहाँ पर जो कमण्डलु था और जो नाना तीर्थों के जल से पूर्ण था, एकाएक उलट गया। मैं उस जल को कमण्डलु में भरने का प्रयत्न करने लगा, किंतु तभी वे प्रभु मयूरेश मुझसे बोले — ॥ १८-१९ ॥ मयूरेश बोले — ब्रह्माजी द्वारा किया गया यह स्तोत्र सभी प्रकार के पापों का नाश करने वाला है। यह मनुष्यों की सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला और सभी प्रकार उपद्रवों को विनष्ट करने वाला है ॥ २० ॥ हे ब्रह्मा! इस स्तोत्र का पाठ कारागृह में गये बन्दीजनों को सात दिन में मुक्त कर देता है । यह स्तोत्र सभी शारीरिक तथा मानसिक व्याधियों को दूर करने वाला तथा भोग और मोक्ष को प्रदान करने वाला है ॥ २१ ॥ हे ब्रह्मन्! आप निश्चिन्त हो जायँ, [आपके कमण्डलु से निर्गत] यह (जलधारा) सभी को पवित्र करने वाली और लोक में ‘कमण्डलुभवा’ इस नाम से विख्यात नदी होगी ॥ २२ ॥ यह नदी अपने दर्शन से वाचिक पापों को, स्पर्श करने से मानस पापों को तथा इसमें स्नान करने से यह सभी प्रकार के शारीरिक पापों का विनाश करने वाली होगी। यह नदी निरन्तर सेवित होने पर मोक्ष प्रदान करेगी ॥ २३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — उन मयूरेश के द्वारा इस प्रकार का वरदान दिये जाने पर उन सभी मुनीश्वरों ने अपनी पत्नियों तथा परिवार के साथ, सात करोड़ गणों ने तथा स्वयं मैंने [भी] उस कमण्डलुभवा नामक नदी में स्नान किया। साथ ही उन मुनियों ने मेरे साथ वहाँ पर तप किया ॥ २४-२५ ॥ तदनन्तर मैं उन मयूरेश की माया से मोहित हो गया और तब मैंने बहुत जनों से कहा — मैं तो जगत् की सृष्टि करने वाला, जगत् के द्वारा वन्दनीय तथा इन्द्र आदि सभी देवताओं द्वारा पूजित हूँ, फिर मैंने ग्यारह वर्ष के उस बालक को क्यों प्रणाम किया? वह तो अन्य बालकों के साथ क्रीडा कर रहा था और आचार-विचार से रहित एक बालक था ॥ २६-२७ ॥ मेरे ज्ञान को धिक्कार है, मेरी महिमा को धिक्कार है और मेरे पितामहपद को भी धिक्कार है! अब मैं अपने बनाये इस सृष्टि-प्रपंच को छिपाकर स्वयं भी गोपनीय रूप से रहूँगा ॥ २८ ॥ यदि यह मयूरेश परमात्मा होगा तो पुनः दूसरी सृष्टि कर लेगा – ऐसा मन में निश्चय करके मैंने अपनी सृष्टि को तथा स्वयं अपने को भी अन्तर्धान कर लिया, फिर जब गजानन ने अपने मित्र बालकों को वहाँ नहीं देखा, तो वे उनके घरों में उन्हें देखने गये ॥ २९-३० ॥ किंतु उन सभी घरों को लोगों से रहित देखकर वे खिन्न हो उठे और उन्होंने जब वृक्षों की ओर देखा तो वहाँ वृक्षों को भी नहीं देखा, न जन्तुओं को देखा और न पशु-पक्षियों को ही देखा। फिर जब वे मयूरेश स्वर्गलोक गये तो उन्होंने वहाँ उन देवताओं को भी नहीं देखा । न तो गन्धर्व दिखायी पड़े और न किन्नर, यक्ष तथा पितृगण । सूर्य, चन्द्रमा भी नहीं दिखायी पड़े ॥ ३१-३२ ॥ उस समय अत्यन्त घना अन्धकार छा जाने के कारण कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था । तदनन्तर जब उन्होंने ध्यान लगाकर देखा तो उन्हें यह सब [मुझ] ब्रह्मा द्वारा किया गया है, ऐसा ज्ञात हुआ ॥ ३३ ॥ तदनन्तर अखिल जगत् के आत्मरूप देव मयूरेश्वर ने अपने सामर्थ्य और अपनी माया को प्रकट किया, फिर उन्होंने अपनी लीला से एक दूसरे ही ब्रह्माण्ड की संरचना कर डाली । तब प्रभु मयूरेश ने उस ब्रह्माण्ड में स्थावर-जंगमात्मक विश्व तथा सम्पूर्ण त्रैलोक्य और मयूरेश की पुरी को, जैसे पहले था, उसी रूप में दिखलाया ॥ ३४-३५ ॥ उन विभु मयूरेश ने बालकों से घिरे हुए स्वयं अपने को, वैसे ही दूसरे ब्रह्माजी को, शंकर-पार्वती तथा उसी प्रकार से तपस्यानुष्ठान में निरत मुनियों, सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह-नक्षत्रों, अनेक स्वर्गों, देवगणों, पृथिवी, सब प्रकार के वृक्षों, समुद्रों, नदियों तथा पातालों को भी पहले के समान ही दिखलाया ॥ ३६-३७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — [हे व्यासजी !] तब उन चिदात्मा मयूरेश का दर्शन कर मुझे स्मृति प्राप्त हुई। उन मयूरेश्वर के द्वारा इस प्रकार से अन्य सृष्टि की संरचना देखकर तुच्छ बुद्धि का परित्याग करके मैंने उन्हें प्रणाम किया और उनसे क्षमा-याचना की ॥ ३८१/२ ॥ उस समय मैंने कला, काष्ठा, मुहूर्त आदि और दिन, पक्ष, मास, ऋतु, वर्ष, कल्प आदि समयरूपी स्वरूप धारण करने वाले तथा चराचर स्वरूप वाले और असंख्य ब्रह्माण्डों को अपने रोमकूपों में धारण करके सुशोभित होने वाले, देवता, ऋषि, यक्ष, गन्धर्व, सरित् एवं सागरस्वरूपी, मनुष्य, किन्नर, लता, वृक्ष और नाग स्वरूप वाले उन विश्वरूप मयूरेश्वर का इस प्रकार दर्शन करके उदात्त बुद्धि वाला होकर उन्हें प्रणाम किया और उनसे क्षमायाचना की ॥ ३९-४११/२ ॥ मैंने उन मयूरेश का बार-बार दर्शन किया। उस समय वे मुकुट धारण किये हुए थे, कानों में कुण्डल, पैरों में नूपुर तथा बाहुओं में बाजूबन्द धारणकर सुशोभित हो रहे थे। उनकी नाभि में शेषनाग, कण्ठदेश में वासुकि सर्प विराजमान था। वे दिव्य मालाओं और वस्त्रों को धारण किये हुए थे ॥ ४२-४३ ॥ वे मयूरेश दिव्य सिंहासन पर विराजमान थे, सभी देवता उनकी स्तुति कर रहे थे, वे सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो पत्नियों से समन्वित थे। अणिमादि अष्ट सिद्धियाँ तथा नौ निधियाँ उनकी सेवामें उपस्थित थीं ॥ ४४ ॥ समग्र चराचर जगत् को मैंने मयूरेश के रूप में देखा। [जगत् के] प्रत्येक पदार्थ और स्वयं अपने-आपका भी मैंने मयूरेश के ही रूप में अवलोकन किया ॥ ४५ ॥ तदनन्तर मैंने उन मयूरेश्वर को प्रणाम किया, बार- बार उनकी स्तुति-प्रार्थना की और कहा — हे देव ! आपकी माया से मोहित होकर अभिमान के वशीभूत हुए तथा आपके प्रभाव को देखने की इच्छा वाले, मुझ दीन तथा शरण में आये हुए-के अपराध को आप क्षमा करने की कृपा करें। क्षणभर में ही अनन्त ब्रह्माण्डों की संरचना करने वाले आप परमात्मा को बार-बार नमस्कार है ॥ ४६-४७ ॥ मैं इस प्रकार कह ही रहा था कि उन्होंने अपनी नासिका से श्वास लेते हुए उस श्वास-वायु के साथ मुझे अपने उदर में प्रविष्ट करा दिया। वहाँ भी मैंने वैसे ही सम्पूर्ण विश्व को देखा, जैसा कि मैंने बाहर देखा था ॥ ४८ ॥ उनके वहाँ मैंने उन देव मयूरेश्वर को भी उसी रूप में देखा, एक-एक रोमकूप में करोड़ों-करोड़ ब्रह्माण्ड स्थित थे। सम्पूर्ण चराचर विश्व को भी उसी रूप में देखा, जैसा कि वह भूमि में था और जैसा द्युलोक में था ॥ ४९ ॥ उनके उदर में स्थित मैं ऐसे ही जब एक ब्रह्माण्ड से दूसरे ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट हुआ तो वहाँ भी मैंने सम्पूर्ण चराचर जगत् को उसी रूप में देखा। इसी प्रकार अनेकों ब्रह्माण्डों में प्रविष्ट होने पर मैंने वहाँ भी सम्पूर्ण विश्व को देखा, स्वयं अपने को भी देखा और देवदेव मयूरेश को भी देखा। तब अत्यन्त खिन्न हुआ मैं उन देवेश्वर से बोला — मैं कहीं भी आपका अन्त नहीं देख रहा हूँ । हे प्रभो! मुझ पर कृपा कीजिये, आप अपनी इस माया को समेट लीजिये। तदनन्तर करुणा के वशीभूत हुए उन देव मयूरेश ने क्षणभर में ही अपनी सम्पूर्ण माया का तिरोधान कर लिया ॥ ५०-५२ ॥ तब मैंने मयूरेश को पूर्व की भाँति देखा, वे बालकों से घिरे हुए थे और क्रीडा कर रहे थे। मैं उन्हें प्रणामकर बोला — मैं आपकी माया को जान नहीं पाया ॥ ५३ ॥ जैसे माता अपने बच्चे के हजारों अपराधों को क्षमा कर देती है, वैसे ही आप भी माता के समान मेरे हजारों अपराधों को क्षमा कर दें। तब मयूरेश मेरे सिर पर हाथ रखकर मुझसे बोले —॥ ५४ ॥ देव बोले — मुझमें न क्रोध है और न किसी के प्रति भेदबुद्धि ही है, यह अपना है, यह पराया है – ऐसा भ्रम भी मुझमें नहीं है। मुझे किसी से भी किंचित् भय नहीं है और न मुझसे ही किसी को अणुमात्र भय होना चाहिये ॥ ५५ ॥ ब्रह्माजी बोले — उनके इस प्रकार के वचन सुनकर मैंने मयूरेशपुर में स्थित भगवान् शिव को, माता पार्वती को और मुनिबालकों के साथ पार्वतीपुत्र मयूरेश को देखा ॥ ५६ ॥ उनसे अनुमति लेकर मैं अत्यन्त आनन्दित होता हुआ अपने स्थान को चला आया। पार्वती बालक मयूरेश को लेकर अपने स्थान पर चली गयीं और वे मुनिबालक भी अपने-अपने आश्रमों को चले गये ॥ ५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘विश्वरूपदर्शन’ नामक एक सौ चारवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १०४ ॥ Content is available only for registered users. 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