November 17, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-क्रीडाखण्ड-अध्याय-115 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ एक सौ पन्द्रहवाँ अध्याय दैत्यराज सिन्धु का सुसज्जित होकर रणभूमि के लिये प्रस्थान, सिन्धु का मयूरेश की सेना के वीरों को पराजित कर मयूरेश के साथ घोर संग्राम, मयूरेश का सर्वत्र चतुर्भुजरूप दिखाना, मोहित होकर सिन्धुदैत्य का अपने भवन में वापस आना अथः पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः सिन्धुवैरुप्यकरणं ब्रह्माजी बोले — अपनी सेना की पराजय का समाचार सुनकर दैत्यराज सिन्धु अत्यन्त चिन्तित हो उठा। उसका मुखमण्डल म्लान हो गया और वह दुःख के सागर में निमग्न हो गया । तदनन्तर सन्तप्तचित्त से वह दैत्यराज विचार करने लगा ॥ ११/२ ॥ सिन्धु बोला — यह विपरीत परिस्थिति कैसे उत्पन्न हो गयी, मैं इसे जान नहीं पा रहा हूँ। लोगों से भरे हुए ब्रह्माण्ड को क्या एक चींटी ग्रसने में समर्थ हो सकती है ? जिस मुझ सिन्धु के आगे इन्द्र आदि देवता भी एक मच्छर के समान लगते हैं, उसी सिन्धुराज की सेना को शिव के एक छोटे-से बालक ने कैसे जीत लिया ? ॥ २-३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहकर वह दैत्य सिन्धु धनुष, बाण, ढाल तथा तलवार धारण कर अश्व पर आरूढ़ हुआ और ‘उस मयूरेश को मारे बिना मैं अपना मुख नहीं दिखलाऊँगा’ यह कहकर पतिंगों के समान उड़ता हुआ रणभूमि के लिये निकल पड़ा ॥ ४-५ ॥ दसों दिशाओं तथा आकाश को निनादित करते हुए उसने अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ायी और फिर वह अग्नि के समान ज्वालायुक्त मुख वाले, अत्यन्त तीक्ष्ण बाणों की वर्षा करने लगा। उस बाणवर्षा से सम्पूर्ण पृथ्वी काँप उठी और समस्त प्राणी मूर्च्छित हो गये । उसने देवसेना पर असंख्य बाणों को चलाया ॥ ६-७ ॥ उसके शस्त्रों के आघात से पीड़ित देवता छिन्न- भिन्न होकर भूमि पर गिर पड़े। जो देवता भाग रहे थे, उनकी भी पीठों पर बाणों से प्रहार हो रहा था ॥ ८ ॥ तदनन्तर उस रणांगण में दैत्य सिन्धु के हाथों से मुक्त की गयी बाणों की वर्षा से देव मयूरेश की सम्पूर्ण सेना अत्यन्त व्याकुल हो उठी। किन्हीं के घुटने और पैरों के दो टुकड़े हो गये थे । किसी-किसी के मस्तक कट गये । इस प्रकार से दैत्यराज सिन्धु तथा देव गुणेश – दोनों की सेनाओं में वहाँ न रोका जा सकने वाला अत्यन्त भयंकर और घनघोर संग्राम हुआ ॥ ९-१०१/२ ॥ उस समय भयंकर महान् कोलाहल तथा धूल उठने के कारण अत्यन्त प्रगाढ़ अन्धकार छा जाने से दोनों पक्षों के वीर जो भी सामने पड़ रहा था, चाहे वह अपने पक्ष का हो अथवा शत्रुपक्ष का, उसे मार डाल रहे थे । देव मयूरेश के सेनानियों ने शस्त्रों के आघात के द्वारा असुरराज दैत्य की विशाल सेना को मार डाला था ॥ ११-१२ ॥ तदनन्तर दैत्य सिन्धु अपने घोड़े से उतर पड़ा और उसने वीरभद्र के पैर पकड़कर सहसा अत्यन्त वेग से उन्हें गिरा दिया। उस दैत्य सिन्धु ने महाबलवान् नन्दीश्वर के मस्तक पर प्रहार किया और तुरन्त ही तलवार के द्वारा भूतराज की कमर पर आघात किया ॥ १३-१४ ॥ पुष्पदन्त के उदर को जोर से चीर डाला और हिरण्यगर्भ की चोटी पकड़कर उसे बड़े ही वेग से घसीट डाला। इसी प्रकार उस दैत्य ने अपने बाण की चोट से श्यामल के ललाट को बींध डाला। क्रोध करते हुए उसने चपल की ठुड्डी को मरोड़ दिया तथा युद्ध में विकट को चोट पहुँचायी ॥ १५-१६ ॥ उस दैत्य ने अपने बाणों की वर्षा से लम्बकर्ण के कण्ठ को छेद डाला और रक्तलोचन के दोनों पैरों को पकड़कर उसे जमीन पर गिरा दिया ॥ १७ ॥ उसके हाथ से किसी प्रकार छूटकर सुमुख सहसा बड़े ही वेग से भाग निकला। उसने सोम को अपने लात प्रहार से रणभूमि में गिरा दिया । तलवार के प्रहार से दैत्य सिन्धु भृंगी के पेट को विदीर्ण कर डाला और बाणों से दावानल के सिर को बींध दिया ॥ १८-१९ ॥ उसने पंचानन की पीठ पर आघात किया तथा युद्ध में चपल को भी मार डाला। इस प्रकार से देवसेना के उन सभी महान् वीरों को युद्धभूमि में उस दैत्य सिन्धु ने मार गिराया। देवसेना के अन्य वीर शीघ्र ही भाग उठे । तदनन्तर वह दैत्यराज सिन्धु आगे बढ़ा और तीनों लोकों को निनादित करते हुए उसने मेघ के समान गम्भीर गर्जना की ॥ २०-२१ ॥ उसके विकराल और भयानक शरीर को देखकर विरूपाक्ष आदि सभी देवगण भाग उठे। दैत्य सिन्धु ने बाणों के समूहों से मयूरेश को अनेक बार बींध डाला । तब मुनियों के साथ गणेश ने उस युद्ध में स्वयं भी युद्ध किया । जैसे सिंह को देखकर हाथी का बच्चा काँप उठता है, वैसे ही वह दैत्य सिन्धु गुणेश को देखकर काँप उठा। तदनन्तर क्रुद्ध होता हुआ वह सिन्धु उन गुणेश्वर से कहने लगा ॥ २२-२४ ॥ सिन्धु बोला — अरे शिव के बालक! मैंने तुम्हारे बल-पराक्रम के विषय में दूर से तो बहुत सुना था, किंतु प्रत्यक्ष में तो तुम सियार के समान बलहीन दिखायी दे रहे हो । अरे मूर्ख ! मेरी हथेली के आघात से चट्टानें भी टूट जाती हैं, फिर तुम उसे कैसे सहन कर पाओगे ? तुम्हें तो अपनी माता का दूध पीकर घर के आँगन में खेल-कूद करना चाहिये ॥ २५-२६ ॥ जिसने इन्द्र आदि देवताओं को जीत रखा है, फिर उसके सामने तुम्हारी क्या गणना ? हे मूढ़! मैं तुम्हारे वध के लिये उत्सुक तो हूँ, किंतु मेरी कृपा मुझे ऐसा करने से रोक रही है। तुम्हारे कोमल अंगों को मैं अपने तीक्ष्ण बाणों से कैसे बींधूं? ॥ २७१/२ ॥ देव बोले — अरे अधम! रे पामर! मूर्खतावश तुम किसलिये बकवास कर रहे हो? यदि मैं जानता कि तुम्हारा इतना छोटा शरीर है तो मैं अवतार ही ग्रहण नहीं करता। अब क्षणभर में ही तुम लघु शरीर वाले को मैं मार डालूँगा ॥ २८-२९ ॥ अरे दुष्ट ! तुम सूर्य से प्राप्त वर के प्रभाव से दुराचरणपरायण हो गये हो, किंतु अब वरदान का वह समय पूरा हो गया है, इस समय तुम्हारी मृत्यु का समय उपस्थित हो गया है । तुम तो डींग हाँकने में ही कुशल हो, फिर इस समय कैसे मेरे साथ युद्ध करोगे ? तुम्हें मारने के लिये तथा तुम्हारे बन्धन में पड़े हुए देवताओं को छुड़ाने के लिये मैंने इस रूप में अवतार धारण किया है ॥ ३०-३१ ॥ जब अन्तिम समय आ जाता है, तो सारा पुरुषार्थ व्यर्थ हो जाता है। मेरे हाथों मारे जाने पर तुम मेरे अत्यन्त दुर्लभ महास्थान को प्राप्त करोगे ॥ ३२ ॥ सिन्धु बोला — अरे मूर्ख ! जबतक मैं तुम्हारी सुकुमार श्रेष्ठ देह को काट नहीं डालता, तभीतक तुम्हें जो बकना है, बक डालो। मरने पर तो जो जिसका भक्त होगा, वह उसके लोक को प्राप्त करेगा। इस समय व्यर्थ में ही तुम अपनी प्रशंसा मत करो ॥ ३३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार से कह करके उस महादैत्य सिन्धु ने भगवान् सूर्य का स्मरण करके अपना धनुष उठाया और उसपर प्रत्यंचा चढ़ायी, तथा एक अत्यन्त सुतीक्ष्ण बाण उसपर चढ़ाया, वह बाण शत्रु का भेदन करने वाला, अभीतक कभी न प्रकटित हुआ तथा विजय प्रदान कराने वाला था ॥ ३४-३५ ॥ उस धनुष की टंकार से तीनों लोक निनादित हो उठे । तदनन्तर उस दुष्ट सिन्धु ने बड़े ही वेग से वह बाण देव मयूरेश के ऊपर छोड़ा ॥ ३६ ॥ उस बाण ने सभी दिशाओं, विदिशाओं तथा आकाश-मण्डल को भी जला डाला। तब उसे देखकर मयूरेश ने अपना परशु छोड़ा, जो वज्र से भी अधिक कठोर, सभी शत्रुओं के अभिमान को चूर-चूर कर देने वाला और अत्यन्त श्रेष्ठ था । प्रलयकालीन अग्नि के समान देदीप्यमान उस परशु ने भी तीनों लोकों को जला डाला ॥ ३७-३८ ॥ उस परशु ने दैत्य सिन्धु के द्वारा छोड़े गये बाण को आकाश में ही खण्ड-खण्ड कर डाला और उस दैत्य को भूमि पर गिराकर उसके उस हाथ को सैकड़ों टुकड़ों में काट डाला, जो धनुष भार को सहन करने वाला और भयंकर था । तदनन्तर वह परशु दैत्य का हाथ काटकर पुनः आकाश में चला गया ॥ ३९१/२ ॥ तदनन्तर क्रुद्ध होकर दैत्य सिन्धु ने अपने शत्रु मयूरेश पर चक्र चलाया, उस चक्र ने दिशाओं को निनादित करते हुए विद्युत् की भाँति ध्वनि की, उस चक्र को आता |हुआ देखकर देव मयूरेश ने अपने तीक्ष्ण शूल को उसपर छोड़ा ॥ ४०-४१ ॥ उस शूल ने सम्पूर्ण जगत् को जला डाला था। वह उस दैत्य सिन्धु के मस्तक पर जा गिरा। वह शूल दैत्य सिन्धु के मुकुट, कान के कुण्डलों तथा कानों का छेदनकर पुनः मयूरेश के हाथों में शीघ्र ही ऐसे जा पहुँचा, जैसे कि उसे छोड़ा ही न गया हो । तदनन्तर कटे हुए कानों वाला वह महान् असुर सिन्धु क्रोधपूर्वक देव मयूरेश से बोला — तुम्हारा पराक्रम तो मैंने आज देख लिया, अब तुम्हें भी अपना पौरुष दिखलाता हूँ। इस समय मैं अपने बाण के आघात से तुम्हारी नाक को काट डालता हूँ ॥ ४२-४४ ॥ ऐसा कहकर हाथ में तलवार लेकर वह दैत्य सिन्धु गुणेश्वर की ओर दौड़ा। तब मयूरेश ने सभी ओर अपने अनेकों रूप बना लिये, जिनमें वे अपने चार हाथों में चार आयुध धारण किये हुए थे। यह देखकर वह दैत्य सिन्धु अत्यन्त विस्मय में पड़ गया और दसों दिशाओं की ओर देखने लगा ॥ ४५-४६ ॥ वह दैत्य जहाँ भी देखता, वहाँ उसे वे देव मयूरेश ही दिखायी देते, जो अपने चारों आयुधों से विभूषित थे। तब वह दैत्य सिन्धु अत्यन्त लज्जित हो गया और उसने अपने घर जाने का मन बना लिया ॥ ४७ ॥ तब भी उसने अपने सामने चार आयुध धारण किये हुए मयूरेश को देखा । फिर जब वह आँखें बन्द किये हुए जाने लगा तो उसने अपने अन्दर हृदय में उन्हीं मयूरेश को विद्यमान देखा ॥ ४८ ॥ फिर जब उसने अपनी आँखों को खोला, तो पुनः सामने मयूर पर आरूढ़ उन मयूरेश को देखा। तब भगवान् सूर्य की कृपा से दैत्य सिन्धु ने मयूरेश को अपने अन्तःकरण में विराजमान रहने वाला जाना ॥ ४९ ॥ तदनन्तर वह दैत्यराज सिन्धु युद्ध में मरने से बचे हुए उन सभी वीरों से घिरा हुआ रहकर अपने मुखकमल को आच्छादित कर युद्धस्थल से अपनी पुरी को चला गया ॥ ५० ॥ चिन्ता से अत्यन्त व्याकुल मन वाला वह दैत्यराज सिन्धु भवन में आकर अपनी शय्या पर लेट गया और वे सभी वीर भी चिन्ता से व्यथितचित्त होकर अपने-अपने घरों को चले गये ॥ ५१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के क्रीडाखण्ड में ‘सिन्धु के वैरूप्यकरण का वर्णन’ नामक एक सौ पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११५ ॥ Content is available only for registered users. 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