November 14, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-112 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ बारहवाँ अध्याय मयूरेश का गणों की सेना के साथ सिन्धुदैत्य पर आक्रमण करने के लिये प्रस्थान, गणों द्वारा दैत्य सिन्धु की सेना पर आक्रमण, पराजित हो सिन्धुसेना का पलायन, क्रुद्ध दैत्य सिन्धु का स्वयं भी युद्ध के लिये प्रस्थान अथः द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः मयूरेशस्य युद्धाय निश्चयः ब्रह्माजी बोले — दूसरे दिन की बात है, मयूरेश अपने वाहन मोर पर आरूढ़ होकर अपने चारों करकमलों में चारों आयुधों को धारणकर मेघ के समान गम्भीर, भीषण गर्जना करने लगे और युद्ध करने की इच्छा से निकल पड़े। तभी भगवान् शिव भी वृषभ पर आरूढ़ होकर गर्जना करते हुए सहसा निकल गये ॥ १-२ ॥ उनके पीछे-पीछे सात करोड़ गण युद्धके लिये सुसज्जित होकर बड़े वेगसे चल पड़े। तब नन्दीश्वर बोले कि गणों के नायक वीरभद्र के रहते हुए, मुझ नन्दी के होते हुए और देवशत्रु असुरों का विनाश करने में समर्थ प्रमथगणों के रहते हुए एकाएक आप लोगों को उस सिन्धुदैत्य को मारने के लिये वहाँ नहीं जाना चाहिये । एक दिन सेवकों का पराक्रम देख लें, तदनन्तर ही युद्ध के लिये जायँ ॥ ३-४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — नन्दीश्वर की कही गयी इस प्रकार की वाणी सुनकर देव मयूरेश्वर बड़ी ही प्रसन्नता से कहने लगे — अच्छी बात कही है, बहुत अच्छी बात कही है। पहले अत्यन्त बलशाली दैत्य सिन्धु के बल- पराक्रम को परख लेना चाहिये ॥ ५-६ ॥ हे नन्दी! मैं आगे-आगे चलता हूँ, आप सब लोग पीछे-पीछे मेरे साथ चलें। तदनन्तर भूतराज, अत्यन्त वीर्यशाली, पुष्पदन्त और कोटि-कोटि संख्या में गण उन मयूरेश्वर के आगे-आगे चलने लगे। वे सभी गण बलरूपी लक्ष्मी से सम्पन्न, देदीप्यमान, वीर और मदोन्मत्त थे ॥ ७-८ ॥ वे सभी दिशाओं के अन्त तक सर्वत्र सबको आक्रान्त करते हुए, मेघ के समान अत्यन्त गम्भीर गर्जना करते हुए तथा अपने भार से धरती को धारण करने वाले शेषनाग के फणों को तथा पृथ्वी को भी झुकाते हुए जा रहे थे ॥ ९ ॥ क्रोधरूपी अग्नि को उगलते हुए वे सभी वीर उस गण्डकीपुरी में पहुँचे और दस करोड़ असुरों से समन्वित दैत्यों के गुल्म (सीमावर्ती चौकी) – पर टूट पड़े ॥ १० ॥ तदनन्तर दोनों पक्षों में अस्त्र-शस्त्रों से, बाणसमूहों से, भिन्दिपालों से तथा परशुओं से परस्पर अत्यन्त रोमांचकारी भीषण युद्ध होने लगा। कुछ दैत्यों के मस्तक कट गये, किसी के पैर, किसी के हाथ, किसी की ऊरु, किसी के घुटने, किसी की जाँघें और किसी के टखने कट गये। कुछ वीरों के प्राण निकल गये ॥ ११-१२ ॥ वे दैत्य युद्धभूमि में गिरकर पुनः उठ पड़ते थे और अपनी सेना के तथा शत्रुसेना के वीरों से लड़ने लगते। इस प्रकार असंख्य दैत्य गिरकर मृत्यु को प्राप्त हो गये ॥ १३ ॥ कुछ दैत्य भागकर वहाँ से निकल गये और कुछ दैत्यों ने वीर गणों से घिरे हुए तथा सभा के मध्य में बैठे हुए दैत्य सिन्धुराज को वहाँ का सम्पूर्ण समाचार बताया ॥ १४ ॥ शस्त्रों के आघात से रक्त को प्रवाहित करते हुए वे दैत्य फूले हुए पलाश के वृक्ष के समान लग रहे थे । कुछ दैत्य वहाँ आकर मृत्यु को प्राप्त हो गये और कुछ दैत्य धैर्य धारणकर दैत्यराज सिन्धु से कहने लगे — ॥ १५ ॥ नगर के द्वारदेश में स्थित सैन्यसमूह के जो दस करोड़ निशाचर थे, वे शत्रुओं से युद्ध करने के अनन्तर मृत्यु को प्राप्त हो गये हैं। पर्वतों के पंखों का छेदन करने वाले इन्द्र के साथ जब युद्ध हुआ था, तब तो हमारी विजय हुई थी, हे सिन्धुराज! आप मौन धारणकर क्यों बैठे हुए हैं, आप अपनों के हित का कार्य करें ॥ १६-१७ ॥ शत्रुओं के द्वारा नगर के उपवनों, भवनों तथा गलियों को जला दिया गया है। उठी हुई धूलिराशि के द्वारा अन्धकार छा जाने पर लगी हुई आग के प्रकाश में नगरनिवासी भाग रहे हैं। कुछ लोग भोजन करते-करते तथा कुछ सोये-सोये नगर से बाहर निकल रहे हैं। कुछ लोग अपने बालकों को लेकर भाग रहे हैं तथा कोई परोसा हुआ भोजन छोड़कर भाग रहे हैं ॥ १८-१९ ॥ हड़बड़ाहट में दौड़ते हुए किसी के वस्त्र सरक रहे थे, कोई ध्यान में निमग्न था तो कोई होम कर रहे थे। उस स्थिति में भी वे विविध प्रकार के शस्त्रों के प्रहार से मारे जा रहे थे। सभी दिशाओं में अग्नि की ज्वालाओं को देखकर पुरवासी भय से अत्यन्त व्याकुल हो गये हैं, उनको यह लग रहा है कि प्रलय उपस्थित हो गया है और सम्पूर्ण नगरी दग्ध हो रही है ॥ २०-२१ ॥ ब्रह्माजी बोले — दूतों के मुख से इस प्रकार का समाचार सुनकर दैत्यराज सिन्धु ने मुख खोलकर जँभाई ली, तब ऐसा प्रतीत हुआ कि मानो बहुत बड़े पर्वत से निकला हुआ सिंह मृगों का भक्षण कर रहा हो और अपनी क्रोधरूपी अग्नि से उद्दीप्त होकर मानो तीनों लोकों को निगल रहा हो ॥ २२ ॥ तदनन्तर वह दैत्यराज सिन्धु उन दूतों से कहने लगा — यह जो दुर्गम सेना दिखलायी पड़ रही है, इसका क्या होगा ? सिंह के आगे भला खरगोश का पराक्रम क्या कर सकेगा ? सुमेरुपर्वत को पतिंगा अथवा सियार क्या हिला सकेगा? मुझ कालरूप का वह छोटा-सा बालक मयूरेश क्या कर लेगा? ॥ २३–२४१/२ ॥ इस प्रकार कहने के अनन्तर उसने अपनी सिंहगर्जना से दसों दिशाओं तथा विदिशाओं को निनादित कर डाला ॥ २५ ॥ फिर वह सिन्धुदैत्य क्षणभर के लिये मौन धारणकर वैसे ही स्थित हो गया, जैसे कोई मुनि मौन धारणकर स्थित हो जाते हैं। तदनन्तर वीरगण दैत्यराज सिन्धु से क्रोधवश मूर्च्छित-से होकर कहने लगे। [ हे राजन्!] आप हमें आज्ञा प्रदान कीजिये, हम क्षणभर में उस मयूरेश पर विजय प्राप्त कर लेंगे। आपके प्रताप से तो हम इस समय तीनों लोकों को वश में कर लेंगे ॥ २६-२७ ॥ सिन्धु बोला — हे महान् वीरो! आप लोगों ने ठीक ही कहा । मेरा भी मन उस शत्रु को देखने के लिये उत्कण्ठित हो रहा है। अतः आप लोग उसकी सेना के साथ युद्ध करो ॥ २८ ॥ तदनन्तर वे श्रेष्ठ वीर दैत्य गर्जना करते हुए आगे बढ़े। वे संख्या में असंख्य थे, सभी वीर शस्त्रों को धारण किये हुए थे और वह सेना चतुरंगिणी थी ॥ २९ ॥ क्रोध तथा हर्ष – दोनों भावों से समन्वित वह रणोन्मत्त दैत्यराज सिन्धु अपने मुख तथा आँखों क्रोधरूपी अग्नि की वर्षा करता हुआ मन की गति के समान वेग वाले अश्व पर सवार होकर युद्ध करने के लिये रणभूमि में गया ॥ ३० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘युद्ध के लिये सिन्धु के प्रस्थान का वर्णन’ नामक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११२ ॥ Content is available only for registered users. 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